स्वस्थ जीवनशैली और प्राकृतिक आहार: गंभीर बीमारियों से बचाव का सही रास्ता
एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली ही हमें गंभीर बीमारियों से दूर रख सकती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में…
—इस घर के संसाधन मेरे बेटे और पोते के लिए हैं, बाहरी लोगों के लिए नहीं! —सावित्री देवी ने कहा, उनकी आवाज में एक ऐसा तीखापन था जिसने घर की शांति को पल भर में भंग कर दिया था। उन्होंने रसोई में खड़े होकर घरेलू उपयोग की चीज़ों पर अपने पूर्ण अधिकार का नियम लागू कर दिया और मेरी माँ के विश्राम कक्ष की सुख-सुविधाओं को सीमित करने का निर्देश दे दिया।
मेरा नाम काव्या शर्मा है। मैं 36 साल की हूँ और इंदौर के एक बहुत ही शांत और प्रतिष्ठित इलाके में अपने पति अर्जुन और हमारे आठ साल के बेटे आरव के साथ रहती हूँ। मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वरिष्ठ परियोजना प्रबंधक (Senior Project Manager) के रूप में काम करती हूँ, और अर्जुन एक बैंक में वित्तीय सलाहकार हैं। हमारा जीवन बहुत ही व्यवस्थित था, जब तक कि इस घर में पारिवारिक राजनीति ने दस्तक नहीं दी थी।
मेरी माँ, शांति देवी, छतरपुर के पास एक बहुत ही छोटे, पारंपरिक भारतीय कस्बे में अकेली रहती थीं। मेरे पिता के देहांत के बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सादगी और धार्मिक कार्यों में बिता दी थी। कई महीनों के लगातार अनुरोध, मिन्नतों और आरव की ज़िद के बाद, वह केवल सात दिन के लिए हमारे शहर वाले घर में आने को तैयार हुईं।

वे हमेशा फोन पर कहती थीं, “बेटी काव्या, वैवाहिक जीवन में बच्चों के घर का अपना एक नियम, अपनी एक गोपनीयता होती है। मैं शहर आकर तुम लोगों पर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी या बोझ नहीं बनना चाहती। तुम दोनों अपनी नौकरी में व्यस्त रहते हो, मुझे गाँव में ही शांति मिलती है।”
लेकिन अर्जुन ने खुद आगे बढ़कर उन्हें फोन किया था, “माँजी, आप हमारे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं हैं, आप हमारी माँ हैं। आरव आपको हर दिन याद करता है और आपकी कहानियाँ सुनना चाहता है। आपको कम से कम एक सप्ताह के लिए हमारे पास आना ही होगा।”
जब माँ आखिरकार इंदौर स्टेशन पर उतरीं, तो उनके पास कपड़ों से भरा कोई बड़ा वीआईपी सूटकेस नहीं था, बल्कि उनके हाथों में शुद्ध ग्रामीण स्नेह से भरा सामान था—मेरे हाथ का बना बेसन का लड्डू, घर का तीखा आम का अचार, बाजरे का शुद्ध आटा और आरव के लिए सर्दियों में अपने हाथों से बुना हुआ एक खूबसूरत मैरून स्वेटर।
लेकिन मेरी सास सावित्री देवी, जो पिछले एक साल से हमारे साथ रह रही थीं, उन्होंने रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर उन पारंपरिक उपहारों को बहुत ही सामान्य और तिरस्कारपूर्ण दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने अपनी भौहें सिकोड़ते हुए कहा—
—सात दिन के प्रवास के लिए इतना सारा सामान लाने की क्या आवश्यकता थी? इरादा केवल सात दिन का है या भविष्य में यहीं स्थायी रूप से रुकने का कोई और विचार है?
