मां के 74वें जन्मदिन पर बहनों ने जिस बहन को ‘बचा खाना चुराने वाली’ कहकर जलील किया, उसी के डिब्बे के पीछे 92 रातों से कार में सो रहे बड़े भाई का दिल दहला देने वाला सच निकला

जिस पल कविता ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू संभालते हुए, सोने की चूड़ियों से भरी अपनी कलाई को झटके से आगे बढ़ाकर शालिनी के कांपते हाथों से भरे हुए खाने के तीन स्टील के डिब्बे छीने और उन्हें रसोई के कोने में रखी बड़ी काली कूड़े की थैली के ऊपर लटका दिया, ठीक उसी पल उस बड़े पुश्तैनी मकान से महज़ दो संकरी गलियां दूर, एक टूटे हुए स्ट्रीट लैंप के नीचे खड़ी अपनी पुरानी, धूल भरी मारुति 800 कार की पिछली सीट पर बैठा उसका सगा बड़ा भाई अरविंद भूख, असहनीय कमजोरी और पसीने से कांप रहा था।

शाम के करीब आठ बजे का वक्त था। लखनऊ के पुराने और संभ्रांत इलाके इंदिरा नगर की उस पुरानी कोठी में शालिनी की मां सावित्री देवी का 74वां जन्मदिन किसी भव्य पारिवारिक जलसे की तरह मनाया जा रहा था। पूरे आंगन में गेंदे और चमेली के फूलों की महक तैर रही थी। रंग-बिरंगी फेयरी लाइट्स से हवेली का कोना-कोना जगमगा रहा था। लाउडस्पीकर पर धीमे सुरों में पुराने शास्त्रीय और फिल्मी भजन बज रहे थे। घर रिश्तेदारों, संपन्न पड़ोसियों, भाभियों, जीजाओं और चहकते बच्चों से पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था।

विशाल डाइनिंग हॉल की लंबी मेज पर चांदी और तांबे की थालियों में छप्पन भोग सजाए गए थे। काजू और खोए की तरी वाला लज़ीज़ शाही पनीर, गरमा-गरम फूली हुई पूड़ियां, देसी घी का जीरा राइस, धीमी आंच पर मथी गई दाल मखनी, बनारसी दम आलू, बूंदी का रायता, तली हुई पापड़ और शहर की सबसे महंगी बेकरी से मंगाए गए तीन-तीन टियर वाले दो विशाल वैनिला और पाइनएप्पल केक मेज की शान बढ़ा रहे थे। करीब पैंतालीस से पचास लोगों के भरपेट, छककर खाने के बाद भी बर्तनों में इतना स्वादिष्ट भोजन बचा हुआ था कि आराम से दस-पंद्रह भूखे लोगों की भूख शांत हो सकती थी।

शालिनी बहुत देर से रसोई के दरवाजे की ओट में खड़ी होकर सब पर नज़र रख रही थी। जब उसने देखा कि लगभग सभी मेहमान खाना खाकर बाहर लॉन में पान और आइसक्रीम के साथ ठहाके लगा रहे हैं, तो वह दबे पांव, अपनी साधारण सूती साड़ी के पल्लू को संभालते हुए रसोई के भीतरी कोने में गई। उसने अपने पुराने, घिसे हुए कपड़े के थैले में से तीन साफ-सुथरे टिफिन डिब्बे निकाले।

उसके हाथ बेचैनी से कांप रहे थे। उसने सबसे पहले डिब्बे में करीने से शाही पनीर के कुछ बड़े टुकड़े और थोड़ी दाल मखनी भरी। दूसरे डिब्बे में उसने गरमा-गरम जीरा चावल और छह पूड़ियां सलीके से सजाईं। तीसरे डिब्बे में उसने मेज पर कटे पड़े केक के दो छोटे टुकड़े और थोड़ी सूखी सब्जी रख दी।

वह तीसरे डिब्बे का ढक्कन बंद करने ही जा रही थी कि उसके ठीक पीछे से एक तीखी, चुभने वाली आवाज़ किसी जहरीले तीर की तरह गूँज उठी।

—फिर से वही बेशर्मी शुरू कर दी तुमने?

शालिनी के हाथ वहीं हवा में जम गए। उसका पूरा शरीर एक पल के लिए बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। उसने मुड़कर देखा।

दरवाजे पर कविता खड़ी थी। कविता, उसकी सबसे छोटी बहन। उसने दस हज़ार की कांजीवरम सिल्क साड़ी पहन रखी थी, गले में हीरों का लॉकेट चमक रहा था और उसके होठों पर वही घमंडी और तिरस्कार भरी मुस्कान तैर रही थी, जो पिछले कुछ महीनों से हर पारिवारिक समारोह में शालिनी का स्वागत करती थी।

शालिनी ने नजरें झुकाते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “कविता… क्या बात है?”

“क्या बात है? तुम पूछ रही हो क्या बात है?” कविता ने आगे बढ़कर अपनी दोनों बाहें सीने पर बांध लीं। “हर बार किसी के घर जाना और वहां से बचा-खुचा खाना समेटकर अपने बैग में ठूंसना… कम से कम आज तो अपनी इस गिरी हुई आदत पर काबू पा लेती! आज मां का 74वां जन्मदिन है, बाहर इतने बड़े-बड़े खानदानी रिश्तेदार और हमारे ससुराल वाले बैठे हैं। अगर किसी ने देख लिया तो क्या सोचेगा कि हमारी इस बड़ी बहन के घर में दो जून की रोटी का भी ठिकाना नहीं है?”

