मायके का स्वाभिमान और जाली अंगूठे का चक्रव्यूह: जब रोहन मल्होत्रा की जालसाजी को ईडी के पूर्व वकील ने एक ही रात में पहुँचाया हवालात के पीछे

भूमिका: यह कहानी है मीरा और उसकी माँ सविता देवी की, जिन्होंने कभी अपने ही बेटे और बहू के लालच की भयावहता की कल्पना नहीं की थी। लाजपत नगर के एक पुश्तैनी और ऐतिहासिक मकान को हड़पने के लिए जब सगा बेटा रोहन और उसकी पत्नी निशा अपनी माँ को एक चिकित्सीय आपातकाल के दौरान बेसहारा छोड़ देते हैं, तो बेटी मीरा और उसके पति अर्जुन न्याय की लड़ाई का बिगुल फूंकते हैं। अर्जुन, जो देश की सबसे बड़ी वित्तीय जांच एजेंसी (ED) का पूर्व वकील है, अपनी पत्नी के परिवार के आत्मसम्मान को बहाल करने के लिए एक ऐसी कानूनी और फॉरेंसिक जाल बुनता है, जो रोहन के करोड़ों के साम्राज्य को एक ही रात में मिट्टी में मिला देता है।

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भाग 1: सरिता विहार फ्लाईओवर का अंधकार और बेबसी

दिल्ली की जुलाई वाली मूसलाधार बारिश ने सरिता विहार फ्लाईओवर के नीचे के माहौल को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया था। भारी वाहनों की गड़गड़ाहट और हॉर्न के शोर के बीच, फ्लाईओवर के नीचे बिछे पुराने अखबारों और कचरों के ढेर पर पानी का सैलाब तैर रहा था। उस कड़कड़ाती ठंडक और गीली हवाओं के बीच एक दुबली-सी, बुजुर्ग औरत अपनी पुरानी गीली शॉल में सिमटी बैठी थी।

मीरा हाथ में छाता लिए तेजी से आगे बढ़ रही थी, लेकिन जैसे ही उसकी नजर उस फ्लाईओवर के खंभे के पास बैठी औरत पर पड़ी, उसके पैर जमीन से चिपक गए। उसके हाथ से छाता लगभग छूट ही गया था। मीरा को कुछ पल लगे यह विश्वास करने में कि वह कोई अजनबी नहीं, बल्कि उसकी अपनी सगी माँ, सविता देवी थीं। ये वही सविता देवी थीं जो कभी बिना अपने बालों को सँवारे और बिना महंगी बनारसी साड़ी पहने अपने पड़ोस की बालकनी तक नहीं जाती थीं। आज उनकी हालत इतनी खराब थी कि उनकी दाहिनी कलाई पर अस्पताल की एक सफेद पट्टी बँधी थी, उनके पैर पानी से भरी साधारण चप्पलों में डूबे हुए थे और वे पूरी तरह भीग चुकी थीं।

“—माँ… आप यहाँ इस हालत में कैसे? रोहन कहाँ है? निशा कहाँ है?” मीरा ने घुटनों के बल बैठकर अपनी माँ के कांपते हुए हाथों को अपने हाथ में लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे थे।

सविता देवी ने धीरे से अपना भारी सिर उठाया। उनकी आँखों में अपनी बेटी को देखने की राहत से पहले एक गहरी शर्म, ग्लानि और बेबसी के भाव उमड़ पड़े। उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “—रोहन और निशा ने वह घर बेच दिया, बेटी। वे बोले कि मैंने खुद अपने होश में अंगूठा लगाकर सब कुछ उनके नाम मंजूर किया था। मुझे घर से बाहर निकाल दिया।”

मीरा के कानों में अचानक वाहनों का वह भारी शोर दूर चला गया। उसका दिमाग सन्न हो गया था। लाजपत नगर का वह दोमंजिला पुश्तैनी मकान, जिसकी आज के बाजार में कीमत लगभग 6 करोड़ रुपये से भी अधिक थी, वह केवल एक संपत्ति नहीं थी। उस घर के एक-एक कमरे को उसके स्वर्गीय पिता महेश शर्मा ने अपनी सरकारी नौकरी के बाद मिली वर्षों की बचत और पेंशन के एक-एक रुपये से बनवाया था। पिता की मृत्यु से पहले, उन्होंने मीरा का हाथ पकड़कर कहा था, “बेटी, यह घर तुम्हारी माँ की सुरक्षा की एकमात्र गारंटी है। जब तक यह घर है, कोई तुम्हारी माँ को बेघर नहीं कर सकता।” और आज उसी घर पर ताला लटका था और माँ सड़क पर थीं।