अर्जुन ने अपनी माँ के इस कड़वे व्यवहार को भांप लिया और उन्हें शालीनता से रोकते हुए कहा, “माँ, आप यह क्या कह रही हैं? माँजी हमारे लिए मौसमी सौगात लाई हैं।” लेकिन सावित्री देवी के चेहरे की कठोरता और आंखों की ईर्ष्या नहीं गई।
वास्तव में, सावित्री देवी को मेरी माँ की आत्मनिर्भरता और उनके अतीत के स्वाभिमान से एक पुरानी असहमति थी। जब हमारी शादी हुई थी, तब अर्जुन और मैं इंदौर के एक बहुत ही छोटे किराए के कमरे में रहते थे। मैं उस समय गर्भवती थी, और हमारे पास अपने सपनों का घर खरीदने के लिए अग्रिम भुगतान (down payment) की रकम बहुत कम पड़ रही थी। बैंक भी हमें पूरा लोन देने से मना कर रहा था। उस कठिन समय में, मेरी माँ ने बिना किसी झिझक के, छतरपुर में मेरे पिता द्वारा छोड़ी गई अपनी पैतृक भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा बेचकर हमें लाखों रुपये की वित्तीय मदद की थी। उन्होंने कभी उस पैसे का कोई हिसाब नहीं माँगा, न ही कभी यह जताया कि उन्होंने हमारी कोई मदद की है। उन्होंने बस अर्जुन का हाथ पकड़कर कहा था, “बेटा, जब शहर में अपनी खुद की छत होती है, तो बेटी के भविष्य का डर थोड़ा कम हो जाता है। तुम दोनों खुश रहो।”
इसके विपरीत, सावित्री देवी ने कुछ साल पहले अपना पुश्तैनी मकान बहुत ऊंचे दामों पर बेचा था, लेकिन उन्होंने उस धन का एक भी पैसा अर्जुन को नहीं दिया। उन्होंने वह सारा पैसा अपने छोटे बेटे रोहित को दे दिया था, जो एक अत्यधिक गैर-जिम्मेदार और लालची व्यक्ति था। रोहित हर कुछ महीने में एक नया काल्पनिक व्यवसाय शुरू करता, उसमें भारी वित्तीय घाटा उठाता और कर्ज में डूब जाता था। जब सावित्री देवी के पास से सारे संसाधन समाप्त हो गए और रोहित ने उन्हें अपने घर में रखने से मना कर दिया, तो वे दो बड़े सूटकेस लेकर हमारे इस घर में आ गईं। हमने बहू और बेटे के रूप में उनका पूरा सम्मान किया, उन्हें घर का सबसे बड़ा और हवादार कमरा दिया, और उनकी हर महीने की महंगी चिकित्सा और दवाइयों का पूरा खर्च उठाया। फिर भी, उनके भीतर का असुरक्षा का भाव ऐसा था कि उन्हें हमेशा लगता था कि मेरी माँ का हमारे जीवन, हमारे बेटे या हमारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।
पहली रात का माहौल बहुत ही सुंदर था। हमारा बेटा आरव अपनी नानी की गोद में सिर रखकर गाँव के मेलों, खेतों और पंचतंत्र की पुरानी कहानियाँ सुनता रहा। अर्जुन ने रसोई में जाकर खुद अपने हाथों से मेरी माँ के स्वास्थ्य के अनुकूल कम मसाले वाली अरहर की दाल परोसी और बड़े सम्मान से उनकी पीठ के दर्द का हाल पूछा।
लिविंग रूम के सोफे पर बैठी सावित्री देवी को यह पारिवारिक आत्मीयता बिल्कुल ठीक नहीं लगी। उन्होंने अपने हाथ की चम्मच को मेज़ पर पटकते हुए ऊंचे स्वर में कहा—
—ऐसा लगता है जैसे इस घर के सारे नियम और फैसले अब नए मेहमानों के आगमन के अनुसार ही तय किए जाएंगे। हमारी राय की तो इस घर में कोई कीमत ही नहीं बची है।