तभी दूसरी बहन मंजू भी अपने हाथ में ठंडा पानी लिए रसोई के भीतर आ गई। मंजू के पति सरकारी क्लास-वन अफसर थे और वह हमेशा अपनी ऊंची हैसियत का रौब झाड़ती थी। उसने शालिनी के खुले डिब्बों को देखा और अपनी नाक सिकोड़ते हुए बोली, “मैं तो कविता से पिछले महीने ही कह रही थी कि शालिनी को ऐसे बड़े आयोजनों में बुलाना ही बंद कर देना चाहिए। जब भी आती है, हाथ में वही फटा हुआ थैला और खाली डिब्बे लेकर पहुंच जाती है।”

रसोई के दरवाजे पर उनका सबसे छोटा भाई दीपक, जो एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, अपने हाथ में कोल्ड ड्रिंक का कैन लिए आकर खड़ा हो गया और जोर से हंस पड़ा।

“अरे मंजू दीदी, अब अगली बार से हमें निमंत्रण पत्र पर साफ-साफ लिखना पड़ेगा कि महोदय, कृपया अपने साथ अपने टिफिन बॉक्स न लाएं! या फिर कैटरर से कहना पड़ेगा कि चालीस मेहमानों के अलावा पांच डिब्बे शालिनी दीदी के कोटे के अलग से पैक कर दे!”

रसोई में खड़ी दोनों मंझली भाभियां भी अपने पल्लू से मुंह ढककर खिलखिलाकर हंस पड़ीं।

शालिनी ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसके सीने में अपमान की एक ऐसी आग जल रही थी जो उसकी आत्मा को भस्म कर रही थी, लेकिन उसके होंठ पूरी तरह सिले हुए थे। उसकी आंखों की कोरों से एक खामोश आंसू टपक कर उस स्टील के डिब्बे पर गिरा।

वह पिछले तीन महीनों से यही सब कुछ चुपचाप, पत्थर की तरह सहती आ रही थी। किसी ने ताना मारा तो वह मुस्कुरा देती, किसी ने उपहास उड़ाया तो वह अपनी नजरें फेर लेती। क्योंकि उसने अपने बड़े भाई अरविंद को गंगाजल की कसम खाकर यह वचन दिया था कि जब तक वह अपने पैरों पर दोबारा खड़ा नहीं हो जाता, उसका यह खौफनाक सच परिवार के किसी भी सदस्य के सामने उजागर नहीं होगा।

पांच भाई-बहनों के इस भरे-पूरे परिवार में अरविंद सबसे बड़ा था। आज से पच्चीस साल पहले जब उनके पिता पंडित राधेमोहन जी का एक आकस्मिक सड़क दुर्घटना में अचानक देहांत हो गया था, तब अरविंद की उम्र मात्र उन्नीस साल थी। वह बी.कॉम के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा था और सिविल सर्विसेज की तैयारी का सपना देख रहा था। लेकिन पिता की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी कि बैंक के कर्ज़दारों और मकान के तकादों ने उस परिवार की चौखट को घेर लिया था।

उस उन्नीस साल के लड़के ने बिना एक पल सोचे अपनी पढ़ाई, अपनी किताबें और अपने सारे सुनहरे सपनों को एक संदूक में बंद कर दिया था। उसने पुरानी लखनऊ की अमीनाबाद वाली दवा मंडी में एक थोक दवा वितरण गोदाम में तीन सौ रुपए महीने की पल्लेदारी और पैकिंग का काम शुरू किया था। वह सुबह छह बजे से रात के ग्यारह बजे तक दवाओं के भारी-भारी गत्ते अपनी पीठ पर ढोता था ताकि उसके छोटे भाई-बहनों का भविष्य बन सके।

सालों की हाड़-तोड़ मेहनत और ईमानदारी के दम पर वह धीरे-धीरे उसी लॉजिस्टिक्स कंपनी में सुपरवाइज़र और फिर वेयरहाउस मैनेजर के पद तक पहुंचा था।

उसने कभी अपनी ज़िंदगी के बारे में नहीं सोचा। जब शालिनी के पति का कम उम्र में देहांत हो गया और वह अपने छह महीने के बच्चे के साथ मायके की चौखट पर आकर रोई थी, तो इसी अरविंद ने अपने पूरे पीएफ का पैसा निकालकर शालिनी को सिलाई की आधुनिक मशीनें और एक छोटी सी दुकान खुलवा कर दी थी ताकि वह समाज में स्वाभिमान से जी सके। जब कविता को दिल्ली के एक नामी फैशन कॉलेज में एडमिशन लेना था और डोनेशन के दो लाख रुपए कम पड़ रहे थे, तो अरविंद ने अपनी सोने की चेन और अंगूठी बेचकर वह फीस भरी थी। जब मंजू की शादी में लड़के वालों ने ऐन मंडप पर अचानक पांच लाख रुपए कैश की मांग रख दी थी, तो इसी अरविंद ने अपने पुराने दोस्तों और साहूकारों के आगे हाथ फैलाकर अपनी बहन की डोली उठाई थी। और जब दीपक को कोटा में आईआईटी की कोचिंग के लिए जाना था, तो अरविंद तीन साल तक फटे हुए जूते पहनकर काम पर जाता रहा ताकि दीपक की हर महीने की हॉस्टल और कोचिंग की फीस बिना किसी रुकावट के पहुंच सके।

अरविंद ने अपने किसी भाई-बहन से कभी एक पैसे का हिसाब नहीं मांगा था। उसने कभी किसी को यह एहसास तक नहीं होने दिया कि उसने उन पर कोई अहसान किया है। वह हमेशा एक बड़े बरगद के पेड़ की तरह सब पर अपनी छांव फैलाए खड़ा रहा। और यही कारण था कि पूरे परिवार, उसकी अपनी सगी मां और भाई-बहनों ने यह मान लिया था कि अरविंद एक ऐसा अमर स्तंभ है जिसे न कभी दुख हो सकता है, न कभी आर्थिक तंगी हो सकती है और न ही उसे किसी के सहारे या सांत्वना की जरूरत पड़ सकती है।

