चेतावनी: क्या आप हमेशा दाईं करवट सोते हैं? जानिए इसके फायदे और संभावित जोखिम
सोने की मुद्रा केवल आराम का विषय नहीं है, बल्कि यह आपके संपूर्ण स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है।…
मेरा नाम हीना है। मेरी उम्र उस वक्त सिर्फ तैंतीस साल थी, जब मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा भयंकर तूफान आया जिसने मेरी हंसती-खेलती दुनिया को पूरी तरह तहस-हस्य कर दिया।
मेरे पति समीर के जीवित रहते हुए, हमने मुंबई के बांद्रा इलाके में स्थित एक आलीशान दो मंज़िला बंगले में सात बेफिक्र और खुशहाल साल बिताए थे। बाहर की दुनिया के लोगों के लिए, हमारा जीवन किसी परियों की कहानी जैसा था—जहाँ दौलत, शोहरत, प्यार और इज़्ज़त की कोई कमी नहीं थी। लोग हमारी ओर देखते और कहते कि हीना से ज्यादा खुशनसीब औरत कोई नहीं है।
लेकिन उस खूबसूरत मुखौटे के पीछे का सच बेहद कड़वा और खौफनाक था।
एक भयानक कार हादसे में समीर की अचानक मौत हो गई। पति का साया सिर से उठते ही, मेरी सास, जानकी देवी ने धीरे-धीरे हमारे पूरे अस्तित्व और जीवन पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया।
शुरुआती दिनों में, वे सभी रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सामने मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए कहतीं, “बेचारी हीना तो इतनी कम उम्र में विधवा हो गई। अब इस अभागिन और इसकी तीन नन्हीं बेटियों का सहारा कौन बनेगा? अगर मैं कदम न उठाऊँ, तो ये अनाथ बच्चे और यह बेबस औरत सड़क पर आ जाएंगे।”

दुनिया वालों की नज़र में जानकी देवी एक बेहद दयालु, महान और त्यागी सास थीं, जो अपने बेटे की मौत के बाद अपनी बहू और पोतियों को संभाल रही थीं।
लेकिन उस बनावटी दयालुता के नकाब के पीछे एक बेहद चालाक, लालची और निष्ठुर औरत छिपी थी।
समीर के अंतिम संस्कार के कुछ ही हफ्तों बाद, जानकी देवी ने समीर के सभी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और जीवन बीमा की रकम पर चालाकी से अपने दस्तखत करवाकर कब्ज़ा कर लिया। जिस बंगले में मेरी बेटियों की किलकारियां गूँजी थीं, जहाँ उनका बचपन बीता था, उस बंगले को भी उन्होंने चुपचाप एक बिल्डर को बेच दिया और सारे पैसे अपने निजी खाते में जमा करा लिए।
इतना ही नहीं, मेरी माँ ने मेरी शादी में जो पुश्तैनी सोने-चाँदी के गहने दिए थे, मेरे पिता के घर से मिली जो भी जमापूंजी थी, और समीर के साथ बिताई मेरी यादों की हर एक निशानी—सब कुछ उन्होंने यह कहकर अपने पास तिजोरी में बंद कर लिया कि “तुम तो नासमझ हो, ये सब चीज़ें मेरे पास ही सुरक्षित रहेंगी।”
और फिर एक दिन, उन्होंने हमें उस मुख्य घर से बाहर निकाल दिया।
उन्होंने हमें बंगले के पिछले हिस्से में बने एक बेहद छोटे, अंधेरे और सीलन भरे स्टोर रूम में रहने के लिए मजबूर कर दिया। वह एक ऐसा कमरा था जहाँ पहले घर का पुराना, टूटा-फूटा कबाड़ और फालतू सामान फेंका जाता था। उस कमरे की ठीक बगल में कपड़े धोने की जगह थी, जहाँ दिन-रात पानी का बहाव रहता था और दीवारों पर काई जमी रहती थी।
उस बदबूदार, छोटे से कमरे में मुझे और मेरी तीन मासूम बेटियों को फेंक दिया गया।
मेरी बेटियों के नाम थे—मेहा, सिमरन और नन्हीं पीहू। उनकी उम्र क्रमशः नौ साल, सात साल और पाँच साल थी।
मेरे लिए वे तीनों इस दुनिया का सबसे बड़ा वरदान थीं। जब भी मैं उदास होती, उनकी मासूम मुस्कान मेरे ज़ख्मों पर मरहम का काम करती थी। लेकिन मेरी सास जानकी देवी की नफ़रत भरी आँखों में, वे केवल “तीन लड़कियां” थीं—एक ऐसा बोझ जिसका उनके लिए कोई मूल्य नहीं था।
जानकी देवी जब भी मेरे पास से गुज़रतीं, वे ज़हर उगलते हुए कहतीं, “इस घर के चिराग को जन्म देने की औकात नहीं थी तुम्हारी! एक बेटा भी नहीं दे सकी मेरे समीर को। यह वंश अब यहीं खत्म हो गया। तीन-तीन बेटियों को पालेगा कौन? ये तो कल को दूसरों के घर चली जाएंगी और हमारा सब कुछ बर्बाद कर देंगी!”