मेरी माँ ने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझा और ग्लानि से भरकर बोलीं, “बहनजी, आप बिल्कुल भी गलत न समझें। मैं यहाँ किसी व्यवस्था में हस्तक्षेप करने नहीं आई हूँ। मैं बस दो ही दिन में अपनी ट्रेन पकड़कर वापस गाँव लौट जाऊँगी।” अर्जुन ने माँ को शांत किया, लेकिन सावित्री देवी का गुस्सा अंदर ही अंदर सुलगता रहा।
अगली सुबह, मैं और अर्जुन अपनी-अपनी नौकरी के अनिवार्य दायित्वों के कारण सुबह आठ बजे ही दफ्तर के लिए निकल गए। मैंने जाने से पहले रसोई में दाल, चावल, हरी सब्जी, ताजा दही और फल पूरी व्यवस्था के साथ एक हॉटकेस में रख दिए थे। घर से बाहर निकलते समय मैंने लिविंग रूम में बैठी सावित्री देवी से बहुत ही विनम्रतापूर्वक अनुरोध किया—
—माँजी, मम्मी की तबीयत पिछले कुछ दिनों से ठीक नहीं है। कृपया उन्हें दोपहर के समय पर भोजन और उनकी रक्तचाप (blood pressure) की दवा दे दीजिएगा। बाहर अत्यधिक गर्मी है, यदि वे समय पर पानी और दवा नहीं लेंगी, तो उन्हें अस्वस्थता और चक्कर आने महसूस होने लगते हैं।
सावित्री देवी ने बिना मेरी तरफ ध्यान दिए, अपने टीवी का वॉल्यूम बढ़ाते हुए कहा, “मुझे अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का अच्छी तरह से पता है। तुम मुझे सिखाने की चेष्टा मत करो। अपने काम पर जाओ।”
उस दिन भाग्यवश मेरी कंपनी की एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यावसायिक बैठक उम्मीद से जल्दी खत्म हो गई। मुझे लगा कि शाम को माँ के साथ थोड़ा समय बिताने का मौका मिलेगा, इसलिए मैं शाम के ठीक चार बजे अपने घर वापस पहुँच गई।
जैसे ही मैंने मुख्य दरवाजे की डिजिटल चाबी से ताला खोला और घर के भीतर कदम रखा, मुझे पूरे घर में एक अजीब सी घुटन, उमस और सन्नाटा महसूस हुआ। लिविंग रूम के सभी एसी और पंखे बंद थे। मैं तुरंत दौड़कर अतिथि कक्ष की तरफ गई, जहाँ मेरी माँ रुकी हुई थीं। कमरे का दृश्य देखकर मेरी आँखों में आंसू आ गए और मेरी मुट्ठियां कस गईं।
मेरी 62 साल की वृद्ध माँ खिड़की के पास फर्श पर एक छोटी सी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी थीं और एक पुराने अखबार को मोड़कर उससे खुद को हवा कर रही थीं। अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण उनकी पूरी सूती साड़ी पसीने से भीगी हुई थी, उनका चेहरा पूरी तरह से लाल हो चुका था और वे बहुत ही कमजोर दिख रही थीं। उनके सामने मेज़ पर कांच के एक गिलास में थोड़ा सा गुनगुना पानी रखा हुआ था। कमरे का पंखा और वेंटिलेशन पूरी तरह से बंद कर दिया गया था।
मैंने तुरंत आगे बढ़कर कमरे का मुख्य स्विच ऑन किया और पंखा चलाया। मैं माँ के घुटनों के पास बैठ गई और घबराकर पूछा, “माँ! इस तपती दोपहर में कमरे की यह व्यवस्था क्यों बंद है? क्या यहाँ की बिजली चली गई है? और आपका चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है, क्या आपने दोपहर का भोजन किया?”