लेकिन आज से ठीक तीन महीने पहले, समय का चक्र ऐसा उलटा घूमा कि सब कुछ बिखर गया।

जिस दवा कंपनी में अरविंद पिछले बीस सालों से अपनी हड्डियां गला रहा था, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने ऑपरेशंस समेटने और भारी लागत घटाने के नाम पर लखनऊ का वह ऐतिहासिक वेयरहाउस रातों-रात बंद करने का नोटिस चस्पा कर दिया। एक ही झटके में अरविंद समेत पचासी कर्मचारी सड़क पर आ गए।

अरविंद के लिए यह खबर किसी पहाड़ के टूटने जैसी थी। पचास साल की उम्र में, जब बालों में सफेदी आ चुकी हो और बाज़ार में सिर्फ नौजवानों की मांग हो, एक नई नौकरी तलाशना रेगिस्तान में पानी ढूंढने जैसा था।

अरविंद ने अपनी बर्बादी की यह खबर पूरे परिवार से छुपाकर रखी थी। उसने यह बात केवल और केवल शालिनी को बताई थी।

उस रात लखनऊ में मूसलाधार बारिश हो रही थी। रात के करीब बारह बजे अरविंद शालिनी की उस छोटी सी सिलाई की दुकान की सीढ़ियों पर भीगता हुआ आकर खड़ा हुआ था। उसके चेहरे पर बरसों की ऐसी थकान और लाचारी थी जिसे देखकर शालिनी का कलेजा कांप गया था। लेकिन अरविंद ने अपनी सगी बहन के सामने अपने आंसुओं को पीते हुए एक झूठी और फीकी मुस्कान के साथ कहा था, “शालिनी, बीस साल से लगातार उस गोदाम की धूल फांकते-फांकते थक गया था। शायद भगवान ने ही मेरी किस्मत में कुछ दिनों की छुट्टी लिख दी है।”

शालिनी ने जब रोते हुए पूछा था कि क्या वह मां और बाकी भाई-बहनों को बता दे, तो अरविंद ने घबराकर उसके हाथ पकड़ लिए थे।

“नहीं शालिनी, भूलकर भी नहीं! मां की उम्र 74 साल हो चुकी है, उन्हें दिल की बीमारी और हाई बीपी है। अगर उन्हें पता चला कि उनका बड़ा बेटा बेरोजगार हो गया है, तो वे सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी। और कविता, मंजू, दीपक… वे सब अपनी-अपनी नई और चमक-दमक भरी जिंदगियों में व्यस्त हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरे बुरे वक्त का साया उनके आशियानों पर पड़े। मुझे भरोसा है कि मैं दो-तीन हफ्तों में कोई न कोई नया काम ढूंढ ही लूंगा।”

लेकिन वह दो-तीन हफ्ते देखते ही देखते तीन महीनों के एक अंतहीन नरक में तब्दील हो गए।

बाज़ार में मंदी थी, कोई भी कंपनी पचास साल के पुराने मैनेजर को वह सैलरी देने को तैयार नहीं थी। कंपनी का जो अंतिम ग्रेच्युटी और पीएफ का भुगतान था, वह प्रबंधन के कानूनी विवाद में कोर्ट में अटक गया। अरविंद के पास जो थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी थी, वह पहले महीने में ही कमरे का किराया, बिजली का बिल और पिछले कर्ज़ों की किस्तें भरने में खत्म हो गई। जब जेब पूरी तरह खाली हो गई, तो उसने सबसे पहले अपनी पुरानी बजाज मोटरसाइकिल बेची। फिर उसने अपने कमरे का रेफ्रिजरेटर, कूलर और अपनी लोहे की अलमारी बेच दी।

दूसरे महीने के अंत में, जब अरविंद लगातार दो महीनों का किराया नहीं दे पाया, तो मकान मालिक ने बिना किसी हमदर्दी के उसका ताला तोड़कर उसका सारा सामान बाहर फेंक दिया और साफ कह दिया कि यह कोई धर्मशाला नहीं है।

उस रात के बाद से अरविंद के सिर से छत पूरी तरह छिन गई थी।

उसके पास अब सिर्फ उसकी वही बीस साल पुरानी मारुति 800 हैचबैक कार बची थी, जिसे उसने कभी अपनी पहली बचत से खरीदा था। उसने उस कार को नहीं बेचा, क्योंकि लखनऊ के दूर-दराज के इंडस्ट्रियल एरिया में इंटरव्यू देने जाने के लिए उसे उस गाड़ी की सख्त जरूरत थी। और उसी रात से वह बंद, पुरानी कार ही अरविंद का चलता-फिरता घर, उसकी छत और उसका बिस्तर बन गई।

कार की पिछली सीट पर एक पुरानी, मुड़ी हुई सूती चादर और एक छोटा तकिया बिछा रहता था। कार की डिक्की में तीन जोड़ी धुली हुई पैंट-शर्ट और एक पुराना तौलिया रखा था। डिक्की के एक कोने में रखे लोहे के पुराने टूलबॉक्स में अरविंद के हाईस्कूल के सर्टिफिकेट, बी.कॉम की अधूरी डिग्री, आधार कार्ड और बीस साल के अनुभव प्रमाण पत्र सुरक्षित रखे थे।

