क्या आपकी त्वचा पर ये छोटे-छोटे दाने हैं? यह एक सामान्य संकेत हो सकता है… और पढ़ें
6 बहुत से लोग अपनी उंगलियों, हथेलियों या त्वचा के किनारों पर छोटे-छोटे पारदर्शी दाने या फफोले जैसी संरचनाएँ देखते…
“अब आखिरकार यह सब कुछ हमेशा के लिए हमारा हो गया…”
रोहन के यह फुसफुसाते हुए शब्द मेरे कानों में किसी ज़हरीले खंजर की तरह उतरे, जब मैं उस महोगनी की लकड़ी से बने सजावटी ताबूत के भीतर बिल्कुल शांत और निश्चल लेटा हुआ था। उसकी ठंडी, पसीने से भीगी उंगलियां मेरी दाहिनी कलाई पर बंधी रोलेक्स घड़ी के सोने के पट्टे को बेरहमी से खींचकर खोलने की कोशिश कर रही थीं। मेरी बेटी काव्या ताबूत के ठीक पास खड़ी अपनी दोनों बाहें सीने पर बांधे यह सब कुछ बिना पलक झपकाए देख रही थी। उसके चेहरे पर अपने सगे पिता के इस दुनिया से चले जाने का न तो कोई रंज था, न ही उसकी आँखों में आंसुओं की एक बूंद। उसने अपने भाई को रोकने की रत्ती भर भी कोशिश नहीं की, बल्कि उसके चेहरे पर एक अजीब सी राहत और अधीरता तैर रही थी। उन दोनों को अपने दिल की गहराइयों तक यह पूरा यकीन था कि अब मैं इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह चुका हूँ, कि मेरी सांसें हमेशा के लिए थम चुकी हैं और मेरी बंद आंखें और सुन्न कान अब उनके किसी भी कुकर्म को न देख सकते हैं और न सुन सकते हैं। लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि बंद पलकों के पीछे उनका 74 वर्षीय पिता न केवल उनकी एक-एक हरकत को महसूस कर रहा था, बल्कि उनके द्वारा किए जाने वाले उन खौफनाक खुलासों को भी दर्ज कर रहा था जो इस फर्जी विदाई की रात को उनके जीवन की सबसे भयावह और अंतिम रात बनाने वाले थे।

मेरा नाम अरविंद मेहरा है। मैंने अपनी ज़िंदगी के पूरे 74 साल बहुत करीब से देखे हैं। आज गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड पर मेरा जो यह तीन मंजिला शीशमहल जैसा बंगला खड़ा है, और मानेसर से लेकर बावल तक लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और सप्लाई चेन का जो करोड़ों का साम्राज्य फैला हुआ है, वह किसी को विरासत में या लॉटरी में नहीं मिला था। मैंने साठ के दशक के उत्तरार्ध में पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में एक छोटी सी ब्रोकरेज की मेज से अपने सफर की शुरुआत की थी। दिन में अठारह-अठारह घंटे पसीना बहाना, ट्रकों के टायरों के बीच रातें गुजारना, बैंकों के चक्कर काटना और अपने स्वाभिमान को दांव पर लगाकर एक-एक पाई जोड़ना—यह मेरी आधी सदी की तपस्या का फल था। मेरी स्वर्गीय पत्नी सुमित्रा और मैंने मिलकर यह सपना देखा था कि हमारे बच्चे कभी उस तंगहाली का मुंह न देखें जिससे हम गुजरे थे। हमने अपने दोनों बच्चों, रोहन और काव्या को दुनिया के सबसे बेहतरीन बोर्डिंग स्कूलों में भेजा, विदेशों में उच्च शिक्षा दिलवाई और उनके मुंह से निकलने से पहले उनकी हर ख्वाहिश को उनके कदमों में ला पटका। सुमित्रा दस साल पहले एक असाध्य बीमारी के चलते मुझे अकेला छोड़कर चली गई थी। जाते वक्त उसने कांपते हाथों से मेरा हाथ थामकर कहा था, “अरविंद, बच्चों को कभी मां की कमी महसूस मत होने देना।” मैंने उस वादे को निभाने में अपनी आत्मा तक झोंक दी। लेकिन शायद मैं यह भूल गया कि बिना संघर्ष और बिना मर्यादा के दिया गया अंधा लाड़-प्यार औलाद के चरित्र को घुन की तरह चाट जाता है। मैंने प्यार और दौलत के बीच की वह लक्ष्मण रेखा ही मिटा दी थी जो एक इंसान को इंसान बनाए रखती है।
उस मनहूस रविवार की दोपहर का मंजर आज भी मेरी रूह को कंपा देता है। डाइनिंग हॉल की विशाल महोगनी की मेज पर दोपहर का खाना लगा हुआ था। हमारी पुरानी हाउस मैनेजर सावित्री, जो पिछले 28 सालों से इस घर को एक मंदिर की तरह संभाल रही थी, बड़े जतन से तांबे के बर्तनों में खाना परोस रही थी। रोहन अपने फोन पर उंगलियां चलाते हुए अचानक बीच में ही बोला, “पापा, मुझे कल दोपहर बारह बजे तक किसी भी हाल में सवा करोड़ रुपए यानी 1.2 करोड़ कैश या ट्रांसफर चाहिए।”
मैंने अपने हाथ का चांदी का चम्मच धीरे से प्लेट पर रख दिया। मैंने उसकी आँखों में झांकने की कोशिश की, लेकिन उसने तुरंत अपनी नज़रें चुरा लीं। मैंने बहुत शांत लहजे में पूछा, “रोहन, इतनी बड़ी रकम की अचानक क्या जरूरत आ पड़ी? तुम्हारी कंपनी का नया वेंचर तो पिछले महीने ही मैंने फंड किया था।”
उसने अपनी उंगलियों को मेज पर थपथपाते हुए झेंप मिटाने के अंदाज़ में कहा, “बस कुछ पुराने कर्ज़े हैं जिन्हें तुरंत चुकाना है। मार्केट में थोड़ी उधारी बढ़ गई है।”
मुझे उसकी इस घबराहट की असली वजह समझने में एक पल भी नहीं लगा। उसका चेहरा, उसकी थरथराती आवाज और आंखों के नीचे के काले घेरे वही पुरानी दास्तान बयान कर रहे थे। मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा, “फिर वही सट्टेबाज़ी? फिर वही कसीनो और ऑनलाइन बेटिंग का दलदल?”
