बच्चे के रोने की आवाज़ सुनते ही माँ घबरा गई — कैमरे में बड़े बेटे की हरकत देखकर उड़ गए होश
एक माँ ने जब सुरक्षा कैमरे की रिकॉर्डिंग देखी, तो वह हैरान रह गई। 5 माता-पिता के लिए अपने बच्चों…
“शायद अब यह औरत सीखेगी कि इस घर के नियमों का उल्लंघन करने का क्या अंजाम होता है।” मेरे पति राहुल ने बेहद ठंडे और बेरुखी भरे लहजे में यह बात कही थी, जब मैं रसोई के ठंडे फर्श पर असहनीय दर्द से तड़प रही थी।
ठीक तीन दिन बाद, राहुल और उसकी माँ, मेरी सास सरला देवी, अस्पताल के मेरे प्राइवेट वार्ड के कमरे में हँसते-बड़बड़ाते हुए दाखिल हुए। उनकी आँखों में जीत का घमंड था और चेहरे पर एक ज़हरीली कुटिलता। उन्हें लगा था कि एक लाचार, टूटी हुई औरत अब हमेशा के लिए उनके कदमों में गिर चुकी है।
लेकिन वे दोनों इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि मेरे तकिए के नीचे छिपा मेरा मोबाइल फोन उनकी ज़बान से निकले हर एक ज़हरीले शब्द को रिकॉर्ड कर रहा था। और उससे भी बड़ी बात, वे इस हकीकत से बेखबर थे कि मेरे वकील ने पहले ही अदालत से आपातकालीन आदेश प्राप्त कर लिए थे। जिस वक्त वे मेरे कमरे में खड़े होकर मेरी बेबसी का मज़ाक उड़ा रहे थे, ठीक उसी वक्त पुलिस की एक विशेष टीम उनके आलीशान मकान का कोना-कोना खंगाल रही थी और उनके काले कारनामों के सबूत जुटा रही थी।

घटना वाले दिन की शुरुआत बिल्कुल आम दिनों की तरह हुई थी, लेकिन हवा में एक अजीब सी घुटन थी।
“इसे वहीं पड़े रहने दे राहुल,” मेरी सास सरला देवी ने हाथ में लकड़ी का भारी बेलन लहराते हुए कड़क आवाज़ में कहा। “जब तक दो-चार घंटे फर्श पर पड़ी नहीं रहेगी, तब तक इसे समझ नहीं आएगा कि इस घर के बड़ों के सामने ज़बान कैसे चलाई जाती है। बड़ी आई शहर की पढ़ी-लिखी मेमसाब!”
मैं रसोई के संगमरमर के ठंडे फर्श पर बिना हिले-डुले पड़ी थी। मेरे दाहिने पैर में ऐसा अहसास हो रहा था जैसे किसी ने जलता हुआ अंगारा रख दिया हो। असहनीय टीस उठ रही थी और शरीर का निचला हिस्सा जैसे सुन्न पड़ता जा रहा था। मुझमें इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि मैं खुद को थोड़ा सा खिसका भी सकूँ।
मैंने रोते हुए, काँपती हुई आवाज़ में गुहार लगाई, “मां जी… प्लीज… मेरे पैर में बहुत तेज़ चोट लगी है… मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा… मुझे अस्पताल ले चलिए…”
सरला देवी के चेहरे पर दया या इंसानियत का एक कतरा भी नहीं था। उनकी आँखें नफ़रत से उबल रही थीं।
“मैंने तुमसे पहले ही दिन कहा था अनन्या,” उन्होंने मेरी तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “इस घर में बड़ों की बात के आगे बहस करने का अंजाम अच्छा नहीं होता। दो-चार डिग्रियाँ क्या हासिल कर लीं और एक अच्छी नौकरी क्या मिल गई, तुम तो खुद को इस घर की मालकिन समझने लगी हो!”