रोज सुबह ठीक पांच बजे, जब दुनिया सो रही होती थी, अरविंद चारबाग रेलवे स्टेशन के पास बने सुलभ शौचालय और सार्वजनिक स्नानघर में जाता था। वहां दस रुपए देकर वह नहाता, शीशे के सामने खड़े होकर कांपते हाथों से शेव करता, अपनी सबसे साफ शर्ट पहनता और फिर दिनभर चिलचिलाती धूप में एक-एक फैक्ट्री और दुकान के चक्कर काटता। दोपहर में वह किसी मंदिर के नल से पानी पीकर अपनी भूख मिटाता और शाम ढलते ही किसी सुनसान पेट्रोल पंप के पीछे अपनी कार पार्क करके बैठ जाता।

शालिनी एक विधवा थी। वह दिन-रात सिलाई मशीन चलाकर स्कूल के बच्चों की यूनिफॉर्म सिलती थी। उसकी अपनी मासिक कमाई मात्र पांच-छह हज़ार रुपए थी, जिससे वह अपने दस साल के बेटे की पढ़ाई और अपने पुराने मकान की मरम्मत का कर्ज़ चुकाती थी। वह इतनी अमीर नहीं थी कि अपने भाई के लिए कोई अलग से फ्लैट या होटल का कमरा किराए पर ले सके।

लेकिन वह एक बहन थी। वह अपने उस भाई को, जिसने उसकी ज़िंदगी संवारी थी, कभी भूखे पेट सोने नहीं दे सकती थी।

पिछले तीन महीनों से हर रात ठीक दस बजे, जब शहर की सड़कें वीरान हो जाती थीं, शालिनी अपनी दुकान बंद करके, अपने आंचल में एक टिफिन छुपाकर उस बंद पड़े पेट्रोल पंप के पीछे वाली अंधेरी पार्किंग में पहुंचती थी। वह कभी दाल-चावल लाती, कभी बेसन के पराठे, तो कभी सादी खिचड़ी।

कई बार जब शालिनी के अपने घर में राशन खत्म हो जाता था और पैसे नहीं होते थे, तो वह अपने और अपने बेटे के हिस्से का खाना आधा करके उस टिफिन में भर लेती थी। जब अरविंद पूछता कि “शालिनी, तूने खाना खाया?” तो वह हंसकर झूठ बोल देती कि “भैया, आज पड़ोस में कथा थी, वहां से बहुत सारा प्रसाद मिल गया था, मेरा पेट पूरी तरह भरा है।”

अरविंद अपनी बहन के उस सफेद झूठ को उसकी आंखों में देखकर समझ जाता था। उसकी आंखों से आंसू बहने लगते थे, लेकिन वह कुछ नहीं कहता था और सिर झुकाकर वह सूखा खाना खा लेता था। उन दोनों के बीच एक ऐसा मूक समझौता था जिसमें कोई अपनी बेबसी को शब्दों में बयां नहीं करता था।

पिछले महीने जब मंजू के आलीशान बंगले में सत्यनारायण भगवान की कथा और हवन हुआ था, तब शालिनी ने वहां के बचे हुए पूड़ी और कद्दू की सब्जी के दो डिब्बे पैक किए थे।

कविता ने उस दिन भरे समाज में हंसते हुए कहा था, “अरे शालिनी, लगता है तुम्हारे घर का चूल्हा पूरी तरह बुझ चुका है जो हर जगह से पोटली बांधकर ले जाती हो!”

शालिनी ने उस दिन अपनी नजरें नीची कर ली थीं और केवल इतना कहा था कि खाना बर्बाद नहीं होना चाहिए।

फिर जब दीपक के बेटे का पहला जन्मदिन एक बड़े थ्री-स्टार होटल में मनाया गया, वहां से भी शालिनी ने चुपके से दो डिब्बों में पुलाव और पनीर पैक किया था।

उस दिन दीपक ने अपने सारे अमीर दोस्तों के सामने अपनी बड़ी बहन का मजाक उड़ाते हुए कहा था, “दोस्तों, मेरी इस बहन को देख लो! किसी दिन कोई बड़ा कैटरर इसे बचा हुआ खाना समेटने के परमानेंट कॉन्ट्रैक्ट पर रख लेगा!”

उस रात सारे रिश्तेदार ठहाके मारकर हंसे थे। शालिनी भी अपने आंसुओं को अपने गले में ही घोंटकर एक फीकी मुस्कान के साथ वहां से निकल आई थी।

और उसी रात, जब अरविंद उस पेट्रोल पंप के पीछे अपनी कार की पिछली सीट पर बैठा हुआ वह ठंडा पुलाव खा रहा था, तो उसने अपनी बहन का हाथ पकड़कर रोते हुए कहा था, “शालिनी, मेरी इस मनहूसियत और बदहाली की वजह से तुझे उन छोटे भाई-बहनों से ऐसी जिल्लत और ताने सहने पड़ रहे हैं जिन्हें कभी मैंने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। मुझे माफ कर दे मेरी बहना।”

शालिनी ने अपने भाई के आंसू पोंछते हुए कहा था, “भैया, लोग सिर्फ वही बोलते हैं जो उनकी आंखों को दिखता है। उन्हें नहीं पता कि जिस इंसान पर वे आज हंस रहे हैं, उसी ने अपनी हड्डियां गलाकर उनकी इन हवेलियों की नींव रखी थी। आप चिंता मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा।”

अरविंद ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा था, “शालिनी, दुनिया इंसान के किए गए अहसानों और कुर्बानियों को बहुत जल्दी भूल जाती है, लेकिन किसी की मजबूरी और लाचारी पर हंसने का मौका कभी नहीं छोड़ती। अगर उन्हें मेरा सच पता चल गया, तो वे मुझे सहारा देने के बजाय मेरी बेबसी का तमाशा बनाएंगे।”

और आज, अपनी मां सावित्री देवी के 74वें जन्मदिन पर, वही खौफनाक मंजर दोबारा उस रसोई में दोहराया जा रहा था।

कविता ने शालिनी के हाथ से छीना हुआ वह पहला डिब्बा अपनी उंगलियों में घुमाते हुए कहा, “दिखाओ जरा, इसमें क्या छुपाकर रखा है तुमने? कोई कोहिनूर हीरा है क्या?”

