3 महीने का शिशु लगातार रोता रहा, रातोंरात निकला नुकीला दाँत—डॉक्टरों ने बताया चौंकाने वाला कारण
5 एक माँ के लिए अपने नवजात शिशु का लगातार रोना हमेशा चिंता का कारण होता है। लेकिन जब एक…
उस शाम पुणे की हवा में एक अजीब सी ठंडक और भारीपन था। आसमान पर बादलों की एक पतली परत छाई हुई थी, जैसे किसी अनहोनी का पूर्वाभास दे रही हो। हिंजवडी की उस गगनचुंबी सोसाइटी की सातवीं मंजिल पर जब लिफ्ट रुकी, तो माँ के चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो केवल अपने नाती-पोतों से मिलने जा रही एक भारतीय दादी के चेहरे पर ही देखी जा सकती है। उनके दोनों हाथों में गरम समोसे और चाशनी में भीगी ताज़ा जलेबियों का डिब्बा था, जिसे उन्होंने रास्ते भर अपने आँचल से ढँक कर रखा था ताकि उसकी गर्माहट कम न हो जाए। उनके पीछे पिताजी, महेश जी, अपने पुराने ढर्रे के चश्मे को ठीक करते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। वे जीवन भर भारतीय रेलवे में एक ईमानदार क्लर्क की नौकरी करते रहे थे, और उनकी पूरी दुनिया अपने बच्चों की तरक्की और खुशियों के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। मैं, यानी उनकी बड़ी बेटी पूजा, उनके पीछे-पीछे चल रही थी। मुझे क्या पता था कि अगले ही पल हम जिस दहलीज पर कदम रखने वाले थे, वह हमारे परिवार के मान-सम्मान, प्यार और विश्वास को हमेशा के लिए चकनाचूर करने वाली थी।
घंटी बजी। दो सेकंड बाद दरवाज़ा खुला। सामने मेरा छोटा भाई रोहन खड़ा था। लेकिन उसके चेहरे पर वह परिचित मुस्कान नहीं थी जो बचपन से लेकर अब तक हर शाम हमारे घर लौटने पर उसके चेहरे पर खिल जाती थी। उसकी आँखें लाल थीं, माथे पर गहरी शिकन थी और शरीर में एक अजीब सा खिंचाव था। उसने पहले हम तीनों को देखा, फिर माँ के हाथ में पकड़े उस जलेबी के डिब्बे पर उसकी नज़र गई। उसकी आँखों में प्यार या अपनापन की जगह एक तीखी नाराजगी और हताशा तैर गई।

माँ ने आगे बढ़कर बड़े लाड़ से कहा, “रोहन बेटा! देख, तेरी और बच्चों की पसंद की गरम जलेबियाँ लाई हूँ। आरव और कियारा कहाँ हैं? स्कूल से आ गए ना?”
माँ का पैर अभी दरवाज़े के अंदर पड़ा ही था कि रोहन ने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाकर दरवाज़े के चौखट को थाम लिया। उसने माँ का रास्ता रोक दिया था। उसका यह व्यवहार किसी खंजर की तरह हवा में लहराया।
“माँ, मैंने आपसे कितनी बार कहा है… कितनी बार हाथ जोड़कर विनती की है कि इस घर में आने से कम से कम दो घंटे पहले एक बार फोन कर दिया करो,” रोहन की आवाज़ में एक ऐसी कठोरता थी जो हमने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी उसके मुँह से नहीं सुनी थी।
माँ वहीं चौखट के बाहर ठिठक गईं। उनके चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे किसी ने अचानक उनके जिस्म से सारा खून निचोड़ लिया हो। “बेटा… बस बच्चों को एक नज़र देखकर चले जाएंगे। तू नाराज़ क्यों हो रहा है? अपने ही बेटे के घर आने के लिए भी क्या अब हमें परायों की तरह पहले से अर्ज़ी लगानी पड़ेगी?”
“हाँ माँ, लगानी पड़ेगी!” रोहन ने बिना पलक झपकाए, बेहद ठंडे और सख्त लहजे में कहा। “अगर दादा-दादी बच्चों से मिलना चाहते हैं, तो पहले फोन करेंगे, समय तय करेंगे। बिना बताए, बिना पूछे अब इस घर में कोई भी अचानक नहीं आएगा। आज आप लोग अंदर नहीं आ सकते।”
यह कहते हुए रोहन ने दरवाज़े को अपनी ओर खींचा और उसे आधा बंद कर दिया।
उस एक पल में समय जैसे हमेशा के लिए थम गया। सीढ़ियों की लॉबी में एक भयानक, दमघोंटू सन्नाटा छा गया। माँ की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ काँपने लगे। पिताजी, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने आत्मसम्मान को अपनी सबसे बड़ी दौलत माना था, एक पल के लिए लड़खड़ाए। उन्होंने अपनी नज़रें नीची कर लीं और चुपचाप फर्श की टाइलों को घूरने लगे। उनकी आँखों में जो गहरा अपमान और अविश्वास था, वह किसी भी शारीरिक चोट से कहीं अधिक दर्दनाक था।
पिताजी ने एक भारी और कांपती हुई आवाज़ में कहा, “रोहन… हम तुम्हारे माँ-बाप हैं। हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं।”
रोहन ने अपनी नज़रें चुराते हुए, बेहद धीमी लेकिन पत्थर जैसी आवाज़ में दोहराया, “इसीलिए कह रहा हूँ पिताजी… ताकि बात और ज़्यादा बिगड़ने से पहले आप लोग समझ सकें। आज आप लोग वापस जाइए।”
माँ की रुलाई फूट पड़ी। उनका गला रुंध गया, “क्या समझें रोहन? यही कि जिस बेटे को हमने अपनी रातों की नींद और अपनी पूरी ज़िंदगी बेचकर इस काबिल बनाया कि वह इस बड़े शहर में एक आलीशान फ्लैट खरीद सके, आज उसी फ्लैट के दरवाज़े पर उसने अपने बूढ़े माँ-बाप के मुँह पर दरवाज़ा बंद कर दिया? क्या हम अब अपने ही पोते-पोती से मिलने के लायक नहीं रहे?”