सबकी शुरुआत एक बेहद मामूली बात से हुई थी।
मेरे ससुर, रामकांत शर्मा जी, लंबे समय से उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर के मरीज थे। डॉक्टर ने उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि उनके खाने में नमक की मात्रा बेहद कम होनी चाहिए। उस दोपहर, जब मैंने दोपहर के भोजन के लिए बनी दाल चखी, तो मुझे लगा कि उसमें नमक काफी तेज़ था।
मैंने बेहद विनम्रता और आदर के साथ सास से कहा था, “मां जी, दाल में शायद नमक थोड़ा तेज़ हो गया है। पापा जी के लिए थोड़ी सी दाल अलग निकालकर उसमें बिना नमक का छौंक लगा देती हूँ, वरना उनका ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा।”
बस। यह एक सीधा और भलाई भरा सुझाव था। लेकिन सरला देवी के अहं को यह बात तीर की तरह चुभ गई। उनके लिए यह सुझाव नहीं, बल्कि उनकी रसोई और उनके हुनर पर एक सीधी चुनौती थी।
“तू मुझे सिखाएगी कि मेरे पति को क्या खिलाना है और क्या नहीं?” सरला देवी चिल्लाई थीं। “तीस साल से मैं इस घर का खाना बना रही हूँ! तू कल की आई लड़की मुझे तमीज़ सिखाएगी?”
बात बढ़ती गई। मैंने उन्हें शांत करने की कोशिश की, लेकिन उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। हाथापाई और बहस के बीच, उन्होंने गुस्से में आकर अपने हाथ में पकड़ा भारी लकड़ी का बेलन पूरी ताकत से मेरे पैरों की तरफ फेंक कर मारा।
वह बेलन सीधे मेरे दाहिने घुटने और टखने के बीच के हिस्से पर लगा। दर्द का एक ज़बरदस्त झटका मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया। मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं पक्के फर्श पर धड़ाम से गिर पड़ी। एक कड़कने की आवाज़ आई—ऐसी आवाज़ जो हड्डियों के टूटने पर आती है।
ठीक उसी पल रसोई के दरवाज़े पर मेरा पति राहुल आकर खड़ा हुआ।
एक पल के लिए, दर्द से धुँधलाती मेरी आँखों ने उम्मीद की एक किरण देखी। मुझे लगा कि राहुल दौड़कर आएगा, मुझे अपनी बाहों में उठाएगा और पूछेगा कि मुझे कहाँ चोट लगी है। आखिर शादी से पहले इसी इंसान ने हाथ थामकर वादा किया था, “अनन्या, दुनिया चाहे कुछ भी कहे, मैं हर मोड़ पर तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”
लेकिन वह राहुल अब मर चुका था। सामने खड़ा इंसान कोई अजनबी था।
उसने नीचे फर्श पर तड़पती हुई अपनी पत्नी को देखा, चेहरे पर घृणा और चिड़चिड़ापन लाया और ठंडे स्वर में बोला, “तुम हमेशा मां को उकसाती क्यों रहती हो अनन्या? क्या तुम एक मिनट के लिए अपना मुँह बंद नहीं रख सकतीं?”
मैंने बिलखते हुए उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, “राहुल… देखो, मेरा पैर सूज रहा है… मैं खड़ी भी नहीं हो पा रही हूँ… मुझे बहुत दर्द हो रहा है, मुझे डॉक्टर के पास ले चलो…”
राहुल ने मेरे सूजे हुए, लाल पड़ते पैर को देखा। फिर उसने अपनी माँ की तरफ देखा और कहा, “आज नहीं। आज इसे फर्श पर ही रहने दो। जब तक थोड़ा दर्द नहीं सहेगी, तब तक इसे सबक नहीं मिलेगा।”
शाम के साढ़े आठ बज चुके थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित हमारे दो मंज़िला मकान की खिड़कियों पर बारिश की बूँदें हथौड़े की तरह पड़ रही थीं।
और वे लोग, जिन्हें मैंने अपना परिवार माना था, जिनके लिए मैंने अपने सगे माँ-बाप का घर छोड़ा था, वे मुझे रसोई के ठंडे फर्श पर असहाय छोड़कर ड्राइंग रूम में चले गए। कुछ ही देर में ड्राइंग रूम से टीवी के चलने की आवाज़ें और उनके ठहाके सुनाई देने लगे।
यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने मेरे साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया था। पिछले कुछ महीनों से वे मेरी ज़िंदगी के हर एक हिस्से पर अपना कब्ज़ा जमा चुके थे।
शादी के कुछ ही महीनों बाद, उन्होंने धीरे-धीरे मेरा स्वतंत्र अस्तित्व छीनना शुरू कर दिया था। मेरा मोबाइल फोन अक्सर सास अपने पास रखती थीं। मेरे सारे ज़रूरी दस्तावेज़—मेरी पहचान पत्र, पासपोर्ट, बैंक के एटीएम कार्ड, यहाँ तक कि मेरी शैक्षणिक डिग्रियाँ भी—उन्होंने अलमारी में बंद करके उसकी चाबी अपने पास छिपा दी थी।
जब भी मैं अपने दस्तावेज़ माँगती, सरला देवी बड़ी मिठास से ज़हर घोलते हुए कहतीं, “अरे बेटा, यह सब तुम्हारे भले के लिए ही तो है। तुम तो ठहरा ठहरी कामकाजी लड़की, कहीं भूल-भाल जाओगी। घर की तिजोरी में सुरक्षित रहेगा।”
इतना ही नहीं, एक नामी कंपनी में सीनियर मैनेजर के पद पर काम करने के कारण मुझे जो अच्छी-खासी तनख्वाह मिलती थी, वह हर महीने की पहली तारीख को राहुल के संयुक्त खाते में ट्रांसफर कराने के लिए मुझे मजबूर किया जाता था। मैं किसके साथ बात कर रही हूँ, ऑफिस से आने में दस मिनट की देरी क्यों हुई, मैं अपनी सहेलियों से क्यों मिल रही हूँ—हर बात का हिसाब देना पड़ता था।
महीनों बीत गए थे और मुझे अपने मायके जाने की इजाज़त नहीं दी गई थी। जब भी मैं अपने माता-पिता से मिलने की ज़िद करती, राहुल कोई न कोई बहाना बना देता या फिर घर में एक नया हंगामा खड़ा कर दिया जाता।
लेकिन मेरे ऊपर अत्याचार का पहाड़ तब टूटा, जब पिछले साल मेरा गर्भपात हो गया था।
वह एक दुखद दुर्घटना थी। अत्यधिक मानसिक तनाव और घर के भारी काम के बोझ के कारण मेरा तीन महीने का बच्चा पेट में ही खत्म हो गया। जब मुझे अस्पताल से घर लाया गया, तो सांत्वना देने के बजाए सरला देवी ने पूरे खानदान में यह ढिंढोरा पीट दिया कि मैं एक ‘कुलक्षणी’ औरत हूँ जो अपने बच्चे को भी संभाल नहीं सकती।
और राहुल? जब मैंने रोते हुए उससे कहा कि मुझे उसके सहारे की ज़रूरत है, तो उसने बिना किसी झिझक के कहा था, “वैसे एक तरह से अच्छा ही हुआ अनन्या। अभी बच्चे का फालतू खर्च उठाने की मेरी कोई मंशा नहीं थी। पहले तुम पूरी तरह से इस घर के सांचे में ढल जाओ।”
उसी दिन मेरी आत्मा के अंदर कुछ टूट गया था। मुझे अहसास हो गया था कि यह घर कोई स्वर्ग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरक है। मैंने राहुल से साफ-साफ कह दिया था कि मैं अब इस शादी में नहीं रह सकती और मुझे तलाक चाहिए।
लेकिन मेरी यह बात सुनकर राहुल हँस पड़ा था। उसने निर्लज्जता से मुस्कुराते हुए कहा था, “तलाक? किस बलबूते पर लोगी तलाक? तुम्हारे सारे कागजात, पैसे, पहचान पत्र सब मेरे पास हैं। और अगर तुम बाहर जाकर कुछ बोलोगी भी, तो तुम्हारी बात पर यकीन कौन करेगा? दुनिया की नज़र में तो तुम एक सनकी और गुस्सैल औरत हो।”
रसोई के फर्श पर पड़े-पड़े, दर्द से कराहते हुए मुझे बाहर से राहुल की आवाज़ सुनाई दी।
“मां, तुम चिंता मत करो। मैं बाहर से शाही पनीर और बिरयानी मंगवा लेता हूँ। आज आराम से बैठकर मैच देखेंगे।”
कुछ ही देर में वे तीनों—राहुल, उसकी माँ और उसके पिता—ड्राइंग रूम में बैठकर बड़े चाव से खाना खाने लगे। उनकी बातों और हँसी के फव्वारों से ऐसा लग रहा था जैसे रसोई में कोई इंसान नहीं, बल्कि कोई बेजान चीज़ पड़ी हो।
मेरे ससुर ने एक बार औपचारिक रूप से कहा, “राहुल, बहू को बहुत तेज़ चोट लगी लगती है। क्या उसे किसी पास के डॉक्टर को दिखा देना चाहिए?”