रोहन चिढ़कर अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर हुआ और चिल्लाया, “उसे सट्टेबाज़ी मत कहिए! वह हाई-यील्ड फाइनेंशियल डेरिवेटिव्स का एक आधुनिक निवेश था! व्यापार में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।”
“व्यापार?” मैंने अपनी आवाज में बरसों का दबा हुआ दर्द समेटते हुए कहा, “रोहन, पिछले महीने ही मैंने तुम्हारे डीएलएफ वाले चार कमरों के लग्जरी फ्लैट का दो करोड़ का बैंक लोन चुकाया था ताकि बैंक तुम्हारी संपत्ति कुर्क न कर ले। उससे तीन महीने पहले तुम्हारी उस तथाकथित एक्सपोर्ट कंपनी के घाटे को मैंने अपनी जेब से भरा था। तुम चालीस साल के हो चुके हो, एक बच्चे के बाप हो, लेकिन तुम्हारी फिजूलखर्ची और जुए की लत खत्म होने का नाम नहीं ले रही।”
तभी मेज के दूसरे कोने पर बैठी मेरी बेटी काव्या ने अपने आईफोन से नज़रें उठाईं और एक बेहद तीखी, अपमानजनक हंसी हंसते हुए बोली, “ओह गॉड पापा! आप जब देखो तब अपनी वही अस्सी के दशक की पुरानी कैसेट बजाना शुरू कर देते हैं। त्याग, तपस्या और मेहनत! कम ऑन, अगर आपके पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, तो वह किस दिन काम आएगी? अगर रोहन को कुछ पैसों की जरूरत है तो आप इतना भाषण क्यों दे रहे हैं? और वैसे भी, मुझे भी अपनी गाड़ी बदलनी है। मेरी किटी पार्टी के सारे फ्रेंड्स के पास पोर्श और रेंज रोवर के नए मॉडल्स हैं, और मुझे उस पुरानी मर्सिडीज एसयूवी में जाना पड़ता है। मुझे अपने दोस्तों के सामने कितनी शर्मिंदगी महसूस होती है, आपको इस बात का कोई अंदाजा भी है?”
मैंने उन दोनों को बहुत ध्यान से देखा। मेरे सामने बैठे ये दोनों चेहरे वही थे जिन्हें मैंने कभी अपनी उंगलियां पकड़कर चलना सिखाया था। मैंने काव्या की आँखों में देखकर बहुत भारी मन से कहा, “काव्या, तुम्हें उस डेढ़ करोड़ की मर्सिडीज कार में बैठने में शर्म आती है जो तुम्हारे इस बूढ़े बाप ने अपनी गाढ़ी कमाई से तुम्हें खरीद कर दी थी, लेकिन चालीस साल की उम्र में, खुद को एक मॉडर्न इंडिपेंडेंट वुमन कहते हुए, अपने सत्तर पार पिता के आगे हर महीने करोड़ों रुपए के लिए हाथ फैलाते हुए तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आती?”

मेरी यह बात रोहन के अहंकार पर किसी तेजाब की तरह गिरी। उसका चेहरा गुस्से से तमतमाकर सुर्ख लाल हो गया। उसने डाइनिंग टेबल पर अपनी मुट्ठी इतनी जोर से पटकी कि पानी का कांच का गिलास गिरकर चकनाचूर हो गया। वह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपनी उंगली मेरी तरफ तानकर चिल्लाया, “तो फिर मर क्यों नहीं जाते आप? छोड़ दीजिए न यह दुनिया! अगर आप इसी तरह अपनी तिजोरी पर सांप बनकर बैठे रहेंगे, तो हम अपनी जिंदगी कब जिएंगे? आप चले जाइए, फिर हम खुद फैसला कर लेंगे कि अपने खानदान के पैसों का क्या और कहाँ इस्तेमाल करना है!”
‘तो फिर मर क्यों नहीं जाते आप…’ यह शब्द नहीं थे, यह सीधे मेरे सीने पर किया गया कोई जानलेवा प्रहार था।
उसी क्षण, ठीक उसी सेकंड, मेरे सीने के बाएं हिस्से में एक ऐसा भयानक, असहनीय और चीर देने वाला दर्द उठा मानो किसी ने जलते हुए अंगारे मेरे दिल के भीतर धंसा दिए हों। मेरा बायां हाथ पलक झपकत ही पूरी तरह सुन्न पड़ गया। मेरी आंखों के आगे गहरा अंधेरा छाने लगा और फेफड़ों से हवा जैसे पूरी तरह गायब हो गई। मैं अपनी डाइनिंग चेयर से लड़खड़ाकर सीधे नीचे संगमरमर के फर्श पर जा गिरा। मेरे मुंह से केवल एक हल्की सी कराह निकली।
फर्श पर गिरते ही काव्या की नजर मुझ पर पड़ी। उसके हाथ कांपे और उसने घबराकर अपना फोन निकाला, “रोहन… पापा को कुछ हो रहा है! मैं तुरंत मैक्स हॉस्पिटल की एम्बुलेंस को कॉल करती हूँ!”