माँ ने अपनी नजरें नीची कर लीं, वे अपनी बेटी के घर में कोई विवाद नहीं चाहती थीं। उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “नहीं बेटी काव्या, कोई बात नहीं। शायद दोपहर में बिजली की कोई तकनीकी समस्या (technical fault) आ गई थी, इसलिए पंखा बंद हो गया था। मैं बिल्कुल ठीक हूँ, तुम चिंता मत करो।”

लेकिन मैं एक पढ़ी-लिखी, समझदार महिला थी। मैंने तुरंत बाहर आकर देखा—घर के बाकी सभी हिस्सों में, सावित्री देवी के कमरे में, मुख्य लॉबी में बिजली और सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पूरी तरह सक्रिय थे। यह कोई तकनीकी समस्या नहीं थी, यह एक जानबूझकर किया गया कृत्य था।
मैं तुरंत रसोई की तरफ भागी ताकि माँ के लिए ठंडा पानी और भोजन ला सकूं। लेकिन रसोई के भीतर का नजारा इससे भी ज्यादा भयानक था। हमारे महंगे डबल-डोर रेफ्रिजरेटर (fridge) के दोनों हैंडलों के बीच एक लोहे की भारी जंजीर लपेटी गई थी और उस पर एक मजबूत ताला लटका हुआ था। उस ताले के ठीक ऊपर, एक सफेद कागज़ पर काले मार्कर से एक बहुत ही स्पष्ट और क्रूर संदेश लिखा हुआ था:
“इस रेफ्रिजरेटर के अंदर की सामग्रियां और फल केवल मेरे बेटे की वैध आय से आए हैं। बाहर से आए हुए मेहमान और बाहरी लोग बिना अनुमति के इसे छूने या उपयोग करने का प्रयास न करें।”
इतना ही नहीं, रसोई के सभी सूखे अनाज के डिब्बे अलमारी के भीतर बंद कर दिए गए थे और एलपीजी गैस सिलेंडर का मुख्य रेगुलेटर भी एक विशेष लॉक के जरिए बंद था।
मेरी माँ ने धीरे से रसोई के दरवाजे पर आकर मेरा हाथ पकड़ा और अत्यंत धीमी आवाज में पूरी सच्चाई बताई, “काव्या, सावित्री देवी दोपहर के लगभग एक बजे अपने छोटे बेटे रोहित के घर चली गईं। जाने से पहले उन्होंने रसोई को पूरी तरह बंद कर दिया और मुझसे सीधे शब्दों में कह गईं—’शांति देवी, जो सामग्रियां तुम अपने गाँव के थैलों में भरकर लाई हो, यदि भूख लगे तो उसी का उपयोग करो। मेरे बेटे की कमाई पर परजीवी बनने की चेष्टा मत करना।’”
मैंने अपनी माँ की सूखी हुई आँखों में देखा और पूछा, “माँ, आपके पास मेरा मोबाइल नंबर था, अर्जुन का नंबर था। आपने हमें एक बार भी फोन क्यों नहीं किया? आप इस भीषण गर्मी में इस तरह भूखी क्यों बैठी रहीं?”
माँ ने एक बहुत ही फीकी, दर्दभरी मुस्कान के साथ मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा, “तुम्हारी नौकरी बहुत महत्वपूर्ण है, बेटी। तुम एक बहुत बड़े पद पर हो। मैं तुम्हारे वैवाहिक जीवन में, तुम्हारे और अर्जुन के बीच मेरी वजह से कोई विवाद या झगड़ा नहीं चाहती थी। मैंने बस… मैंने बस अपनी पोटली से एक सूखी हुई रोटी निकाली और उसे थोड़े से पानी में भिगोकर ले लिया था। मैं ठीक हूँ, मेरी बच्ची।”
मैंने उस कागज़ के टुकड़े को फ्रिज से बाहर खींचा। जब मैंने उस कागज़ को पलटा, तो उसके पीछे सावित्री देवी के हाथ से लिखी हुई एक और पंक्ति थी जो उनके वास्तविक इरादों को पूरी तरह नग्न कर रही थी। उसमें लिखा था: “यह शानदार घर आज नहीं तो कल कानूनी रूप से केवल मेरे और मेरे छोटे बेटे रोहित के परिवार का होगा। अपनी वास्तविक पृष्ठभूमि और औकात को पहचानो और यहाँ से विदा हो जाओ।”
उस क्षण, मेरे भीतर एक आम बहू की तरह चिल्लाने, रोने या तुरंत सावित्री देवी को फोन करके उन पर चीखने की तीव्र इच्छा हुई। लेकिन मेरे पिता ने मुझे हमेशा सिखाया था कि जब सामने वाला व्यक्ति अपनी मर्यादा भूल जाए, तो आपका सबसे बड़ा हथियार आपका संयम और कानून होता है। मैंने गहरी सांस ली, अपने गुस्से को पूरी तरह से शांत किया और एक रणनीतिक दिमाग से काम लेना शुरू किया।