राहुल ने चबाते हुए हँसकर जवाब दिया, “अरे पापा, आप बेवजह परेशान होते हैं। कल सुबह कह देंगे कि बाथरूम में पैर फिसल गया था। डॉक्टर को घर पर ही बुला लेंगे।”
और फिर राहुल ने जो अगली बात कही, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।
“इस बार जब यह ठीक होगी, तो मैं इससे नौकरी छुड़वा दूंगा। इसे 24 घंटे घर में ही रखूँगा। जब इसके पास अपनी कमाई नहीं होगी, तो यह पूरी तरह से हमारे इशारों पर नाचेगी। इसे अपने नियंत्रण में रखना और आसान हो जाएगा।”
उस अंधेरी, तूफानी रात में, रसोई के उस ठंडे फर्श पर लेटे-लेटे मुझे एक कड़वी हकीकत का अहसास हुआ।
यह कोई अचानक हुआ गुस्सा नहीं था। यह कोई हादसा नहीं था। यह एक बेहद सोची-समझी, खतरनाक साजिश थी। वे धीरे-धीरे मेरी नौकरी, मेरे पैसे, मेरी आज़ादी, मेरी पहचान—सब कुछ छीनकर मुझे एक ऐसी ज़िंदा लाश बना देना चाहते थे, जिसके पास भागने का कोई रास्ता न बचे।

अगर मैं आज शांत रह गई, अगर मैंने आज हार मान ली, तो मैं इस नरक से कभी ज़िंदा बाहर नहीं निकल पाऊँगी।
रात के लगभग बारह बज चुके थे। घर के बाकी हिस्से में सन्नाटा छा गया था। टीवी बंद हो चुका था और राहुल और उसके माता-पिता अपने-अपने कमरों में सोने चले गए थे।
दर्द के मारे मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन मेरे दिमाग में अब डर की जगह एक ठंडे, सुलगते हुए प्रतिशोध ने ले ली थी।
मुझे किसी भी कीमत पर उस रसोई से निकलकर ड्राइंग रूम में रखे अपने पर्स तक पहुँचना था। मेरे पर्स के गुप्त ज़िप वाले हिस्से में एक पुराना, छोटा की-पैड वाला मोबाइल फोन था, जो मैंने महीनों पहले एक आपातकालीन स्थिति के लिए छिपा कर रखा था और जिसके बारे में राहुल या उसकी माँ को कोई अंदाज़ा नहीं था।
मैंने अपने बाएँ पैर और कुहनियों के बल घिसटना शुरू किया। हर एक इंच आगे बढ़ने पर मेरे टूटे हुए दाहिने पैर में बिजली का सा झटका लगता था। दर्द इतना भयानक था कि मेरी चीख निकलने को होती, लेकिन मैं अपनी जीभ को दाँतों तले दबा लेती ताकि कोई आवाज़ बाहर न आए।
दस फीट का वह फासला मुझे दस किलोमीटर जितना लंबा लगा। पसीने और आँसुओं से तर-बतर, लगभग आधे घंटे की दर्दनाक जद्दोजहद के बाद, मैं ड्राइंग रूम के सोफे तक पहुँची। काँपते हाथों से मैंने पर्स से वह छोटा फोन निकाला।
मेरा पहला ख्याल पुलिस को फोन करने का आया। लेकिन फिर मुझे राहुल की बात याद आई—”तुम्हारी बात पर यकीन कौन करेगा?” अगर पुलिस आती भी, तो राहुल और उसकी माँ उन्हें पैसे खिलाकर या यह कहकर टाल देते कि यह घरेलू मामला है या मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ। मुझे एक ऐसा इंसान चाहिए था जो कानून को समझता हो और जो मेरी मदद बिना किसी शर्त के कर सके।
मैंने अपनी बचपन की सहेली, मेधा को फोन लगाया, जो अब दिल्ली हाईकोर्ट में एक जाने-माने आपराधिक मामलों की वकील थी।
तीसरी बेल पर मेधा ने फोन उठाया। उसकी नींद भरी आवाज़ आई, “हेलो?”
