स्वस्थ जीवनशैली और प्राकृतिक आहार: गंभीर बीमारियों से बचाव का सही रास्ता
एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली ही हमें गंभीर बीमारियों से दूर रख सकती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में…
“हम सब कुछ संभाल चुके हैं, अब दादी की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है,” कहकर मेरे रिश्तेदार उन्हें छोड़कर बाहर चले गए। मैंने न हिम्मत हारी, न मिन्नतें कीं—बस दस्तावेज़ उठाए और कानूनी रास्ता चुना। कुछ हफ्तों बाद 2 लॉकर खुले, जिनमें निवेश के कागज़ात और वह सच था जो पूरे परिवार के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता था। यह कहानी सिर्फ एक संपत्ति की नहीं है, बल्कि उस न्याय की है जो एक खामोश दीवार के पीछे सालों से सिसक रहा था।

सुबह के 6 बजकर 40 मिनट थे। पुणे की जुलाई वाली भारी बारिश मेरी छोटी-सी पुरानी बिल्डिंग की सीढ़ियों तक भर आई थी। हवा में मिट्टी और गीली दीवारों की अजीब-सी गंध थी। मैं अपनी रसोई में चाय का पानी चढ़ाकर बस बैठी ही थी कि अचानक नीचे मुख्य दरवाज़े पर किसी के ज़ोर-ज़ोर से पैर पटकने की आवाज़ आई। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, मेरे फ्लैट का दरवाज़ा खटखटाया नहीं, बल्कि लगभग पीट दिया गया। मैंने घबराकर दरवाज़ा खोला। सामने मेरे सगे चाचा राजीव खड़े थे। उनके हाथ में एक पुराना, टूटा हुआ सूटकेस था जिसे उन्होंने बिना कुछ कहे सीधे लिविंग रूम के फर्श पर पटक दिया। उनके ठीक पीछे चाची मीना खड़ी थीं, जो कार में बैठने के लिए वापस मुड़ रही थीं। लेकिन सबसे ज़्यादा दिल दहला देने वाला दृश्य वह था जो राजीव चाचा के आगे खड़ा था। मेरी बूढ़ी दादी, सावित्री देवी, एक बेहद पतली सूती नाइटी में वहां खड़ी थीं। उनके पैरों की चप्पलें कीचड़ से पूरी तरह लथपथ थीं, उनके सफ़ेद बाल बारिश के पानी से भीगकर उनके चेहरे पर चिपके हुए थे, और उनके दोनों हाथ ठंड या शायद किसी गहरे डर से कांप रहे थे।
राजीव चाचा ने दादी को मेरी ओर थोड़ा आगे बढ़ाया और रूखे स्वर में कहा, “लो, अपनी दादी को संभालो। घर की अकेली लड़की हो, नौकरी भी वैसी ही है, कम से कम अब यही काम तुम्हारे आ जाएगा। हमारे पास अब इनके लिए वक्त नहीं है।”
मैंने अपनी सुध-बुध खोते हुए दादी को नीचे गिरने से पहले अपनी बाहों में थाम लिया। उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था और वे लगातार बुदबुदा रही थीं। मैंने चाचा से पूछा, “चाचा, आप यह क्या कर रहे हैं? इस तूफ़ानी बारिश में दादी को इस हालत में यहाँ छोड़कर आप कहाँ जा रहे हैं? इनका इलाज, इनका घर?”
तभी नीचे खड़ी कार का शीशा नीचे हुआ। चाची मीना ने वहीं से चिल्लाकर कहा, “हमसे अब यह सब नहीं होता, अनन्या। रात-रात भर उठकर घर में घूमती हैं, सबको परेशान करती हैं। डॉक्टर ने भी साफ़ कह दिया है कि इनकी मानसिक स्थिति और दिक्कतें रोज़ बढ़ रही हैं। वैसे भी, तुम जिस डेक्कन वाले बंगले की बात कर रही हो, वह अब हमारे पास नहीं है। उसका सौदा हो चुका है। सारा पैसा इनकी दवाइयों और हमारी ज़रूरतों में लग गया।”
मैंने चौंककर पूछा, “बंगला अलग कर दिया? दादी ने अपनी मर्ज़ी से वह पुश्तैनी घर कब बेचा? वे तो हमेशा कहती थीं कि वह दादाजी की आखिरी निशानी है!”