लेकिन इससे पहले कि काव्या का नंबर डायल हो पाता, रोहन ने एक चीते की तरह झपट्टा मारकर काव्या की कलाई को हवा में ही दबोच लिया। उसकी आँखों में एक ऐसी वहशी, ठंडी और शैतानी चमक थी जिसे देखकर मेरी रूह तक कांप गई। उसने बहुत दबी हुई, फुसफुसाती आवाज में कहा, “रुक जाओ, काव्या! फोन नीचे रखो!”
मैं फर्श पर बेबस पड़ा था। मेरा शरीर पूरी तरह पंगु हो चुका था, जुबान तालू से चिपक गई थी, लेकिन मेरा दिमाग और मेरी चेतना पूरी तरह जाग रही थी।
काव्या कांपती आवाज में बोली, “रोहन… तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? क्या मतलब रुक जाओ? पापा फर्श पर तड़प रहे हैं!”
रोहन ने अपनी पकड़ और मजबूत करते हुए कहा, “पापा को मैसिव हार्ट अटैक आया है। अगर अभी एम्बुलेंस आ गई और ये अस्पताल पहुँच गए, तो बड़े-बड़े डॉक्टर इन्हें आईसीयू में वेंटिलेटर पर डालकर फिर से जिंदा बचा लेंगे। और तुम्हें अच्छी तरह याद है न कि पिछले हफ्ते ही इन्होंने समीर खन्ना को बुलाकर कहा था कि वे अपनी पूरी वसीयत बदलकर सारी संपत्ति, शेयर और ट्रस्ट का पैसा किसी चैरिटेबल फाउंडेशन के नाम करने वाले हैं? अगर आज ये बच गए, तो कल सुबह हम दोनों सड़कों पर आ जाएँगे, काव्या! सिर्फ… सिर्फ पांच मिनट खामोश खड़ी रहो। सब कुछ अपने आप हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।”
काव्या ने एक पल के लिए फर्श पर तड़पते हुए, अपनी अंतिम सांसों के लिए संघर्ष करते अपने सगे बाप को देखा। फिर उसने अपने भाई की उन लालची और वहशी आँखों में देखा। कुछ सेकंड के लिए उस कमरे में केवल मेरी उखड़ती हुई सांसों की आवाज आ रही थी। काव्या का हाथ धीरे-धीरे नीचे झुक गया और उसने अपना फोन वापस अपनी जेब में रख लिया। वह दोनों सगे भाई-बहन, मेरे अपने खून, खामोश खड़े होकर अपने बाप के जिस्म से प्राण निकलने का इंतजार कर रहे थे।
तभी रसोई के भारी दरवाजे खुले और हमारी पुरानी हाउस मैनेजर सावित्री हाथ में गरम चाय की केतली लिए बाहर आई। जैसे ही उसकी नजर फर्श पर बेसुध पड़े मुझ पर और उसके पास खड़े रोहन-काव्या पर पड़ी, उसके हाथ से चाय की केतली छूटकर फर्श पर गिरी और खौलती हुई चाय चारों तरफ फैल गई।
“हे मेरे बांके बिहारी! बड़े साहब!” सावित्री पागलों की तरह चीखती हुई दौड़ी। उसने आव देखा न ताव, सीधे जमीन पर बैठकर मेरे सिर को अपनी गोद में उठाया और अपनी साड़ी के पल्लू से मेरे माथे का पसीना पोंछने लगी। उसने एक सेकंड की भी देर किए बिना अपनी जेब से फोन निकाला, 112 और पड़ोस में रहने वाले हमारे फैमिली डॉक्टर कपूर का इमरजेंसी नंबर मिलाया और दोनों बच्चों की तरफ देखकर शेरनी की तरह दहाड़ी, “आप दोनों पत्थर की मूरत बने क्या तमाशा देख रहे हैं? आपके पिता की सांसें उखड़ रही हैं और आप दोनों यहां खड़े हैं? हाथ लगाइए, साहब को सीधा कीजिए!”
डॉक्टर कपूर का घर हमारे बंगले से सिर्फ दो सौ मीटर की दूरी पर था। वे तीन मिनट के भीतर अपने इमरजेंसी किट के साथ वहां पहुंचे, उन्होंने तुरंत मेरी जुबान के नीचे जीवन रक्षक दवा रखी, सीपीआर शुरू किया और पांच मिनट के भीतर एम्बुलेंस के पैरामेडिक्स मुझे स्ट्रेचर पर डालकर सायरन बजाते हुए अस्पताल की तरफ ले गए। बेहोश होने और कोमा की गहराइयों में जाने से पहले मैंने जो आखिरी चेहरा देखा था, वह मेरी औलादों का नहीं, बल्कि 28 साल से हमारे घर में काम करने वाली उस बुजुर्ग सावित्री का था, जिसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था और जो हाथ जोड़कर ईश्वर से मेरी जिंदगी की भीख मांग रही थी।
तीन दिन बाद जब मुझे पूरी तरह होश आया, तो मैं गुरुग्राम के एक बेहद प्रतिष्ठित निजी अस्पताल के वीवीआईपी कार्डियक आईसीयू में था। मेरे सीने में पेसमेकर और कई नलियां लगी हुई थीं, लेकिन मॉनिटर पर मेरी धड़कनें अब पूरी तरह स्थिर थीं। मेरे बेड के दाईं तरफ सावित्री लाल और सूजी हुई आँखों के साथ बैठी मेरा हाथ सहला रही थी, और बाईं तरफ मेरे पिछले पैंतालीस साल पुराने जिगरी दोस्त और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील समीर खन्ना खड़े थे।
मैंने बहुत धीमी और लड़खड़ाती आवाज में ऑक्सीजन मास्क के भीतर से पूछा, “समीर… रोहन और काव्या कहाँ हैं? क्या वे बाहर कॉरिडोर में बैठे हैं?”
