इस तरह दूध पीना पड़ सकता है भारी! पति-पत्नी दोनों को लि.वर कै.ंसर का पता चला
दूध को लंबे समय से संपूर्ण आहार माना जाता है। इसमें कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए…
सुबह के पाँच बजकर इक्कीस मिनट हुए थे। दिल्ली से सटे उस शांत आवासीय उपनगर में अभी भोर की पहली किरण भी ठीक से ज़मीन पर नहीं उतरी थी। पेड़ों पर परिंदों की हल्की चहचहाहट के अलावा पूरी कॉलोनी एक गहरी, निश्चिंत नींद में डूबी हुई थी। लेकिन मेरे घर के आँगन से आ रही उस भारी धातु की चरमराहट और लोहे के भारी गेट के टूटने की कर्कश आवाज़ ने मेरी नींद को किसी भयानक दुःस्वप्न की तरह एक झटके में उड़ा दिया।
मेरी आँखें खुलीं तो दिल किसी अनहोनी की आशंका से पसलियों को तोड़ने की हद तक धड़क रहा था। मैं चौंककर बिस्तर से उठी। कमरे में पसरे नीले अंधेरे में मैंने एक पल के लिए अपने बगल में सो रहे बच्चों को देखा। दस साल का आरव अपने छोटे भाई कबीर का हाथ पकड़े बेखबर सो रहा था, और दूसरी तरफ छह साल की तारा तथा सात साल की नन्ही अन्वी तकिए पर अपने चेहरे छुपाए नींद की आगोश में थीं। बाहर से आ रही आवाज़ कोई सामान्य खटपट नहीं थी—वह किसी भारी इंजन की घरघराहट और ज़मीन के कांपने की थरथराहट थी।

मैं नंगे पाँव बालकनी की खिड़की की तरफ भागी। जैसे ही मैंने पर्दा हटाया, जो नज़ारा मेरी आँखों के सामने था, उसने मेरे जिस्म के सारे खून को एक पल में बर्फ बना दिया। मेरी सांसें मेरे गले में ही अटक कर रह गईं।
हमारे घर के साइड वाले लोहे के छोटे गेट का ताला टूटा हुआ ज़मीन पर पड़ा था और गेट का एक पल्ला ज़मीन पर घिसट रहा था। हमारे हरे-भरे छोटे से लॉन की ताज़ा दूब को बेरहमी से कुचलते हुए कपूर कंस्ट्रक्शंस का एक विशालकाय, दस पहियों वाला रेडी-मिक्स कंक्रीट का ट्रक आँगन के ठीक बीचों-बीच खड़ा था। उस विशाल घूमते हुए ड्रम से जुड़ा लंबा लोहे का पाइप सीधे हमारे उस छोटे से खूबसूरत स्विमिंग पूल के ऊपर तना हुआ था।
और फिर, उस ड्रम की उल्टी दिशा में घूमने की घड़घड़ाहट के साथ ही, गाढ़ा, धूसर, चिपचिपा और बदबूदार कंक्रीट का एक विशाल सैलाब उस नीले पानी के साफ ताल में गिरने लगा। साफ़, नीला पानी मटमैले फेन में बदल रहा था, और हर गिरते हुए कंक्रीट के लच्छे के साथ मेरे स्वर्गीय पति राजीव की अंतिम सांसों की यादें उस मलबे के नीचे घुट-घुट कर दफन हो रही थीं।
ट्रक के पहियों के पास, अपनी रेशमी गुलाबी गाउन को समेटे, आँखों पर महंगा चश्मा टिकाए सुनीता कपूर खड़ी थी। उसके चेहरे पर एक ऐसी क्रूर, विजयी मुस्कान थी जो केवल दूसरों की लाचारी का मज़ाक उड़ाने वाले अहंकारी चेहरों पर ही दिखाई देती है। ट्रक के केबिन में उसका पति महेश कपूर बैठा था, जो अपने हाथों से उस हाइड्रोलिक लीवर को दबा रहा था ताकि कंक्रीट का बहाव और तेज़ हो सके।
उस एक पल में मेरी आँखों के सामने मेरी पूरी ज़िंदगी एक टूटी हुई फिल्म की तरह घूमने लगी।
वह पूल केवल सीमेंट, ईंट और नीली सिरेमिक टाइलों का कोई ढांचा नहीं था। वह मेरे पति राजीव के इस दुनिया में छोड़े गए वजूद का सबसे पवित्र हिस्सा था। राजीव एक बेहद मेहनती, ईमानदार सिविल इंजीनियर और छोटे कांट्रैक्टर थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी ईमानदारी से ईंट-गारे का हिसाब लगाकर हमारे इस छोटे से आशियाने को बनाया था। दो साल पहले जब उन्हें पेट के चौथे स्टेज के कैंसर का पता चला, तो हमारी दुनिया ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थी। डॉक्टरों ने जब हाथ खड़े कर दिए और कह दिया कि उनके पास सिर्फ कुछ ही महीनों का वक्त बचा है, तब राजीव टूटे नहीं थे।
अपनी असहनीय कीमोथेरेपी और हड्डियों को गला देने वाले दर्द के बावजूद, राजीव अपनी ज़िंदगी के आखिरी तीन महीनों में हर दोपहर इसी आँगन में एक पुरानी कुर्सी डालकर बैठा करते थे। उनके शरीर का वज़न घटकर आधा रह गया था, चेहरे का रंग पीला पड़ चुका था, लेकिन उनके हाथों में हमेशा एक लेज़र लेवलर और टाइल काटने वाली मशीन रहती थी।
जब मैं रोते हुए उनसे कहती, “राजीव, आप यह सब क्यों कर रहे हैं? डॉक्टर ने आपको बिस्तर से उठने तक के लिए मना किया है। आप आराम क्यों नहीं करते?”
