स्वस्थ जीवनशैली और प्राकृतिक आहार: गंभीर बीमारियों से बचाव का सही रास्ता
एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली ही हमें गंभीर बीमारियों से दूर रख सकती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में…
दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में स्थित विक्रम मेहरा का वह आलीशान बंगला बाहर से देखने वाले किसी भी इंसान के लिए सफलता और समृद्धि की एक मिसाल जैसा था। ऊंची दीवारें, मखमली लॉन, महंगी गाड़ियां और समाज में एक बड़ा नाम, सब कुछ उस घर की शोभा बढ़ाते थे। बाहर की दुनिया मानती थी कि मेहरा परिवार एक आदर्श और सुखी परिवार की जीती-जागती तस्वीर है, जहां एक बेहद कामयाब व्यवसायी पति, एक सुंदर और पूरी तरह से समर्पित पत्नी और एक प्यारा सा आठ साल का बेटा एक साथ रहते हैं। लेकिन उस घर के बड़े और नक्काशीदार लोहे के दरवाजों के भीतर की सच्चाई कुछ और ही थी, जिसे केवल वहां रहने वाली नैना ही महसूस कर सकती थी। उस घर की विशाल और ठंडी दीवारों के भीतर कोई सुकून या प्यार नहीं था, बल्कि वहां एक अजीब सी खामोशी और मानसिक दबाव का पहरा रहता था। रात के ठीक ग्यारह बज चुके थे, और डाइनिंग टेबल पर तरह-तरह के पकवान पूरी तरह से ठंडे हो रहे थे। नैना अपने आठ साल के बेटे आरव को सुलाने के बाद नीचे आई थी, उसने एक खूबसूरत रेशमी साड़ी पहनी थी, माथे पर पारंपरिक सिंदूर सजाया था और गले में वही मंगलसूत्र पहना था जिसे विक्रम ने आठ साल पहले पूरी दुनिया के सामने उसके गले में बांधा था। लेकिन आज, उस मंगलसूत्र का वजन नैना को किसी लोहे की जंजीर से भी ज्यादा भारी महसूस हो रहा था। तभी मुख्य दरवाजा खुला और विक्रम मेहरा ने घर के अंदर कदम रखा, उसके चेहरे पर दिनभर की थकान से ज्यादा एक अजीब सा घमंड और आत्ममुग्धता साफ दिखाई दे रही थी। नैना ने हमेशा की तरह बिना कोई शिकायत किए या बिना कोई सवाल पूछे चुपचाप उसकी प्लेट में खाना परोसना शुरू कर दिया। विक्रम ने अपनी रेशमी टाई को थोड़ा ढीला किया और अपने महंगे स्मार्टफोन पर नजरें गड़ाए हुए बेहद रूखे स्वर में कहा कि कल नोएडा साइट पर एक बेहद जरूरी और बड़ी मीटिंग है, इसलिए उसे आने में काफी देर हो जाएगी और नैना उसका इंतजार न करे। नैना ने उसकी प्लेट को हाथ में उठाया, विक्रम के चेहरे को देखा, और अपनी जिंदगी में पहली बार एक गहरी और ठंडी सांस लेते हुए कहा कि अब वह कभी उसका इंतजार नहीं करेगी। विक्रम ने उसकी इस बात पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया और न ही उसकी तरफ आंख उठाकर देखा, क्योंकि उसे अपने मन में पूरा यकीन था कि नैना उसे छोड़कर कहीं नहीं जा सकती। शादी के बाद विक्रम ने बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत नैना की पूरी दुनिया को इस बड़े और आलीशान घर की चारदीवारी तक ही सीमित कर दिया था। उसका मानना था कि एक ऐसी महिला जिसके पास खुद की कोई आमदनी नहीं है और जो पूरी तरह से अपने पति के पैसों पर निर्भर है, वह समाज में उसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकती। विक्रम ने हाथ धोते हुए बहुत ही ठंडे और तीखे स्वर में कहा था कि जिस दिन तुम मुझे छोड़ोगी, उसी दिन अच्छी तरह समझ लेना कि इस घर की दहलीज से बिल्कुल खाली हाथ बाहर जाओगी, क्योंकि यहां जो कुछ भी मौजूद है, वह सब सिर्फ और सिर्फ मेरा है। विक्रम ने यह बात अपनी पत्नी से ऐसे कही थी जैसे वह किसी जीवनसंगिनी से नहीं, बल्कि अपने घर के किसी अदने से नौकर को नौकरी के सख्त नियम और शर्तें समझा रहा हो। वह अपने इसी अहंकार में यह भूल गया था कि समय का चक्र कभी भी घूम सकता है और भाग्य की लकीरें पलटने में देर नहीं लगती।