राजीव चाचा ने अपनी जेब से एक भारी कानूनी लिफाफा निकाला और उसे मेरी तरफ फेंकते हुए कहा, “कागज़ात पर साफ़-साफ़ अंगूठे का निशान है। सब कुछ कानूनी तौर पर हुआ है। अब उनके नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं बची। हम आज ही दुबई के लिए निकल रहे हैं, हमारी नई नौकरी और नया जीवन वहाँ इंतज़ार कर रहा है। एक बुजुर्ग की वजह से हम अपने हवाई टिकट रद्द नहीं कर सकते। अब जो करना है, तुम करो।”
दादी ने धुंधली आँखों से सड़क की तरफ देखा, जहाँ कार स्टार्ट हो रही थी। उन्होंने बेहद कमज़ोर आवाज़ में कहा, “राजू, मुझे मेरे घर ले चल बेटा। तेरे बाबूजी शाम को दफ़्तर से आएंगे तो मुझे घर पर न पाकर बहुत ढूंढ़ेंगे। मुझे यहाँ मत छोड़।”
चाची मीना यह सुनकर ज़ोर से हंस पड़ीं, “इन्हें अब यह भी याद नहीं कि बाबूजी को गए 11 साल बीत चुके हैं! तुम तो इनकी सबसे लाडली पोती थीं अनन्या, बचपन में तुम्हारे लिए बड़े-बड़े वादे करती थीं। अब देखो, तुम अपनी इस छोटी-सी 8,000 रुपये वाली नौकरी में इनकी सेवा कितने दिन कर पाती हो। ऑल द बेस्ट!” कार तेज़ी से आगे बढ़ गई और पीछे छोड़ गई सिर्फ काला धुआं और बारिश के पानी की बौछारें। दादी उस लाल ब्रेक लाइट को तब तक देखती रहीं जब तक वह सड़क के मोड़ पर गायब नहीं हो गई।

मेरे पास रोने या अपनी किस्मत को कोसने का बिल्कुल समय नहीं था। हकीकत यह थी कि मेरा खुद का मकान किराया पिछले दो महीने से बाकी था। मैं घर बैठे ऑनलाइन छोटी-मोटी दुकानों के लिए सामानों का विवरण (प्रोडक्ट डिस्क्रिप्शन) लिखने का काम करती थी। मेरी महीने की कमाई कभी 18,000 रुपये होती थी, तो कभी गिरकर 9,000 रुपये पर आ जाती थी। उस सुबह जब मैंने अपना बैंक अकाउंट चेक किया, तो उसमें केवल 612 रुपये बचे थे। लेकिन सामने एक बुजुर्ग महिला खड़ी थी, जिन्होंने कभी बचपन में मुझे अपनी गोद में पाला था। मैंने अपनी सारी चिंताएं एक तरफ रखीं, दादी को अंदर लाकर उनके भीगे कपड़े बदले, उन्हें एक सूखी गर्म साड़ी पहनाई। रसोई से गर्म पानी लाकर उनके कीचड़ से सने पैरों को साफ़ किया। मेरी हालत देखकर पड़ोस की रहने वाली उमा काकू ने बिना मांगे ही एक कटोरा गर्म खिचड़ी भेज दी थी। मैंने अपने हाथों से दादी को वह खिचड़ी खिलाई।
लेकिन असली परीक्षा तो अभी शुरू होनी थी। पहली ही रात को दादी की मानसिक स्थिति का अंदाज़ा मुझे हुआ। वे पूरी रात सोई नहीं। उन्होंने कम से कम 17 बार मुझसे एक ही सवाल पूछा, “अनु, मेरा कमरा कहाँ है? मेरा सामान कहाँ रखा है?” दूसरी रात को स्थिति और गंभीर हो गई, जब वे आधी रात को चुपके से उठीं और बालकनी का दरवाज़ा खोलकर नीचे सड़क पर जाने की कोशिश करने लगीं। अगर मेरी आँख समय पर न खुलती, तो कोई भी अनहोनी हो सकती थी। तीसरे दिन दोपहर को उन्होंने लिविंग रूम के बड़े आईने में खुद का अक्स देखा और डरकर ज़ोर से चीख पड़ीं, “यह कौन अजनबी औरत मेरे घर में घुस आई है? इसे बाहर निकालो!”