तो वे अपनी कमज़ोर, सूखी उँगलियों से मेरे आँसू पोंछते और एक फीकी मगर गहरी मुस्कान के साथ कहते थे, “मीरा, मैं जानता हूँ कि मेरे जाने के बाद तुम्हारे और इन चारों बच्चों के सिर पर दुखों का पहाड़ टूटने वाला है। मैं तुम्हारे लिए कोई बहुत बड़ी जागीर या करोड़ों की वसीयत छोड़कर नहीं जा रहा। लेकिन मैं अपने इन मासूम बच्चों के लिए एक ऐसी जगह छोड़कर जाना चाहता हूँ जहाँ वे जब भी हँसें, खेलें या पानी में छपाक करें, तो उन्हें यह एहसास हो कि उनका बाप अपनी बाहें फैलाए उनके इर्द-गिर्द मौजूद है। मैं उनके लिए ताउम्र की गर्मियों की खुशियाँ इस नीले पानी में छोड़कर जाना चाहता हूँ।”
राजीव ने अपने कांपते हाथों से उस पूल की एक-एक नीली टाइल को खुद छूकर सीधा किया था। उन्होंने उस पूल के किनारे पर अपने और चारों बच्चों के हाथों के छोटे-छोटे निशान एक गीली सीमेंट की तख्ती पर उकेरे थे। और उस पूल के बनकर तैयार होने के ठीक बाईस दिन बाद, राजीव ने इसी आँगन में मेरी गोद में अपना सिर रखकर हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद ली थीं।

राजीव के जाने के बाद, पिछले दो सालों में मैंने एक औरत और एक माँ के रूप में अपने आँसुओं को अपनी ताक़त बना लिया था। अकेले चार बच्चों का पालन-पोषण करना, सुबह पाँच बजे उठकर उनके टिफिन तैयार करना, बैंक की कागज़ी कार्रवाइयों को समझना, बिजली के बिल और स्कूल की भारी-भरकम फीसों का इंतज़ाम करना, और रात को जब चारों बच्चे सो जाएं तो तकिए में मुँह दबाकर अकेले रोना—यह मेरी रोज़ की ज़िंदगी बन चुकी थी।
लेकिन सुनीता कपूर के लिए हमारी यह सादगी और लाचारी शायद उनका शिकार करने का सबसे आसान जरिया बन गई थी। सुनीता इस पॉश सोसाइटी की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) की जॉइंट सेक्रेटरी थी। उसके पति महेश कपूर की अपनी कंक्रीट और कंस्ट्रक्शन की कंपनी थी, जिसका इलाके के भ्रष्ट राजनेताओं और नगर निगम के अधिकारियों के साथ गहरा गठजोड़ था। सुनीता अपनी इस छोटी सी कुर्सी और पति के काले धन के नशे में इस कदर चूर थी कि वह पूरी लेन को अपनी निजी जागीर समझती थी।
उसे हमारे घर से हर चीज़ से चिढ़ थी। कभी दीवाली पर हमारे बरामदे में जलते दीयों की कतार से उसे दिक्कत होती, तो कभी गेट पर रखे माँ तुलसी के चौबारे से। कभी बच्चों की छोटी साइकिलें सड़क के किनारे खड़ी हो जातीं, तो वह आकर हमारे मुख्य दरवाज़े पर लातें मारती थी। लेकिन उसकी सबसे बड़ी नफ़रत उस छोटे से पूल से थी। जब भी चिलचिलाती धूप में आरव, कबीर, तारा और नन्ही अन्वी उस पूल के पानी में उतरते और उनकी किलकारियाँ हवा में गूँजतीं, तो सुनीता अपनी बालकनी में आकर चीखने लगती थी। उसे बच्चों की वह मासूम हँसी किसी कांटे की तरह चुभती थी, क्योंकि वह हँसी उसे यह याद दिलाती थी कि एक लाचार और बेसहारा मानी जाने वाली औरत के घर में भी खुशियाँ ज़िंदा थीं।
सिर्फ दो दिन पहले की ही तो बात थी। शाम के वक्त बच्चे स्कूल से लौटकर उस ठंडे पानी में खेल रहे थे। अन्वी अपनी पीली बत्तख वाली फ्लोटिंग ट्यूब को सीने से लगाए पानी में पाँव मार रही थी और आरव उसे तैरना सिखा रहा था।
अचानक सुनीता बिना किसी अनुमति के हमारे मुख्य गेट को धकेलते हुए सीधे आँगन में घुस आई थी। उसके हाथ में एक भारी फाइल थी और चेहरे पर नफ़रत का ज़हर।
उसने अपने चश्मे को नाक से नीचे खिसकाते हुए बच्चों पर अपनी तीखी उँगली तान दी थी, “ऐ जंगली बच्चों! तुरंत इस पानी से बाहर निकलो!”