तभी फ्लैट के अंदर से एक नन्ही, मासूम किलकारी गूंजी। पाँच साल की कियारा दौड़ती हुई आई, “दादी! दादू! आप आ गए!”
माँ का ममतामयी दिल पसीज गया। उन्होंने अपने आँसू पोंछते हुए आगे कदम बढ़ाया, “मेरी बच्ची…”
लेकिन रोहन ने कियारा को पीछे धकेलते हुए दरवाज़े के गैप को और कम कर दिया। “माँ, प्लीज़! तमाशा मत बनाइए। आज नहीं!”
उसी पल अंदर से नेहा बाहर आई। रोहन की पत्नी, हमारी बहू। उसके एक कान में वायरलेस हेडसेट लगा हुआ था, हाथ में उसका ऑफिस लैपटॉप खुला था जिसकी स्क्रीन पर दर्जनों चार्ट्स और वीडियो कॉलिंग का विंडो खुला हुआ दिख रहा था। उसके चेहरे पर घबराहट, पसीना और एक गहरी बेबसी साफ झलक रही थी। वह अपनी आँखें हमसे नहीं मिला पा रही थी।
“मम्मीजी… प्लीज़ आप लोग बुरा मत मानिए,” नेहा ने बहुत ही दबी हुई, कांपती हुई आवाज़ में कहा।
माँ का रोष अब नेहा पर फूट पड़ा। माँ ने रोते हुए कहा, “बुरा कैसे न मानूँ नेहा? मेरी पोती मुझे अंदर बुला रही है और तुम दोनों मुझे चौखट पर एक भिखारी की तरह बाहर खड़ा रखे हो! क्या यही संस्कार हैं? क्या यही सिला दे रहे हो तुम लोग हमारे प्यार का?”
मैंने उस वक्त ध्यान से नेहा के चेहरे को देखा। मुझे लगा था कि नेहा के चेहरे पर कोई घमंड या नफ़रत दिखेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। नेहा की आँखों में आँसू छलक आए थे। वह शर्म और बेबसी के बोझ तले दबी हुई लग रही थी। अगर यह सब नेहा की साज़िश थी, अगर वही रोहन को भड़का रही थी, तो फिर उसकी आँखों में यह गहरा दर्द और लाचारी क्यों थी? यह बात मेरे दिल में एक कांटे की तरह चुभ गई।
अंदर से आरव की भी आवाज़ आई, “दादी, अंदर आओ ना! मुझे समोसा खाना है!”
माँ की सहनशक्ति जवाब दे गई। उनके हाथों की ताक़त खत्म हो गई और उनके हाथ से वह जलेबी और समोसे का डिब्बा छूटकर नीचे गिर पड़ा। डिब्बे का ढक्कन खुला और फर्श पर गर्म, रसीली जलेबियाँ बिखर गईं। चाशनी फर्श पर फैल गई, मानो हमारे परिवार के वर्षों पुराने रिश्तों का मीठापन ज़मीन पर गिरकर मैला हो गया हो।
पिताजी ने आगे बढ़कर माँ का कंधा पकड़ा। उन्होंने नीचे झुककर उस बिखरे हुए डिब्बे को उठाया और बहुत ही शांत लेकिन टूटे हुए स्वर में कहा, “चलो सुनीता। जिस चौखट पर हमारा कोई सम्मान नहीं, वहाँ हमारी मुहब्बत भी बेकार है। चलो यहाँ से।”
माँ ने अंतिम बार रोहन की ओर देखा। उनकी आँखों में अनगिनत सवाल थे, जिनका कोई जवाब नहीं था। रोहन ने अपने होंठ भींचे, उसके जबड़े सख्त हो गए, लेकिन उसने एक शब्द नहीं कहा और चुपचाप खड़ा रहा।
हम तीनों लिफ्ट की तरफ मुड़ गए। जैसे ही लिफ्ट का दरवाज़ा खुला, पीछे से रोहन के फ्लैट का भारी मुख्य दरवाज़ा ‘धड़ाम’ की आवाज़ के साथ पूरी तरह बंद हो गया। वह आवाज़ केवल एक लकड़ी के दरवाज़े के बंद होने की नहीं थी, वह हमारे भरे-पूरे परिवार के दो टुकड़ों में बंट जाने की आवाज़ थी।

उस रात हमारे कोथरूड वाले पुराने घर में चूल्हा नहीं जला। घर के हर कोने में एक भयानक, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। माँ अपने कमरे के बिस्तर पर मुँह ढँक कर रो रही थीं। उनकी सिसकियों की आवाज़ पुराने पंखे की घरघराहट के बीच गूंज रही थी। पिताजी बैठक में अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे शून्य में ताक रहे थे। उन्होंने अपनी चाय तक को हाथ नहीं लगाया था। जिस पिता ने कभी अपने बच्चों के सामने अपनी आँखों में एक बूँद आँसू नहीं आने दिया था, आज उनकी पलकों के कोरों पर नमी की एक पतली लकीर सूख चुकी थी।
मैं रसोई में खड़ी पानी का गिलास हाथ में लिए सोच रही थी कि आखिर बात यहाँ तक कैसे पहुँची?
रोहन हमेशा से एक संवेदनशील, आज्ञाकारी और परिवार से प्यार करने वाला लड़का था। जब उसने तीन साल पहले हिंजवडी की इस पॉश सोसाइटी में साढ़े तीन बीएचके का फ्लैट खरीदा था, तो उसने सबसे पहले पिताजी के पैर छूकर कहा था, “पापा, यह घर मेरा नहीं, आपका है।” नेहा से उसकी शादी को नौ साल हो चुके थे। नेहा एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर थी। वह आधुनिक सोच वाली ज़रूर थी, लेकिन कभी भी उसने हमारे साथ बदतमीज़ी या असम्मानजनक व्यवहार नहीं किया था। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि रोहन ने अपने ही माँ-बाप को धक्के मारकर बाहर निकाल दिया? क्या वाकई एक बड़ी नौकरी, बड़ा फ्लैट और आधुनिक जीवनशैली इंसान के खून को इतना सफेद कर देती है? क्या आधुनिकता का मतलब अपनों का अनादर करना ही होता है?