दादी को उस हालत में देखना मेरे लिए दिल टूटने जैसा था। जब भी मेरा हौसला डगमगाता, मैं चुपचाप बाथरूम में जाती, अपने आंसू बहाती, फिर ठंडे पानी से अपना चेहरा धोकर वापस उनके सामने एक झूठी मुस्कान के साथ आ खड़ी होती। जब उनका डर बहुत ज़्यादा बढ़ जाता और वे कांपने लगतीं, तो मैं उनके पास बैठकर वही पुराना भजन गाने लगती जो वे बचपन में मेरी चोटी बनाते समय गाया करती थीं—“रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम…” इस भजन की धुन में कोई जादुई शांति थी। इसे सुनते ही उनकी कांपती हुई आँखें धीरे-धीरे शांत हो जाती थीं और वे सो जाती थीं।
एक रात, जब चारों तरफ सन्नाटा था, दादी ने अचानक बिस्तर पर लेटे-लेटे अपना कांपता हुआ हाथ बढ़ाया और मेरे चेहरे को छुआ। उनकी आँखों में उस समय एक अजीब सी चमक और होश था। उन्होंने कहा, “अनु… तू आई थी न उस दिन भी मेरे पास?”
मैंने उनका हाथ थामते हुए धीरे से पूछा, “कौन-से दिन, दादी? आप किस दिन की बात कर रही हैं?”
लेकिन वह होश का पल बेहद छोटा था। वे तुरंत फिर से अपनी धुंधली यादों की दुनिया में खो गईं और बुदबुदाने लगीं, “मीना ने मेरा फोन छीनकर अलमारी में बंद कर दिया था। राजू बहुत गुस्से में था, वह कह रहा था कि अगर मैंने उस सफ़ेद कागज़ पर अंगूठा नहीं लगाया, तो वह मुझे किसी दूर के वृद्धाश्रम में अकेला छोड़ आएगा। मुझे बहुत डर लग रहा था अनु…”
दादी की यह बात सुनकर मेरे अंदर एक नया मोड़ आया। मुझे समझ आ गया कि यह सिर्फ एक बूढ़ी औरत की बीमारी का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी साज़िश है। अगले ही दिन मैंने बिना देर किए वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन (सीनियर सिटीजन हेल्पलाइन) पर फोन किया। वहाँ के अधिकारियों ने मेरी पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी और मुझे ज़िला समाज कल्याण कार्यालय जाने की सलाह दी। साथ ही, उन्होंने मुझे पुणे की एक जानी-मानी वकील नैना देशमुख का नंबर भी दिया, जो बुजुर्गों के अधिकारों के लिए मुफ़्त कानूनी लड़ाई लड़ती थीं।
मैं तुरंत वकील नैना देशमुख के केबिन में पहुँची और उन्हें सारी बात विस्तार से बताई। राजीव चाचा का अचानक आना, दादी को इस हालत में छोड़ना, और बंगले के बेचे जाने की संदिग्ध बात। नैना जी ने अपने चश्मे को ठीक करते हुए गंभीर आवाज़ में कहा, “अनन्या, यह सिर्फ एक आम परिवार का आपसी प्रॉपर्टी का झगड़ा नहीं है। कानूनी भाषा में कहें तो यह एक बुजुर्ग महिला के अधिकारों का खुला उल्लंघन है, उनका परित्याग है, और सबसे बड़ी बात—यह संपत्ति से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय शोषण और जालसाजी का मामला हो सकता है। हम सबसे पहले अदालत से उनकी सुरक्षा और तुम्हें उनकी अस्थायी कानूनी देखरेख (कस्टडी) मिलने का आदेश प्राप्त करेंगे, ताकि राजीव कानूनी रूप से उन्हें दोबारा नुकसान न पहुँचा सके।”
