पीठ के निचले हिस्से में दिखने वाले ये दो गड्ढे क्या हैं? जानिए ‘डिमपल्स ऑफ वीनस’ का सच
क्या आपने कभी पीठ के निचले हिस्से में इन दो गड्ढों को देखा है? मानव शरीर रहस्यों और अनोखी संरचनाओं…
भूमिका: यह कहानी है अनन्या की, जो एक स्वाभिमानी और बेहद काबिल चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) है। लखनऊ के एक सीधे-साधे, ईमानदार शिक्षक परिवार से ताुक रखने वाली अनन्या की शादी गुरुग्राम के बड़े रियल एस्टेट टाइकून रोहन मल्होत्रा से होती है। मल्होत्रा परिवार बाहर से जितना संस्कारी और आलीशान दिखता है, अंदर से उतना ही खोखला, लालची और साजिशों का गढ़ है। जब वे अनन्या की मासूमियत और उसके माता-पिता की मेहनत की कमाई को हड़पने की कोशिश करते हैं, तो अनन्या चुपचाप एक ऐसा जाल बुनती है जो उस पूरे साम्राज्य को हिला कर रख देता है। दशहरे की एक शाम, जब मल्होत्रा परिवार को लगता है कि उन्होंने अनन्या को पूरी तरह तोड़ दिया है, तभी से खेल का असली रुख बदलता है।

गुरुग्राम के सेक्टर-65 की एक गगनचुंबी इमारत की 28वीं मंजिल पर स्थित वह पेंटहाउस किसी महल से कम नहीं था। कांच की विशाल दीवारें, इटैलियन मार्बल का फर्श, और छत से लटकते हुए झूमर इस बात की गवाही दे रहे थे कि यहाँ रहने वाले लोगों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है। वह दशहरे का त्योहार था। पूरे घर को गेंदे के फूलों और महंगी लाइटों से सजाया गया था। डाइनिंग टेबल पर तरह-तरह के पकवान सजे थे—शाही पनीर, दाल मखनी, कश्मीरी पुलाव और न जाने क्या-क्या।
मेज के चारों ओर परिवार के दस महत्वपूर्ण लोग बैठे थे। परिवार के मुखिया महेश मल्होत्रा, उनकी पत्नी सविता, उनकी बेटी नेहा, दामाद और कुछ करीबी रिश्तेदार। सब लोग हंस-hnsकर बातें कर रहे थे, लेकिन उस हंसी के पीछे एक अजीब सा तनाव था। अनन्या, जो उस घर की बहू थी, टेबल के एक कोने में चुपचाप खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी।
अचानक, मेज पर एक फाइल आकर गिरी। वह ₹1.2 करोड़ की पर्सनल गारंटी और कुल मिलाकर ₹14.8 करोड़ के कॉर्पोरेट फ्रॉड की फाइल थी।
“यह क्या है रोहन?” अनन्या की आवाज धीमी लेकिन बेहद स्पष्ट थी। “तुमने मेरे माता-पिता के लखनऊ वाले घर के दस्तावेज इस लोन में कैसे लगा दिए? और इस पर मेरे जाली हस्ताक्षर किसने किए?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। रोहन मल्होत्रा, जो हाथ में वाइन का ग्लास लिए बैठा था, का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने ग्लास टेबल पर पटका और खड़ा हो गया।
“यहाँ तुम्हें बचाने कोई नहीं आएगा!” रोहन चिल्लाया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उसने पूरे परिवार के सामने अनन्या पर हाथ उठा दिया। उसने अनन्या के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं।
वह झटका इतना भयानक था कि अनन्या संतुलन खो बैठी और डाइनing टेबल से टकरा गई। शाही पनीर का कटोरा उलटकर उसकी महंगी क्रीम रंग की सिल्क साड़ी पर फैल गया। चोट के कारण उसके मुंह के भीतर एक कड़वा और तीखा स्वाद उतर आया। लेकिन उस शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा, उसे उस आवाज ने अंदर तक झकझोर दिया जो अगले ही पल उस आलीशान कमरे में गूँजी।
वह हंसी थी। उसकी सास सविता मल्होत्रा की हंसी।
सविता ने अपनी चांदी की प्लेट से काजू उठाते हुए बड़े ठंडे लहजे में कहा, “बहू को भी पता होना चाहिए कि इतने बड़े घरों में जुबान कैसे संभाली जाती है। अगर रोहन ने तुम्हें सही रास्ता दिखाने के लिए हाथ उठाया है, तो इसमें गलत क्या है? आखिर तुम एक मामूली स्कूल टीचर की बेटी हो, तुम्हें इस रईसी की समझ ही कहां है!”