मैंने अपनी माँ को दिलासा दिया, उन्हें अपने कमरे में ले गई और बाहर के एक अच्छे रेस्तरां से उनके स्वास्थ्य के अनुकूल शुद्ध भोजन और ठंडा जूस ऑर्डर किया। जब तक भोजन आ रहा था, मैंने अपने स्मार्टफोन का कैमरा ऑन किया। मैंने फ्रिज पर लगी उस जंजीर और ताले की अत्यधिक स्पष्ट (high-definition) तस्वीरें लीं। मैंने उस कागज़ पर लिखे दोनों तरफ के संदेशों का क्लोज-अप शॉट लिया।
इसके बाद, मैं अतिथि कक्ष में गई और मैंने बंद पड़े बिजली के मुख्य पैनल, कमरे के भीतर के ऊंचे तापमान के संकेतक और खिड़की के पास बैठी मेरी अस्वस्थ माँ का एक पूरा वीडियो साक्ष्य (video evidence) बनाया। मैंने घर के आंतरिक सीसीटीवी कैमरों के फुटेज को भी अपने लैपटॉप में डाउनलोड कर लिया, जिसमें सावित्री देवी दोपहर को गैस रेगुलेटर बंद करती हुई और फ्रिज पर ताला लगाती हुई साफ दिखाई दे रही थीं। ये सारे सबूत अब मेरी कानूनी फाइल का हिस्सा बन चुके थे।
सावित्री देवी और उनके छोटे बेटे रोहित इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ थे कि अर्जुन और मैं पिछले दो महीने से एक बहुत बड़ा और गुप्त निर्णय ले चुके थे। वास्तव में, यह घर जिसमें हम रह रहे थे, उसकी पूरी ईएमआई (EMI) और कागजात अर्जुन और मेरे संयुक्त नाम पर थे। सावित्री देवी को लगता था कि अर्जुन अपनी माँ के प्रति अंधा है और वह यह घर कभी नहीं बेचेगा।
लेकिन रोहित के बढ़ते कर्ज और सावित्री देवी के हर दिन के मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर, अर्जुन और मैंने दो महीने पहले ही इस बड़े घर को बेचने की कानूनी प्रक्रिया (legal sale process) शुरू कर दी थी। हमें इंदौर के ही एक बहुत बड़े व्यवसायी के रूप में एक सही खरीदार मिल चुका था, बैंक से लोन ट्रांसफर की वित्तीय सहमति आ चुकी थी और हमने अपने लिए शहर के एक दूसरे शांत हिस्से में एक नए, आधुनिक लेकिन छोटे और सुरक्षित घर की बुकिंग भी पूरी कर ली थी।
हमारी योजना थी कि इस घर की रजिस्ट्री पूरी होते ही, हम सावित्री देवी को बहुत ही शालीनता से समझाकर, उनके रहने के लिए पास में ही एक बेहतरीन वन-बीएचके (1-BHK) किराए का फ्लैट पूरी सुख-सुविधाओं के साथ दे देंगे और उनके बैंक खाते में एक निश्चित मासिक रकम भेजते रहेंगे, ताकि हम दोनों के परिवारों के बीच एक सुरक्षित दूरी बनी रहे। लेकिन सावित्री देवी ने आज जो कृत्य किया था, उसने हमारे इस नरम फैसले को एक कठोर कानूनी निर्णय में बदल दिया था।
शाम के ठीक सात बजे अर्जुन दफ्तर से वापस लौटा। उसने जब घर का बदला हुआ माहौल देखा और मेरी माँ के चेहरे की कमजोरी पकड़ी, तो वह बेचैन हो गया। मैं उसे सीधे अपने अध्ययन कक्ष (study room) में ले गई और मैंने चुपचाप वह कागज़ का नोट, फ्रिज के ताले की तस्वीरें और वीडियो फुटेज उसके सामने रख दिए।
अर्जुन ने जब अपनी माँ के हाथ से लिखी हुई वे क्रूर पंक्तियाँ पढ़ीं, तो उसका पूरा चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। उसकी आँखों में अपनी सास के प्रति गहरा पछतावा था। वह तुरंत अतिथि कक्ष में गया, उसने मेरी माँ के पाँव छुए और काफी देर तक उनके घुटनों के पास बैठकर रोता रहा। उसने अपनी माँ की इस घिनौनी हरकत के लिए उनसे हाथ जोड़कर माफी मांगी।