उसकी भयानक आवाज़ सुनकर चारों बच्चे सहम गए थे। अन्वी डर के मारे रोने लगी थी और आरव ने तुरंत आगे बढ़कर अपनी छोटी बहनों को अपने पीछे छुपा लिया था।
मैं रसोई से हाथ पोंछती हुई बाहर भागी थी, “सुनीता जी! यह क्या तरीका है? आप मेरे बच्चों को इस तरह क्यों डरा रही हैं?”
सुनीता ने अपनी ठुड्डी हवा में उठाई और बेहद बदतमीज़ी से कहा था, “मीरा, अपने इन अनाथों को तमीज़ सिखाओ! यह कोई सार्वजनिक मेला नहीं है जहाँ हर शाम यह शोर-शराबा चले। इस सोसाइटी के कुछ कायदे-कानून हैं। अगर तुम्हारे बच्चे यहाँ रहेंगे, तो उन्हें कब्रिस्तान की तरह शांत रहना होगा!”
मेरे तन-बदन में आग लग गई थी। राजीव के जाने के बाद मैंने बहुत कुछ सहा था, लेकिन अपने बच्चों के लिए ‘अनाथ’ शब्द सुनकर मेरे भीतर की माँ चीख उठी थी।
मैंने सीधे उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा था, “सुनीता कपूर, यह मेरा निजी घर है और यह मेरे बच्चों का अपना आँगन है। वे किसी की सड़क पर नहीं, अपने पिता के बनाए पूल में खेल रहे हैं। और आप बिना मेरी इजाज़त के मेरे घर की चारदीवारी के अंदर कदम रखने की हिम्मत कैसे कर सकती हैं? तुरंत बाहर निकलिए यहाँ से!”
सुनीता का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा था। उसने अपनी उँगली मेरे चेहरे के ठीक सामने हिलाते हुए वह ज़हरीली धमकी दी थी जिसने उस शाम को खौफनाक बना दिया था।
उसने कहा था, “मुझसे ज़बान लड़ाने की यह हिम्मत? याद रखना मीरा, इस इलाके में मेरी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। अगर तुम्हारे बच्चों की यह आवाज़ दोबारा मेरी बालकनी तक आई, तो मैं इस ज़मीन से इस पूल का नामो-निशान मिटा दूँगी। यह मेरी आखिरी चेतावनी है!”
और आज सुबह, उस औरत ने अपनी उसी घिनौनी धमकी को एक खौफनाक हकीकत में बदल दिया था।
खिड़की के शीशे से जब मैंने कंक्रीट के उस भारी मलबे को राजीव के सपनों पर गिरते देखा, तो मेरा कलेजा मुँह को आ गया। मैं पागलों की तरह सीढ़ियों से नीचे भागी। मैंने अपना मोबाइल फोन उठाया और मुख्य दरवाज़ा खोलकर आँगन में कूद पड़ी।
“रोको इसे! महेश कपूर, अपनी यह गंदी मशीन तुरंत बंद करो!” मैं पूरी ताक़त से चीखी।
मेरी आवाज़ सुनकर महेश ने ट्रक के शीशे से बाहर झांका। उसके चेहरे पर एक कुटिल, घमंडी मुस्कान उभरी, लेकिन उसने मशीन बंद करने के बजाय कंक्रीट के डिस्चार्ज लीवर को और घुमा दिया। गाढ़ा, पत्थर जैसा कंक्रीट अब तक पूल के आधे हिस्से को भर चुका था। पानी किनारों से छलक कर लॉन की मिट्टी में बह रहा था।
सुनीता ने जब मुझे हाथ में फोन लिए वीडियो बनाते देखा, तो वह तेज़ी से मेरी तरफ लपकी। उसकी आँखें गुस्से से जल रही थीं।
“फोन बंद कर मीरा! यह वीडियो बनाने का ड्रामा बंद कर!” उसने झपटकर मेरा हाथ पकड़ना चाहा।
मैंने फुर्ती से अपना हाथ पीछे खींचा और अपने फोन का कैमरा सीधे उसके चेहरे, ट्रक की नंबर प्लेट, गेट के टूटे हुए ताले और आँगन में मलबे के रूप में बहते कंक्रीट पर घुमा दिया। मेरा हाथ कांप रहा था, लेकिन मेरी आवाज़ में एक ऐसा फौलादी संकल्प था जो मैंने खुद कभी महसूस नहीं किया था।
“सुनीता कपूर, तुम अपनी हदें पार कर चुकी हो। तुमने रात के अंधेरे में मेरे घर की बाउंड्री तोड़ी है, मेरी निजी संपत्ति पर डाका डाला है और मेरे पति की निशानी को बर्बाद किया है। यह सब कुछ इस कैमरे में रिकॉर्ड हो रहा है!” मैंने दहाड़ते हुए कहा।
सुनीता ने एक ठहाका लगाया, “निजी संपत्ति? यह सोसाइटी की शांति का मामला है! RWA के नियमों के तहत यह अवैध निर्माण था जो पड़ोसियों के लिए उपद्रव बन चुका था। मैंने बस कॉलोनी के हित में इस गड्ढे को भरवाया है। जा, जो करना है कर ले! पुलिस बुला, कोर्ट जा… जब तक तू कागज़ लेकर आएगी, तब तक यह कंक्रीट पत्थर बन चुका होगा और तेरे पास रोने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचेगा!”