लेकिन नैना हमेशा से ऐसी खामोश, सहमी हुई और लाचार महिला नहीं थी। विक्रम से शादी होने से पहले वह अपने कॉलेज और कॉरपोरेट जगत की एक बेहद होनहार और बुद्धिमान अकाउंट्स विशेषज्ञ यानी चार्टर्ड अकाउंटेंट थी, जिसका दिमाग बड़ी-बड़ी कंपनियों के जटिल वित्तीय घोटालों और उलझनों को चुटकियों में सुलझा देता था। जब आरव का जन्म हुआ, तब विक्रम ने बहुत ही चालाकी और प्यार का नाटक करते हुए उसे नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। विक्रम ने उस समय बड़े-बड़े वादे करते हुए कहा था कि मेहरा परिवार की बहुएं बाहर दफ्तरों में काम करने के लिए धक्के नहीं खातीं और एक अच्छे और संस्कारी घर की मां अपने नवजात बच्चे को किसी अजनबी आया या नौकरानी के भरोसे नहीं छोड़ती। विक्रम के इन शब्दों ने नैना के भीतर की पेशेवर महिला को मार दिया और उसे एक आदर्श मां तथा एक घरेलू पत्नी के सांचे में कैद कर दिया। धीरे-धीरे, विक्रम की यह सुरक्षात्मक चिंता एक कठोर पाबंदी में बदल गई। घर के हर एक छोटे-छोटे खर्च पर सवाल उठाए जाने लगे, नैना के अपने मायके जाने पर तरह-तरह के ताने दिए जाने लगे, और हर छोटी-मोटी बहस के अंत में विक्रम का हमेशा एक ही तयशुदा वाक्य होता था कि तुम्हारे पास अपना खुद का क्या है, जो कुछ भी है वह मेरा कमाया हुआ है। लेकिन विक्रम अपने बेइंतहा अहंकार में एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक हकीकत को पूरी तरह से भुला चुका था। वह भूल गया था कि आज जिस ‘मेहरा अर्बन प्रोजेक्ट्स’ के साम्राज्य पर वह इतना घमंड करता है, उसकी असली नींव और शुरुआत नैना के स्वर्गीय पिता ओमप्रकाश शर्मा के आर्थिक सहयोग और उनके दिए गए शुरुआती निवेश से ही संभव हो पाई थी। ओमप्रकाश जी एक बहुत ही स्वाभिमानी, समझदार और दूरदर्शी इंसान थे, जिन्हें व्यापार और इंसानी फितरत की गहरी समझ थी। अपनी मृत्यु से ठीक पहले, उन्होंने विक्रम को भनक लगे बिना बहुत ही कानूनी और खामोश तरीके से अपनी कंपनी के छत्तीस प्रतिशत शेयर सीधे नैना के नाम ट्रांसफर कर दिए थे और उसे एक पुराना, भारी लोहे का बक्सा सौंपते हुए एक आखिरी और अमूल्य सीख दी थी। उन्होंने कहा था कि बेटी, इंसान अपनी मीठी बातों और बहानों से अपने काले सच को कुछ समय के लिए छिपा सकता है, लेकिन खातों के आंकड़े, वित्तीय दस्तावेज और गणित का हिसाब कभी झूठ नहीं बोलते; इसलिए जिस दिन तुम्हें अपनी जिंदगी में लगे कि पैरों के नीचे की जमीन खिसक रही है, उस दिन बिना झिझक इस पुराने बक्से को खोल लेना। नैना ने अपने पिता के उस बक्से को कई सालों तक हाथ भी नहीं लगाया था, क्योंकि वह हर मुमकिन कोशिश करके अपने इस वैवाहिक रिश्ते और अपने परिवार को बचाना चाहती थी, लेकिन विक्रम की बढ़ती हुई हरकतों और धोखे ने आखिर उसे वह बक्सा खोलने और अपनी असली ताकत को पहचानने पर मजबूर कर दिया।
इस पूरे ड्रामे की शुरुआत लगभग छह महीने पहले हुई थी, जब नैना एक सुबह विक्रम की एक पुरानी और महंगी ऊनी जैकेट को ड्राई क्लीनिंग के लिए साफ कर रही थी। तभी उसकी जेब से एक बेहद महंगे फाइव-स्टार होटल की रसीद नीचे गिर गई। उस रसीद पर दो लोगों के आलीशान कैंडल-लाइट डिनर और एक शानदार सुइट की बुकिंग का पूरा विवरण था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उस रसीद की तारीख बिल्कुल वही थी, जिस दिन विक्रम ने नैना से फोन पर कहा था कि वह एक बेहद जरूरी और आपातकालीन बिजनेस डील के सिलसिले में मुंबई जा रहा है और वहां के काम में बहुत व्यस्त है, जबकि वह रसीद मुंबई की नहीं बल्कि दिल्ली से सटे गुरुग्राम के ही एक होटल की थी। उस एक रसीद ने नैना के मन में गहरे शक के बीज बो दिए, और इसके बाद धोखे के बादल लगातार घने होते चले गए। विक्रम के फोन पर आधी रात को आने वाले अज्ञात नंबरों के कॉल्स, अचानक से उसके फोन का पासवर्ड बदल जाना, और विक्रम का नैना तथा आरव से पूरी तरह से दूरी बना लेना, यह सब इस बात का साफ इशारा था कि दाल में कुछ काला है। इसके बाद, मेहरा अर्बन प्रोजेक्ट्स की एक बड़ी दिवाली कॉरपोरेट पार्टी में नैना को अपने दिल में उठ रहे हर एक सवाल का सीधा और कड़वा जवाब मिल गया। उस पार्टी में रिया मल्होत्रा पूरे शबाब पर मौजूद थी, जो हाल