उसने एक झटके से डिब्बे का ढक्कन खोल दिया।

“अरे वाह! शाही पनीर! सबसे महंगी डिश पर हाथ साफ किया है।”

मंजू ने आगे बढ़कर दूसरा डिब्बा खोला और जोर से बोली, “और इसमें जीरा राइस और पूड़ियां… यानी पूरे दो दिन का राशन एक ही झटके में समेटने की पूरी तैयारी थी!”

रसोई का यह हंगामा सुनकर आंगन में बैठे कुछ रिश्तेदार, चाचा-ताऊ और उनके बच्चे उठकर रसोई के दरवाजे के पास आकर खड़े हो गए और तमाशा देखने लगे।

शालिनी ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उसकी आवाज अपमान और डर से थरथरा रही थी, “कविता… मंजू… मेरी बात सुनो। मेज पर बहुत सारा खाना अभी भी पड़ा हुआ है। मेहमान खा चुके हैं। अगर यह खाना किसी के पेट में चला जाएगा, तो इसमें क्या गुनाह है? फेंकने से तो अच्छा है कि कोई भूखा इसे खा ले।”

कविता ने अपनी त्योरियां चढ़ाते हुए तीखी आवाज में पूछा, “किस भूखे के पेट में? कौन है वह भूखा जिसके लिए तुम हमारे घर से चोरी-छिपे खाना चुराकर ले जा रही हो?”

शालिनी ने आगे बढ़कर डिब्बा वापस लेने की कोशिश की, “कविता, प्लीज मुझे जाने दो। मुझे देर हो रही है।”

“नहीं! पहले बताओ कि यह खाना किसके लिए है?” कविता ने डिब्बा अपनी पीठ के पीछे छुपा लिया। “पार्टी का पूरा खर्च हम तीनों भाई-बहन उठाएं, लाखों रुपए का कैटरिंग का बिल हम भरें, और तुम यहां आकर मुफ्त का माल समेटकर अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन करो? और पूछने पर हमें जवाब भी न दो?”

शालिनी के स्वाभिमान को जैसे किसी ने सरेआम नीलाम कर दिया हो। उसने बहुत दबी लेकिन सख्त आवाज में कहा, “कविता, मैंने भी मां के इस जन्मदिन के लिए अपनी कमाई में से पांच सौ रुपए दिए थे!”

मंजू एक ज़हरीली हंसी हंसी, “ओह प्लीज शालिनी! पांच सौ रुपए? बाहर जो केक रखा है न, वह पूरे तीन हज़ार रुपए का आया है! तुम्हारे उन पांच सौ रुपयों में तो मेहमानों के टिशू पेपर भी नहीं आते!”

दीपक भी आगे आकर अपनी जेब में हाथ डालते हुए बोला, “दीदी, अगर घर में इतनी ही तंगी चल रही है, तो सबके सामने ऐसे डिब्बे भरने के बजाय हमसे सीधे-सीधे भीख मांग लिया करो! हम भाई-बहन मिलकर तुम्हें हर महीने दो-चार हज़ार रुपए का राशन डलवा दिया करेंगे, लेकिन कम से कम खानदान की नाक तो मत कटवाओ!”

शालिनी की आंखों से अब आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उसने रोते हुए कहा, “दीपक, मुझे अपने लिए, अपने घर के लिए तुम लोगों से एक दाना भी नहीं चाहिए! मैंने आज तक अपनी मेहनत की सूखी रोटी खाई है और आगे भी खाऊंगी!”

“तो फिर यह खाना किसके लिए है?” कविता ने चिल्लाकर पूछा।

शालिनी अपने होंठ भींचकर बिल्कुल खामोश खड़ी रही।

तभी आंगन में खड़े दीपक के आठ साल के बेटे ने ताली बजाते हुए अपने दोस्तों से कहा, “देखो-देखो! बड़ी बुआ फिर से खाना चुरा रही हैं!”

उस मासूम बच्चे के मुंह से निकले उन शब्दों ने शालिनी के दिल के आखिरी टुकड़े को भी चकनाचूर कर दिया। वह बच्चों पर गुस्सा नहीं हो सकती थी, क्योंकि बच्चे तो वही आईना होते हैं जो अपने बड़ों के घरों में देखते और सुनते हैं।

शालिनी ने अपना संयम खो दिया। वह आगे बढ़ी और उसने पूरी ताकत से कविता के हाथ से डिब्बा छीनने की कोशिश की, “कविता, भगवान के लिए वह डिब्बा मुझे दे दो!”

कविता ने झटके से अपना हाथ पीछे खींचा, “बिल्कुल नहीं दूंगी! आज यह फैसला होकर रहेगा!”

तभी ड्रॉइंग रूम से बूढ़ी मां सावित्री देवी अपनी लाठी टेकती हुई, लड़खड़ाते कदमों से रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हुईं। उनके चेहरे पर गहरी चिंता और उलझन थी।

“क्या हो रहा है यहाँ? तुम सब अपनी इस बड़ी बहन के साथ इस तरह क्यों चीख-चिल्ला रहे हो? आज मेरा जन्मदिन है, कम से कम आज तो घर में शांति रखो!”