इसके बाद के कई हफ्ते बेहद भागदौड़ और मानसिक तनाव से भरे रहे। हमें कई तरह की सरकारी जांचों से गुज़रना पड़ा, डॉक्टरों से दादी की मानसिक स्थिति की मेडिकल रिपोर्ट तैयार करवानी पड़ी, और समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने हमारे छोटे से घर का मुआयना भी किया। इस कठिन समय में मेरी पड़ोसी उमा काकू मेरे लिए एक फरिश्ता बनकर सामने आईं। जब मैं कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही होती, उमा काकू दिनभर दादी के पास बैठती थीं। वे उन्हें समय पर पोहे और उपमा खिलातीं, उन्हें पुराने मराठी भावगीत सुनातीं, और सबसे बड़ी बात—दादी की हर अजीब और बेतुकी बात का उत्तर इतनी आत्मीयता से देतीं जैसे दादी दुनिया की सबसे समझदारी भरी बात कर रही हों।
धीरे-धीरे, उस शांत और सुरक्षित माहौल का असर दादी के स्वास्थ्य पर दिखने लगा। उनके मानसिक रूप से शांत और अच्छे रहने के पल अब बढ़ने लगे थे। हालांकि वे कभी मुझे मेरे नाम से पहचानती थीं, तो कभी अपनी गुज़र चुकी माँ समझ बैठती थीं। लेकिन इन सब के बीच, एक बात बहुत अजीब थी। वे रोज़ाना कुछ विशेष वाक्यों को बार-बार दोहराती थीं, मानो उनका दिमाग किसी गहरी पहेली को सुलझाने की कोशिश कर रहा हो। वे अक्सर कहती थीं: “लोहे के दो शेर हमेशा दरवाज़े पर पहरा देते हैं…” “बिना गाने वाली जो मैना है, उसके पेट के अंदर से ही असली रास्ता जाता है…” और इसके बाद वे एक खास संख्या बोलती थीं—“सात… तीन… एक… नौ।”
शुरुआत में मुझे लगा कि यह उनकी बीमारी के कारण है, लेकिन जब वे हर दो-तीन दिन में इसी क्रम में इन शब्दों को दोहराने लगीं, तो मैंने अपनी एक डायरी में इन सभी वाक्यों और उस संख्या को हूबहू नोट कर लिया।
एक दोपहर, जब बाहर हल्की धूप खिली थी, दादी लिविंग रूम में बैठी थीं। अचानक उन्होंने मेरी तरफ देखा और बहुत ही सामान्य आवाज़ में पूछा, “अनु, क्या राजू ने वह सुंदर घर अपने नाम करके तेरी स्वर्गीय माँ का हिस्सा भी खुद रख लिया क्या? उसने वादा किया था कि वह सबको उनका हक देगा।”
यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गई। मेरी माँ के निधन के बाद, परिवार में कभी किसी ने भी उनके हिस्से या उनकी किसी संपत्ति की बात नहीं की थी। चाचा और चाची ने हमेशा यही दिखाया था कि वे ही पूरे परिवार के कर्ता-धर्ता हैं। मैंने तुरंत दादी के पास बैठकर पूछना चाह कि वे किस हिस्से की बात कर रही हैं, लेकिन हमेशा की तरह, उनका दिमाग फिर से शून्य में चला गया और वे चुप हो गईं।