ही में कंपनी की नई ब्रांड डायरेक्टर बनकर आई थी। रिया बेहद खूबसूरत, आधुनिक, महत्वाकांक्षी और तेजतर्रार महिला थी, जो अपनी प्रोफेशनल सीमाओं को लांघकर पूरी पार्टी के दौरान लगातार विक्रम के इर्द-गिर्द मंडरा रही थी। विक्रम की आंखों में रिया के लिए जो दीवानगी और आकर्षण था, वैसा खिंचाव नैना ने पिछले कई सालों से अपने लिए विक्रम की आंखों में कभी नहीं देखा था। उसी शाम, रिया मल्होत्रा ने बहुत ही शातिर और मीठे अंदाज में नैना के पास आकर उसके दिल पर सीधे शब्दों के घाव किए थे। रिया ने अपनी शैंपेन का ग्लास घुमाते हुए कहा था कि नैना जी, आपको पूरा दिन इस बड़े से घर में अकेले बैठकर बोरियत नहीं होती? देखिए ना, विक्रम और मैं दिन-रात एक करके, बिजनेस ट्रिप्स पर जाकर इस मेहरा साम्राज्य को कितनी ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं; वैसे विक्रम अक्सर दफ्तर में कहते हैं कि आपके हाथ की बनी पारंपरिक खीर बहुत लाजवाब होती है, कभी हमें भी चखाइएगा। रिया ने इन चंद शब्दों में बिना सीधे कहे नैना को उसकी सामाजिक और पारिवारिक हैसियत का अहसास करा दिया था कि वह सिर्फ एक घरेलू औरत है जिसका काम रसोई में खीर बनाना है, जबकि विक्रम की असली दुनिया और उसका बिजनेस रिया संभालती है। नैना उस समय सिर्फ मुस्कुराई थी, उसकी आंखों में न तो कोई आंसू था और न ही कोई कमजोरी, क्योंकि उसी पल उसने अपने मन में यह पक्का फैसला कर लिया था कि अब वह एक बेचारी भारतीय नारी की तरह रोएगी नहीं, बल्कि अपनी बौद्धिक क्षमता से इस धोखे का करारा जवाब देगी।

लेकिन नैना को अपना घर छोड़ने और इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर विक्रम के इस नए अफेयर ने नहीं किया था, बल्कि उसके पीछे कुछ और भी ज्यादा गहरी, अनैतिक और खतरनाक बातें थीं जो कंपनी के खातों में छिपी हुई थीं। नैना सिर्फ एक धोखा खाई हुई पत्नी नहीं थी, बल्कि वह एक पेशेवर और माहिर चार्टर्ड अकाउंटेंट भी थी, जिसका दिमाग कंपनी की बैलेंस शीट और इनवॉइस को देखते ही सच का पता लगा लेता था। मार्च के महीने में जब विक्रम एक हफ्ते के लिए विदेश दौरे पर गया हुआ था, तब नैना ने बहुत ही सावधानी और गोपनीयता से विक्रम के पर्सनल स्टडी रूम के लॉकर को खोला और कंपनी की कुछ आंतरिक वित्तीय फाइलें और डिजिटल लॉग्स की जांच शुरू की। जो सच उसके सामने आया, उसने नैना के होश उड़ा दिए। कंपनी के खातों में बहुत बड़े पैमाने पर अवैध हेरफेर और वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही थीं। एक ही निर्माण कार्य और प्रोजेक्ट के लिए तीन अलग-अलग सप्लायर्स के नाम पर फर्जी बिल बनाए गए थे। कुछ ऐसी शेल कंपनियों और वेंडर्स को करोड़ों रुपयों का नियमित भुगतान किया जा रहा था, जिनका जमीन पर कोई भौतिक वजूद ही नहीं था। जब नैना ने अपनी खोजी नजरों से उन बैंक खातों और ट्रांजैक्शन डिटेल्स को खंगाला, तो उसे साफ पता चल गया कि यह सारा पैसा अलग-अलग रास्तों से घूम-फिरकर सीधे रिया मल्होत्रा के सगे भाई की फर्जी शेल कंपनियों के खातों में जमा हो रहा था। यही नहीं, नगर निगम और सरकारी विभागों से मिलने वाले बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर ठेकों की कुल लागत को जानबूझकर कागजों पर दोगुना-तिगुना दिखाया गया था और कुछ बेहद संदिग्ध नकदी भुगतान मनीष बेदी नाम के एक कुख्यात बिचौलिया और ठेकेदार तक पहुंचाए गए थे, जो राजनीतिक गलियारों में अनुचित लेन-देन और रिश्वतखोरी के लिए बदनाम था। लेकिन नैना के पैरों तले से असली जमीन तो तब खिसकी जब उसने विक्रम के पर्सनल लैपटॉप के एक छिपे हुए फोल्डर में एक ड्राफ्ट कानूनी ईमेल और कुछ एफिडेविट देखे। विक्रम इस पूरे वित्तीय घोटाले और टैक्स चोरी की कानूनी जिम्मेदारी और सारा जोखिम कंपनी के अन्य मासूम निदेशकों और अप्रत्यक्ष रूप से नैना के स्वर्गीय पिता ओमप्रकाश शर्मा के पुराने फैमिली ट्रस्ट पर डालने की पूरी तैयारी कर चुका था। वह अंदर ही अंदर कंपनी को पूरी तरह से खोखला करके, सारा फंड विदेश ट्रांसफर करके रिया मल्होत्रा के साथ एक नई दुनिया बसाने और नैना को पूरी तरह सड़क पर लाने की साजिश रच चुका था।