समीर खन्ना ने अपनी भारी फ्रेम का चश्मा उतारा, अपनी जेब से रुमाल निकालकर अपनी नम आँखें पोंछीं और बहुत देर तक खामोश रहे। फिर उन्होंने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “अरविंद… मैं तुमसे कोई झूठ नहीं बोलूंगा। रोहन परसों रात यहां आया था, लेकिन वह डॉक्टर से तुम्हारी हालत पूछने के बजाय सीधे मेरे पास आया था। उसने मुझसे बहुत दबी जुबान में यह जानने की कोशिश की कि क्या तुमने पिछले हफ्ते उस नई वसीयत पर दस्तखत कर दिए थे या पुरानी वाली वसीयत ही अभी लागू है। और काव्या ने आज सुबह मुझे फोन करके पूछा कि तुम्हारे बैंक लॉकरों की चाबियां और गोल्फ कोर्स वाले बंगले के मूल रजिस्ट्री के कागजात किस सेफ में रखे हैं। उन दोनों में से कोई भी इस वक्त यहां नहीं है। वे घर पर बैठकर अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट के साथ संपत्तियों का बंटवारा प्लान कर रहे हैं।”
मैंने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं।
आईसीयू में दी जा रही दर्द निवारक दवाओं ने मेरे सीने के उस भयंकर शारीरिक दर्द को तो पूरी तरह सुन्न कर दिया था, लेकिन मेरी आत्मा के भीतर जो जख्म हुआ था, उसका कोई इलाज किसी मेडिकल साइंस के पास नहीं था। जिस औलाद के लिए मैंने अपनी पूरी जिंदगी धूप-छांव की परवाह किए बिना लगा दी, वे मेरे जिस्म के ठंडे होने का इंतजार कर रहे थे।
मैंने अपनी आंखें खोलीं। मेरी आँखों में अब कोई आंसू नहीं था। वहां केवल एक कठोर, जमा देने वाला संकल्प था। मैंने समीर का हाथ कसकर पकड़ लिया और कहा, “समीर, मुझे एक आखिरी काम करना है। मुझे अपनी आँखों से यह देखना है कि अगर उन दोनों को यह पक्का यकीन हो जाए कि उनका बाप अब इस दुनिया में नहीं रहा, तो वे अपने लालच में किस हद तक गिर सकते हैं। मुझे उनका असली, नंगा चेहरा देखना है।”
समीर ने चौंककर मेरी तरफ देखा, “अरविंद, तुम क्या सोच रहे हो? कोई भी फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र या कानूनी धोखाधड़ी मैं नहीं होने दूंगा। कानून की एक सीमा होती है।”
“नहीं समीर,” मैंने दृढ़ता से कहा, “कोई गैर-कानूनी काम नहीं होगा। कोई सरकारी दस्तावेज नहीं बनेगा, किसी बीमा कंपनी या बैंक को कोई सूचना नहीं दी जाएगी। यह सिर्फ मेरे अपने घर के भीतर, अगले कुछ घंटों के लिए एक निजी पर्दाफाश होगा। मैं अपने जीते जी अपने बच्चों का असली चरित्र देखना चाहता हूँ ताकि जब मैं अपनी अंतिम वसीयत लिखूं, तो मेरे हाथ में जरा भी संकोच न हो।”
डॉक्टरों ने शुरुआत में इसका सख्त विरोध किया, लेकिन जब उन्होंने देखा कि मेरी मानसिक शांति इसी पर टिकी है, तो वे एक शर्त पर राजी हुए। अस्पताल से मुझे डिस्चार्ज करने के बजाय एक गुप्त मेडिकल एम्बुलेंस के जरिए घर लाया गया। बंगले के पिछले गेस्ट रूम में दो आईसीयू नर्सों, एक पोर्टेबल वेंटिलेटर और लाइफ-सपोर्ट सिस्टम को पूरी तरह तैयार रखा गया ताकि अगर मेरी तबीयत जरा भी बिगड़े तो तुरंत इलाज मिल सके। घर के तमाम नौकरों को छुट्टी दे दी गई थी, केवल सावित्री और समीर खन्ना इस पूरी योजना से वाकिफ थे।
रोहन और काव्या को अस्पताल की तरफ से समीर द्वारा केवल इतना संदेश भिजवाया गया कि घर लाते वक्त एम्बुलेंस में ही मुझे एक दूसरा भीषण कार्डियक अरेस्ट आया और डॉक्टर मुझे बचा नहीं सके। चूंकि अरविंद मेहरा एक बेहद सादगी पसंद इंसान थे, इसलिए कोई सार्वजनिक शोक सभा नहीं होगी और परिवार के लोग घर के बड़े ड्रॉइंग रूम में ही उन्हें अंतिम विदाई देंगे।
अगली शाम, गोल्फ कोर्स रोड वाले उस विशाल बंगले के मुख्य ड्रॉइंग रूम के बीचों-बीच एक खूबसूरत, नक्काशीदार महोगनी की लकड़ी का खुला हुआ सजावटी ताबूत रखा गया था। चारों तरफ सफेद लिली और रजनीगंधा के फूलों की लड़ियां सजी हुई थीं। कमरे में अगरबत्तियों की हल्की खुशबू और एक भयावह, भारी सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं अपने सबसे पसंदीदा काले रंग के थ्री-पीस जोधपुरी सूट में उस मखमली ताबूत के भीतर बिल्कुल सीधा लेटा हुआ था। मेरी आंखें पूरी तरह बंद थीं, डॉक्टरों द्वारा दी गई विशेष दवाओं के कारण मेरी सांसें इतनी धीमी और सूक्ष्म चल रही थीं कि बाहर से देखने पर किसी को भी मेरे सीने का हिलना महसूस नहीं हो सकता था।