मंजू ने तुरंत अपनी मां का कंधा पकड़ते हुए बात बनाई, “कुछ नहीं मां! आप देखिए अपनी इस लाडली बेटी को। हर बार की तरह आज भी यह चुपचाप तीन-तीन बड़े डिब्बे भरकर घर का सारा कीमती खाना अपने थैले में भरकर भाग रही थी। हमने बस इतना पूछा कि यह खाना किसके लिए ले जा रही है, तो यह हम पर ही गुस्सा कर रही है।”

सावित्री देवी ने अपनी बूढ़ी, कमजोर आंखों से शालिनी की तरफ देखा।

“शालिनी… बेटी, यह क्या है? क्या तेरे घर में सच में राशन की इतनी कमी है? अगर कोई तकलीफ थी तो तूने मुझे क्यों नहीं बताया?”

शालिनी अपनी मां के सामने नजरें नहीं मिला सकी। वह चाहे तो अभी, इसी वक्त एक सेकंड में सच बोलकर अपनी इन दोनों घमंडी बहनों और भाई के मुंह पर तमाचा जड़ सकती थी। लेकिन उस सुबह अरविंद ने फोन पर रोते हुए कहा था, “शालिनी, आज मां का जन्मदिन है। मेरी इस बदहाली की वजह से मां की आंखों में एक भी आंसू नहीं आना चाहिए। तू वादा कर कि तू आज कुछ नहीं बताएगी।”

शालिनी ने अपनी सिसकियों को रोकते हुए कहा, “मां… मुझे बस यह डिब्बे ले जाने दीजिए। मैं आपसे हाथ जोड़ती हूँ, मुझसे कोई सवाल मत पूछिए।”

कविता ने पास रखी नगर निगम की बड़ी काली कूड़ेदान वाली थैली को एक हाथ से उठाया और दूसरे हाथ से पनीर वाले डिब्बे का ढक्कन खोलकर उसे सीधे कूड़े की थैली के ऊपर उल्टा करने की मुद्रा में ले आई।

कविता ने बहुत क्रूरता से कहा, “नहीं मां! यह खाना किसी भी हालत में इस घर से बाहर नहीं जाएगा। जो खाना बचा है, वह या तो हमारे कुत्तों को जाएगा या फिर इस कूड़ेदान में फिंकेगा! अगर शालिनी को इस खाने से इतना ही गहरा लगाव है, तो यह पूरे खानदान के सामने उस इंसान का नाम बताए जिसके मुंह में यह निवाला डालने जा रही है!”

शालिनी की नजर उस डिब्बे पर टिक गई। उसकी आंखों के सामने ठीक दो घंटे पहले आया अरविंद का वह व्हाट्सएप मैसेज तैर गया:

‘शालिनी, आज सुबह से चक्कर आ रहे हैं। कल रात से पानी के अलावा पेट में कुछ नहीं गया है। आज रात जो भी रूखा-सूखा, बचा हुआ खाना मिल जाए, थोड़ा जल्दी ले आना मेरी बहना, अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा।’

जैसे ही कविता ने अपनी कलाई को थोड़ा और झुकाया और पनीर की तरी उस कूड़े की थैली में टपकने ही वाली थी, शालिनी की आत्मा की सारी हदें टूट गईं। वह अपनी दोनों हथेलियों को अपने सिर पर रखकर पागलों की तरह पूरे आंगन में चीख पड़ी।

—कविता, रुक जाओ! वह खाना मत फेंकना… क्योंकि मेरा सगा बड़ा भाई पिछले चौबीस घंटे से भूखा बैठा है और आज रात यही खाना खाएगा!

उसकी वह चीख उस विशाल हवेली के कोने-कोने से टकराकर गूँज उठी।

पूरे आंगन में, पूरे डाइनिंग हॉल में एक ऐसा भयावह और गहरा सन्नाटा छा गया मानो किसी ने वहां मौजूद हर इंसान की सांसें एक ही झटके में छीन ली हों। लाउडस्पीकर का संगीत भी किसी ने बंद कर दिया।

मंजू की आंखें फटी की फटी रह गईं, “क्या? कौन सा भाई?”

दीपक ने घबराकर चारों तरफ देखा और बोला, “दीदी, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? तुम्हारा इकलौता छोटा भाई तो मैं हूँ, और मैं तुम्हारे सामने छप्पन भोग खाकर खड़ा हूँ!”

कविता का हाथ उस कूड़ेदान के ऊपर हवा में ही जम गया।

सावित्री देवी के हाथ से उनकी लाठी छूटकर संगमरमर के फर्श पर गिरी। उनकी आवाज बुरी तरह कांपने लगी, “शालिनी… तू… तू क्या कह रही है? क्या तू अरविंद की बात कर रही है? अरविंद तो पिछले तीन महीनों से अपनी कंपनी के बड़े प्रोजेक्ट के सिलसिले में कानपुर के फाइव स्टार होटल में रुका हुआ है ना? उसने तो परसों ही फोन पर कहा था कि वह बहुत व्यस्त है!”