इस भयंकर और कड़वे सच को जानने के बाद भी नैना ने जल्दबाजी में कोई हंगामा नहीं किया, बल्कि उसने अगले तीन महीने तक पूरी तरह से सामान्य और शांत रहकर एक गहरी खामोश तपस्या की। उसने विक्रम को जरा सी भी भनक नहीं लगने दी कि उसे उसके इस काले धंधे का पता चल चुका है। रोज रात को जब विक्रम गहरी नींद में सो रहा होता, तब नैना बहुत ही शांति से उठती और अपने पुराने पेशेवर कौशल का इस्तेमाल करते हुए कंपनी के मुख्य सर्वर से ओरिजिनल बैंक स्टेटमेंट्स, इंटरनल ईमेल्स, डिलीट किए गए सर्वर लॉग्स और विक्रम तथा रिया के बीच हुई व्हाट्सएप चैट्स के डिलीटेड बैकअप्स को एक-एक करके अपनी सुरक्षित क्लाउड ड्राइव और पेन ड्राइव में सेव करती रही। वह अब वह कमजोर और बेचारी नैना नहीं थी जिसे विक्रम रोज अपनी उंगलियों पर नचाता था, बल्कि वह एक ऐसा चक्रव्यूह रच रही थी जिसमें विक्रम का बचना नामुमकिन था। इसी दौरान एक रात, जब विक्रम वाशरूम में था, उसका फोन टेबल पर बज उठा और स्क्रीन पर रिया का नाम चमक रहा था। नैना ने फोन रिसीव नहीं किया, लेकिन तभी एक प्री-रिकॉर्डेड ऑडियो मैसेज पॉप-अप हुआ जिसे सुनते ही नैना के दिल में बची-खुची दया की भावना भी हमेशा के लिए खत्म हो गई। उस ऑडियो क्लिप में रिया बहुत ही नीचता से हंसते हुए कह रही थी कि डार्लिंग विक्रम, तुम फालतू में उस घरेलू औरत की इतनी चिंता क्यों करते हो? नैना कभी भी यह घर छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली; उसके पास न तो कोई नौकरी है, न खुद का बैंक बैलेंस है और ऊपर से आरव की जिम्मेदारी भी उसी पर है; हमारे भारतीय समाज में ऐसी पारंपरिक और अनपढ़ जैसी औरतें पति का हर अत्याचार और हर धोखा चुपचाप सहती हैं, वे कभी समाज के डर से बगावत करने की सोच भी नहीं सकतीं। इसके जवाब में विक्रम की साफ आवाज गूंज रही थी कि हां रिया, तुम बिल्कुल सही कह रही हो, इसीलिए तो वह मेरे लिए सबसे सुरक्षित दांव है; उसके पास भागने या जाने की कोई जगह नहीं है, उसे सालों से मेरे दिए टुकड़ों पर ऐश करने की आदत जो हो चुकी है। उस भयानक रात नैना आरव के बिस्तर के पास बैठकर पूरी रात चुपचाप आंसू बहाती रही, लेकिन वे आंसू कमजोरी के नहीं, बल्कि उसके भीतर सुलग रही प्रतिशोध की आग के थे। उसने अपने आंसू पोंछे और तय किया कि अब वह विक्रम से कोई शिकायत या मिन्नतें नहीं करेगी, बल्कि सीधे अपनी कानूनी ताकत से उसे उसकी असली औकात दिखाएगी।
अगली सुबह, जैसे ही विक्रम अपने रूटीन के अनुसार जिम के लिए घर से बाहर निकला, नैना ने बिना एक पल गंवाए अपने पिता की सबसे पुरानी, वफादार सहयोगी और शहर की सबसे नामी और तेजतर्रार कानूनी सलाहकार काव्या सेठी को फोन मिलाया। काव्या ने इतने सालों बाद सुबह-सुबह नैना का फोन देखकर बड़ी हैरानी से पूछा कि नैना बेटा, सब ठीक तो है ना? नैना ने बहुत ही शांत और दृढ़ स्वर में कहा कि आंटी, मेरी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं है, लेकिन अब मैं सब कुछ कानूनन ठीक करने जा रही हूं। काव्या ने एक अनुभवी और वरिष्ठ वकील की तरह सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा कि क्या तुम्हारे पास विक्रम के खिलाफ सिर्फ शक है या कोई पक्के और पुख्ता कानूनी दस्तावेज भी हैं? नैना ने जवाब दिया कि आंटी, मेरे पास सिर्फ शक नहीं बल्कि कंपनी के पिछले तीन सालों का पूरा कच्चा-चिट्ठा, वित्तीय हेरफेर के सारे सबूत और पाई-पाई का हिसाब है, और साथ ही मेरे पिता के दिए छत्तीस प्रतिशत शेयर्स के ओरिजिनल डाक्यूमेंट्स भी पूरी तरह सुरक्षित हैं। काव्या सेठी फोन के दूसरी तरफ बहुत गर्व से मुस्कुराई और उसने कहा कि अगर ऐसा है नैना, तो तुम्हारे पास इस समय उस अहंकारी विक्रम मेहरा की सोच से कहीं ज्यादा कानूनी ताकत है; अब वह समय आ चुका है जब तुम्हें मेहरा साहब को यह दिखाना होगा कि एक पढ़ी-लिखी और सक्षम महिला क्या कर सकती है। उन दोनों ने मिलकर अगले कुछ दिनों में बहुत ही गुप्त तरीके से एक बेहद मजबूत और अचूक कानूनी जाल तैयार किया, जिसमें विक्रम का बचना नामुमकिन था; नैना को विक्रम से एक भी रुपया भीख में नहीं चाहिए था, वह सिर्फ अपने पिता की बनाई कंपनी और अपना खोया हुआ आत्मसम्मान पूरी तरह वापस पाना चाहती थी।
आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन भी आ गया जब नैना को अपनी इस योजना को अंजाम देना था। सुबह के ठीक आठ बजकर सैंतालीस मिनट हो रहे थे जब विक्रम हमेशा की तरह अपने चमचमाते नीले कॉरपोरेट सूट में सीढ़ियों से नीचे उतरा, उसके चेहरे पर वही पुराना मर्दाना अहंकार साफ झलक रहा था। उसने जाते हुए रूखेपन से कहा कि मैं नोएडा के बड़े प्रोजेक्ट की साइट पर जा रहा हूं, आज पूरा दिन बहुत व्यस्तता रहेगी। नैना ने हमेशा की तरह कोई बहस नहीं की और बस धीरे से अपना सिर हिला दिया। लेकिन जैसे ही विक्रम की महंगी कार घर के बड़े गेट से बाहर निकली, नैना ने तुरंत अपने फोन में मौजूद फैमिली लोकेशन ट्रैकिंग ऐप को ओपन किया। कुछ ही समय के भीतर कार का जीपीएस सिग्नल नोएडा की तरफ जाने वाले हाईवे को छोड़कर सीधे गुरुग्राम के सबसे महंगे और आलीशान ज्वेलरी शोरूम के बाहर जाकर रुक गया, जहां विक्रम अपनी प्रेमिका रिया मल्होत्रा के लिए हीरों का एक बेहद कीमती और चमचमाता हुआ हार खरीदने में मसरूफ था। इधर घर पर, ठीक ग्यारह बजकर बीस मिनट पर नैना की पहले से की गई व्यवस्था के अनुसार दो प्रोफेशनल पैकर्स और मूवर्स की गाड़ियां घर के पिछले दरवाजे से अंदर दाखिल हुईं। नैना ने बहुत ही गरिमा और ईमानदारी का परिचय देते हुए घर का एक भी कीमती सामान, सोने के जेवर, चांदी के बर्तन या कोई भी महंगा फर्नीचर हाथ तक नहीं लगाया, क्योंकि उसे विक्रम की कमाई का एक तिनका भी अपने साथ नहीं ले जाना था। उसने पैकर्स से सिर्फ और आठ साल के आरव के सारे कपड़े, उसकी जरूरी दवाइयां, उसके स्कूल के सारे प्रगति पत्रक और रिकॉर्ड्स, अपने खुद के पुराने शैक्षणिक प्रमाणपत्र, अपना पर्सनल लैपटॉप, अपना पासपोर्ट, अपने पिता की वसीयत, कंपनी के छत्तीस प्रतिशत शेयर के ओरिजिनल कानूनी दस्तावेज और वह पुराना लोहे का बक्सा गाड़ियों में लोड करवाया। दोपहर के ठीक एक बजे, नैना आरव को उसके स्कूल से छुट्टी होने से पहले ही प्रिंसिपल से विशेष अनुमति लेकर जल्दी बाहर ले आई। आरव ने अपनी बड़ी-बड़ी और मासूम आंखों से अपनी मां को देखते हुए बड़ी उत्सुकता से पूछा कि मम्मा, क्या हम लोग कहीं बाहर घूमने या छुट्टियों पर जा रहे हैं? नैना ने अपने लाडले बेटे को बड़ी शिद्दत से अपने सीने से लगाया, उसकी पेशानी को चूमा और बेहद प्यार भरे लेकिन मजबूत स्वर में कहा कि हां बेटा, हम कुछ दिनों के लिए एक बहुत ही सुंदर, शांत और नई जगह पर रहने जा रहे हैं, जहां भविष्य में तुम्हें और मुझे कोई भी इंसान कभी डरा नहीं पाएगा और न ही कोई हम पर चिल्लाएगा, हम वहां अपनी एक नई और खूबसूरत दुनिया बनाएंगे। आरव ने फिर पूछा कि क्या पापा भी हमारे साथ वहां आएंगे? नैना ने आरव की आंखों में देखते हुए बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि नहीं बेटा, आज के बाद वह कभी नहीं आएंगे।
शाम के ठीक चार बजकर सत्रह मिनट पर विक्रम मेहरा अपने चेहरे पर एक बड़ी सी कामयाबी की मुस्कान लिए घर वापस लौटा, उसके हाथ में देश के सबसे बड़े ज्वेलरी ब्रांड का एक शानदार मखमली बैग था जिसके भीतर रिया मल्होत्रा के लिए खरीदा गया हीरों का चमचमाता हार रखा हुआ था। लेकिन जैसे ही उसने अपने घर के मुख्य हॉल में कदम रखा, उसे पूरे माहौल में एक अजीब सी, डरावनी और भारी शांति का अहसास हुआ। लिविंग रूम के दरवाजे के पास रोज बिखरे रहने वाले आरव के रंग-बिरंगे जूते वहां मौजूद नहीं थे, हॉल के सोफे पर पड़े रहने वाले उसके खिलौने गायब