उनकी नज़रों में मैं एक नाकाम, मनहूस और कुलक्षणी पत्नी थी। वे इस बात को पूरी तरह भूल चुकी थीं कि संतान ईश्वर की देन होती है, उसमें किसी स्त्री का कोई दोष नहीं होता।
मैं उनके हर ताने, हर अपमान और हर ज़ुल्म को चुपचाप सहती रही। मैं रोज़ रात को भगवान के सामने रोती और सोचती कि शायद वक्त बदलेगा, शायद कभी मेरी सास का दिल पिघलेगा और वे अपनी इन मासूम पोतियों को गले से लगाएँगी।
लेकिन मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ बहुत जल्द आने वाला था।
वह जानकी देवी के एनजीओ का वार्षिक चैरिटी इवेंट का दिन था।
हर साल, जानकी देवी एक बड़े एनजीओ की आड़ में मुंबई के एक बेहद प्रतिष्ठित पांच सितारा होटल में एक भव्य दान समारोह आयोजित करती थीं। उस कार्यक्रम में शहर के बड़े-बड़े उद्योगपति, नामी राजनीतिज्ञ, मशहूर डॉक्टर, बॉलीवुड की हस्तियां और समाज के उच्च वर्ग के लोग शामिल होते थे।
उस कार्यक्रम का मुख्य विषय हमेशा होता था—”अनाथ बच्चों और बेसहारा महिलाओं का सशक्तिकरण और कल्याण।”
लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा दोहरापन और कड़वा सच यही था कि जो औरत मंच पर खड़ी होकर घंटों बेसहारा महिलाओं के अधिकारों पर भाषण देती थी, टीवी कैमरों के सामने आँसू बहाती थी, वही औरत अपने ही घर की विधवा बहू और तीन मासूम पोतियों को नौकरों से भी बदतर ज़िंदगी जीने पर मजबूर कर रही थी।
उस दिन सुबह चार बजे से ही मुझे काम पर लगा दिया गया था।
होटल के विशाल हॉल में ताज़े फूलों की सजावट करना, मेहमानों की मेज़ों को व्यवस्थित करना, क्रॉकरी साफ करना, और भोजन के प्रबंध की देखरेख करना—यह सारा भारी काम अकेले मुझे ही सौंप दिया गया था। मैं एक नौकरानी की तरह बिना रुके, बिना कुछ खाए-पिए काम कर रही थी।
मेरी तीनों बेटियां घर के उसी छोटे से सीलन भरे कमरे में अकेली बंद थीं। जब मैंने सुबह सास से बिनती की थी कि मैं बच्चियों को भी साथ ले आती हूँ ताकि वे कुछ अच्छा खाना खा लेंगी, तो जानकी देवी ने मुझे एक ज़ोरदार डांट लगाई थी।
“खबरदार जो उन मनहूसों को यहाँ लेकर आई!” उन्होंने फुसफुसाते हुए धमकी दी थी। “इतने बड़े और हाई-सोसाइटी के इवेंट में उन भीखमंगियों की कोई जगह नहीं है। वे वहाँ आयेंगी तो मेरी नाक कट जाएगी। तू बस अपना काम कर और अपनी औकात में रह।”
दोपहर के तीन बज चुके थे। हॉल मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। हर तरफ महंगे परिधानों की चमक-दमक, इत्र की खुशबू और अभिजात वर्ग की गूँज थी।
मैं सिर झुकाए, हाथों में चाय और कॉफी की भारी ट्रे लिए मेहमानों के बीच से गुज़र रही थी। मेरी आँखें थकान से बंद हो रही थीं, पैर कांप रहे थे और भूख के मारे पेट में ऐंठन हो रही थी।

तभी, भीड़ के बीच से तेज़ी से गुज़रते हुए होटल के एक नए और घबराए हुए वेटर का ध्यान भटक गया। वह अचानक मुझसे टकरा गया।
हाथ से नियंत्रण छूट गया। चाय का एक कीमती चीनी मिट्टी का कप मेरी ट्रे से फिसलकर सीधे संगमरमर के चमकदार फर्श पर गिरा और एक ज़ोरदार छनछनाहट के साथ चकनाचूर हो गया। गर्म चाय फर्श पर फैल गई।