उसी पल पीछे से मुख्य दरवाज़े पर एक दर्दनाक चीख गूंजी।
“मम्मा… पापा का पूल!”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। चारों बच्चे दरवाज़े पर खड़े थे। तारा और अन्वी ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रो रही थीं। कबीर अपनी छोटी मुट्ठियाँ भींचे कांप रहा था। और दस साल का आरव… उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में जो गहरा, बेबस दर्द था, उसने मेरे सीने को छलनी कर दिया।
आरव दौड़कर मेरे पास आया। उसने अपनी कांपती उँगलियों से मेरा पल्लू पकड़ लिया और उस मलबे में डूबते पूल को देखते हुए सिसक उठा, “मम्मा… पापा ने कहा था कि वे इस पानी में हमेशा हमारे पास रहेंगे… ये अंकल पापा को क्यों मार रहे हैं? मम्मा, प्लीज़ पापा के पूल को बचा लो ना!”
उस मासूम बच्चे के उन शब्दों—‘ये अंकल पापा को क्यों मार रहे हैं’—ने मेरे भीतर के सारे संकोच, सारे डर और सारी कमज़ोरी को एक ही पल में राख कर दिया। उस एक सेकंड में मेरे भीतर की लाचार विधवा मर गई और उसकी जगह अपने बच्चों के हक़ के लिए किसी भी हद तक जाने वाली एक शेरनी ने जन्म ले लिया।
मैंने अपने बच्चों को अपने सीने से लगाया। मैंने आरव के सिर को चूमा और बेहद शांत, बर्फ जैसी ठंडी आवाज़ में कहा, “आरव, अपनी बहनों और भाई को अंदर ले जाओ। दरवाज़ा अंदर से बंद करो। तुम्हारी मम्मा आज अपने बच्चों की खुशियों पर किसी की नज़र नहीं लगने देगी।”
बच्चों को अंदर भेजने के बाद, मैंने बिना एक पल गंवाए अपने फोन से सीधे अपने देवर, निखिल को फोन मिलाया।
निखिल राजीव का छोटा भाई था। वह दिल्ली की एक प्रतिष्ठित नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में सीनियर सर्वे एंड जियोमैटिक्स इंजीनियर था। राजीव के जाने के बाद निखिल ने हमेशा एक साए की तरह हमारा साथ दिया था, लेकिन हमने कभी उसे अपनी रोज़मर्रा की पड़ोस की छोटी-मोटी खटपट में घसीटना ठीक नहीं समझा था।
फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ से निखिल की भारी, गंभीर आवाज़ आई, “हाँ, भाभी? इतनी सुबह सब खैरियत तो है ना?”
मैंने अपनी सांसों को काबू में करते हुए बिना रोए, बेहद सटीक शब्दों में कहा, “निखिल, सुनीता और महेश कपूर ने सुबह-सुबह हमारे साइड गेट का ताला तोड़कर अंदर रेडी-मिक्स ट्रक घुसा दिया है। वे इस वक्त राजीव के बनाए पूल को कंक्रीट से पाट रहे हैं। उन्होंने आधा पूल भर दिया है।”
दूसरी तरफ एक भयानक, सन्न कर देने वाली खामोशी छा गई। मैं फोन के उस पार निखिल की तेज़ होती सांसों की आवाज़ सुन सकती थी।
कुछ सेकंड बाद निखिल की आवाज़ आई—उसमें कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक बेहद खतरनाक और नपा-तुला ठहराव था। “भाभी, आप मेरी बात बहुत ध्यान से सुनिए। आप उन दोनों से कोई हाथापाई या बहस नहीं करेंगी। आप एक सुरक्षित दूरी पर खड़ी होकर उस ट्रक के हर हिस्से, कंक्रीट के बैच मिक्सर के स्टिकर, ड्राइवर की सीट, टूटे हुए गेट और कपूर दंपत्ति की गतिविधियों का लगातार 4K वीडियो बनाती रहिए। मैं ठीक दो घंटे में आपके पास पहुँच रहा हूँ। और हाँ… राजीव भैया की वह अलमारी में रखी नीली प्लास्टिक वाली फाइल निकालकर टेबल पर रख लीजिए।”
“नीली फाइल?” मैंने पूछा।
“हाँ, भाभी। जिसमें भैया ने इस पूरे प्लॉट के ओरिजिनल डिमार्केशन (सीमांकन), म्यूटेशन, सीवर लाइन अप्रूवल और सैटेलाइट लैंड सर्वे के दस्तावेज़ रखे थे। बस वह फाइल निकालिए। आज कपूर परिवार को समझ आएगा कि एक सिविल इंजीनियर के घर में गैर-कानूनी कंक्रीट डालने का क्या अंजाम होता है।”
फोन कट गया।