थे और डाइनिंग रूम की दीवारों पर लगी उनकी पारिवारिक तस्वीरें वहां से हटाई जा चुकी थीं। विक्रम के मन में एक अज्ञात डर ने दस्तक दी, वह तेजी से दौड़ता हुआ ऊपर अपने मास्टर बेडरूम की तरफ गया। वहां अलमारी के सारे दरवाजे पूरी तरह खुले हुए थे और नैना का एक भी कपड़ा या उसका कोई भी सामान वहां मौजूद नहीं था, पूरी अलमारी पूरी तरह से खाली पड़ी थी। विक्रम हैरान-परेशान होकर नीचे डाइनिंग टेबल की तरफ भागा, वहां रात का कोई खाना नहीं बना था, बल्कि टेबल के ठीक बीचों-बीच एक बहुत ही बड़ा और चमकीला पीला लिफाफा रखा हुआ था जिस पर विक्रम का नाम लिखा था।
उसी वक्त विक्रम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उसने तुरंत बिना सोचे-समझे नैना का नंबर डायल किया। फोन की घंटी बजते ही नैना ने बहुत ही शांति से कॉल रिसीव कर लिया। विक्रम फोन पर पागलों की तरह चीखते हुए चिल्लाया कि नैना, तुम इस वक्त अपने पूरे होश में हो या नहीं? यह क्या घटिया तमाशा लगा रखा है तुमने और तुम आरव को लेकर कहां गायब हो गई हो? तभी नैना को फोन की दूसरी तरफ से कागज के बहुत ही तेजी से फटने की आवाज सुनाई दी, जिससे साफ था कि विक्रम ने गुस्से में उस पीले लिफाफे को फाड़ दिया था। नैना ने बहुत ही शांत, गंभीर और अडिग आवाज में कहा कि विक्रम, मैं इस वक्त दुनिया की सबसे सुरक्षित और सुकून भरी जगह पर हूं, जहां तुम्हारी परछाई भी नहीं पहुंच सकती। विक्रम ने लिफाफे के भीतर से निकले कागजातों को देखते हुए बेहद गुस्से में कहा कि ये कोर्ट के तलाक के नोटिस और हमारी कंपनी के पिछले तीन सालों के गुप्त बैंक स्टेटमेंट्स यहां टेबल पर क्यों रखे हैं? तुम इन रद्दी कागजों से मेरा क्या बिगाड़ लोगी? तुम भूल गई कि तुम खाली हाथ इस घर से बाहर गई हो और तुम सड़क पर आ जाओगी। नैना फोन पर बहुत ही धीरे से मुस्कुराई और उसने कहा कि विक्रम, जरा उन कागजातों के बिल्कुल नीचे रखी हुई उस रंगीन तस्वीर को भी अपने हाथों में उठाकर ध्यान से देख लो, शायद तुम्हें तुम्हारे हर सवाल का जवाब मिल जाएगा।
विक्रम ने जैसे ही उन कानूनी कागजातों के नीचे छिपी हुई उस हाई-डेफिनिशन तस्वीर को देखा, उसके पूरे शरीर में एक भयंकर सिहरन दौड़ गई और उसके हाथ बुरी तरह से कांपने लगे। उस तस्वीर में विक्रम मेहरा, रिया मल्होत्रा और कुख्यात ठेकेदार मनीष बेदी एक बेहद आलीशान और सुनसान फार्महाउस से आधी रात को एक साथ बाहर निकलते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। सबसे भयानक बात यह थी कि उस तस्वीर के ऊपर जो डिजिटल टाइमस्टैम्प और तारीख दर्ज थी, वह बिल्कुल वही रात थी जिस रात मेहरा अर्बन प्रोजेक्ट्स को नगर निगम का वह करोड़ों रुपयों का विवादित सरकारी टेंडर अलॉट किया गया था। वह तस्वीर इस बात का सबसे बड़ा और पुख्ता अदालती सबूत थी कि विक्रम ने रिश्वतखोरी और अनुचित लेन-देन के जरिए वह कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया था। फोन पर अचानक कई मिनटों के लिए एक बहुत ही भारी और जानलेवा खामोशी छा गई, विक्रम के गले से एक शब्द भी बाहर नहीं निकल पा रहा था और उसका पूरा अहंकार उस एक तस्वीर को देखकर मिट्टी में मिल चुका था। विक्रम ने अपनी कांपती हुई और बेहद कमजोर आवाज में कहा कि नैना… तुम शायद यह अच्छी तरह नहीं समझ रही हो कि तुम इस वक्त समाज में कितनी बड़ी हस्ती और किस रसूखदार इंसान से दुश्मनी मोल ले रही हो, तुम अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल कर रही हो। नैना ने एक गहरी सांस ली और कहा कि विक्रम, गलती मेरी नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी भूल तो तुमने की है। तुम पिछले आठ सालों में अपनी अंधी मर्दानगी और घमंड के कारण कभी यह समझ ही नहीं पाए कि तुम्हारी पत्नी वास्तव में कौन थी। तुमने मुझे हमेशा सिर्फ एक लाचार, अनपढ़ और कमजोर घरेलू औरत समझा जो तुम्हारे हर धोखे को चुपचाप सहती रहेगी, जबकि हकीकत यह थी कि मैं एक ऐसा