अनन्या की ननद नेहा ने अपनी कुटिल मुस्कान को छिपाने के लिए पानी का ग्लास मुंह से लगा लिया। ससुर महेश मल्होत्रा ने अखबार को थोड़ा और ऊपर कर लिया, जैसे कमरे में कुछ हुआ ही न हो। उस पेंटहाउस में दस लोग मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी आगे बढ़कर रोहन का हाथ रोकने की हिम्मत नहीं की। वे सब इस तमाशे का मूक गवाह बने हुए थे।
रोहन ने गुस्से में आकर दोबारा अनन्या पर प्रहार किया, उसे गहरे दर्द से भर दिया। “जाओ, बुलाओ जिसे बुलाना है! पुलिस बुलाओ, कोर्ट जाओ। हमारे पास पैसा है, शहर के सबसे महंगे वकील हैं, और ऊपर सरकार तक हमारी पहचान है। देखता हूँ कौन माई का लाल मुझे छूता है।”
यह तीसरा प्रहार तब हुआ था जब अनन्या ने सिर्फ अपने माता-पिता के आत्मसम्मान की बात की थी। वह फर्श पर गिर गई, लेकिन उसने अपनी आंखों से एक बूंद भी आंसू नहीं बहने दिया। वह मल्होत्रा परिवार के सामने कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी।
अनन्या फर्श पर बैठी अपनी साड़ी पर लगे दागों को देख रही थी, और उसका दिमाग चार साल पीछे चला गया। जब उसकी शादी रोहन से तय हुई थी, तब मल्होत्रा परिवार ने लखनऊ आकर उसके माता-पिता से कहा था, “हमें दहेज में एक रुपया भी नहीं चाहिए। हमें तो बस आपकी संस्कारी और पढ़ी-लिखी बेटी चाहिए जो हमारे बिजनेस को संभाल सके।”
अनन्या के पिता, जो एक सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक थे, ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी उस शादी में लगा दी थी ताकि उनकी बेटी को कोई कमी न खले। लेकिन शादी के महज तीन महीने बाद ही असली रंग सामने आने लगे।
सविता मल्होत्रा ने एक दिन अनन्या को अपने कमरे में बुलाया और कहा, “देखो अनन्या, तुम इस घर की बहू हो। अब तुम्हारी जो भी सैलरी है, वह ‘घर की साझी आमदनी’ मानी जाएगी। बड़े घरों में पैसे का हिसाब अलग तरह से होता है।”
उस दिन के बाद से, अनन्या की पूरी तनख्वाह सविता के बताए खातों में ट्रांसफर होने लगी। घर का बिजली का बिल, किराना, नौकरों की सैलरी, यहां तक कि नेहा के विदेश दौरों के हवाई टिकट भी अनन्या के क्रेडिट कार्ड से स्वाइप होते थे। अनन्या खुद एक-एक रुपये के लिए तरसती थी, जबकि उसका पूरा परिवार उसकी कमाई पर ऐश कर रहा था।
जब भी अनन्या इस बात का विरोध करने की कोशिश करती, रोहन हमेशा उसे इमोशनल ब्लैकमेल करता। वह कहता, “मां का स्वभाव थोड़ा कड़क है अनन्या, लेकिन वह दिल की बुरी नहीं हैं। अगर तुम्हें यह परिवार बचाना है, तो थोड़ा सहना पड़ेगा। आखिर एक समझदार औरत ही घर को जोड़कर रखती है।”