इस घटना के ठीक दो महीने बाद, अदालत और समाज कल्याण अधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने सभी रिपोर्टों और गवाहों के बयानों के आधार पर यह माना कि दादी सावित्री देवी मेरे साथ पूरी तरह सुरक्षित और खुश हैं। अदालत ने मुझे उनकी अस्थायी कानूनी देखरेख और उनके इलाज से जुड़े सभी फैसले लेने का आधिकारिक अधिकार सौंप दिया। यह हमारे लिए एक बहुत बड़ी कानूनी जीत थी। उस रात, मेरे पास जश्न मनाने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन मैंने और उमा काकू ने मिलकर चाय बनाई और 10 रुपये वाले पारले-जी बिस्कुट के पैकेट के साथ उस छोटी-सी लेकिन बेहद कीमती खुशी को मनाया।
रात के करीब ग्यारह बजे रहे थे। दादी खिड़की के पास बैठी बाहर हो रही रिमझिम बारिश को देख रही थीं। अचानक कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई। दादी ने अपनी गर्दन घुमाई और उनकी आवाज़ इस बार बिल्कुल साफ़, गंभीर और सुलझी हुई थी, जैसी सालों पहले हुआ करती थी। उन्होंने मुझसे कहा, “डेक्कन सहकारी बैंक। शाखा कार्यालय। लॉकर नंबर 739। राजीव ने उस बंगले के चप्पे-चप्पे में उसे बहुत खोजा, अलमारियों को तोड़ डाला, पर उसे वह कभी नहीं मिला।”
यह सुनते ही मेरे हाथ में पकड़ा हुआ चाय का कांच का कप नीचे गिरते-गिरते बचा। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैंने घुटनों के बल उनके पास बैठकर धीरे से पूछा, “दादी, उस लॉकर की चाबी कहाँ है? चाचा किस चीज़ को खोज रहे थे?”
दादी ने मेरी आँखों में देखा, उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई और उन्होंने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, “जो मैना हमारे पुराने दीवान के कोने में लकड़ी के नक्काशीदार बॉक्स पर बनी है… जो कभी गाती नहीं… चाबी उसी के पेट के भीतर छिपी है।” यह कहने के ठीक अगले ही पल, वे फिर से सामान्य हो गईं और खिड़की के बाहर देखते हुए अपना वही भजन गुनगुनाने लगीं, जैसे उन्होंने पिछले दो मिनट में कुछ कहा ही न हो।
मैंने तुरंत अपनी वह डायरी खोली जिसमें मैंने उनके पुराने वाक्य लिखे थे। अब जाकर मुझे उस पहेली का असली मतलब समझ आया। “लोहे के दो शेर” का मतलब था डेक्कन सहकारी बैंक के मुख्य द्वार पर बने ब्रास के दो शेरों के स्टेच्यू! “बिना गाने वाली मैना” का मतलब था दादाजी के ज़माने का वह पुराना लकड़ी का बॉक्स जो चाचा हमारे घर छोड़ गए थे, जिसके ऊपर एक लकड़ी की मैना की आकृति नक्काशी की गई थी! और वह संख्या “सात-तीन-एक-नौ” (7319) दरअसल उस लॉकर का पासवर्ड या उस बॉक्स का एक सीक्रेट कोड था!