विनाशकारी तूफान थी जो सिर्फ अपने बेटे के भविष्य और अपने परिवार की मर्यादा की खातिर इतने सालों से खामोश बैठा था। फोन के पूरी तरह से कटने से पहले विक्रम की सांसें बुरी तरह से फूल चुकी थीं और उसके चेहरे का रंग सफेद पड़ चुका था। अपनी पूरी जिंदगी में पहली बार, विक्रम मेहरा को किसी इंसान से इतना भयानक डर लग रहा था। उसे अब अच्छी तरह समझ आ गया था कि नैना ने जो पीला लिफाफा डाइनिंग टेबल पर छोड़ा है, वह कोई मामूली पारिवारिक धमकी नहीं है, बल्कि उसके पूरे साम्राज्य, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और उसकी पूरी जिंदगी की बर्बादी की एक मुकम्मल और कानूनी शुरुआत है, जिसका पहला वार नैना ने बहुत ही खामोशी और सटीकता से सीधे उसके दिल पर किया था।
विक्रम मेहरा के फोन की स्क्रीन काली हो चुकी थी, लेकिन उसके कानों में नैना की आखिरी आवाज किसी बजती हुई घंटी की तरह गूंज रही थी। हाथ में मौजूद हीरों का हार अब उसे जलते हुए कोयले जैसा महसूस हो रहा था, जिसे वह न तो रख सकता था और न ही फेंक सकता था। वह पागलों की तरह अपने लिविंग रूम के आलीशान सोफे पर बैठ गया, जहां कभी उसका बेटा आरव अपने खिलौनों के साथ खेलता था और नैना हर शाम उसके दफ्तर से लौटने पर मुस्कुराकर पानी का ग्लास हाथ में थामती थी। उस विशाल बंगले में अब केवल सन्नाटा पसरा हुआ था, एक ऐसा सन्नाटा जो विक्रम के अहंकार को धीरे-धीरे लील रहा था। उसने तुरंत कांपते हाथों से रिया मल्होत्रा का नंबर डायल किया, क्योंकि इस वित्तीय और कानूनी संकट में रिया ही उसकी आखिरी उम्मीद थी। फोन की तीन घंटियां जाने के बाद रिया ने बेहद रूखे और पेशेवर अंदाज में कॉल उठाया। विक्रम ने घबराते हुए कहा कि रिया, सब कुछ खत्म हो गया है, नैना घर छोड़कर चली गई है और उसने हमारे सारे गुप्त लेन-देन, फर्जी इनवॉइस और उस रात की तस्वीर कानूनी वकील काव्या सेठी को सौंप दी है, वह हमारे खिलाफ एक बहुत बड़ा जाल बुन चुकी है। फोन के दूसरी तरफ से रिया की कोई हमदर्दी भरी आवाज नहीं आई, बल्कि एक ठंडी और स्वार्थी हंसी गूंजी। रिया ने बहुत ही तीखे स्वर में कहा कि विक्रम, तुमने तो कहा था कि तुम्हारी पत्नी एक घरेलू और सीधी-सादी औरत है जिसे अकाउंट्स की कोई समझ नहीं है; अब अगर टैक्स विभाग या कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तक यह बात पहुंचती है, तो मेरी नौकरी और मेरा करियर पूरी तरह तबाह हो जाएगा; मैं तुम्हारे इस निजी पारिवारिक ड्रामे और अवैध मामलों में अपना नाम खराब नहीं करना चाहती, बेहतर होगा कि तुम अपने वकील से बात करो और मुझे इस सब से दूर रखो। इसके बाद रिया ने बिना विक्रम का जवाब सुने फोन काट दिया और उसका नंबर हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया। विक्रम को उस पल अहसास हुआ कि जिस रिश्ते को वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा आकर्षण मान रहा था, वह असल में रेत की एक ऐसी दीवार था जो एक ही झटके में ढह गया।
अगले दो दिन विक्रम के लिए किसी जलते हुए नरक जैसे थे। मेहरा अर्बन प्रोजेक्ट्स के मुख्य दफ्तर में जैसे ही यह खबर फैली कि कंपनी की आंतरिक वित्तीय फाइलों की दोबारा जांच होने वाली है, शेयरधारकों और अन्य निदेशकों के बीच खलबली मच गई। ठीक तीसरे दिन सुबह, काव्या सेठी के कानूनी नोटिस के आधार पर कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की एक आपातकालीन और विशेष बैठक बुलाई गई। विक्रम मेहरा बेहद थके हुए चेहरे और बिखरे बालों के साथ कॉन्फ्रेंस रूम में दाखिल हुआ, उसे लग रहा था कि वह अपने रसूख और पैसों के दम पर बाकी डायरेक्टर्स को मना लेगा। लेकिन जैसे ही उसने मुख्य कुर्सी की तरफ देखा, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वहां नैना बैठी हुई थी, उसने एक बेहद शालीन और गंभीर सूती साड़ी पहनी थी, उसकी आंखों में कोई काजल या आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी चमक थी जो केवल एक आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी महिला के चेहरे पर होती है। उसके बगल में काव्या सेठी अपने हाथ में एक बहुत बड़ी कानूनी फाइल लिए बैठी थीं। विक्रम ने गुस्से में मेज पर हाथ मारते हुए कहा कि नैना, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी कंपनी के बोर्ड रूम में इस तरह बैठने की? तुम एक घरेलू औरत हो, तुम्हारा इस बिजनेस से कोई लेना-देना नहीं है।