उस छनछनाहट की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरे विशाल हॉल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। लाइटों की चकाचौंध के बीच, सैकड़ों जोड़ों की आँखें मुड़कर मेरी तरफ देखने लगीं।
मैं घबरा गई। मेरा दिल इतनी तेज़ धड़कने लगा मानो सीने से बाहर आ जाएगा। मैं तुरंत नीचे झुकी और कांपते हाथों से कांच के टुकड़ों को समेटने लगी।
और ठीक उसी पल, मुख्य मंच पर बैठी जानकी देवी अपनी जगह से उठीं। उनके चेहरे पर गुस्सा और झूठा गुस्सा साफ देखा जा सकता था। उन्हें लगा कि यह उनके भव्य आयोजन में एक बड़ा दाग लग गया है।
वे भारी कदमों से चलती हुई मेरे पास आईं। सबके सामने, माइक की गूँज के बीच, उन्होंने बेहद कड़क और अपमानजनक स्वर में कहा, “तुम जहाँ भी जाती हो, सिर्फ और सिर्फ तबाही और शकुन ही फैलाती हो! इतने सालों से इस परिवार में रह रही हो, लेकिन आज तक तमीज़ का एक कतरा भी नहीं सीख सकीं। एक चाय का कप तक ढंग से नहीं पकड़ सकतीं? तुम्हारी इसी नालायकी की वजह से मेरे बेटे की ज़िंदगी तबाह हो गई थी!”
उनके शब्द किसी ज़हरीले तीर की तरह मेरे कलेजे को छलनी कर रहे थे।
सैकड़ों अमीर, पढ़े-लिखे और संभ्रांत लोगों की भीड़ में मैं एक लाचार, फटेहाल कपड़ों में लिपटी औरत ज़मीन पर घुटनों के बल बैठी थी। कांच के टुकड़े समेटते हुए मेरी उंगली कट गई थी और उससे खून बह रहा था, लेकिन मेरी आँखों से निकलते आँसू उस खून से भी ज्यादा गर्म थे।
मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं सिर उठाकर उस भरी सभा में अपने बचाव में एक शब्द भी कह पाती। मेरा आत्मसम्मान पूरी तरह से कुचल दिया गया था।
और ठीक तभी…
हॉल के सबसे मुख्य वीआईपी टेबल से एक भारी लकड़ी की कुर्सी के खिसकने की आवाज़ आई।
पूरे हॉल का ध्यान अचानक उस दिशा में चला गया।
एक लंबा, रोबीला और बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला शख्स अपनी जगह से धीरे-धीरे उठा।
वे थे विक्रांत सिंघानिया।
भारत के सबसे बड़े इंडस्ट्रियल ग्रुप के चेयरमैन, देश के अग्रणी हॉस्पिटल्स और मीडिया नेटवर्क के मालिक। विक्रांत सिंघानिया एक ऐसा नाम था जिसके आगे बड़े-बड़े राजनेता और नौकरशाह भी सिर झुकाते थे। वे बेहद कम बोलते थे, अपनी निजी ज़िंदगी को मीडिया से दूर रखते थे और उनके चेहरे पर हमेशा एक गहरा, विचारशील और सख्त भाव रहता था।
विक्रांत जी ने अपनी जगह से कदम बढ़ाए। उनके चलने में एक अजीब सा आत्मविश्वास और गरिमा थी।
पूरे हॉल में इतना सन्नाटा छा गया था कि किसी के सांस लेने की आवाज़ भी सुनी जा सकती थी। जानकी देवी ने जब देखा कि विक्रांत सिंघानिया खुद उस तरफ आ रहे हैं, तो उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्हें लगा कि देश का इतना बड़ा उद्योगपति शायद उनकी इस बेवकूफ बहू को डांटने या उनका समर्थन करने आ रहा है।
लेकिन विक्रांत जी जानकी देवी के पास आकर रुक गए। उनकी ठंडी, गहरी आँखें जानकी देवी के चेहरे पर गड़ गईं।
उन्होंने बेहद शांत, गंभीर और भारी आवाज़ में कहा—
“श्रीमती जानकी देवी… जो औरत आपके परिवार की मर्यादा है, जो आपके दिवंगत बेटे की अमानत है, क्या आप एक भरी सभा में, सैकड़ों अजनबियों के सामने, उसके साथ ऐसा घिनौना और अमानवीय व्यवहार करती हैं?”