अगले दो घंटे किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। महेश और सुनीता ने पूरा ट्रक खाली कर दिया था। लगभग आठ क्यूबिक मीटर गाढ़ा कंक्रीट उस पूल में भर चुका था। पानी पूरी तरह गायब हो चुका था और उसकी जगह सीमेंट का एक भयानक, बदसूरत स्लैब आकार ले रहा था। काम खत्म होते ही महेश ने ट्रक को बाहर निकाला और टूटे हुए गेट को वैसे ही खुला छोड़कर अपनी कोठी के अंदर चले गए, जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।
सुबह के ठीक साढ़े नौ बजे, हमारी गली में तीन गाड़ियाँ एक के पीछे एक आकर रुकीं।
पहली गाड़ी से निखिल उतरा। उसके साथ एक बेहद शालीन और सख्त चेहरे वाली महिला थीं, जिन्होंने काले रंग का ब्लेज़र पहना हुआ था—वे दिल्ली हाईकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता अदिति शर्मा थीं। दूसरी गाड़ी से दो युवा तकनीकी विशेषज्ञ उतरे, जिनके हाथों में पीले रंग के आधुनिक डिजिटल टोटल स्टेशन (लैंड सर्वे के उपकरण) और जीपीएस ट्राइपॉड थे। और तीसरी सरकारी गाड़ी से, जिस पर राज्य नगर विकास प्राधिकरण की नीली बत्ती लगी थी, इलाके के आधिकारिक जूनियर इंजीनियर (JE) राकेश सक्सेना उतरे।
निखिल सीधे मेरे पास आया। उसने मेरे सिर पर हाथ रखा और झुककर मेरे कांपते हुए हाथों को थामा, “भाभी, आप बिल्कुल मत डरिए। भैया के खून-पसीने के एक-एक कतरे का हिसाब आज कानून के सामने होगा।”
अधिवक्ता अदिति शर्मा ने आगे बढ़कर मुझसे हाथ मिलाया, “मीरा जी, निखिल ने मुझे रास्ते में पूरा मामला समझाया है और आपके भेजे गए वीडियो मैंने देख लिए हैं। यह सिर्फ ट्रेसपासिंग (अवैध प्रवेश) या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का मामला नहीं है। यह एक सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र है। क्या आपके पास मकान के मूल दस्तावेज़ हैं?”
मैंने तुरंत राजीव की वह पुरानी नीली फाइल अदिति जी के हाथों में सौंप दी।
राजीव एक बेहद व्यवस्थित इंजीनियर थे। उस फाइल में न केवल हमारे मकान की 2011 की मूल रजिस्ट्री और नगर निगम का स्वीकृत नक्शा था, बल्कि जब राजीव ने यह मकान बनवाया था, तब उन्होंने सरकारी सर्वेयर से इस पूरे प्लॉट का एक-एक इंच का डिजिटल टीएसएम (Total Station Mapping) सर्वे करवाकर उसकी लैमिनेटेड प्रति भी सुरक्षित रखी थी।
सर्वेयर वर्मा जी और उनकी टीम ने बिना एक पल गंवाए हमारे आँगन में अपने अत्याधुनिक लेज़र टोटल स्टेशन और ट्राइपॉड स्थापित कर दिए।
उन्होंने हमारे घर के स्वीकृत सीमांकन बिंदुओं (Boundary Benchmarks) पर लेज़र रिफ्लेक्टर लगाए और उपग्रह से जुड़े जीपीएस निर्देशांकों (Coordinates) की गणना शुरू कर दी। लाल लेज़र की किरणें हमारे आँगन से होती हुई सुनीता कपूर की उस आठ फीट ऊँची, नक्काशीदार सजावटी बाउंड्री वॉल की तरफ जाने लगीं, जिसे सुनीता ने पिछले साल अपनी कोठी के नवीनीकरण के वक्त बनवाया था।
लगभग पंद्रह मिनट तक कंप्यूटर स्क्रीन पर मैप का मिलान करने के बाद, सर्वेयर वर्मा जी के चेहरे पर एक अजीब सा अविश्वास और हैरानी का भाव उभर आया। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया, नक्शे को दोबारा देखा, और फिर जूनियर इंजीनियर सक्सेना जी को अपनी स्क्रीन की तरफ इशारा किया।
“सक्सेना जी, ज़रा यहाँ देखिए। यह अविश्वसनीय है!” वर्मा जी ने कहा।
इंजीनियर सक्सेना ने स्क्रीन पर झुककर देखा और उनकी आँखें भी चौंक कर बड़ी हो गईं।
“मीरा जी,” अधिवक्ता अदिति शर्मा ने बहुत ही गंभीर और तीखी आवाज़ में मुझसे कहा, “क्या आपको पता है कि आपकी पड़ोसन सुनीता कपूर ने पिछले साल जो अपनी यह भव्य बाउंड्री वॉल और उसके ऊपर बना इटैलियन मार्बल का फव्वारा खड़ा किया है, वह कहाँ बना है?”