शालिनी घुटनों के बल फर्श पर गिर पड़ी और अपने आंचल में अपना चेहरा छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगी।

ठीक उसी पल, हवेली के मुख्य लोहे के फाटक के चरचराने की आवाज आई।

आंगन में खड़े सभी पचास लोगों की नजरें घूमकर उस मुख्य प्रवेश द्वार की तरफ टिक गईं।

चौखट पर एक साया खड़ा था।

वह अरविंद था।

वही अरविंद, जिसे यह पूरा परिवार, उसकी सगी मां और उसके अमीर भाई-बहन पिछले तीन महीनों से एक बहुत बड़ा, कामयाब और व्यस्त कॉर्पोरेट अफसर समझ रहे थे।

लेकिन सामने खड़े उस इंसान को देखकर वहां खड़े किसी भी रिश्तेदार के लिए उसे पहचानना नामुमकिन सा लग रहा था।

अरविंद ने जो ग्रे रंग की पैंट पहन रखी थी, उसकी दोनों मोहरियां नीचे से फटी हुई थीं और उस पर जगह-जगह धूल और ग्रीस के काले धब्बे लगे थे। उसके पैरों के बाटा वाले काले लेदर के जूतों के तले पूरी तरह घिस चुके थे और अंगूठे के पास से चमड़ा फटा हुआ था। उसकी दाढ़ी दो दिन से बनी नहीं थी, गाल पूरी तरह पिचक कर अंदर धंस चुके थे, आंखों के नीचे काले और डरावने गड्ढे बन गए थे और उसका पूरा जिस्म कमजोरी के मारे थर-थर कांप रहा था।

उसके बाएं हाथ में वही पुरानी, फटी हुई सूती चादर मुड़ी हुई लटकी थी और उसके दाहिने हाथ की कांपती उंगलियों में उसकी उस पुरानी मारुति 800 कार की चाबी थी।

अरविंद ने अपनी सूनी, लाल और आंसुओं से भरी आंखों से सबसे पहले अपनी बूढ़ी मां सावित्री देवी को देखा, जो चौखट के पास पत्थर की मूरत बनी खड़ी थीं। फिर उसने फर्श पर बैठी रोती हुई अपनी बहन शालिनी को देखा। और फिर उसकी नजर कविता के हाथ में लटके उस स्टील के डिब्बे पर जाकर टिक गई, जो अब भी उस कूड़ेदान के ऊपर झूल रहा था।

अरविंद लड़खड़ाते कदमों से, अपने कांपते पैरों को घसीटते हुए धीरे-धीरे आंगन की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आया।

उसकी आवाज बहुत धीमी, सूखी और रुंधी हुई थी।

“कविता… मेरी बच्ची… वह खाना मत फेंकना।”

पूरे आंगन में किसी की सांस लेने तक की आवाज नहीं आ रही थी।

अरविंद ने एक बहुत गहरी, दर्दनाक सांस ली और अपनी नजरें जमीन में गड़ाते हुए कहा, “वह शालिनी अपने लिए नहीं ले जा रही थी… वह खाना मेरे लिए था।”

सावित्री देवी अपने कांपते हाथों को आगे बढ़ाते हुए अपने बेटे की तरफ बढ़ीं। उनके होंठ थरथरा रहे थे, “अरविंद… मेरे बच्चे… यह क्या हालत बना रखी है तूने? तू… तू तो कानपुर में था ना? तू तो अपनी नई कार खरीदने वाला था ना बेटा?”

अरविंद की आंखों से वे आंसू, जिन्हें उसने पिछले नब्बे दिनों से अपनी कार की बंद खिड़कियों और अंधेरी रातों के पीछे लोहे के बांध की तरह रोक रखा था, एक सैलाब बनकर उसकी दाढ़ी पर बह निकले। वह अपनी मां के कदमों में गिर पड़ा और उसने अपनी मां के चरणों में अपना माथा टेक दिया।

“मां… मैं कहीं बाहर नहीं गया था। मैं पिछले तीन महीनों से इसी लखनऊ शहर की सड़कों पर भटक रहा था।”

उसने कांपते हाथों से अपनी कार की चाबी को ऊपर उठाया और अपने भाई-बहनों की तरफ देखा।

“आज से ठीक बानवे दिन पहले मेरी कंपनी बंद हो गई थी मां। मेरी नौकरी चली गई थी। दो महीने पहले जब जेब की आखिरी पाई खत्म हो गई, तो मकान मालिक ने मेरा बिस्तर और संदूक सड़क पर फेंक दिया था।”

अरविंद की आवाज हिचकियों में टूट गई।

“मां… मैं पिछले बानवे दिनों से, लगातार बानवे रातों से, बाहर उस संकरी गली में खड़ी अपनी उस पुरानी मारुति कार की पिछली सीट पर सो रहा हूँ!”

यह सुनते ही ऐसा लगा जैसे पूरे आंगन पर कोई आकाशीय बिजली गिर पड़ी हो।

कविता के हाथ से वह स्टील का डिब्बा छूटकर फर्श पर गिरा। पूड़ियां और पनीर फर्श पर बिखर गए। कविता का चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ गया।

मंजू ने अपने दोनों हाथों से अपना मुंह दबा लिया और वह वहीं सोफे पर गिर पड़ी।

दीपक के हाथ से कोल्ड ड्रिंक का कैन छूट गया। उसके पैर कांपने लगे।

अरविंद ने अपने घुटनों के बल बैठकर, फर्श पर रोती हुई अपनी बहन शालिनी के सिर पर अपना कांपता हुआ हाथ रखा। उसने अपनी लाल आंखों से कविता, मंजू और दीपक की तरफ देखा।

“और इन बानवे रातों में… जब तुम सब अपने-अपने वातानुकूलित कमरों में मखमली गद्दों पर सो रहे थे, जब तुम अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों और पार्टियों के स्टेटस सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे… अगर तुम्हारा यह बड़ा भाई भूख से तड़पकर किसी फुटपाथ पर नहीं मरा… तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए, क्योंकि जिस बहन को तुम सब अभी लालची, भिखारी और खाना चुराने वाली कहकर जलील कर रहे थे, वह अपनी उस छोटी सी सिलाई की कमाई में से अपने और अपने बच्चे के हिस्से का आधा निवाला बचाकर हर रात दस बजे उस अंधेरे पेट्रोल पंप के पीछे मुझे खिलाने आती थी!”