“मेधा… मेरी बात ध्यान से सुनो…” मेरी आवाज़ अत्यधिक दर्द के कारण थरथरा रही थी।
“अनन्या? तुम इस वक्त? क्या हुआ? तुम्हारी आवाज़ ऐसी क्यों लग रही है?” मेधा तुरंत सतर्क हो गई।
मैंने बिना वक्त गंवाए, संक्षेप में पूरी बात बताई—किस तरह मेरी सास ने मुझ पर हमला किया, कैसे मेरा पैर तोड़ दिया गया, कैसे मुझे फर्श पर तड़पने के लिए छोड़ दिया गया और कैसे उन्होंने मेरे सारे दस्तावेज़ और पैसे जब्त कर रखे थे।
मेधा की सांसें तेज़ हो गईं। “अनन्या, तुम शांत रहो। क्या तुम अभी उस घर से निकल सकती हो?”
“नहीं मेधा, मेरा पैर टूट चुका है। मैं चल भी नहीं सकती। अगर मैंने भागने की कोशिश की और वे जाग गए, तो वे मुझे जान से मार डालेंगे।”
मेधा ने कुछ सेकंड सोचा, फिर उसकी पेशेवर आवाज़ गूँजी, “ठीक है, जैसा मैं कहती हूँ वैसा करो। सबसे पहले, अपने फोन का रिकॉर्डर ऑन करो अगर संभव हो, या फिर उस फोन को ऐसी जगह छिपाओ जहाँ से उनकी बातें रिकॉर्ड हो सकें। मैं अभी एम्बुलेंस और पुलिस के साथ-साथ कोर्ट के एक अर्जेंट मजिस्ट्रेट ऑर्डर की तैयारी करती हूँ। domestic violence और illegal confinement का केस बनेगा। लेकिन हमें उन्हें रंगे हाथों पकड़ना होगा ताकि वे बाद में मुकर न सकें।”
“मुझे क्या करना होगा?” मैंने पूछा।
“कल सुबह जब वे तुम्हारे पास आएँ, तो तुम उनसे अपनी चोट और अपने कागजातों के बारे में बात करना। उन्हें इस बात का घमंड होने देना कि वे जीत गए हैं। उन्हें अपनी ज़बान से अपने जुर्म कबूल करने दो। बाकी काम मैं संभाल लूंगी।”
मेधा के शब्दों ने मुझे एक नई ताकत दी। मैंने फोन को वापस छिपाया और उसी तरह घिसटते हुए वापस रसोई में आ गई। उस रात दर्द ने मुझे सोने नहीं दिया, लेकिन मेरे अंदर जल रही बदले की आग ने मुझे बेहोश भी नहीं होने दिया।
अगले दिन सुबह लगभग आठ बजे, राहुल रसोई में आया। मुझे अभी भी उसी हालत में पड़े देखकर उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान आ गई।
“क्यों मेमसाब? आ गया स्वाद? उतर गया सारा वकालत का बुखार?” उसने लात से मेरे पास पड़े पानी के खाली गिलास को परे धकेलते हुए कहा।
मैंने अपने चेहरे पर डर और लाचारी का मुखौटा पहन लिया। “राहुल… मुझे बहुत दर्द हो रहा है… प्लीज मुझे डॉक्टर के पास ले चलो… मैं कसम खाती हूँ, मैं कभी माँ जी से बहस नहीं करूँगी…”
तब तक सरला देवी भी वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने अपने हाथ में चाय का कप पकड़ा हुआ था।
“देख लिया राहुल?” सरला देवी ने चुस्की लेते हुए कहा। “जब तक इन जैसी लड़कियों को सीधा न किया जाए, ये सिर पर चढ़ी रहती हैं। अब इसे समझ आया है कि पति और सास के कदमों में ही औरत की जगह होती है।”
मैंने अपने छिपे हुए छोटे फोन का रिकॉर्डिंग बटन पहले ही दबा दिया था।
“मां जी,” मैंने रोने का नाटक करते हुए कहा, “आपने मेरा पैर तोड़ दिया… अगर यह कभी ठीक नहीं हुआ तो? मैं अपनी नौकरी कैसे करूँगी?”