विक्रांत जी के इस एक वाक्य ने मानों पूरे हॉल में एक बिजली का धमाका कर दिया हो। जानकी देवी का चेहरा पलभर में फक पड़ गया। उनकी ज़बान जैसे तालू से चिपक गई।
“व… विक्रांत जी… आप गलत समझ रहे हैं…” जानकी देवी ने हकलाते हुए सफाई देने की कोशिश की। “यह मेरी बहू है… यह हमेशा काम बिगाड़ देती है… इसे सिखाना पड़ता है…”
“सिखाना?” विक्रांत जी की आवाज़ में एक बर्फ जैसी ठंडक थी। “यह शिक्षा नहीं है, यह उत्पीड़न है। और वह भी उस मंच से, जहाँ आप ‘महिला सशक्तिकरण’ पर लाखों रुपये का चंदा इकट्ठा कर रही हैं।”
इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, विक्रांत सिंघानिया ने अपना बेहद कीमती, ब्रांडेड सूट का कोट अपने कंधों से निकाला।
वे धीरे से ज़मीन पर घुटनों के बल बैठे। सैकड़ों लोगों की नज़रों के सामने, देश के सबसे अमीर आदमियों में से एक, ज़मीन पर पड़ी एक रोती हुई, अशक्त औरत के सामने झुका था। उन्होंने अत्यंत सम्मान और नम्रता के साथ वह कोट मेरे कांपते हुए कंधों पर लपेट दिया ताकि मेरा फटा हुआ आंचल ढक सके।
उसी क्षण, मेरी नज़र हॉल के पिछले विशाल दरवाज़े पर पड़ी।
मेरी तीनों बेटियां—मेहा, सिमरन और नन्हीं पीहू—वहाँ दरवाज़े के पीछे छिपी खड़ी थीं। वे किसी तरह घर का ताला खोलकर, अपनी माँ को ढूंढते हुए उस बड़े होटल तक पहुँच गई थीं। अपनी माँ को इस तरह ज़मीन पर पड़ा और अपमानित होता देख, उन मासूमों की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। वे डर के मारे एक-दूसरे से चिपकी हुई थीं।
विक्रांत सिंघानिया की नज़र भी उन तीनों मासूम बच्चियों पर पड़ी।
वे अपनी जगह से उठे और सीधे हॉल के दरवाज़े की तरफ बढ़े। वे उन तीनों बच्चियों के सामने जाकर प्यार से अपने घुटनों पर बैठ गए। उन्होंने अपने रुमाल से नन्हीं पीहू के आँसू पोंछे और बेहद कोमल आवाज़ में कहा—
“रोओ मत मेरी बच्चियों। आज के बाद तुम्हें कभी यह सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि तुम इस दुनिया में अकेली हो या तुम्हारा कोई मोल नहीं है।”
वे बच्चियों का हाथ थामकर उन्हें वापस हॉल के बीच में ले आए। फिर वे मेरी तरफ मुड़े। उन्होंने अपनी गहरी आँखों से मुझे देखा और पूरी महफ़िल के सामने बुलंद आवाज़ में ऐलान किया—
“हीना जी… आप और आपकी ये तीनों बेटियां आज से, और इसी पल से, इस दुनिया में अकेली नहीं हैं। मैं विक्रांत सिंघानिया, आज इस भरी सभा में साक्षी मानकर यह घोषणा करता हूँ कि आज से आपकी और आपके बच्चों की हर एक ज़िम्मेदारी, उनके सम्मान, उनकी शिक्षा और उनकी सुरक्षा की पूरी जवाबदेही मेरी है।”