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन इस बार वे बेबसी के नहीं, बल्कि उस सच के सामने आने के थे जो इतने समय से छुपाया गया था। मुझे पहली बार यह पूरी तरह समझ आया कि चाचा राजीव और चाची मीना ने किसी बेसहारा, बीमार बूढ़ी औरत को सिर्फ एक बोझ समझकर नहीं छोड़ा था। दरअसल, वे उस स्त्री को अपने से दूर छोड़ गए थे, जिसके कमज़ोर दिमाग के किसी कोने में आज भी पूरे परिवार की असली वसीयत और दौलत का ठिकाना सुरक्षित था। वे थक चुके थे उसे ढूंढकर, और जब उन्हें लगा कि दादी अब कभी कुछ नहीं बता पाएंगी, तो वे उन्हें फेंककर चले गए।
अगली सुबह, जैसे ही सूरज निकला, मैं वकील नैना देशमुख के पास कानूनी आदेश की कॉपी लेकर पहुँची। हम दोनों बैंक मैनेजर के पास गए। जब हमने अदालत के कस्टडी ऑर्डर्स दिखाए, तो बैंक प्रशासन ने हमें उस लॉकर को खोलने की अनुमति दे दी। जब लॉकर नंबर 739 को खोला गया, तो उसके अंदर जो कुछ भी था, उसने हमारे पूरे परिवार के इतिहास और चाचा के झूठ का पर्दाफ़ाश कर दिया।
उस लॉकर के भीतर दो बहुत बड़े सील पैकेट थे। पहले पैकेट में करोड़ों रुपये के पुराने और नए ब्लू-चिप कंपनियों के शेयर्स के सर्टिफिकेट्स थे, जो दादाजी ने मेरी माँ और मेरे नाम पर सुरक्षित किए थे। और दूसरे पैकेट में वह सबसे बड़ा कानूनी दस्तावेज़ था, जिसने चाचा की रातों की नींद उड़ाने की पूरी ताकत रखी थी। वह दादाजी की असली और अंतिम वसीयत थी, जिसमें साफ़ लिखा था कि डेक्कन वाले बंगले का मालिकाना हक सिर्फ और सिर्फ सावित्री देवी के पास रहेगा, और उनकी मृत्यु के बाद उसका आधा हिस्सा मेरी स्वर्गीय माँ (यानी मुझे) और आधा हिस्सा राजीव को मिलेगा। राजीव चाचा ने जो कागज़ात दिखाकर बंगला बेचा था, वह पूरी तरह से एक जाली दस्तावेज़ (फॉर्जरी) था, जिस पर दादी के अंगूठे का निशान उनकी अस्वस्थता का फ़ायदा उठाकर धोखे से लिया गया था।
नैना जी ने उन कागज़ात को देखते हुए गर्व से कहा, “अनन्या, अब बाज़ी पूरी तरह तुम्हारे हाथ में है। राजीव ने जो किया है, वह एक गंभीर कानूनी अपराध है। हम इस वसीयत के आधार पर उस बंगले की अवैध बिक्री को तुरंत रद्द करवा सकते हैं और दुबई में बैठे तुम्हारे चाचा के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी का मामला दर्ज करा सकते हैं।”
उस शाम जब मैं घर लौटी, तो मैंने बैंक से मिले उन दस्तावेज़ों को सुरक्षित अलमारी में रखा। मैंने दादी के पास जाकर उनके सिर पर अपना हाथ रखा। वे सो रही थीं, उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी, मानो उन्होंने अपना सबसे बड़ा कर्तव्य पूरा कर दिया हो। अब मेरे पास अपनी आगे की पढ़ाई, दादी के बेहतरीन इलाज और एक सुरक्षित भविष्य के लिए पर्याप्त साधन थे। जो रिश्तेदार हमें सड़क पर छोड़ गए थे, आज वे खुद कानून के शिकंजे में फंसने की कगार पर खड़े थे।
यह कहानी केवल एक बंद लॉकर की नहीं है, बल्कि इस बात का सबूत है कि जब आप सच्चे दिल से किसी बुजुर्ग की सेवा करते हैं, तो ईश्वर स्वयं आपके लिए न्याय के बंद दरवाज़े खोल देता है।
एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली ही हमें गंभीर बीमारियों से दूर रख सकती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में…
मेरी बेटी ने अस्पताल में कहा, “दादी ने मुझे कुछ विशेष मोती दिए थे, पापा ने कहा था कि इसके…
होटल के कमरों में केवल सफेद चादरें इस्तेमाल होने के पीछे कई दिलचस्प कारण हैं। जब भी हम किसी होटल…
स्वस्थ और खुशहाल जीवन के लिए अपने पेट को साफ रखना बहुत जरूरी है। आज के समय में हमारी जीवनशैली…
“हम सब कुछ संभाल चुके हैं, अब दादी की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है,” कहकर मेरे रिश्तेदार उन्हें छोड़कर बाहर चले गए।…
प्लास्टिक कुर्सी के बीच बने छोटे छेद का असली सच। हम सभी ने अपने घरों, दुकानों, या किसी न किसी…