सरला देवी जोर से हँसीं। “नौकरी? कौन सी नौकरी? आज ही राहुल तुम्हारे ऑफिस में तुम्हारी बीमारी का झूठा इस्तीफा पत्र ईमेल करेगा। और जहाँ तक तुम्हारे पैर का सवाल है, तो थोड़ा-बहुत लँगड़ाकर भी तो तुम घर का काम कर ही सकती हो! तुम्हारे सारे गहने, तुम्हारे बैंक के कार्ड और पासपोर्ट हमारे पास अलमारी में बंद हैं। तुम चाहकर भी पुलिस के पास नहीं जा सकतीं, क्योंकि तुम्हारे पास अपनी पहचान साबित करने का भी कोई जरिया नहीं है!”
राहुल ने अपनी माँ की बात का समर्थन करते हुए कहा, “बिल्कुल सही कहा माँ। और अगर पुलिस आई भी, तो हम कह देंगे कि तुम मानसिक रूप से बीमार हो और तुम्हें दौरे पड़ते हैं। डॉक्टर का एक फर्जी पर्चा बनवाना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है।”
वे दोनों अपनी चाल की कामयाबी पर हँस रहे थे। उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका एक-एक शब्द, उनका एक-एक कुबूलनामा, उस छोटे से फोन में डिजिटल रूप से दर्ज हो रहा था।
लगभग एक घंटे बाद, राहुल ने एक प्राइवेट एम्बुलेंस को बुलाया। वे मुझे एक गुमनाम, छोटे से प्राइवेट अस्पताल में ले गए, जहाँ का डॉक्टर राहुल का जानकार था। उनका इरादा मेरा सही इलाज कराने का नहीं, बल्कि केवल मेरे पैर पर प्लास्टर चढ़ाकर मामले को रफा-दफा करने का था ताकि बाहर किसी को भनक न लगे।
अस्पताल के कमरे में मुझे लेटाया गया। डॉक्टर ने मेरे पैर का एक्स-रे देखकर बताया कि मेरी टखने की हड्डी गंभीर रूप से टूट चुकी है और तुरंत सर्जरी की ज़रूरत है।
राहुल ने डॉक्टर को किनारे ले जाकर कुछ पैसे थमाए और कहा, “डॉक्टर साहब, बस ऐसा प्लास्टर बांध दीजिए कि यह चलने-फिरने लायक न रहे, लेकिन दर्द थोड़ा कम हो जाए। हमें कोई बड़ी सर्जरी नहीं करानी।”
डॉक्टर ने चुपचाप पैसे जेब में रख लिए।
दो दिन बीत गए। अस्पताल के उस प्राइवेट केबिन में मुझे एक तरह से कैद करके रखा गया था। राहुल और उसकी माँ बारी-बारी से पहरा देते थे ताकि मैं किसी बाहर वाले से बात न कर सकूँ। वे मेरे सामने आकर मेरी बेबसी का मज़ाक उड़ाते, मुझे ताने मारते और मुझे मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश करते।
तीसरे दिन की दोपहर।
मौसम बेहद साफ था। राहुल और सरला देवी अस्पताल के कमरे में दाखिल हुए। उनके हाथों में मिठाइयों का डिब्बा था।
“लो अनन्या, मुँह मीठा करो,” सरला देवी ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा। “आज तुम्हारे बैंक खाते से सारे फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाकर राहुल के खाते में ट्रांसफर करवा लिए गए हैं। तुम्हारी कंपनी ने भी तुम्हारा इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। अब तुम पूरी तरह से एक बेघर, बिना नौकरी वाली अपाहिज औरत बन चुकी हो जो पूरी तरह से हम पर आश्रित है।”
राहुल ने एक कुर्सी खींची और मेरे बेड के पास बैठ गया। “अब तुम्हें समझ आया अनन्या कि मुझसे पंगा लेने का क्या नतीजा होता है? तुमने सोचा था कि तुम मुझसे तलाक लेकर मेरी संपत्ति में से हिस्सा लोगी? अब देखो, तुम्हारी अपनी संपत्ति भी मेरी हो चुकी है। और तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।”
वे दोनों कमरे में ठहाके मारकर हँसने लगे। उनकी हँसी में घमंड और जुर्म की बू आ रही थी।
मैंने अपने चेहरे से लाचारी का मुखौटा धीरे से हटा दिया। मेरे चेहरे पर अब न दर्द था, न डर। मैंने सीधे राहुल की आँखों में देखा और बेहद शांत आवाज़ में कहा, “तुम दोनों को सच में लगता है कि तुम बहुत चालाक हो?”