शाम के ठीक सात बजे मुख्य ड्रॉइंग रूम का भारी सागवान का दरवाजा खुला।
सबसे पहले रोहन कमरे में दाखिल हुआ। उसने काले रंग का कुर्ता पहन रखा था, लेकिन उसके चलने के अंदाज़ में, उसके चेहरे पर किसी अनाथ हुए बेटे का रंज-ओ-गम दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था। वह सीधे ताबूत के पास आया। उसने मेरे चेहरे की तरफ एक सरसरी नजर डाली। उसकी पहली प्रतिक्रिया कोई चीख या आंसू नहीं थी। उसकी गिद्ध जैसी आंखें सीधे मेरी दाईं कलाई पर जाकर टिक गईं, जहां वह 18-कैरेट गोल्ड की विंटेज रोलेक्स डेट-जस्ट घड़ी बंधी हुई थी, जिसे मैंने स्विट्जरलैंड से अपनी कंपनी की पच्चीसवीं सालगिरह पर खरीदा था।
रोहन ने एक गहरी सांस ली और बुदबुदाया, “यह घड़ी अभी भी इनके हाथ में ही बंधी है… शुक्र है किसी वॉर्डबॉय ने अस्पताल में हाथ साफ नहीं किया।”
कुछ ही मिनटों बाद हाई हील्स की खट-खट की आवाज के साथ काव्या भी कमरे में दाखिल हुई। उसने डिजाइनर सफेद चिकनकारी का सूट पहन रखा था और अपनी आंखों पर लगा बड़ा सनग्लास उतारकर अपने बालों में अटका लिया था। वह ताबूत के पास आई, उसने झुककर मेरे चेहरे को देखा, चारों तरफ नजर दौड़ाई कि कोई देख तो नहीं रहा, और फिर उसने अपने सीने से एक बहुत लंबी, ठंडी राहत भरी सांस छोड़ते हुए फुसफुसाकर कहा, “ओह थैंक गॉड… आखिरकार यह रोज-रोज का ड्रामा और लेक्चरबाजी हमेशा के लिए खत्म हुई!”
रोहन ने बिना वक्त गंवाए अपनी जेब से एक डायरी निकाली और बोला, “काव्या, कल सुबह नौ बजे ही मैंने दिल्ली के सबसे बड़े कमर्शियल प्रॉपर्टी डीलर भाटिया को यहां बुलाया है। सबसे पहले हम मानेसर वाले तीनों बड़े वेयरहाउस बेचेंगे। उनसे कम से कम 120 करोड़ का लिक्विड कैश तुरंत मिल जाएगा।”
काव्या ने तुरंत टोका, “नहीं रोहन! वेयरहाउस बाद में। पहले स्टडी रूम की वह बड़ी डिजिटल तिजोरी खोलनी होगी। मुझे पूरा यकीन है कि पापा ने अपने सारे सीक्रेट विदेशी बैंक खातों, म्यूचुअल फंड्स और मॉरीशस वाले ट्रस्ट के पासवर्ड अपनी उस पुरानी लाल डायरी में लिखकर रखे हैं। अगर वह डायरी हाथ लग गई, तो समझो तीन सौ करोड़ की लिक्विड वेल्थ हमारे हाथ में होगी।”
तभी ड्रॉइंग रूम के दरवाजे से बुजुर्ग सावित्री हाथ में गंगाजल और तांबे का लोटा लिए कांपते कदमों से दाखिल हुई। वह सफेद सूती साड़ी में थी और उसकी आंखें रो-रो कर सूज चुकी थीं। जैसे ही वह ताबूत के पास आने लगी, काव्या ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर उसे रास्ते में ही बेहद नफरत और बेरुखी से रोक दिया।
काव्या ने अपनी तीखी आवाज में कहा, “सावित्री जी, बस यहीं रुक जाइए। अब आपको यहां कोई नौटंकी करने की जरूरत नहीं है। और बेहतर होगा कि आप आज रात ही सर्वेंट क्वार्टर से अपना सारा बोरिया-बिस्तर बांध लें। कल सुबह सूरज निकलने से पहले मुझे आप इस बंगले के आसपास भी दिखाई नहीं देनी चाहिए।”
सावित्री जैसे किसी गहरे सदमे से कांप उठी। उसके हाथ का लोटा थरथराया, “बिटिया… यह आप क्या कह रही हैं? मैं पिछले 28 सालों से इस घर में हूँ। जब आपकी मां का देहांत हुआ था, तब से मैंने आप दोनों को अपने सगे बच्चों की तरह पाला है। साहब की यह अंतिम विदाई…”
रोहन बीच में ही एक कुटिल और जालिम हंसी हंसते हुए आगे आया और उसने सावित्री का हाथ पकड़कर पीछे झटक दिया, “बस करो अपना यह पुराना इमोशनल भाषण! अब इस घर में तुम्हारे जैसे फालतू नौकरों की फौज पालने के लिए हमारे पास कोई चैरिटी फंड नहीं है। और कान खोलकर सुन लो, जाते वक्त अपना वही फटा हुआ संदूक लेकर जाना। घर की एक भी पुरानी चीज, कोई चांदी का बर्तन या सजावटी सामान गायब नहीं होना चाहिए। कल सुबह मैं खुद पूरी इन्वेंटरी चेक करूंगा, समझे?”