अगले तीन दिन हमारे घर के लिए किसी नर्क से कम नहीं थे। माँ ने बच्चों का नाम लेना बिल्कुल बंद कर दिया था। जो माँ दिन में दस बार आरव की पढ़ाई और कियारा की मीठी बातों के किस्से सुनाया करती थी, वह अब सिर्फ दीवार पर टंगी भगवान कृष्ण की तस्वीर को खामोशी से निहारती रहती थी। मोहल्ले के लोग जब पूछते, “सुनीता जी, आजकल बच्चे नहीं दिख रहे?” तो माँ झूठी मुस्कान के साथ कह देतीं, “उनकी परीक्षाएँ चल रही हैं, इसलिए व्यस्त हैं।” लेकिन भीतर ही भीतर उनका आत्मसम्मान और मातृत्व तिल-तिल कर मर रहा था।
तीसरे दिन की दोपहर को, जब पिताजी किसी काम से बैंक गए हुए थे, मैंने माँ के पास जाकर कहा, “माँ, मुझसे यह खामोशी अब बर्दाश्त नहीं हो रही। मैं आज ही हिंजवडी जाऊँगी और रोहन से पूछूँगी कि आखिर उसकी हिम्मत कैसे हुई पिताजी के साथ ऐसा बर्ताव करने की। क्या वह भूल गया कि उसकी इंजीनियरिंग की फीस भरने के लिए पिताजी ने अपनी भविष्य निधि (पीएफ) का पैसा निकाल लिया था?”
माँ ने अपनी कमज़ोर और सूजी हुई आँखों से मुझे देखा और मेरा हाथ थाम लिया। “नहीं पूजा, तू कहीं नहीं जाएगी।”
“क्यों माँ? हम क्यों सहें यह अपमान?”
“क्योंकि अगर उसने हमें अपनी ज़िंदगी से बाहर करने का फैसला कर लिया है, तो हमें भी अपने आत्मसम्मान को बचाना होगा। मैं नहीं चाहती कि मेरे नाती-पोते यह देखें कि उनकी दादी अपने बेटे के घर में ज़बरदस्ती घुसने की कोशिश कर रही है। प्यार माँगा नहीं जाता पूजा, और जो प्यार माँगने पर मिले, वह भीख कहलाता है। अगर उसे हमारे बिना ही शांति मिलती है, तो हम उसे वही शांति देंगे।”
माँ के उन भारी शब्दों ने मुझे निरुत्तर कर दिया। लेकिन मेरे दिल का गुस्सा और उलझन शांत नहीं हुई थी।
उसी शाम, जब मैं अपने कमरे में बैठी थी, मेरे फोन की स्क्रीन जली। स्क्रीन पर नेहा का नाम चमक रहा था। मेरा पहला मन हुआ कि मैं फोन काट दूँ और उसे ब्लॉक कर दूँ। लेकिन फिर मेरे मन में एक जिज्ञासा जागी कि आखिर उस दिन रोहन के पीछे खड़े होकर रोने वाली नेहा अब क्या कहना चाहती है?
मैंने फोन उठाया और बिना कोई अभिवादन किए सीधे कहा, “हाँ नेहा, कहो। अब क्या बाकी रह गया है सुनाने को?”
दूसरी तरफ से कुछ पलों तक सिर्फ भारी सांसों और सिसकियों की आवाज़ आई। फिर नेहा की अत्यंत धीमी और कांपती हुई आवाज़ सुनाई दी, “दीदी… क्या आप आज शाम मुझसे मिल सकती हैं? अकेले? प्लीज़… रोहन को या मम्मीजी-पापाजी को मत बताइएगा कि मैंने आपको फोन किया है।”
“मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी नेहा। जो तमाशा तुम लोगों ने उस दिन किया, उसके बाद बात करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है,” मैंने गुस्से में कहा।
“दीदी, मैं हाथ जोड़ती हूँ… बस आधे घंटे के लिए आ जाइए। अगर आप नहीं आईं, तो शायद यह परिवार हमेशा के लिए पूरी तरह तबाह हो जाएगा। मैं आपको सब कुछ सच-सच बताना चाहती हूँ। वह सच जो रोहन ने अपने सीने में दबा रखा है,” नेहा की आवाज़ में इतनी बेबसी और गिड़गड़ाहट थी कि मेरा कठोर दिल भी एक पल के लिए पिघल गया।
मैंने एक गहरी सांस ली, “ठीक है। मैं आ रही हूँ।”
मैंने माँ से कहा कि मैं बाज़ार जा रही हूँ और सीधे हिंजवडी के लिए कैब बुक कर ली। पूरे रास्ते मेरे दिमाग में हज़ारों सवाल घूमते रहे।
जब मैं रोहन के फ्लैट पर पहुँची, तो शाम के सात बज रहे थे। घंटी बजाने पर नेहा ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर उदासी की गहरी छाया थी। दोनों बच्चे घर पर नहीं थे। पूछने पर नेहा ने बताया कि उसने बच्चों को अपनी बहन के घर भेज दिया है ताकि हम शांति से बात कर सकें, और रोहन अभी ऑफिस की एक लंबी मीटिंग में फंसा हुआ था।
नेहा मुझे सीधे बालकनी में ले गई, जहाँ से नीचे पुणे शहर की जगमगाती बत्तियाँ दिखाई दे रही थीं। उसने मेरे लिए चाय की प्याली आगे बढ़ाई, लेकिन मैंने उसे छूने से भी इनकार कर दिया।
“औपचारिकता छोड़ो नेहा। सीधे मुद्दे पर आओ। तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?” मैंने सपाट आवाज़ में पूछा।
नेहा ने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। उसकी उंगलियाँ अपनी कुर्ती के छोर को मरोड़ रही थीं। “दीदी… उस दिन जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मैं अपनी ज़िंदगी भर शर्मिंदा रहूँगी। लेकिन भगवान के लिए यह मत सोचिए कि रोहन या मैं मम्मीजी और पापाजी से नफ़रत करते हैं।”
“अगर नफ़रत नहीं करते, तो मुँह पर दरवाज़ा क्यों बंद किया?” मैंने तीखे स्वर में पूछा। “माँ-बाप कोई अनचाहे मेहमान नहीं होते जिन्हें तुम अपनी मर्जी के मुताबिक अपॉइंटमेंट देकर बुलाओ!”