परिवार को बचाने के चक्कर में अनन्या चुप रही। लेकिन मल्होत्रा परिवार का लालच बढ़ता ही गया। दो साल पहले, रोहन ने अपने एक “अधूरे प्रोजेक्ट को बचाने” के नाम पर अनन्या के पर्सनल सेविंग अकाउंट से ₹25 लाख रुपये निकलवा लिए। उसके बाद, उसने ₹60 लाख के एक बड़े कारोबारी ऋण (Business Loan) पर अनन्या को गारंटर बना दिया। रोहन ने कसम खाई थी कि वह तीन महीने में यह लोन चुका देगा, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी बैंक की एक भी किस्त जमा नहीं की गई।
अनन्या को लगातार बैंक से नोटिस आ रहे थे, लेकिन जब भी वह रोहन से पूछती, वह बात को टाल देता। असली सच्चाई तो तब सामने आई जब अनन्या ने चुपचाप कंपनी के इंटरनल ऑडिट के दस्तावेजों की जांच शुरू की।
करीब आठ महीने पहले की एक रात अनन्या के दिमाग में बिजली की तरह कौंधी। उस दिन उसे बहुत तेज बुखार था। उसका पूरा शरीर तप रहा था। रोहन रात को देर से घर लौटा और उसके हाथ में एक गिलास जूस था।
“लो अनन्या, यह जूस पी लो। डॉक्टर से बात की थी, उन्होंने इसमें नींद की एक हल्की दवा मिलाई है ताकि तुम्हें आराम मिल सके,” रोहन ने बड़े प्यार से कहा था।
उस समय अनन्या को रोहन की चिंता पर भरोसा हो गया था। लेकिन वह जूस पीने के बाद वह ऐसी गहरी नींद में सोई कि उसे अगले चौदह घंटे तक कुछ भी याद नहीं रहा। जब वह अगली सुबह जागी, तो उसका सिर भारी था और उसकी दाहिने हाथ की उंगली पर नीली स्याही का एक हल्का सा निशान था।
जब उसने रोहन से पूछा था, तो उसने हंसकर बात उड़ा दी थी, “अरे, तुम कल रात सोते समय शायद मेरे ऑफिस बैग के पास लेटी थीं, वहां स्टैम्प पैड खुला रह गया होगा। तुम भी न अनन्या, कितना सोचती हो!”
लेकिन ऑडिट के दौरान जब अनन्या के हाथ वह स्कैन की हुई सीक्रेट फाइल लगी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उस फाइल में ₹1.2 करोड़ की एक और व्यक्तिगत गारंटी के पेपर थे, जिस पर न सिर्फ अनन्या के नकली हस्ताक्षर थे, बल्कि उसका अंगूठा भी लगा हुआ था। वह अंगूठे का निशान उसी नीली स्याही वाली रात को लिया गया था, जब उसे नशीली दवा दी गई थी।
इतना ही नहीं, उस फाइल के पीछे एक और बड़ा सच छिपा था। रोहन और उसके पिता महेश मल्होत्रा ने मिलकर एक शेल कंपनी (फर्जी कंपनी) बनाई थी, जिसके जरिए उन्होंने अलग-अलग बैंकों और इनवेस्टर्स से कुल मिलाकर ₹14.8 करोड़ का फंड डायवर्ट किया था। और इस पूरे महाघोटाले की बलि का बकरा बनाने के लिए उन्होंने अनन्या के नाम का इस्तेमाल किया था। अगर कंपनी डूबती, तो पूरी कानूनी जिम्मेदारी अनन्या की होती और उसे जेल जाना पड़ता।
सबसे भयानक बात यह थी कि उस लोन को सुरक्षित करने के लिए रोहन ने अनन्या के माता-पिता के लखनऊ वाले उस इकलौते छोटे से घर के जाली पेपर्स भी लगा दिए थे, जिसे उसके पिता ने अपनी पूरी जिंदगी की पेंशन से बनाया था।