ताबूत के भीतर लेटे-लेटे मेरे पूरे शरीर का खून खौल उठा। मेरी मुट्ठियां बंद होने को हुईं, लेकिन मैंने अपने आत्मनियंत्रण की अंतिम सीमा तक जाकर खुद को रोके रखा। जिस सावित्री ने अपनी पूरी जवानी, अपने पूरे 28 साल इस घर की सेवा में होम कर दिए, जिसने मेरी बीमार पत्नी की आखिरी दिनों में दिन-रात मल-मूत्र तक साफ किया था, और जिसने महज दो दिन पहले अपनी सूझबूझ से मेरी जान बचाई थी—मेरी औलादें मेरे शव के सामने खड़े होकर उस बुजुर्ग महिला को एक आवारा कुत्ते की तरह धक्के मारकर बाहर निकाल रही थीं।
सावित्री रोती हुई कमरे से बाहर चली गई।
उसके जाते ही रोहन फिर से ताबूत के ऊपर झुका। उसकी ठंडी, पसीने से तर उंगलियां मेरी कलाई की घड़ी के स्ट्रैप तक पहुंचीं। वह उसे खोलने के लिए जोर आजमाने लगा।
काव्या ने चिढ़कर पूछा, “रोहन, तुम इस वक्त इस घड़ी के पीछे क्यों पड़े हो? तिजोरी में इससे सौ गुना ज्यादा माल पड़ा है।”
रोहन ने घड़ी को झटके से खींचते हुए कहा, “काव्या, तुम नहीं समझतीं! यह सिर्फ एक घड़ी नहीं है, यह लिमिटेड एडिशन विंटेज गोल्ड रोलेक्स है। ग्रे मार्केट में इसे अभी तुरंत बेचूं तो कम से कम 35 से 40 लाख रुपए कैश हाथ में आएंगे। इससे मैं उस आदमी का मुंह कुछ दिनों के लिए बंद कर सकूंगा।”
काव्या ठिठक गई। उसने अपनी भौहें सिकोड़ीं और पूछा, “कौन आदमी रोहन? तुम किस आदमी की बात कर रहे हो?”
कमरे में कुछ पलों के लिए एक बेहद भारी और डरावना सन्नाटा छा गया। रोहन ने एक बार फिर चारों तरफ देखा, मानो दीवारों के भी कान हों। फिर उसने बहुत दबी, थरथराती आवाज में वह सच उगला जिसने ताबूत के भीतर लेटे मेरे पैरों तले की दुनिया हिला दी।
रोहन ने कहा, “काव्या… मैंने दिल्ली के सबसे बड़े अंडरवर्ल्ड बुकी और हवाला ऑपरेटर विक्रम राणा से पिछले छह महीनों में ऑनलाइन सट्टेबाजी और कसीनो में करीब आठ करोड़ रुपए का कर्ज ले रखा है। उसने मुझे कल शाम तक का अल्टीमेटम दिया था कि अगर पैसे नहीं मिले, तो वह मेरे बेटे को किडनैप करवा लेगा या मुझे गोलियों से भून देगा। और तुम्हें क्या लगता है कि पापा को वह हार्ट अटैक अचानक आ गया था?”
काव्या की सांसें जैसे गले में ही अटक गईं। उसकी आंखें खौफ से फैल गईं, “क्या… क्या मतलब रोहन?”
रोहन के चेहरे पर एक ऐसी घिनौनी मुस्कान उभरी जिसे देखकर कोई शैतान भी शर्मसार हो जाए। उसने कहा, “रविवार की सुबह, जब सावित्री नाश्ते के बाद पापा की ब्लड प्रेशर और दिल की नियमित दवाएं उनकी मेज पर रख रही थी, तब मैंने चुपके से उनकी ब्लड थिनर और हार्ट की दवाओं की जगह थायरॉइड और हाई-डोज पोटैशियम के कैप्सूल बदल दिए थे। मुझे अच्छी तरह पता था कि दोपहर की बहस में जब उनका बीपी बढ़ेगा, तो उनका कमजोर दिल उस केमिकल के असंतुलन को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा! मैंने केवल उस प्रक्रिया को थोड़ा तेज कर दिया था जो वैसे भी अगले दो-चार सालों में होने वाली थी!”
यह सुनते ही काव्या के मुंह से एक दबी हुई चीख निकली। उसने अपने दोनों हाथों से अपना मुंह दबा लिया। लेकिन उसके चेहरे पर अपने सगे भाई द्वारा किए गए इस जघन्य कृत्य के खिलाफ कोई नफरत या पश्चाताप नहीं था, बल्कि उसकी आँखों में केवल यह डर था कि कहीं वे पकड़े न जाएं।
काव्या ने कांपती आवाज में कहा, “रोहन… तुम पागल हो गए हो! अगर पोस्टमॉर्टम हुआ, अगर पुलिस को जरा भी भनक लगी तो हम दोनों तिहाड़ जेल में सड़ेंगे!”