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले। “दीदी, आपको हमारी कॉर्पोरेट ज़िंदगी का सच बाहर से बहुत खूबसूरत लगता होगा। बड़ा पैकेज, बड़ा घर, बड़ी गाड़ी… लेकिन इस चमक-दमक के पीछे हम जिस मानसिक दबाव में जी रहे हैं, वह कोई नहीं देखता। मैं जिस अमेरिकी प्रोजेक्ट को लीड कर रही हूँ, उसकी सारी मुख्य कॉल्स और एस्केलेशन मीटिंग्स शाम को 5 बजे से रात के 11 बजे के बीच होती हैं। एक छोटी सी गलती, पृष्ठभूमि में एक ज़रा सा शोर, या दस मिनट के लिए स्क्रीन से हटना भी लाखों डॉलर के प्रोजेक्ट और मेरी नौकरी को खतरे में डाल सकता है।”
“तो क्या माँ-बाप के प्यार से तुम्हारी नौकरी बड़ी हो गई?” मैंने ताना मारा।
“नहीं दीदी! बात यह नहीं है,” नेहा ने तड़प कर कहा। “मुश्किल यह नहीं है कि वे आते हैं। मुश्किल यह है कि जब वे आते हैं, तो वे सिर्फ बैठने नहीं आते। मम्मीजी का स्वभाव है—वे आते ही रसोई में घुस जाती हैं, खाना पकाने लगती हैं, बर्तन समेटने लगती हैं। पापाजी पंखे, नल या बच्चों के खिलौने ठीक करने में लग जाते हैं। वे यह सब प्यार और मदद की भावना से करते हैं, मैं जानती हूँ। लेकिन ज़रा मेरी स्थिति सोचिए दीदी! मैं अपने कमरे में हेडसेट लगाकर लैपटॉप पर विदेशी क्लाइंट्स से बात कर रही होती हूँ, और बाहर मेरी साठ साल की सास मेरे बच्चों के लिए रोटी बना रही होती है। उस पल मेरे दिल पर क्या गुज़रती होगी? मुझे खुद से घिन आने लगती है कि मैं कितनी स्वार्थी और निकम्मी बहू हूँ जो अपने कमरे में बैठी है जबकि उसके बूढ़े सास-ससुर काम कर रहे हैं!”
नेहा रोते हुए आगे बोली, “और अगर मैं अपना काम छोड़कर, मीटिंग ऑन-होल्ड रखकर बाहर आकर मम्मीजी के साथ बैठती हूँ, तो मेरा काम छूटता है। पिछले तीन महीनों में तीन बार मेरे अमेरिकी डायरेक्टर ने मुझे पूरे डिपार्टमेंट के सामने डांटा है क्योंकि मेरी बैकग्राउंड में अचानक प्रेशर कुकर की सीटी बजी थी या बच्चों के चिल्लाने की आवाज़ आई थी। मुझे दो बार लिखित चेतावनी मिल चुकी है कि अगर मेरा ध्यान काम पर नहीं रहा, तो मुझे प्रोजेक्ट से हटा दिया जाएगा। रोहन की कंपनी में भी बड़े पैमाने पर छंटनी चल रही है। अगर मेरी नौकरी चली गई, तो इस घर की डेढ़ लाख की ईएमआई, बच्चों की स्कूल फीस और परिवार का खर्च कैसे चलेगा?”
मैं कुछ पलों के लिए खामोश हो गई। एक कामकाजी महिला होने के नाते मैं उसके तनाव को समझ सकती थी, लेकिन फिर भी मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि सिर्फ इस वजह से कोई अपने माँ-बाप को दरवाज़े से लौटा दे।
“नेहा, यह सब बातचीत से सुलझाया जा सकता था,” मैंने कहा। “तुम माँ को प्यार से समझा सकती थीं कि वे शाम के समय न आएं, या चुपचाप बैठें। इसके लिए उन्हें इतने अपमानजनक तरीके से बेइज्जत करने की क्या ज़रूरत थी?”
नेहा ने अपनी दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढँक लिया। उसकी सिसकियाँ और तेज़ हो गईं। “दीदी… यही तो सबसे बड़ा राज़ है। दरवाज़ा बंद करने की असली वजह मेरा काम या मेरा वर्क-फ्रॉम-होम था ही नहीं।”
मेरे कान खड़े हो गए। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। “फिर? फिर असली वजह क्या थी?”
नेहा ने कांपते हुए अपनी आँखें उठाईं। उसकी आँखों में एक ऐसा गहरा दर्द और खौफ था जिसने मुझे भीतर तक डरा दिया। उसने धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, “दीदी… उस घटना से ठीक चार दिन पहले… पापाजी के पास इस फ्लैट की जो एक पुरानी डुप्लीकेट चाबी थी, वे उससे चुपचाप ताला खोलकर सीधे घर के अंदर आ गए थे। उस वक्त रोहन घर पर नहीं था।”
यह सुनते ही मेरे जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई। “क्या? पापाजी अकेले आए थे?”