उस दिन अनन्या ने रोना बंद कर दिया। उसने समझ लिया कि यह परिवार उसका कभी था ही नहीं। वे लोग भेड़िए थे जो उसे और उसके परिवार को जिंदा निगल जाना चाहते थे। उसी दिन से अनन्या ने एक सीए (CA) के दिमाग का इस्तेमाल करना शुरू किया। उसने चुपचाप सबूत इकट्ठे किए। फर्जी इनवॉइस, बेनामी खातों में किए गए ट्रांजेक्शन, रोहन की कॉल रिकॉर्डिंग्स, और शेल कंपनियों के डमी डायरेक्टर्स के आईडी कार्ड्स—सब कुछ उसने दो अलग-अलग पेन ड्राइव में सुरक्षित कर लिया था।
चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के नाते अनन्या जानती थी कि वित्तीय अपराधों की जड़ें कितनी गहरी होती हैं। जब उसने रोहन के लैपटॉप के बैकअप डेटा को डिक्रिप्ट किया, तो उसे ‘मल्होत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर’ के समांतर चल रही छह अन्य कंपनियों का पता चला। ये कंपनियाँ केवल कागजों पर थीं। इनका कोई दफ़्तर नहीं था, कोई कर्मचारी नहीं थे, लेकिन इनके खातों में हर महीने करोड़ों रुपये का लेन-देन हो रहा था।
ससुर महेश मल्होत्रा जो खुद को शहर का सबसे प्रतिष्ठित बिल्डर कहते थे, असल में उन फर्जी कंपनियों के मुख्य लाभार्थी थे। वे निवेशकों से नया प्रोजेक्ट शुरू करने के नाम पर भारी रकम नकद लेते थे, और उस पैसे को वैध दिखाने के लिए अनन्या के डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग करके उसे शेल कंपनियों के खातों में घुमाते थे।
जब इनवेस्टर्स अपने फ्लैट्स के पजेशन के लिए दबाव बनाते, तो महेश मल्होत्रा राजनीतिक रसूख और पुलिस में अपनी पैठ का डर दिखाकर उन्हें चुप करा देते थे। अनन्या ने देखा कि इस पूरे खेल में उसकी ननद नेहा भी बराबर की भागीदार थी। नेहा के नाम पर दुबई और सिंगापुर में कई विदेशी बैंक खाते खुले हुए थे, जहाँ इस घोटाले का एक बड़ा हिस्सा हवाला के जरिए भेजा गया था।
यह केवल एक घरेलू प्रताड़ना का मामला नहीं था, बल्कि यह देश के बैंकिंग सिस्टम को चूना लगाने का एक बहुत बड़ा संगठित वित्तीय अपराध था। अनन्या समझ चुकी थी कि अगर उसने सही समय पर पुख्ता सबूत नहीं जुटाए, तो मल्होत्रा परिवार सारा दोष उसके सिर मढ़कर खुद को पाक-साफ साबित कर देगा। इसलिए उसने हर एक अवैध ट्रांजेक्शन की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट तैयार की, जिसे कोर्ट में कोई भी चुनौती नहीं दे सकता था।
दशहरे की शाम को जब अनन्या ने वही फाइल महेश मल्होत्रा के सामने रखी, तो मल्होत्रा साम्राज्य का घमंड सातवें आसमान पर था। उन्हें लगा कि एक अकेली औरत उनका क्या बिगाड़ लेगी।
“वह संपत्ति मेरे माता-पिता की गाढ़ी कमाई है,” अनन्या ने फर्श पर गिरकर भी अपनी आवाज को कमजोर नहीं होने दिया। उसकी आंखों में अब डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। “और जो हस्ताक्षर तुम लोगों ने किए हैं, वे नकली हैं। कोर्ट में फॉरेंसिक जांच होते ही तुम सब बेनकाब हो जाओगे।”