“कहाँ?” मैंने कांपते होंठों से पूछा।
अदिति जी ने नीली फाइल की उस लैमिनेटेड शीट पर अपनी उँगली रखी, “सुनीता कपूर की पूरी की पूरी 40 फीट लंबी सजावटी दीवार आपकी रजिस्टर्ड निजी ज़मीन के अंदर ठीक 70 सेंटीमीटर (लगभग सवा दो फीट) का अतिक्रमण करके बनाई गई है!”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या? सवा दो फीट?”
“हाँ!” निखिल ने आगे बढ़कर कहा। “जब राजीव भैया जीवित थे, तो कपूर परिवार ने उनसे झूठा वादा किया था कि वे अपनी पुरानी दीवार की जगह पर ही नई दीवार बना रहे हैं। भैया अपनी बीमारी के चलते उस वक्त इसका आधिकारिक नाप नहीं करवा पाए थे। लेकिन इस डिजिटल मास्टर मैप के अनुसार, कपूर परिवार ने आपकी लगभग 90 वर्ग फीट बेशकीमती ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा करके अपनी यह आलीशान दीवार खड़ी कर रखी है!”
अभी यह सनसनीखेज खुलासा हुआ ही था कि तभी जूनियर इंजीनियर सक्सेना जी, जो उस समय आँगन में फैले कंक्रीट और टूटे गेट के पास खड़े उस खाली कंक्रीट बैग और मिक्सर के ड्रिप मार्क की जाँच कर रहे थे, अचानक चौंक उठे।
सक्सेना जी ने अपने मोबाइल पर नगर निगम के निर्माण पोर्टल का डेटाबेस खोला। उन्होंने उस कंक्रीट के बचे हुए मलबे के रंग, उसकी गिट्टी के आकार और उस पर छपे बैच कोड ‘PWD-SEC-4-DRN-098’ को ध्यान से देखा। उनकी भौंहें बुरी तरह तन गईं और उनके चेहरे पर गहरा गुस्सा छा गया।
“यह नामुमकिन है… इतनी बड़ी हिम्मत!” सक्सेना जी बड़बड़ाए।
अदिति जी ने पूछा, “क्या हुआ, सक्सेना जी? क्या कोई और गड़बड़ी है?”
इंजीनियर सक्सेना ने अपनी डायरी निकाली और गुस्से में कांपती आवाज़ में कहा, “मैडम, यह जो कंक्रीट यहाँ इस निजी आँगन में डाला गया है, यह कोई बाज़ार से खरीदा हुआ निजी कंक्रीट नहीं है। यह M-30 ग्रेड का वह विशेष प्री-मिक्स्ड कंक्रीट है, जो आज सुबह 5 बजे सेक्टर-4 के मुख्य सरकारी स्टॉर्म-वॉटर ड्रेनेज (नाले) के निर्माण कार्य के लिए नगर निगम के सरकारी प्रोजेक्ट पर डिलीवर होना था! महेश कपूर की कंपनी ‘कपूर कंस्ट्रक्शंस’ को उस सरकारी नाले के निर्माण का ठेका मिला हुआ है।”
निखिल ने अपनी आँखें सिकोड़ीं, “इसका मतलब?”
“इसका सीधा मतलब यह है कि महेश कपूर ने सरकारी खजाने से स्वीकृत, जनता के टैक्स के पैसे से खरीदे गए सरकारी सीमेंट और कंक्रीट के पूरे ट्रक को सरकारी साइट से डायवर्ट करके, चोरी-छिपे यहाँ एक निजी रंजिश निकालने के लिए एक विधवा के घर में गैर-कानूनी तरीके से झोंक दिया!” सक्सेना जी ने अपनी फाइल पर एक लाल निशान लगाते हुए कहा। “यह सीधे-सीधे सरकारी संपत्ति की चोरी, सार्वजनिक पद के दुरुपयोग, प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) और सरकारी अनुबंध के उल्लंघन का संगीन गैर-ज़मानती आपराधिक मामला बनता है!”
उसी समय, बाहर गाड़ियों का शोर और सर्वे उपकरणों को देखकर, सुनीता कपूर अपनी कोठी का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली। उसके पीछे महेश कपूर भी अखबार हाथ में लिए इतराता हुआ बाहर आया था। उन्हें लगा था कि शायद कोई आम पड़ोस का झगड़ा चल रहा है।
सुनीता ने अपनी कर्कश आवाज़ में चिल्लाना शुरू किया, “अरे! यह मेरी कोठी के सामने किस भिखारी का मेला लगा रखा है? यह सरकारी गाड़ी यहाँ क्या कर रही है? सक्सेना, तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ? RWA की जॉइंट सेक्रेटरी हूँ मैं! तुरंत अपनी यह नौटंकी यहाँ से हटाओ!”