“हाँ,” नेहा ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा। “दोपहर का वक्त था। मैं अपने बेडरूम का दरवाज़ा बंद करके एक बहुत ही क्रिटिकल क्लाइंट कॉल पर थी। मैंने शॉर्ट्स और एक साधारण टी-शर्ट पहनी हुई थी क्योंकि मैं अपने निजी कमरे में थी। अचानक मुझे लिविंग रूम से किसी के चलने की आवाज़ आई। मैं डर गई कि कोई चोर घुस आया है। जब मैंने धीरे से बेडरूम का दरवाज़ा खोला, तो देखा पापाजी सोफे पर बैठे थे। वे बिना बताए, सीधे चाबी से ताला खोलकर अंदर आ गए थे।”
“तो इसमें इतनी बड़ी क्या बात हो गई नेहा? वे कोई पराए थोड़े ही हैं, अपने ही घर में आए थे!” मैंने बात को संभालना चाहा।
“दीदी, बात उनके आने की नहीं थी!” नेहा की आवाज़ में दर्द की इंतहा थी। “पापाजी उस वक्त अपने फोन पर लाउडस्पीकर ऑन करके गाँव वाले बड़े ताऊजी से बात कर रहे थे। शायद उन्हें लगा कि घर में कोई नहीं है। मैं उस वक्त कमरे से बाहर आने ही वाली थी कि मेरे कानों में पापाजी के वो शब्द पड़े… जिन्होंने मेरे कलेजे के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।”
“क्या… क्या कहा था पापाजी ने?” मेरा गला सूख गया।
नेहा की आँखें शून्य में ताकने लगीं, मानो वह उस भयावह पल को दोबारा जी रही हो। “पापाजी ताऊजी से कह रहे थे—‘भैया, रोहन तो अब पूरी तरह हाथ से निकल चुका है। वह अपनी इस पढ़ी-लिखी, घमंडी पत्नी का गुलाम बन गया है। इस घर पर अब पूरी तरह बहू का राज चलता है। बहू दिन भर कमरे में बंद होकर कंप्यूटर पर बैठी रहती है, न घर का काम करती है, न धर्म-कर्म का ख्याल है। रोहन को उसने अपनी उंगलियों पर नचा रखा है। हमारे बुढ़ापे का सहारा तो अब पूरी तरह छिन चुका है। यह लड़की हमारे पूरे खानदान को बर्बाद करके ही दम लेगी।’”
यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला।
नेहा फूट-फूट कर रोने लगी, “दीदी, जिस ससुर को मैंने हमेशा अपने सगे पिता से बढ़कर माना, जिनकी हर बीमारी में मैंने आधी रात को उठकर दवाइयाँ दीं, जिनकी हर पसंद-नापसंद का ख्याल रखा… जब उन्होंने मेरे पीठ पीछे मुझे अपने ही पति के परिवार को तोड़ने वाली एक ‘घमंडी और कुल-नाशिनी’ औरत का तमगा दे दिया, तो मेरे पैरों के नीचे से मेरी पूरी दुनिया खिसक गई। मैं वहीं बेडरूम के दरवाज़े के पीछे गिर पड़ी और घंटों रोती रही। जब पापाजी बिना किसी से मिले, पानी पीकर चले गए, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा इस घर में कोई अस्तित्व ही नहीं है।”
मैं सन्न रह गई। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मेरे सीधे-सादे, शांत रहने वाले पिताजी किसी के बारे में इतनी ज़हरीली बातें भी बोल सकते हैं। भारतीय परिवारों का यह एक ऐसा कड़वा और घिनौना सच है जिसे अक्सर संस्कारों के नाम पर कालीन के नीचे दबा दिया जाता है—पीठ पीछे बहुओं को परिवार की बर्बादी का कारण मान लेना और अपने ही बेटों को ‘जोरू का गुलाम’ ठहरा देना।
मैंने कांपती आवाज़ में पूछा, “फिर… फिर तुमने यह बात रोहन को बताई?”
“नहीं दीदी!” नेहा ने तुरंत कहा। “मैंने रोहन को यह कभी नहीं बताया कि मैंने पापाजी की वह पूरी बातचीत अपने कानों से सुन ली थी। अगर मैं रोहन को यह बताती, तो रोहन का अपने पिता पर से हमेशा के लिए भरोसा उठ जाता। बाप-बेटे का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जाता। लेकिन उस शाम जब रोहन घर आया, तो उसने मुझे बेडरूम के फर्श पर बेसुध रोते हुए पाया। मेरा ब्लड प्रेशर इतना गिर गया था कि मुझे चक्कर आ रहे थे। रोहन के बार-बार कुरेदने पर मैंने बस इतना कहा कि पापाजी अचानक चाबी से ताला खोलकर अंदर आ गए थे और मेरी प्राइवेसी खत्म हो गई है, मुझे इस घर में डर और घुटन महसूस होती है।”
नेहा ने अपनी सिसकियों को रोकते हुए कहा, “रोहन ने जब मेरी यह हालत देखी, तो वह अंदर से पूरी तरह टूट गया। उसे समझ आ गया कि अगर उसने कोई सख्त कदम नहीं उठाया, तो या तो मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ जाएगा, हमारी शादी टूट जाएगी, या फिर रोज़-रोज़ की इस दखलंदाज़ी से माँ-बाप के साथ रिश्ते में ऐसा ज़हर घुलेगा जो कभी खत्म नहीं होगा। इसलिए… उस दिन जब मम्मी-पापा अचानक बिना बताए फिर से आ गए, तो रोहन ने जानबूझकर वह कठोर कदम उठाया।”
“किसलिए?” मेरी आँखें भी भर आईं।
“ताकि सारा गुस्सा, सारी नफ़रत और सारा इल्ज़ाम उस पर आ जाए!” नेहा ने रोते हुए खुलासा किया। “रोहन ने जानबूझकर खुद को एक ‘बदतमीज़, पत्थरदिल और नालायक बेटा’ साबित कर दिया ताकि मम्मी-पापा का सारा गुस्सा रोहन पर रहे, मुझ पर नहीं! रोहन जानता था कि अगर उसने माँ-बाप को अंदर आने दिया, तो मैं अपने आँसू और अपना तनाव नहीं छुपा पाऊँगी, और सच बाहर आ जाएगा। उसने अपने माँ-बाप की नज़रों में खुद को गिरा लिया ताकि इस परिवार के रिश्ते पूरी तरह से जलकर राख होने से बच सकें! उसने मुझे बचाने के लिए, और अपने पिता की इज़्ज़त को मेरी नज़रों में गिरने से बचाने के लिए अपने ही सीने पर यह खंजर झेल लिया, दीदी!”