राहुल की हँसी अचानक रुक गई। “क्या मतलब?”
“मतलब यह, राहुल,” मैंने तकिए के नीचे से वह छोटा की-पैड वाला फोन निकाला और उसकी स्क्रीन उनकी तरफ कर दी। उस फोन में पिछले तीन दिनों की हर एक बातचीत, हर एक धमकी, और उनका पूरा कुबूलनामा रिकॉर्ड हो चुका था।
सरला देवी का चेहरा पीला पड़ गया। “यह… यह फोन इसके पास कहाँ से आया?”
राहुल गुस्से में झपटा, “लाओ वह फोन मुझे दो!”
लेकिन इससे पहले कि वह मेरा हाथ पकड़ पाता, अस्पताल के कमरे का भारी दरवाज़ा एक ज़ोरदार धक्के के साथ खुला।
कमरे के अंदर दिल्ली पुलिस के चार सशस्त्र जवान, एक महिला पुलिस अधिकारी, और उनके पीछे मेरी वकील मेधा दाखिल हुई। उनके हाथों में कोर्ट का एक आधिकारिक कानूनी वारंट था।
“राहुल शर्मा और सरला देवी,” महिला पुलिस अधिकारी की कड़क आवाज़ कमरे में गूँजी। “आप दोनों को धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 498A (घरेलू हिंसा), अवैध रूप से बंधक बनाने और धोखाधड़ी के आरोपों में गिरफ्तार किया जाता है।”
राहुल के हाथ-पांव फूल गए। “इंस्पेक्टर साहब! आप गलत समझ रही हैं! यह हमारी घरेलू बात है! मेरी पत्नी मानसिक रूप से बीमार है, यह बाथरूम में गिर गई थी!”
मेधा आगे बढ़ी और उसने अपने बैग से एक टैबलेट निकालकर एक वीडियो प्ले किया।
वीडियो में साफ़ दिख रहा था कि ठीक उसी समय, पुलिस की एक दूसरी टीम राहुल के घर का ताला तोड़कर अंदर दाखिल हो चुकी थी। मजिस्ट्रेट के सर्च वारंट के तहत, पुलिस ने अलमारी का लॉकर तोड़ा था और वहाँ से मेरे सारे असली दस्तावेज़—पासपोर्ट, डिग्रियाँ, पहचान पत्र, गहने और वे जबरन दस्तखत कराए गए कागजात—बरामद कर लिए थे।
“तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है राहुल,” मेधा ने ठंडे स्वर में कहा। “अदालत ने अनन्या की सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन ऑर्डर जारी कर दिया है। और जो सबूत तुम्हारे घर से मिले हैं, और जो रिकॉर्डिंग अनन्या के पास है, उसके बाद तुम दोनों को कम से कम दस साल की जेल होना तय है।”
सरला देवी पुलिस अधिकारी के पैरों में गिर पड़ीं। “मैडम जी! मुझे माफ कर दो! मैंने कुछ नहीं किया! यह सब मेरे बेटे ने कहा था! मुझे जेल मत ले जाओ!”