मेरी माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटा अर्जुन, तुम बहुत अच्छे हो। मैं जानती हूँ इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। लेकिन अपनी माँ के दिल की कड़वाहट को समझो।”
रात के नौ बजे, अर्जुन वापस मेरे पास आया। उसकी आवाज में अब कोई दुविधा या लाचारी नहीं थी। उसने दृढ़ता से कहा, “काव्या, अब केवल समझाने, सहने या पारिवारिक बातचीत का समय पूरी तरह समाप्त हो चुका है। मेरी माँ ने हमारी सादगी को हमारी कमजोरी मान लिया है। अब हमें अपनी कानूनी, पारिवारिक और नैतिक सीमाएं पूरी तरह से तय करनी होंगी। हम कल सुबह ही इस घर का अंतिम सौदा पूरा करेंगे।”
उसी रात, हमने अपने वकील और घर के खरीदार को फोन किया। रजिस्ट्री के कागजात पहले से ही तैयार थे। हमने फैसला किया कि घर की बिक्री की कानूनी तारीख जो अगले सप्ताह होने वाली थी, उसे बदलकर कल सुबह ठीक आठ बजे की जाएगी। सावित्री देवी रात के ग्यारह बजे अपने छोटे बेटे रोहित के घर से वापस लौटीं। उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी, उन्हें लग रहा था कि मेरी माँ अपमानित होकर सुबह की ट्रेन से वापस चली जाएंगी। उन्होंने हमसे कोई बात नहीं की और सीधे अपने कमरे में जाकर सो गईं। उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि सुबह का सूरज उनके पैर तले की जमीन खिसकाने वाला था।
अगली सुबह, ठीक आठ बजे, हमारे घर के मुख्य दरवाजे की घंटी बहुत ही आक्रामक और पेशेवर तरीके से बजी।
सावित्री देवी अपने कमरे से चाय का कप लेकर बाहर निकलीं, उनके चेहरे पर अब भी वही अहंकार था। आरव और मेरी माँ पहले से ही अपने बैग पैक करके लिविंग रूम में शांत बैठे थे। अर्जुन और मैं मुख्य मेज़ के पास खड़े थे।
जैसे ही अर्जुन ने दरवाजा खोला, बाहर तीन लोग खड़े थे। बीच में इंदौर जिला न्यायालय (Indore District Court) के वरिष्ठ कॉर्पोरेट वकील मिस्टर पाठक थे, उनके दाहिने हाथ में एक सीलबंद कानूनी फाइल थी, और उनके साथ दो अन्य पुरुष थे जो संपत्ति के नए खरीदार के आधिकारिक कानूनी प्रतिनिधि (Authorized Representatives) थे। उनके पीछे दो सुरक्षा गार्ड भी खड़े थे।
सावित्री देवी ने आगे आकर आश्चर्य से पूछा, “अर्जुन बेटा, सुबह-सुबह ये सरकारी लोग हमारे घर में क्या कर रहे हैं? और काव्या की माँ के बैग यहाँ क्यों रखे हैं? क्या यह बूढ़ी औरत वापस जा रही है?”
वकील मिस्टर पाठक ने आगे बढ़कर मेज़ पर अपनी फाइल खोली और सावित्री देवी की तरफ देखते हुए बहुत ही आधिकारिक और ठंडे स्वर में कहा—
—श्रीमती सावित्री देवी, कृपया ध्यान से सुनिए। यह घर अब आपका या आपके बेटे अर्जुन शर्मा का नहीं रहा। आज सुबह ठीक सात बजकर तीस मिनट पर, इस संपत्ति की अंतिम बिक्री विलेख (Final Sale Deed) की रजिस्ट्री कानूनी रूप से पूरी हो चुकी है। इस घर के पूर्ण स्वामित्व के अधिकार (Absolute Ownership Rights) अब मिस्टर सिंघानिया के समूह के पास ट्रांसफर हो चुके हैं, जिन्होंने इस घर को खरीदा है।
यह सुनते ही सावित्री देवी के हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर गिर गया। उनका पूरा चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने चिल्लाकर कहा, “यह क्या बकवास है! अर्जुन, तुम अपनी माँ के जिंदा रहते यह घर कैसे बेच सकते हो? तुमने मुझसे बिना पूछे यह कदम कैसे उठाया? यह घर मेरा है, मेरे छोटे बेटे रोहित का इस पर अधिकार है!”