जब नेहा की बात खत्म हुई, तो बालकनी में केवल हवा की सांय-सांय आवाज़ बची थी।
मेरे पैरों में खड़े रहने की ताक़त नहीं बची थी। मैं वहीं बालकनी की एक कुर्सी पर गिर पड़ी। मेरे दिमाग में एक बवंडर चल रहा था। जिस भाई को मैं पिछले तीन दिनों से दुनिया का सबसे एहसानफरामोश इंसान समझ रही थी, वह असल में अपने परिवार की मर्यादा और अपनी पत्नी के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपनी ही बलि चढ़ा रहा था!
और मेरे पिताजी? वे कोई बुरे इंसान नहीं थे। वे उसी पारंपरिक, पितृसत्तात्मक भारतीय सोच के शिकार थे जहाँ एक पिता यह स्वीकार नहीं कर पाता कि उसका बेटा अब बड़ा हो चुका है, उसकी अपनी एक स्वतंत्र दुनिया है, उसकी अपनी सीमाएँ हैं, और उसकी पत्नी कोई उसकी नौकरानी या उसके परिवार की जागीर नहीं बल्कि एक स्वतंत्र इंसान है जिसका अपना एक आत्मसम्मान है। पिताजी के उस एक फोन कॉल के ज़हर ने पूरे परिवार के अमृत को विष में बदल दिया था।
तभी मुख्य दरवाज़ा खुला और रोहन अंदर दाखिल हुआ। उसके कंधे झुके हुए थे, हाथ में ऑफिस का भारी बैग था। जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, वह चौंक गया। उसके चेहरे पर वही पुराना अपराधबोध और घबराहट तैर गई।
“दीदी… आप यहाँ?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा।
मैं अपनी कुर्सी से उठी। मैं बिना एक पल गंवाए आगे बढ़ी और अपने छोटे भाई को अपने सीने से लगा लिया। मेरे आँसू उसके कुर्ते को भिगोने लगे।
रोहन स्तब्ध रह गया। “दीदी… क्या हुआ? आप रो क्यों रही हैं? क्या माँ ठीक हैं? पापा…”
“तू कितना बड़ा बेवकूफ है रोहन!” मैंने रोते हुए उसकी पीठ पर हाथ मारा। “तूने खुद को इतना बड़ा शहीद क्यों बना लिया? तूने मुझे सच क्यों नहीं बताया? क्या मैं सिर्फ तेरी खुशियों में हिस्सा बँटाने के लिए बड़ी बहन बनी थी? इतने बड़े दर्द का बोझ तू अकेले अपने सीने पर क्यों ढोता रहा?”
रोहन की आँखें भर आईं। उसने एक नज़र नेहा पर डाली, जो सिर झुकाए खामोश खड़ी थी। रोहन समझ गया कि अब कोई पर्दा नहीं बचा था। उसका वह सख्त, कठोर मुखौटा ताश के पत्तों की तरह ढह गया और वह एक छोटे बच्चे की तरह मेरे गले लगकर सिसक-सिसक कर रोने लगा।
“दीदी… मैं क्या करता?” रोहन की आवाज़ रुंध गई थी। “एक तरफ वह बाप था जिसकी उँगली पकड़कर मैंने चलना सीखा, जिसने मुझे यहाँ तक पहुँचाने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी। दूसरी तरफ मेरी पत्नी थी, जो अपना घर-बार छोड़कर मेरे साथ आई, जो दिन-रात पसीना बहाकर मेरे साथ इस घर की ईंट-ईंट जोड़ रही है। मैं दोनों में से किसी को खोना नहीं चाहता था दीदी! अगर मैं पापा से लड़ता, तो वे जीते जी मर जाते। अगर मैं नेहा को चुप कराता, तो मैं अपनी ही नज़रों में एक कायर पति बन जाता। मेरे पास खुद को बुरा बनाने के अलावा कोई तीसरा रास्ता नहीं था दीदी… कोई तीसरा रास्ता नहीं था!”
उस रात मैंने अपने भाई और अपनी भाभी का हाथ अपने हाथों में लिया। मैंने रोहन की आँखों में देखा और बहुत ही दृढ़ता से कहा, “रोहन, चुप्पी किसी समस्या का समाधान नहीं होती। जब हम गलतफहमियों को खामोशी की चादर से ढँक देते हैं, तो उसके नीचे रिश्ते सड़ने लगते हैं। इस बीमारी का इलाज केवल सच की कड़वी दवा से ही हो सकता है। कल सुबह हम सब आमने-सामने बैठेंगे। अब जो भी होगा, सच के साथ होगा।”
अगली सुबह, कोथरूड के हमारे पुराने घर में धूप बहुत धीमी और सुस्त थी।
ड्राइंग रूम में एक भारी, दमघोंटू तनाव फैला हुआ था। सोफे के एक तरफ पिताजी अपनी गंभीर मुद्रा में बैठे थे, उनका चेहरा किसी चट्टान की तरह सख्त था। उनके पास माँ बैठी थीं, जिनकी आँखें सूजी हुई थीं। सामने वाले सोफे पर मैं, रोहन और नेहा बैठे थे। आरव और कियारा को हमने बाहर बालकनी में खेलने के लिए भेज दिया था।
कमरे में इतनी शांति थी कि दीवार घड़ी की हर टिक-टिक दिल की धड़कन की तरह सुनाई दे रही थी।
पिताजी ने एक बार भी रोहन या नेहा की तरफ नहीं देखा। उन्होंने बहुत ही रूखे स्वर में मुझसे कहा, “पूजा, तुमने इन्हें यहाँ क्यों बुलाया है? जब हमारे बीच कोई रिश्ता ही नहीं बचा, तो फिर इस औपचारिकता का क्या मतलब है?”