रोहन ने हंसते हुए कहा, “फॉरेंसिक जांच? कानून? तुम भूल रही हो अनन्या कि महेश मल्होत्रा का नाम इस शहर के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ जुड़ता है। तुम्हारा वह बूढ़ा बाप लखनऊ से यहां तक आ भी नहीं पाएगा।”
अनन्या ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी गंदी हो चुकी साड़ी के पल्लू के नीचे से अपना फोन निकाला। उसका हाथ कांप नहीं रहा था। उसने स्पीड डायल पर ‘1’ नंबर दबाया। यह नंबर उसने किसी पुलिस स्टेशन का नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई का सेव कर रखा था।
फोन उठते ही अनन्या ने कहा, “अर्जुन भैया… ये लोग मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार कर रहे हैं। इन्होंने मुझे कमरे में बंद करने की कोशिश की है और मेरे माता-पिता के घर पर कब्जा कर रहे हैं। मुझे यहाँ से निकालिए।”
दूसरी तरफ दो सेकंड के लिए एक ऐसी खामोशी छा गई, जैसे कोई शेर अपने शिकार पर झपटने से पहले रुकता है। फिर एक शांत, ठंडी लेकिन बेहद सख्त आवाज आई।
“अनन्या, तुरंत अपने बेडरूम में जाओ। दरवाजा अंदर से लॉक कर लो। अपने चेहरे और कपड़ों पर लगे किसी भी निशान के साथ छेड़छाड़ मत करना। कपड़े मत बदलना। जो डिजिटल और फिजिकल सबूत तुम्हारे पास हैं, उन्हें अपने पास सुरक्षित रखो। कानून रास्ते में है। मैं खुद आ रहा हूँ।”
रोहन जोर से हँस पड़ा। “भाई को फोन किया है? वह जो लखनऊ में एक छोटा-mota वकील है? उसे भी बुला लो, उसे भी समझा दूँगा कि गुरुग्राम के बड़े लोगों से कैसे बात करते हैं।”
लेकिन रोहन मल्होत्रा एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहा था। वह यह नहीं जानता था कि अनन्या का बड़ा भाई अर्जुन शर्मा सिर्फ एक वकील नहीं था। वह केंद्र सरकार के प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) से जुड़े मामलों का एक विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) था। वह एक ऐसा अधिकारी था जिसके नाम से बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने कांपते थे।
अनन्या ने महीनों पहले ही उन काली फाइलों की एक डिजिटल कॉपी अपने भाई को भेज दी थी, लेकिन उसने अर्जुन को रोक रखा था। उसने कहा था, “भैया, जब तक मैं खुद आपको हरी झंडी न दूँ, तब तक कोई कार्रवाई मत करना। मैं इस परिवार को एक मौका और देना चाहती हूँ।” और आज मल्होत्रा परिवार ने वह आखिरी मौका भी खो दिया था।
अनन्या लड़खड़ाते हुए खड़ी हुई और अपने बेडरूम की तरफ बढ़ने लगी। पीछे हॉल में सविता का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उसने अपनी बेटी नेहा से फुसफुसाते हुए पूछा, “नेहा, इस लड़की के तेवर बदले हुए लग रहे हैं। उसने कहीं उस गारंटी वाली पूरी फाइल की कॉपी तो नहीं कर ली?”