अर्जुन ने आगे बढ़कर अपनी माँ की आँखों में सीधे देखा। उसकी आवाज में कोई गुस्सा नहीं था, केवल एक न्यायपूर्ण कठोरता थी। उसने कहा—
—माँ, इस घर की एक-एक ईंट का भुगतान काव्या और मैंने अपनी नौकरी की गाढ़ी कमाई से किया था। इस घर को खरीदने के लिए मेरी अग्रिम राशि कम पड़ी थी, तब इसी शांति देवी माँजी ने अपनी ज़मीन बेचकर हमारी छत सुरक्षित की थी। आपने कभी इस घर में एक पैसा भी नहीं लगाया, बल्कि अपना घर बेचकर सारा पैसा रोहित के जुए और सट्टे के कारोबार में उड़ा दिया। और कल दोपहर आपने जो किया… फ्रिज पर जो ताला लगाया और जो नोट लिखा, उसने मेरे भीतर के बेटे को पूरी तरह से जगा दिया है।
मैं (काव्या) आगे बढ़ी और मैंने अपने बैग से कल रात का वह लिखित नोट, फ्रिज के ताले की हाई-डेफिनिशन तस्वीरें और सीसीटीवी फुटेज की एक कॉपी मेज़ पर रख दी।
मैंने सावित्री देवी से कहा, “सावित्री जी, आपने कल इस नोट पर लिखा था ना कि ‘यह घर आज नहीं तो कल कानूनी रूप से मेरे छोटे बेटे रोहित के परिवार का होगा और मैं अपनी औकात समझूं।’ तो देख लीजिए, आज सुबह आठ बजे से इस घर पर न तो मेरा अधिकार है, न अर्जुन का, और आपका तो कभी था ही नहीं। यह घर अब मिस्टर सिंघानिया का है, और इनके सुरक्षा गार्डों के पास इस घर का कब्जा लेने का कानूनी वारंट है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सावित्री देवी ने तुरंत अपने कांपते हाथों से छोटे बेटे रोहित को फोन लगाया। उन्होंने रोते हुए कहा, “रोहित बेटा! जल्दी हमारे घर आ! अर्जुन और काव्या ने यह घर किसी बाहरी व्यक्ति को बेच दिया है! हमें यहाँ से निकलने के लिए कहा जा रहा है! तू तुरंत अपनी गाड़ी लेकर आ और मुझे अपने घर ले चल!”
फोन के दूसरी तरफ से रोहित की एक बेहद रूखी, स्वार्थी और कड़वी आवाज आई जो लाउडस्पीकर के कारण पूरे कमरे में साफ सुनाई दे रही थी—
—माँ, आप पागल हो गई हैं क्या? मेरे घर में पहले से ही बैंक के कर्जदारों का कब्जा होने वाला है! मेरी पत्नी ने साफ़ कह दिया है कि आपके नखरे उठाने के लिए हमारे घर में कोई जगह नहीं है! अर्जुन के पास बहुत पैसा है, आप वहीं रहिए। मुझे इस पचड़े में मत घसीटिए!
यह कहकर रोहित ने फोन काट दिया। सावित्री देवी का फोन उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया। उनके अहंकार का जो महल पिछले तीन सालों से खड़ा था, वह उनके अपने सगे छोटे बेटे के एक वाक्य से पल भर में ताश के पत्तों की तरह ढह गया। उन्हें समझ आ गया कि जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी पूरी दौलत लुटाई, उसने उन्हें सड़क पर छोड़ दिया था, और जिस बड़े बेटे और बहू का उन्होंने हर दिन अपमान किया, केवल वही उनके बुढ़ापे का सहारा थे।
वकील मिस्टर पाठक ने घड़ी की तरफ देखा और कहा, “श्रीमती सावित्री देवी, नए नियमों के अनुसार आपके पास अपने दो सूटकेस समेटने के लिए केवल तीस मिनट का समय है। उसके बाद इस घर के मुख्य डिजिटल लॉक को बदल दिया जाएगा।”
सावित्री देवी पूरी तरह से टूट चुकी थीं। वे रोती हुई मेरी माँ, शांति देवी के पैरों में गिर पड़ीं। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा—
—बहनजी, मुझे क्षमा कर दीजिए! मैंने आपके सीधेपन और सादगी का मज़ाक उड़ाया। मैंने इस घर के संसाधनों पर ताला लगाया, लेकिन आज भगवान ने मेरे भाग्य पर ही ताला लगा दिया है। अर्जुन बेटा, काव्या बहू, मुझे रास्ते पर मत छोड़ो! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई!