अधिवक्ता अदिति शर्मा ने बहुत ही शांत, सधे हुए कदमों से आगे बढ़कर सुनीता और महेश के ठीक सामने अपने कदम रोके। उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी हुई नीली फाइल को एक झटके से बंद किया, जिससे एक तीखी आवाज़ गूंजी।
“सुनीता कपूर, अपनी आवाज़ नीची रखिए,” अदिति जी की आवाज़ में कानून की वह ठंडक थी जो किसी भी अपराधी की रीढ़ में कंपकंपी पैदा कर दे। “आप कौन हैं, यह तो अब पूरा शहर जानेगा। पहली बात—जिस ज़मीन पर खड़े होकर आप यह घमंड दिखा रही हैं, आपकी वह 40 फीट लंबी नक्काशीदार दीवार मीरा जी की निजी संपत्ति पर 70 सेंटीमीटर का गैर-कानूनी अतिक्रमण है। हम अगले दो घंटे के भीतर इस पूरी दीवार को ध्वस्त करने का आधिकारिक डिमोलिशन नोटिस जारी कर रहे हैं।”
सुनीता का चेहरा एक पल में सफेद पड़ गया। उसका मुँह खुला का खुला रह गया, “क्या… क्या बकवास है? यह मेरी ज़मीन है!”
“यह आपकी ज़मीन नहीं है, मिसेज़ कपूर,” सर्वेयर वर्मा जी ने टोटल स्टेशन की डिजिटल स्क्रीन को उसके मुँह के सामने घुमाते हुए कहा। “यह सैटेलाइट जीपीएस मैपिंग है। आपके फव्वारे और दीवार का हर एक इंच मीरा जी के रजिस्टर्ड खसरा नंबर के अंदर घुसा हुआ है।”
तभी जूनियर इंजीनियर सक्सेना जी ने आगे बढ़कर महेश कपूर की आँखों में आँखें डालीं। महेश के हाथ से वह अखबार छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
सक्सेना जी ने अत्यंत कड़े शब्दों में कहा, “और मिस्टर महेश कपूर, अपनी इस गैर-कानूनी गुंडागर्दी के लिए आपने जो आज सुबह 5:21 पर सरकारी ड्रेनेज प्रोजेक्ट का ट्रक नंबर DL-1GB-4421 यहाँ घुसाया था, उसका पूरा जीपीएस लॉग और कंक्रीट बैच कोड मेरे पास आ चुका है। आपने सरकारी प्रोजेक्ट की सामग्री चुराकर एक निजी अपराध को अंजाम दिया है। मैंने एंटी-करप्शन ब्रांच (ACB) और स्थानीय पुलिस स्टेशन को आधिकारिक सूचना भेज दी है। आपकी कंपनी का लाइसेंस तुरंत प्रभाव से ब्लैकलिस्ट किया जा रहा है और आपकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हो रहा है!”
‘ब्लैकलिस्ट’ और ‘गिरफ्तारी’ के शब्द सुनते ही महेश कपूर के चेहरे की सारी हेकड़ी हवा हो गई। उसके माथे पर पसीने की मोटी-मोटी बूँदें छलक आईं। उसके घुटने कांपने लगे। जिस रसूख और पैसे के दम पर वह पिछले दो साल से एक बेसहारा परिवार को कुचलने का सपना देख रहा था, वही रसूख आज कानून के फंदे में बदलकर उसके गले तक पहुँच चुका था।
उसी वक्त मुख्य सड़क पर पुलिस की दो पीसीआर वैन सायरन बजाती हुई आकर रुकीं।
गाड़ियों से स्थानीय पुलिस थाने के इंस्पेक्टर अपनी पूरी टीम के साथ बाहर निकले। उनके हाथों में मीरा द्वारा सुबह रिकॉर्ड की गई वह वीडियो क्लिप थी जो निखिल ने सीधे जिले के डीसीपी (DCP) को फॉरवर्ड कर दी थी।
मोहल्ले के दर्जनों लोग, जो अब तक सुनीता कपूर के डर से अपने घरों में दुबके रहते थे, अब अपनी बालकनियों और छतों पर निकल आए थे। RWA के प्रेसिडेंट और अन्य वरिष्ठ सदस्य भी मौके पर पहुँच चुके थे। जब सबको यह पता चला कि सुनीता कपूर ने न केवल एक अनाथ बच्चों के परिवार पर ज़ुल्म किया, बल्कि सरकारी खजाने की चोरी और ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा भी कर रखा था, तो पूरी सोसाइटी में सुनीता के खिलाफ थू-थू होने लगी।
सुनीता पागलों की तरह चीखने लगी, “महेश, कुछ करो! फोन लगाओ मंत्री जी को! यह सब झूठ है!”
लेकिन महेश की हिम्मत जवाब दे चुकी थी। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और इंस्पेक्टर के सामने हाथ जोड़ने लगा, “साहब… मुझसे गलती हो गई… मैं सारा कंक्रीट अभी हटवा देता हूँ… मैं पूरा हर्जाना भरने को तैयार हूँ… प्लीज़ मुझे गिरफ्तार मत कीजिए!”
इंस्पेक्टर ने झिड़क कर उसका हाथ हटाया, “कानून का मज़ाक समझ रखा है तुमने? एक बेसहारा माँ के घर में डाका डालकर उसके बच्चों की खुशियाँ छीनने निकले थे? अब अपनी यह सफाई अदालत में देना!”