रोहन ने लापरवाही से हाथ हिलाया, “कोई पोस्टमॉर्टम नहीं होगा। समीर खन्ना ने नैचुरल कार्डियक अरेस्ट की बात मान ली है। कल सुबह जैसे ही हम अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करेंगे, सारा सबूत राख की ढेरी में बदल जाएगा। उसके बाद तुम अपने हिस्से की 150 करोड़ की संपत्ति लेकर अपने यूरोप ट्रिप पर निकल जाना और मैं अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करूंगा।”
उस पल, मेरे भीतर का पिता पूरी तरह मर गया। लेकिन मेरे भीतर का वह इंसान, जो सच और न्याय के लिए आधी सदी तक लड़ा था, अपनी पूरी शक्ति और चेतना के साथ जीवित हो उठा।
रोहन जैसे ही मेरी कलाई से वह घड़ी पूरी तरह खींचने वाला था, ठीक उसी क्षण, मेरी दाहिनी मुट्ठी पूरी ताकत के साथ खुली और मैंने रोहन की कलाई को लोहे की तरह अपनी मजबूत उंगलियों के शिकंजे में कस लिया।
रोहन के हलक से एक ऐसी दिल दहला देने वाली, भयानक चीख निकली जो पूरे बंगले की छतों से टकराकर गूँज उठी। उसका पूरा शरीर बिजली के झटके की तरह कांप गया। उसके चेहरे का खून पूरी तरह निचोड़ लिया गया हो, वह सफेदी की हद तक पीला पड़ गया। उसकी आंखें अपनी खोपड़ी से बाहर आने को हो गईं।
इससे पहले कि वह या काव्या कुछ समझ पाते, मैं उस महोगनी के ताबूत से उठकर पूरी तरह सीधा बैठ गया।
काव्या के हाथ से उसका फोन छूटकर फर्श पर गिरा और कांच की तरह बिखर गया। वह पीछे की तरफ लड़खड़ाई और सोफे से टकराकर नीचे गिर पड़ी। उसके मुंह से केवल एक बेतुकी, घिघियाती हुई आवाज निकल रही थी, “भू… भूत! पापा… नहीं… यह नहीं हो सकता!”
मैंने रोहन की कलाई को और ज्यादा मरोड़ा। उसकी हड्डियां चटकने की कगार पर थीं। वह दर्द और असीम खौफ के मारे घुटनों के बल फर्श पर गिर पड़ा, “पापा… छोड़िए… मुझे छोड़िए… आप… आप तो…”
“मैं मरा नहीं हूँ, रोहन मेहरा!” मेरी आवाज उस बड़े हॉल के सन्नाटे को किसी कड़कड़ाती बिजली की तरह चीरती हुई गूँजी।
उसी पल ड्रॉइंग रूम के दोनों भारी दरवाजे पूरी ताकत से खुले।
कमरे के भीतर समीर खन्ना, उनके साथ गुरुग्राम पुलिस के दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी, चार सशस्त्र पुलिसकर्मी, और पीछे आंसुओं से भरी आँखों के साथ सावित्री दाखिल हुई। पुलिस अधिकारियों के हाथ में एक हाई-एंड ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डर था, जो ड्रॉइंग रूम के झूमर में लगे हिडन कैमरों से सीधे लाइव स्ट्रीम के जरिए पिछले पैंतालीस मिनट की एक-एक हरकत और रोहन के उस कबूलनामे के एक-एक शब्द को रिकॉर्ड कर रहा था।
डीसीपी राघवेंद्र सिंह ने आगे बढ़कर अपनी सर्विस रिवॉल्वर बाहर निकाली और रोहन की कनपटी पर तानते हुए बहुत ठंडी आवाज में कहा, “रोहन मेहरा, अपने हाथ अपने सिर के पीछे रख लो। अपने सगे पिता की हत्या के प्रयास, दवाओं में जहर मिलाने, धोखाधड़ी और जबरन वसूली की साजिश के तहत तुम दोनों भाई-बहन को इस वक्त गिरफ्तार किया जाता है।”
रोहन फर्श पर घिसटता हुआ, पागलों की तरह रोते हुए मेरे पैरों के पास आया। उसने अपनी हथेलियां जोड़ दीं, उसकी लार और आंसू फर्श पर टपक रहे थे, “पापा… मुझे माफ कर दीजिए! वह शैतान विक्रम राणा मुझे मार डालता! मैं लालच में अंधा हो गया था पापा… मुझे पुलिस से बचा लीजिए! मैं आपका इकलौता बेटा हूँ, आपका कुलदीपक हूँ पापा!”
मैंने अपने पैर को झटके से पीछे खींच लिया। मेरी आँखों में उसके लिए न तो कोई गुस्सा था, न नफरत, और न ही दया का एक कतरा। वहां केवल एक शून्य था, एक ऐसा रेगिस्तान जहां अब कोई रिश्ता कभी नहीं पनप सकता था।
मैंने नीचे झुककर उस घिनौने चेहरे की तरफ देखा और बहुत शांत, लेकिन लोहे जैसी भारी आवाज में कहा, “रोहन, जिस औलाद ने अपनी सगी मां की ममता का मान नहीं रखा, जिसने 28 साल से मां जैसा दुलार देने वाली सावित्री को धक्के मारकर निकालने में एक पल नहीं लगाया, और जिसने चंद रुपयों और जुए के कर्ज के लिए अपने बाप की दवाओं में जहर मिला दिया—वह किसी कुल का दीपक नहीं, बल्कि उस कुल को भस्म करने वाला सबसे बड़ा अंगारा है।”
काव्या घुटनों के बल रेंगती हुई आई और उसने मेरी पैंट का निचला हिस्सा पकड़ लिया, “पापा… मैंने कुछ नहीं किया! मैं तो बस डर गई थी! रोहन ने सब प्लान किया था पापा… प्लीज मुझे जेल मत भेजिए! मेरा समाज में क्या नाम रह जाएगा? मेरी पूरी लाइफ बर्बाद हो जाएगी पापा!”