अरविंद के यह शब्द नहीं थे, यह उन तीनों भाई-बहनों की आत्मा पर पड़े वे कोड़े थे जिनका कोई इलाज नहीं था।

आंगन में खड़े रिश्तेदार, जो थोड़ी देर पहले शालिनी पर हंस रहे थे, शर्म के मारे अपना सिर झुका चुके थे।

सावित्री देवी ने अपनी छाती पीटते हुए एक ऐसी चीख मारी जो उस पूरी कोठी की दीवारों को हिला गई। वह जमीन पर बैठ गईं और उन्होंने अपने पचास साल के उस लाचार, भूखे बेटे को अपने सीने से ऐसे चिपका लिया जैसे कोई मां अपने किसी नवजात बच्चे को चिपकाती है।

“हे मेरे भगवान! यह कैसा घोर कलयुग दिखा दिया तूने! जिस बेटे ने उन्नीस साल की उम्र में अपने सारे सपने इस खानदान की चौखट पर कुर्बान कर दिए, जिसने अपनी बहनों की डोलियां उठाने और अपने भाई को अफसर बनाने के लिए अपनी पूरी जवानी उस दवा मंडी के गत्तों के नीचे दबा दी… आज वही बेटा बानवे रातों से अपनी ही मां के शहर में कार में लावारिसों की तरह सो रहा था और मैं अपने जन्मदिन के केक काट रही थी!”

सावित्री देवी ने पलटकर कविता, मंजू और दीपक की तरफ देखा। उनकी बूढ़ी आंखों में ममता की जगह एक ऐसा भयानक आक्रोश था जिसे देखकर तीनों भाई-बहन थर-थर कांपने लगे।

सावित्री देवी ने अपनी उंगली उनकी तरफ तानते हुए कहा, “थू है तुम्हारी इस दौलत पर! थू है तुम्हारी इन महंगी साड़ियों, गाड़ियों और हीरों के गहनों पर! जिस भाई की कमाई की सीढ़ियां चढ़कर तुम आज इन महलों में पहुंचे हो, आज उसी भाई के निवाले को तुम कूड़ेदान में फेंकने चले थे? अगर आज शालिनी न होती, तो मेरा बेटा भूख से मर गया होता और तुम अपनी इन पार्टियों में नाच रहे होते!”

दीपक घुटनों के बल रेंगता हुआ आया और उसने अरविंद के फटे हुए जूतों को पकड़ लिया। वह पागलों की तरह रोने लगा, “भैया… मुझे माफ कर दीजिए भैया! मैं अंधा हो गया था… मुझे अपनी इस नौकरी और पैसों का घमंड हो गया था भैया! आपने मुझे अपनी उंगली पकड़कर स्कूल भेजा था… मुझे मार लीजिए भैया, लेकिन मुझे माफ कर दीजिए!”

कविता और मंजू भी रोती हुई दौड़कर आईं और अरविंद के पैरों में गिर पड़ीं।

कविता की आंखों से आंसू उसकी रेशमी साड़ी पर गिर रहे थे, “भैया… मुझे नहीं पता था… मुझे सच में कुछ नहीं पता था भैया! मैंने जो कुछ कहा, उसके लिए मुझे चाहे जितनी सजा दे दीजिए, लेकिन अपनी इस अभागन बहन से अपनी नजरें मत फेरिए भैया!”

लेकिन अरविंद ने बहुत धीरे से अपने पैर पीछे खींच लिए।

उसकी आंखों में अपने इन भाई-बहनों के लिए न तो कोई नफरत थी, न कोई गुस्सा था और न ही कोई बददुआ। वहां केवल एक गहरा, शांत और हमेशा के लिए जम चुका खालीपन था। वह खालीपन जो तब पैदा होता है जब इंसान यह समझ जाता है कि खून के रिश्ते हमेशा प्यार और वफादारी के मोहताज नहीं होते।

अरविंद ने अपनी बूढ़ी मां के आंसू अपनी उंगलियों से पोंछे और बहुत शांत लहजे में कहा, “मां… आप रोइए मत। आपका यह बेटा आज भी हारा नहीं है। जब तक मेरे इन हाथों में जान है, मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगा। मुझे बस आपका आशीर्वाद चाहिए।”

अरविंद ने नीचे झुककर फर्श पर बैठी अपनी बहन शालिनी को दोनों हाथों से सहारा देकर खड़ा किया। उसने शालिनी के माथे को चूमा और उसके हाथ में पकड़े उस कपड़े के थैले को अपने कंधे पर टांग लिया।

“चल शालिनी… तेरी दुकान पर चलते हैं। आज हम दोनों भाई-बहन मिलकर वही सूखी रोटी खाएंगे जो तूने अपने प्यार और पसीने की कमाई से बनाई है। इस हवेली के छप्पन भोग में अब मेरे हिस्से का कोई निवाला बाकी नहीं रहा।”

अरविंद ने अपनी मां के चरण छुए, अपनी बहन शालिनी का हाथ अपने मजबूत हाथों में थामा और बिना एक बार भी पीछे मुड़े, उस जगमगाती हवेली के मुख्य द्वार से बाहर निकल गया।

आंगन में खड़ा पूरा परिवार, उसकी दोनों बहनें और भाई सिर झुकाए, आंसुओं में डूबे उस अंधेरी गली की तरफ देखते रह गए, जहां वह बड़ा भाई अपनी उस छोटी बहन के साथ अपने आत्मसम्मान का सबसे बड़ा दीया जलाकर एक नई सुबह की तरफ बढ़ रहा था।

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