उस एक पल में… उस होटल के शानदार हॉल में मौजूद किसी भी इंसान ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि एक अनजान, बेघर और लाचार दिख रही औरत की ज़िंदगी में ईश्वर किस तरह का चमत्कार करने वाला था।
समारोह तुरंत खत्म हो गया। जानकी देवी का चेहरा ज़लील होकर काला पड़ चुका था। जो लोग कुछ देर पहले जानकी देवी की झूठी तारीफें कर रहे थे, वे अब उन पर थूक रहे थे और उन पर लानत भेज रहे थे।
विक्रांत सिंघानिया ने मुझे और मेरी तीनों बेटियों को अपनी निजी मर्सिडीज कार में बिठाया और अपने जुहू स्थित भव्य एस्टेट ले गए।
वहाँ पहुँचकर, उन्होंने हमें एक बेहद खूबसूरत, विशाल और आरामदायक कमरा दिया। मेरी बेटियों के लिए नए कपड़े, खिलौने और तरह-तरह के व्यंजन मँगवाए गए। पिछले एक साल में पहली बार मेरी बेटियों के चेहरे पर ऐसी बेफिक्र और सच्ची मुस्कान आई थी।
अगले ही दिन, विक्रांत जी ने अपने सबसे वरिष्ठ वकीलों की टीम को मेरे कमरे में भेजा।
“हीना जी,” वकीलों के प्रमुख ने कहा, “विक्रांत सर के सख्त निर्देश हैं कि आपके साथ हुए हर एक अन्याय का हिसाब कानून के ज़रिए लिया जाए। हमें बस आपकी सहमति चाहिए।”
मैंने अपनी बेटियों की तरफ देखा, जो उस विशाल बगीचे में हंसती हुई तितलियों के पीछे भाग रही थीं। मेरे अंदर की डरपोक औरत अब मर चुकी थी। एक माँ के रूप में, मुझे अपने बच्चों के हक के लिए खड़ा होना ही था।
मैंने कागज़ात पर अपने दस्तखत कर दिए।
अगले तीन महीनों में, विक्रांत जी के कानूनी तंत्र ने जानकी देवी के साम्राज्य को ताश के पत्तों की तरह बिखेर कर रख दिया।
वकीलों ने अदालत में सबूत पेश किए कि कैसे जानकी देवी ने अपने बेटे समीर के जाली दस्तखत बनाकर बैंक खातों से पैसे निकाले थे, कैसे उन्होंने धोखे से पुश्तैनी बंगला बेचा था, और कैसे वे एक विधवा बहू और तीन नाबालिग पोतियों को गैर-कानूनी ढंग से प्रताड़ित कर रही थीं।
अदालत का फैसला ऐतिहासिक आया।
जज ने जानकी देवी द्वारा बेचे गए बंगले की पूरी रकम, समीर के सभी बैंक डिपॉजिट, और मेरे सारे पुश्तैनी गहने मुझे तुरंत वापस लौटाने का सख्त आदेश दिया। इसके अलावा, घरेलू हिंसा (Domestic Violence) और जालसाज़ी के गंभीर आपराधिक मामलों के तहत, सत्तर साल की जानकी देवी को तीन साल की जेल की सजा सुनाई गई।
जब पुलिस जानकी देवी को हथकड़ी पहनाकर कोर्ट रूम से बाहर ले जा रही थी, तो वे बिलखते हुए मेरे पास आईं।
“हीना! मुझे माफ कर दे बेटा!” वे मेरे पैर पकड़ने लगीं। “मैं तेरी सास हूँ! मुझे जेल मत भेज! अपनी बेटियों के बारे में सोच, लोग क्या कहेंगे कि उनकी दादी जेल में है!”