मैंने काव्या का हाथ अपने कपड़ों से धीरे से लेकिन पूरी नफरत के साथ हटाया।
मैंने कहा, “काव्या, तुमने अपने हाथों से जहर नहीं दिया, लेकिन जब तुम्हारा सगा बाप फर्श पर तड़प रहा था, तब तुमने एम्बुलेंस का फोन रोककर अपनी सहमति दी थी। अपराध करने वाले से बड़ा अपराधी वह होता है जो अपनी आंखों के सामने अपराध होते हुए देखकर अपने स्वार्थ के लिए खामोश रहता है। तुम्हें अपनी लाइफ की नहीं, अपनी किटी पार्टी और अपनी मर्सिडीज कार के खोने की चिंता थी। आज से तुम्हारी वह नकली दुनिया हमेशा के लिए खत्म होती है।”
पुलिसकर्मियों ने आगे बढ़कर रोहन और काव्या दोनों की कलाइयों में लोहे की हथकड़ियां कस दीं। वे दोनों गिड़गिड़ाते हुए, चीखते हुए और अपने गुनाहों की माफी मांगते हुए उस आलीशान बंगले के मुख्य द्वार से घसीटते हुए बाहर ले जाए गए। जिस समाज और जिस स्टेटस के लिए उन्होंने अपनी आत्मा का सौदा किया था, उसी समाज की गाड़ियों के सायरन की गूँज में उनका नाम हमेशा के लिए एक कलंक बन चुका था।
जब पुलिस की गाड़ियां चली गईं और घर में फिर से वही गहरा सन्नाटा छा गया, तो मैं उस महोगनी के ताबूत से बाहर निकलकर अपनी पुरानी आर्मचेयर पर आकर बैठ गया। समीर खन्ना मेरे पास आए और उन्होंने अपने ब्रीफकेस से एक कानूनी दस्तावेज निकाला।
समीर ने बहुत गंभीर स्वर में कहा, “अरविंद, यह तुम्हारी नई और अंतिम वसीयत का ड्राफ्ट है। जैसा तुमने कहा था, मैंने इसे पूरी तरह तैयार कर लिया है। तुम्हें बस इस पर अपने हस्ताक्षर करने हैं।”
मैंने कलम हाथ में ली।
मैंने उस वसीयत के हर पन्ने को बहुत ध्यान से पढ़ा। मैंने अपनी 250 करोड़ की चल-अचल संपत्ति, अपने तमाम वेयरहाउस, शेयर और कंपनियों का मालिकाना हक एक नए पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ‘सुमित्रा-अरविंद मेहरा मेमोरियल फाउंडेशन’ के नाम कर दिया, जिसका एकमात्र उद्देश्य अनाथ, बेसहारा बच्चों की मुफ्त उच्च शिक्षा और असहाय बुजुर्गों के लिए विश्वस्तरीय वृद्धाश्रमों का निर्माण करना था। और उस पूरे ट्रस्ट की लाइफटाइम मुख्य ट्रस्टी और संरक्षक के रूप में, मैंने 28 साल से हमारे साथ साए की तरह खड़ी सावित्री देवी का नाम दर्ज किया, साथ ही गोल्फ कोर्स रोड वाले इस पूरे बंगले का मालिकाना हक और पचास करोड़ का कॉर्पस फंड सावित्री और उसके आने वाले परिवार के सुरक्षित भविष्य के नाम लिख दिया।
मैंने कांपते लेकिन दृढ़ हाथों से उस वसीयत के अंतिम पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर किए।
सावित्री कमरे के कोने में खड़ी हाथ जोड़कर फूट-फूट कर रो रही थी, “साहब… यह आप क्या कर रहे हैं? मैं तो सिर्फ एक मामूली नौकरानी हूँ… मुझे इतने बड़े धन की कोई चाह नहीं है साहब…”
मैंने आगे बढ़कर सावित्री के सिर पर एक बड़े भाई की तरह हाथ रखा। मेरी आँखों से पहली बार एक सच्चा, निर्मल आंसू टपक कर उस कानूनी कागज़ पर गिरा।
मैंने कहा, “सावित्री, खून का रिश्ता वह नहीं होता जो सिर्फ एक कोख से पैदा होने पर बनता है। असली रिश्ता वह होता है जो इंसानियत, त्याग और वफादारी की कसौटी पर खरा उतरता है। मेरी अपनी औलादों ने मुझे कफन में लपेटने की साजिश रची, और तुमने अपनी जान की बाजी लगाकर मुझे दूसरा जीवन दिया। आज के बाद तुम इस घर की नौकरानी नहीं, इस घर की मालकिन और इस परिवार का सबसे बड़ा स्वाभिमान हो।”
उस रात, जब मैंने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखा, तो गुरुग्राम के आसमान में घने काले बादलों के बीच से एक चमकता हुआ तारा दिखाई दे रहा था। मुझे लगा जैसे सुमित्रा उस अनंत आकाश से मुस्कुराते हुए कह रही हो कि आखिरकार, देर से ही सही, मैंने न्याय और इंसानियत का सबसे सही फैसला ले लिया था।
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