नेहा ने कांपती हुई आवाज में जवाब दिया, “मां… अगर उसने ऐसा किया है, और अगर उसका भाई सच में किसी बड़ी एजेंसी में है… तो सिर्फ रोहन नहीं, हम सब सलाखों के पीछे होंगे। क्योंकि उस शेल कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में मेरा और आपका नाम भी है।”
अनन्या ने बेडरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसने अपनी साड़ी पर लगे हल्दी और सब्जी के दागों को देखा, अपने होंठों से बहते सूखे खून को महसूस किया। उसने अपने आंसुओं को रोक कर रखा था क्योंकि वह जानती थी कि आज रात भावनाओं की नहीं, बल्कि सबूतों की जीत होने वाली है। उसने अलमारी के गुप्त कोने से दोनों पेन ड्राइव निकालीं और उन्हें अपनी पॉकेट में सुरक्षित रख लिया।
हॉल में रोहन अभी भी चिल्ला रहा था और अपने रसूखदार दोस्तों को फोन लगा रहा था, “अरे शर्मा जी, कोई बात नहीं, घर का मामूली झगड़ा है। वह लड़की किसी पुलिस वाले को बुला रही है, जरा देख लीजिएगा।” लेकिन रोहन को सामने से जो जवाब मिल रहे थे, उससे उसके माथे पर पसीना आने लगा था। ऊपर से आदेश आ चुके थे कि आज रात कोई भी पुलिस अधिकारी मल्होत्रा परिवार की मदद नहीं करेगा।
ठीक रात के 11:30 बजे, पेंटहाउस के बाहर गाड़ियों के सायरन की आवाज गूंज उठी। लेकिन ये स्थानीय पुलिस की गाड़ियां नहीं थीं। ये आर्थिक अपराध शाखा (EOW) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गाड़ियां थीं, जिनके साथ भारी सुरक्षा बल मौजूद था।
जब पेंटहाउस का मुख्य दरवाजा तोड़ा गया, तो महेश मल्होत्रा और रोहन के होश उड़ गए। सबसे आगे सफेद शर्ट और डार्क सूट में अर्जुन शर्मा खड़े थे। उनके पीछे दिल्ली और गुरुग्राम के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर का दरवाजा तोड़ने की? तुम जानते हो मैं कौन हूँ?” महेश मल्होत्रा ने अपने आखिरी अहंकार को समेटते हुए चिल्लाकर कहा।
अर्जुन शर्मा ने बिना कोई शब्द बोले अपनी जेब से एक आधिकारिक वारंट निकाला और महेश के चेहरे के सामने कर दिया। “महेश मल्होत्रा, आपके खिलाफ ₹14.8 करोड़ के वित्तीय फ्रॉड, मनी लॉन्ड्रिंग, शेल कंपनियों के जरिए कर चोरी, जाली दस्तावेज बनाने और एक महिला को बंधक बनाकर प्रताड़ित करने का गैर-जमानती वारंट है।”
इसी बीच अनन्या ने अपने बेडरूम का दरवाजा खोला। वह उसी हाल में बाहर आई—चेहरे पर चोट के निशान, साड़ी पर बिखरा हुआ खाना। फॉरेंसिक टीम ने तुरंत उसके घावों और कपड़ों के सैंपल लिए ताकि रोहन के खिलाफ घरेलू हिंसा और क्रूरता का अचूक मामला दर्ज किया जा सके।
रोहन ने भागने की कोशिश की, लेकिन महिला पुलिस अधिकारियों और कमांडो ने उसे वहीं दबोच लिया। सविता और नेहा जो कुछ देर पहले तक अहंकार में हंस रही थीं, अब पुलिस के पैरों में गिरकर भीख मांग रही थीं।
अनन्या ने अपने भाई की तरफ देखा। उसकी आंखों में चार साल बाद एक सुकून था। उसने रोहन की तरफ मुड़कर देखा, जो अब हथकड़ियों में जकड़ा हुआ था, और बड़े शांत लहजे में कहा, “तुमने कहा था न रोहन कि तुम्हारे पैसे के आगे कानून भी झुकता है? आज देख लो, कानून झुकता नहीं है, बल्कि जब वह अपने असली रूप में आता है, तो तुम्हारे जैसे झूठे साम्राज्यों को मिट्टी में मिला देता है।”
दशहरे की वह रात मल्होत्रा परिवार के पतन और एक स्वाभिमानी महिला के आत्मसम्मान की जीत की गवाह बनी। गुरुग्राम का वह आलीशान पेंटहाउस अब एक सील की जा चुकी संपत्ति बन चुका था, और मल्होत्रा खानदान की ‘सीए बहू’ ने साबित कर दिया था कि सच्चाई और ईमानदारी को कभी भी चंद रुपयों की ताकत से खरीदा नहीं जा सकता।
सवाल: आपकी जगह अनन्या होती तो क्या आप उसी समय पुलिस बुलातीं, या पहले पूरे परिवार का सच सामने लातीं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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