नैना अपनी जगह से उठी भी नहीं, उसने बस मेज पर रखे कुछ डाक्यूमेंट्स को विक्रम की तरफ खिसका दिया। नैना ने बहुत ही ठंडे लेकिन बेहद असरदार स्वर में कहा कि विक्रम मेहरा, अपनी आवाज को नीचे रखो, यह सिर्फ तुम्हारी कंपनी नहीं है। मेरे स्वर्गीय पिता ओमप्रकाश शर्मा जी ने जब इस कंपनी की शुरुआत की थी, तब उन्होंने बहुत ही दूरदर्शिता दिखाते हुए छत्तीस प्रतिशत शेयर सीधे मेरे नाम किए थे, जिसके कानूनी कागजात इस वक्त बोर्ड के सामने हैं। पिछले तीन महीनों में तुमने और रिया मल्होत्रा ने मिलकर जो फर्जी सप्लायर्स के नाम पर करोड़ों रुपयों का हेरफेर किया है, उसका एक-एक डिजिटल सबूत और बैंक स्टेटमेंट मैंने बाकी सभी डायरेक्टर्स को दिखा दिया है। कंपनी के नियम और कानून के अनुसार, तुम इस वक्त एक बहुत बड़े वित्तीय संकट के घेरे में हो और बाकी सभी शेयरधारकों ने सर्वसम्मति से तुम्हें मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से पूरी तरह बेदखल करने का फैसला ले लिया है। विक्रम ने बाकी निदेशकों की तरफ देखा, जो कभी उसके सामने सिर झुकाते थे, लेकिन आज उन सब ने अपनी नजरें फेर ली थीं। विक्रम पूरी तरह से अकेला पड़ चुका था। काव्या सेठी ने आगे बढ़ते हुए कहा कि मिस्टर मेहरा, यह तो सिर्फ शुरुआत है; नैना जी ने आपके खिलाफ अदालत में अलग होने और बच्चे की पूरी कस्टडी अपने पास रखने का मुकदमा भी दर्ज कर दिया है, और जो सबूत हमारे पास हैं, उनके आधार पर आपको आरव से मिलने की इजाजत भी शायद ही कभी मिलेगी; अब आप इस कंपनी और इस परिवार से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं।
इस पूरी कानूनी और सामाजिक लड़ाई के छह महीने बीत चुके थे। वसंत कुंज का वह आलीशान बंगला अब बिक चुका था क्योंकि कंपनी के कर्ज और नुकसान की भरपाई के लिए विक्रम को अपनी सारी निजी संपत्तियां बेचनी पड़ी थीं। विक्रम मेहरा अब दिल्ली के एक छोटे से किराए के मकान में गुमनामी की जिंदगी जी रहा था, उसका नाम, उसका रसूख और उसका घमंड सब कुछ कानून की भट्टी में जलकर राख हो चुका था। दूसरी तरफ, एक नई और बेहद खूबसूरत सुबह की शुरुआत हो चुकी थी। दिल्ली के एक नए और शांत इलाके में स्थित एक अपार्टमेंट की बालकनी में नैना बैठी हुई थी, उसके हाथ में चाय का एक कप था। सुबह की गुनगुनी धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसका आत्मविश्वास और भी ज्यादा खिल उठा था। सामने छोटे से बगीचे में आठ साल का आरव अपने नए दोस्तों के साथ फुटबॉल खेल रहा था, उसकी हंसी की आवाज हवा में गूंज रही थी। नैना ने मेहरा अर्बन प्रोजेक्ट्स की कमान अब पूरी तरह से अपने हाथों में ले ली थी और अपने पिता के पुराने ट्रस्ट को फिर से पुनर्जीवित कर दिया था। अब वह किसी के टुकड़ों पर पलने वाली या हर खर्च का हिसाब देने वाली एक लाचार पत्नी नहीं थी, बल्कि वह एक स्वतंत्र, सफल और अपने पैरों पर खड़ी एक सशक्त महिला और मां थी। उसने आसमान में उड़ते हुए आजाद परिंदों की तरफ देखा और अपने मन में मुस्कुराई। उसे अपने पिता की वह सीख एक बार फिर याद आई कि जब एक औरत अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ी होती है, तो वह अपने पैरों की बेड़ियों को भी अपनी सबसे बड़ी ताकत बना सकती है। नैना ने सोने के उस पिंजरे को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया था, और अब पूरा खुला आसमान उसकी अपनी नई और ऊंची उड़ान का गवाह था।
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