माँ ने भी अपना आँचल संभालते हुए मुँह फेर लिया।
रोहन ने कुछ कहना चाहा, लेकिन मैंने उसका हाथ दबाकर उसे रोक दिया। मैं अपनी जगह से उठी। मैंने अपने पर्स की ज़िप खोली और उसमें से एक पुरानी, पीतल की चाबी निकाली।
मैंने उस चाबी को ले जाकर सीधे सेंटर टेबल पर, ठीक पिताजी की चाय की प्याली के सामने ‘खनन’ की आवाज़ के साथ रख दिया।
चाबी की उस तीखी आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।
पिताजी ने चौंक कर उस चाबी को देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी घबराहट की लकीर उभरी, जिसे उन्होंने तुरंत छुपाने की कोशिश की।
“यह क्या है पूजा?” माँ ने हैरान होकर पूछा।
“यह वही चाबी है माँ,” मैंने बहुत ही शांत, लेकिन गंभीर आवाज़ में कहा, “जिसने हमारे परिवार के विश्वास के ताले को हमेशा के लिए तोड़ दिया।”
पिताजी का चेहरा पीला पड़ने लगा।
मैंने सीधे पिताजी की आँखों में आँखें डालकर कहा, “पापा, हम सब बचपन से सुनते आए हैं कि माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। और भगवान कभी अपने ही बच्चों के घर में चुपके से आकर उनके पीठ पीछे उनके चरित्र और उनके प्यार पर कालिख नहीं पोतते।”
“पूजा! यह क्या बकवास कर रही है तू अपने बाप के सामने?” माँ गुस्से में चिल्लाईं।
“यह बकवास नहीं है माँ, यह वह कड़वा सच है जो आप पिछले चार दिनों से अपने आंसुओं के पीछे छुपाए बैठी हैं!” मैंने अपनी आवाज़ में पूरा दर्द उंडेल दिया। “पापा, चार दिन पहले जब आप इस चाबी से ताला खोलकर रोहन के फ्लैट में घुसे थे, और फोन पर बड़े ताऊजी से कह रहे थे कि नेहा एक घमंडी, कुल-नाशिनी औरत है जिसने आपके बेटे को गुलाम बना लिया है… उस वक्त नेहा अपने बेडरूम के दरवाज़े के पीछे खड़ी आपकी एक-एक ज़हरीली बात को अपने कानों से सुन रही थी!”
माँ का मुँह खुला का खुला रह गया। उन्होंने स्तब्ध होकर अपने पति की ओर देखा।
पिताजी का पूरा शरीर कांपने लगा। उनका वह कठोर, अभिमानी चेहरा अचानक शर्मिंदगी और अपराधबोध के बोझ तले झुक गया। उनके होंठ थरथराए, लेकिन उनकी ज़बान से एक शब्द नहीं फूटा। उनका झूठ, उनका पूर्वाग्रह और उनका अहंकार भरी दोपहर में नंगे सच के सामने बेनकाब हो चुका था।
मैंने आगे कहा, “पापा, जिस बहू को आपने बिना सोचे-समझे कुल-नाशिनी कह दिया, उसने आपकी उस घिनौनी बात का ज़िक्र आज तक अपने पति से नहीं किया! उसने अपने सीने में उस ज़हर के घूँट को पी लिया ताकि आपके बेटे की नज़रों में उसके पिता की इज़्ज़त हमेशा के लिए मिट्टी में न मिल जाए! और रोहन? जिस बेटे को आपने उस दिन नालायक समझ लिया, उसने अपनी पत्नी के उस बहते हुए आंसुओं और टूटते हुए आत्मसम्मान को देखकर, सारा इल्ज़ाम अपने सिर पर ले लिया। उसने आपके मुँह पर दरवाज़ा इसलिए बंद किया ताकि आपके और नेहा के बीच कभी सीधा टकराव न हो, ताकि यह परिवार पूरी तरह से बिखरने से बच सके!”
माँ की आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उन्होंने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया। वे अविश्वास से कभी अपने पति को देखतीं, तो कभी अपनी बहू नेहा को, जो सिर झुकाए खामोशी से रो रही थी।
“महेश जी…” माँ की आवाज़ कांप उठी। “क्या यह सच है? क्या आपने सच में अपनी ही बहू के लिए इतने घटिया शब्द कहे थे? जिस बहू ने आपकी बाईपास सर्जरी के वक्त पंद्रह दिन तक अस्पताल के आईसीयू के बाहर भूखे-प्यासे बैठकर आपकी सेवा की थी, आपने उसी के लिए यह सब कहा?”