वही औरत, जो दो मिनट पहले मुझे अपाहिज और बेबस देखकर हँस रही थी, अब एक भीक माँगती हुई लाचार बुढ़िया की तरह ज़मीन पर गिरकर रो रही थी।
राहुल ने भागने की कोशिश की, लेकिन महिला कांस्टेबलों ने उसे दबोच लिया और उसके हाथों में हथकड़ी पहना दी।
जब पुलिस उन्हें घसीटते हुए अस्पताल के गलियारे से बाहर ले जा रही थी, तो अस्पताल के कर्मचारी, डॉक्टर और मरीज सब उनकी तरफ धिक्कार की नज़रों से देख रहे थे। राहुल ने एक बार पीछे मुड़कर मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब घमंड नहीं, बल्कि खौफ और विनाश का अहसास था।
मैंने बेड पर बैठे-बैठे उसे देखा और कहा, “अब शायद तुम सीखोगे राहुल, कि किसी औरत की खामोशी को उसकी कमजोरी समझने की भूल करने का क्या अंजाम होता है।”
इस घटना के छह महीने बाद।
मेरी टखने की सफल सर्जरी हुई और डॉक्टरों की मदद तथा फिजियोथेरेपी के बाद अब मैं बिना किसी सहारे के अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी।
अदालत में मुकदमा तेज़ी से चला। मेरे पास मौजूद अकाट्य सबूतों, ऑडियो रिकॉर्डिंग और पुलिस द्वारा बरामद किए गए कागजात के आधार पर, जज साहब ने राहुल और सरला देवी को ज़मानत देने से साफ इनकार कर दिया। उन्हें सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।
इसके अलावा, कोर्ट के आदेश पर मेरी मेहनत की पूरी कमाई, मेरे गहने और संपत्ति का मेरा हिस्सा मुझे वापस दिलवाया गया।
आज मैं अपने खुद के खरीदे हुए एक छोटे लेकिन खूबसूरत अपार्टमेंट में रहती हूँ। मैंने एक नई कंपनी में बतौर वाइस प्रेसिडेंट अपनी नई पारी शुरू की है।
हर शाम जब मैं अपनी बालकनी में खड़ी होकर ढलते हुए सूरज को देखती हूँ, तो मुझे अहसास होता है कि उस खौफनाक रात में अगर मैंने डरकर घुटने टेक दिए होते, तो आज मैं जीवित न होती।
ज़िंदगी में जब अन्याय सीमा पार कर जाए, तो सहना पाप बन जाता है। कभी-कभी अपने हक के लिए लड़ना और अपने दुश्मनों को उनकी सही जगह दिखाना ही जीवित रहने का एकमात्र रास्ता होता है।
मेरी कहानी उन तमाम औरतों के लिए एक सबक है जो बंद कमरों में अत्याचार सहती हैं और सोचती हैं कि उनका कोई रास्ता नहीं है। रास्ता हमेशा होता है—बस ज़रूरत होती है अपने अंदर के डर को खत्म करने की और सही वक्त पर सही कदम उठाने की।
एक माँ ने जब सुरक्षा कैमरे की रिकॉर्डिंग देखी, तो वह हैरान रह गई। 5 माता-पिता के लिए अपने बच्चों…
रात के समय अचानक पैरों में तेज़ ऐंठन होना एक ऐसी समस्या है जिसका सामना दुनिया भर में लाखों लोग…
5 सुबह उठते ही यदि आपकी आँखों में खुजली, जलन, लालिमा या चिपचिपापन महसूस होता है, तो यह केवल थकान…
6 त्वचा हमारे शरीर की पहली सुरक्षा परत होती है। जब इस पर कोई असामान्य बदलाव दिखाई देता है, तो…
कई लोग त्वचा पर दिखाई देने वाले छोटे लाल दानों, फुंसियों या उभरे हुए धब्बों को सामान्य एलर्जी, कीड़े के…
क्या आप जानते हैं कि रसोई का एक साधारण मसाला आपकी जीवनशैली को बेहतर बना सकता है? अक्सर सही आहार…