पुलिस ने महेश कपूर को पकड़कर सीधे पुलिस वैन के अंदर धकेल दिया।
अधिवक्ता अदिति शर्मा ने सुनीता की तरफ देखा, जिसकी आँखों में अब केवल खौफ और ज़िल्लत के आँसू थे। अदिति जी ने बहुत ही साफ शब्दों में कहा, “सुनीता कपूर, आपके पास दो रास्ते हैं। या तो अगले चौबीस घंटे के भीतर आप अपने खर्चे पर इस पूरे कंक्रीट को इस पूल से कटवाकर बाहर निकलवाएँगी, हमारे मुवक्किल के पूरे लॉन और टूटे हुए गेट की मरम्मत का दस लाख रुपये का हर्जाना भरेंगी, और अपनी इस 70 सेंटीमीटर की अवैध दीवार को खुद अपने हाथों से तुड़वाएँगी… वरना कल सुबह नगर निगम का बुलडोज़र आपकी इस पूरी कोठी के अवैध हिस्से को मलबे में तब्दील कर देगा!”
सुनीता का सिर शर्म और पराजय के बोझ से हमेशा के लिए झुक गया। वह एक शब्द भी नहीं बोल सकी और रोते हुए अपने घर के अंदर भाग गई।
अगले तीन दिनों तक उस आँगन का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था।
कपूर कंस्ट्रक्शंस के ही मज़दूर और आधुनिक कंक्रीट कटर मशीनें दिन-रात काम कर रही थीं। जो कंक्रीट अभी पूरी तरह सूखा नहीं था, उसे हाइड्रोलिक जैकहैमर और कटर से एक-एक इंच काटकर बाहर निकाला गया। सुनीता की वह 70 सेंटीमीटर की घमंडी, नक्काशीदार दीवार बुलडोज़र के एक ही वार में भरभराकर गिर पड़ी और हमारी ज़मीन की मूल सीमा पर एक नई, सुंदर बाउंड्री वॉल खड़ी की गई।
निखिल और मैंने खुद खड़े होकर उस पूल की सफाई करवाई। कंक्रीट के हटने के बाद, जब हमने उस पर पानी की तेज़ धार मारी, तो नीचे से वही नीली, चमकदार सिरेमिक टाइलें दोबारा मुस्कुराती हुई बाहर निकल आईं। और सबसे बढ़कर—पूल के उस कोने पर राजीव और बच्चों के हाथों के वे छोटे-छोटे निशान, जो सीमेंट की तख्ती पर बने थे, पूरी तरह सुरक्षित थे। कंक्रीट की वह ज़हरीली परत भी उस अमर प्रेम के निशानों को मिटा नहीं पाई थी।
चौथे दिन की शाम को, आसमान में एक बेहद खूबसूरत, गुलाबी और सुनहरी शाम ढल रही थी।
पूल में दोबारा ताज़ा, ठंडा और नीला पानी लबालब भर दिया गया था। पानी की सतह पर ढलते सूरज की किरणें हीरों की तरह चमक रही थीं।
आरव, कबीर, तारा और नन्ही अन्वी अपने रंग-बिरंगे स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहनकर, हाथ में अपनी वही पीली बत्तख वाली ट्यूब लिए आँगन में खड़े थे। उनके चेहरों पर अब कोई खौफ नहीं था, कोई डर नहीं था।
अन्वी ने दौड़कर मेरा हाथ पकड़ा, “मम्मा… क्या अब हम पानी में जा सकते हैं? क्या अब पापा का पूल बिल्कुल ठीक है?”
मेरी आँखों से खुशी के दो बूँद आँसू छलक कर मेरे गालों पर बह निकले। मैंने नीचे झुककर अपने चारों बच्चों को एक साथ अपनी बाहों में समेट लिया।
“हाँ, मेरे बच्चों,” मैंने रुंधे हुए मगर गर्व से भरे गले से कहा। “यह तुम्हारे पापा का प्यार है। और दुनिया की कोई भी ताकत, कोई भी कंक्रीट, एक पिता के अपने बच्चों के लिए छोड़े गए प्यार को कभी नहीं दबा सकती। जाओ, जी भर के खेलो!”
चारों बच्चों ने एक साथ उस नीले पानी में छलांग लगा दी।
‘छपाक’ की उस गूंजती हुई खूबसूरत आवाज़ के साथ ही पानी की फुहारें चारों तरफ बिखर गईं। बच्चों की वह खिलखिलाती, मासूम हँसी एक बार फिर शाम की ठंडी हवाओं में तैरने लगी।
मैं आँगन के किनारे उस पुरानी कुर्सी पर बैठ गई। मैंने अपनी आँखें मूँद लीं। उस ठंडी, भीगी हवा के झोंके में मुझे ऐसा लगा जैसे राजीव मेरे ठीक पीछे खड़े हैं, उनका हाथ बड़े लाड़ से मेरे कंधे पर रखा है, और वे मंद-मंद मुस्कुराते हुए कह रहे हैं—‘देखा मीरा, मैंने कहा था ना… सच की बुनियाद पर बना प्यार कभी नहीं डूबता।’
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