पिताजी के पास कोई जवाब नहीं था। उनकी आँखें डबडबा गईं। जिस मान-सम्मान को बचाने के लिए वे पिछले तीन दिनों से खामोशी की ढाल बनाए बैठे थे, वह ढाल आज चकनाचूर हो चुकी थी। वे अपने ही बच्चों के सामने पूरी तरह बौने साबित हो चुके थे।
कमरे में कुछ पलों के लिए केवल नेहा और माँ के रोने की आवाज़ गूंजती रही।
तभी नेहा अपनी जगह से उठी। वह धीरे-धीरे चलकर पिताजी के सोफे के पास पहुँची। उसने कोई ताना नहीं मारा, कोई कड़वा शब्द नहीं कहा। वह चुपचाप घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई और उसने अपने दोनों हाथ पिताजी के कांपते हुए पैरों पर रख दिए।
“पापाजी…” नेहा की रुंधती हुई आवाज़ ने उस कमरे के हर इंसान के दिल को झकझोर दिया। “मुझसे अगर कोई भूल हुई हो, तो मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं जानती हूँ कि मैं एक पुरानी पीढ़ी की आदर्श घरेलू बहू शायद नहीं बन पाई। मैं सुबह पाँच बजे उठकर आपकी सेवा में हाज़िर नहीं हो पाती, न ही मैं दिन भर घर के चौके-चूल्हे में समय बिता पाती हूँ। लेकिन भगवान साक्षी है पापाजी, मैंने कभी भी आपको और मम्मीजी को अपने सगे माँ-बाप से कम नहीं समझा। मैंने कभी रोहन को आपसे दूर करने का सपना भी नहीं देखा।”
नेहा ने रोते हुए अपना सिर उनके पैरों पर टिका दिया, “मेरी नौकरी, मेरी यह व्यस्तता… यह मेरा कोई घमंड नहीं है पापाजी, यह मेरी मजबूरी और इस परिवार के भविष्य की ज़रूरत है। मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। अगर आपको लगता है कि मेरे इस घर में रहने से आपका बेटा आपसे दूर हो रहा है, तो आप जो सज़ा देंगे, मैं भुगतने को तैयार हूँ। लेकिन प्लीज़… अपने बेटे को अपने दिल से मत निकालिए। उसने जो कुछ भी किया, सिर्फ हम दोनों को टूटने से बचाने के लिए किया था।”
नेहा के उन शब्दों ने महेश जी के भीतर के सारे अहंकार, सारी झूठी शान और पितृसत्तात्मक अकड़ को हमेशा के लिए पिघलाकर बहा दिया।
पिताजी फफक-फफक कर रो पड़े। एक बूढ़े, सेवा-निवृत्त पिता की वह चीख किसी बांध के टूटने जैसी थी। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथों से नेहा के सिर को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया।
“मुझे माफ़ कर दे बेटी… मुझे माफ़ कर दे!” पिताजी की हिचकियाँ बंध गईं। “मैं अपनी पुरानी, सड़ी-गली सोच का अंधा गुलाम बन गया था। मुझे लगा कि अगर मेरा बेटा तेरी सुनता है, तो मेरी अहमियत खत्म हो गई। मैं भूल गया था कि तू भी किसी की नाज़ों से पली बेटी है, जो अपने सारे सपने हमारे परिवार के साथ जोड़कर यहाँ आई है। मैंने अपनी ही औलाद के घर में ज़हर बो दिया… मुझे माफ़ कर दे बहू!”
माँ ने आगे बढ़कर रोहन को अपने आंसुओं से भिगोते हुए गले से लगा लिया। “मेरे बच्चे… तूने इतना बड़ा दर्द अकेले क्यों सहा? तूने अपनी माँ को भी इतना पराया समझ लिया?”
रोहन अपनी माँ की गोद में अपना सिर रखकर वैसे ही रोने लगा जैसे वह बचपन में स्कूल से चोट खाकर लौटने पर रोया करता था।
उस दिन उस छोटे से पुराने ड्राइंग रूम में कोई हारा नहीं था, सब जीत गए थे। वह जो एक दीवार आधुनिकता और पुरानी सोच के बीच, सास-ससुर और बहू के बीच, और पिता और पुत्र के बीच खड़ी हो गई थी, वह सच के आंसुओं में पूरी तरह बह चुकी थी।
पिताजी ने टेबल पर रखी उस पुरानी चाबी को अपने हाथ में उठाया। उन्होंने कुछ पलों तक उस चाबी को देखा, फिर बहुत ही आदर और स्नेह के साथ वह चाबी वापस नेहा की हथेली पर रख दी।
“यह चाबी अब तुम्हारे पास ही रहेगी बेटी,” पिताजी ने अपनी भीगी आँखों में एक नई चमक के साथ कहा। “लेकिन अब हम इस चाबी से कभी बिना बताए ताला नहीं खोलेंगे। प्यार का मतलब किसी के निजी जीवन में ज़बरदस्ती दखल देना नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे के आत्मसम्मान और सीमाओं की इज़्ज़त करना होता है। अब जब भी हम तुम्हारे घर आएंगे, तो पहले अपनी बेटी नेहा को फोन करके पूछेंगे कि क्या मेरी बेटी के पास अपने इस बूढ़े बाप के साथ एक कप चाय पीने का वक्त है?”
पूरा कमरा एक सुकून भरी, नम मुस्कान से भर गया।
बालकनी से आरव और कियारा दौड़ते हुए अंदर आए और सीधे अपने दादा-दादी की गोद में कूद पड़े। बच्चों की हंसी की खनक ने उस घर के हर उदास कोने को एक नई ज़िंदगी से भर दिया। बाहर धूप अब खिली हुई थी और हवा में एक नया, ताज़ा एहसास था।
उस दिन उस परिवार ने एक बहुत बड़ा सबक सीखा था—रिश्ते सिर्फ खून या रिवाजों से नहीं चलते। रिश्ते चलते हैं एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करने से, वक्त के साथ अपनी सोच को बदलने से, और सबसे बढ़कर, बंद दरवाज़ों के पीछे छिपकर घुटने के बजाय, सच को खुलकर स्वीकार करने की हिम्मत से। जब प्यार में समझदारी और सम्मान की चाशनी घुल जाती है, तो बंद दरवाज़े भी हमेशा के लिए दिलों के रास्ते खोल देते हैं।
5 एक माँ के लिए अपने नवजात शिशु का लगातार रोना हमेशा चिंता का कारण होता है। लेकिन जब एक…
बासी नारियल पानी कभी-कभी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। 6 हाल ही में सोशल मीडिया पर एक चौंकाने…
पुदीना और प्राकृतिक उपायों से अपनी आंखों को दें नई ताजगी और रोशनी। आज के डिजिटल दौर में कंप्यूटर, लैपटॉप…
हवा में मस्कट और दुबई की उस तपती, झुलसा देने वाली रेगिस्तानी धूप की कोई गर्माहट नहीं थी, लेकिन लखनऊ…
रात में जानवरों की आंखों की अनोखी चमक का वैज्ञानिक सच जानिए। रात के अंधेरे में जब हम किसी बिल्ली,…
रात को लहसुन खाने से शरीर को मिलते हैं अद्भुत और प्राकृतिक फायदे। भारतीय रसोई में लहसुन का उपयोग सदियों…