मेरी माँ, जो एक अत्यंत दयालु और आध्यात्मिक महिला थीं, उन्होंने तुरंत झुककर सावित्री देवी को उठाया। उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा, “काव्या बेटी, क्रोध का उत्तर क्रोध से देना न्याय नहीं है। इन्होंने जो किया, उसका फल इन्हें मिल गया। लेकिन एक वृद्ध महिला को इस तरह सड़क पर छोड़ना हमारे संस्कार नहीं हैं।”
मैंने अर्जुन की तरफ देखा। हमारी योजना पहले से ही तैयार थी। अर्जुन ने अपनी जेब से एक दूसरी चाबी निकाली और उसे मेज़ पर रख दिया।
उसने सावित्री देवी से कहा, “माँ, हमने आपके लिए इस इलाके से दो किलोमीटर दूर एक बहुत ही सुंदर, सुरक्षित और सुसज्जित वन-बीएचके (1-BHK) फ्लैट एक साल के लिए किराए पर बुक कर दिया है। उस फ्लैट का पूरा किराया और आपकी हर महीने की दवाइयों का खर्च काव्या और मैं हर महीने सीधे आपके खाते में भेजते रहेंगे। लेकिन अब आप हमारे साथ एक छत के नीचे नहीं रहेंगी। घरेलू संसाधनों पर ताला लगाने वाले लोगों के साथ हम अपने बेटे आरव की परवरिश नहीं कर सकते। आपने हमारे बीच जो पारिवारिक और वित्तीय सीमाएं तय की थीं, यह उसी का परिणाम है।”
सावित्री देवी ने रोते हुए उस चाबी को उठा लिया। उनकी आँखों में अब कोई अहंकार नहीं था, केवल एक गहरा पश्चाताप और आत्मग्लानि थी। वे चुपचाप अपने दो सूटकेस लेकर, नए खरीदार के सुरक्षा गार्डों के साथ उस बड़े बंगले की सीढ़ियों से नीचे उतर गईं।
अर्जुन ने आगे बढ़कर मेरी माँ का हाथ थामा, और हम सबने अपने छोटे बेटे आरव के साथ उस घर की दहलीज को हमेशा के लिए पार कर लिया। हमारी गाड़ी जब हमारे नए, छोटे लेकिन बेहद सकारात्मक और प्रेम से भरे घर के सामने रुकी, तो सुबह की ताजी धूप हमारे चेहरों पर पड़ रही थी। इंदौर का वह बड़ा मकान बिक चुका था, लेकिन हमारे परिवार का स्वाभिमान, हमारी शांति और मेरी माँ का सम्मान हमेशा के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो चुका था।
कमेंट सेक्शन में पूरी कहानी देखें।
एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली ही हमें गंभीर बीमारियों से दूर रख सकती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में…
मेरी बेटी ने अस्पताल में कहा, “दादी ने मुझे कुछ विशेष मोती दिए थे, पापा ने कहा था कि इसके…
होटल के कमरों में केवल सफेद चादरें इस्तेमाल होने के पीछे कई दिलचस्प कारण हैं। जब भी हम किसी होटल…
स्वस्थ और खुशहाल जीवन के लिए अपने पेट को साफ रखना बहुत जरूरी है। आज के समय में हमारी जीवनशैली…
“हम सब कुछ संभाल चुके हैं, अब दादी की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है,” कहकर मेरे रिश्तेदार उन्हें छोड़कर बाहर चले गए।…
प्लास्टिक कुर्सी के बीच बने छोटे छेद का असली सच। हम सभी ने अपने घरों, दुकानों, या किसी न किसी…