मैंने अपनी नज़रों को कठोर किया और बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, “जब आप अपनी ही पोतियों को सीलन भरे कमरे में भूखा सुलाती थीं, जब आप मुझे ज़मीन पर फेंककर अपमानित करती थीं, तब आपको अपनी मर्यादा और रिश्तों का याद नहीं आया जानकी देवी जी? यह मेरी नफ़रत नहीं, यह आपके ही कर्मों की फसल है जो आज आप काट रही हैं।”
पुलिस उन्हें खींचते हुए ले गई। उनके रोने की आवाज़ें धीरे-धीरे कोर्ट परिसर के सन्नाटे में गायब हो गईं।
समय बीतता गया। दो साल पंख लगाकर उड़ गए।
विक्रांत जी ने केवल हमें कानूनी लड़ाई में ही मदद नहीं की, बल्कि उन्होंने मुझे अपनी कंपनी में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) विंग का हेड बना दिया। मैं, जो कभी चार दीवारों के बीच घुट रही थी, अब हज़ारों बेसहारा महिलाओं और अनाथ बच्चों के जीवन को संवारने का काम कर रही थी।
मेरी तीनों बेटियां—मेहा, सिमरन और पीहू—मुंबई के सबसे बेहतरीन इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने लगीं। उनकी प्रतिभा खिलकर बाहर आने लगी।
लेकिन इस सब के बीच, विक्रांत जी के प्रति मेरे दिल में जो सम्मान था, वह धीरे-धीरे एक बेहद गहरे, पवित्र और आत्मीय रिश्ते में बदलने लगा था। वे हर शाम हमारे साथ वक्त बिताते, मेरी बेटियों के साथ पढ़ाई में मदद करते, उनके साथ खेलते और मेरे सुख-दुख के साथी बनते।
उन्होंने कभी अपने एहसानों का दावा नहीं किया, कभी मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखी। उनका व्यक्तित्व एक विशाल बरगद के पेड़ की तरह था, जिसकी छाया में मेरा बिखरा हुआ जीवन फिर से पनप रहा था।
एक दिन शाम को, जब समंदर के किनारे ढलते हुए सूरज की लालिमा बिखरी हुई थी, विक्रांत जी ने मुझे बांद्रा के उसी सी-फेसिंग रेस्तरां में बुलाया।
वे सफेद कुर्ते-पायजामे में बेहद सौम्य लग रहे थे। उनके हाथ में एक छोटा सा मखमली डिब्बा था।
“हीना,” उन्होंने समंदर की लहरों की तरफ देखते हुए कहा, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी भावुकता थी। “जब मैंने तुम्हें उस दिन होटल के फर्श पर देखा था, तो मुझे केवल एक अन्याय दिखा था। लेकिन पिछले दो सालों में मैंने तुम्हें एक अद्भुत माँ, एक सशक्त औरत और एक सच्चे इंसान के रूप में देखा है।”
उन्होंने वह डिब्बा खोला। उसमें एक सादी सी सोने की अंगूठी थी।
“मैं तुम्हारी अतीत की जगह नहीं लेना चाहता, न ही मैं तुम पर कोई अधिकार जताना चाहता हूँ। लेकिन क्या तुम मुझे अपनी और अपनी तीनों बेटियों की ज़िंदगी में एक स्थायी साथी बनने का मौका दोगी? क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”
मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े—लेकिन इस बार ये आँसू दर्द या अपमान के नहीं थे, बल्कि असीम कृतज्ञता और खुशी के थे।
मैंने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उनके हाथ में दे दिया।
आज, मैं मुंबई के अपने नए घर की विशाल बालकनी में खड़ी हूँ। ठंडी समुद्री हवाएं मेरे बालों को छूकर गुज़र रही हैं।
सामने बगीचे में मेरी तीनों बेटियां अपने नए पापा, विक्रांत के साथ हंसती हुई खेल रही हैं। विक्रांत पीहू को अपने कंधों पर बिठाकर दौड़ रहे हैं और उनकी हँसी की गूँज पूरे घर में फैल रही है।
अपनी ज़िंदगी के उस भयानक दौर को याद करके आज मुझे डर नहीं लगता।
भगवान जब आपकी ज़िंदगी से कोई रास्ता बंद करता है, तो वह आपके लिए एक नया, ज्यादा सुंदर और सम्मानजनक रास्ता खोल देता है। बस ज़रूरत इस बात की होती है कि हम अपने स्वाभिमान को कभी न मरने दें, अपने हक के लिए आवाज़ उठाने से न डरें, और विश्वास रखें कि अंधेरी से अंधेरी रात के बाद भी एक खूबसूरत और चमकदार सवेरा ज़रूर आता है।
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