भाग 2: छह सप्ताह का छलावा और अस्पताल का षड्यंत्र

करीब छह सप्ताह पहले, सविता देवी को एक गंभीर चिकित्सीय आपातकाल (Medical Emergency) का सामना करना पड़ा था। उन्हें अचानक ब्रेन स्ट्रोक आया था और वे बेहोश हो गई थीं। जयपुर में रहने वाली मीरा को जैसे ही यह खबर मिली, वह उसी रात दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ना चाहती थी। लेकिन उसके सगे भाई रोहन ने फोन पर बड़े ही शांत और दिलासा देने वाले लहजे में कहा था, “मीरा, तू परेशान मत हो। तू जयपुर में अपने बच्चों और अपनी नौकरी पर ध्यान दे। मैं दिल्ली में हूँ, अपनी माँ के पास अस्पताल में खड़ा हूँ। मैं सब कुछ संभाल लूँगा। यहाँ आकर तू सिर्फ भीड़ बढ़ाएगी।”

रोहन की पत्नी निशा ने भी फोन पर ताना मारते हुए कहा था, “हाँ मीरा दीदी, हम तो यहाँ रोज़ अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं, डॉक्टरों की मिन्नतें कर रहे हैं। आप बस जयपुर में बैठकर फोन पर अच्छी बेटी बनने का नाटक मत कीजिए। हम पर भरोसा रखिए।”

मीरा ने उनकी बातों पर विश्वास कर लिया था। उसे लगा कि उसका भाई आखिरकार अपनी जिम्मेदारी समझ रहा है। लेकिन उसे क्या पता था कि उस अस्पताल के बंद कमरे के भीतर, आईसीयू (ICU) की उस धुंधली रोशनी में एक बहुत बड़ा कॉर्पोरेट फ्रॉड और पारिवारिक षड्यंत्र रचा जा रहा था। जब उसकी माँ जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थीं, तब उनका सगा बेटा उनके अंगूठे के निशान जाली दस्तावेजों पर ले रहा था।

फ्लाईओवर के नीचे खड़ी मीरा का पति अर्जुन तुरंत आगे बढ़ा। उसने अपनी महंगी लेदर जैकेट उतारी और सविता देवी के ठंडे कंधों पर डाल दी। अर्जुन ने जब माँजी की दाहिनी कलाई पर अस्पताल का वह बैंड और उनकी सूजी हुई उंगलियों को देखा, तो उसकी शांत और पेशेवर आंखें एक बेहद सख्त और खतरनाक लहजे में बदल गईं। अर्जुन जो खुद एक बेहद शांत स्वभाव का व्यक्ति था, इस पारिवारिक गद्दारी को देखकर अंदर तक हिल गया था।

“माँजी, मेरी तरफ देखिए,” अर्जुन ने उनके सामने बैठते हुए कहा। “उस घर को बेचने के पैसे कहाँ हैं? क्या रोहन ने आपके बैंक खाते में कोई रकम ट्रांसफर की है?”

सविता देवी ने धीरे-धीरे अपना सिर नकारात्मक रूप में हिलाया। “नहीं अर्जुन, वह कहता था कि अस्पताल का बिल बहुत बड़ा था। कई लाख रुपये का खर्च आया था। जब मुझे अस्पताल से छुट्टी मिली, तो रोहन और निशा मुझे लाजपत नगर वाले घर ले जाने के बजाय महिपालपुर के एक बेहद सस्ते और साधारण से होटल में छोड़ आए। उन्होंने कहा कि घर में कुछ मरम्मत का काम चल रहा है। तीन दिन तक मैं वहां रही, फिर रोहन ने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया। आज सुबह होटल वाले ने कहा कि उनके बिल का भुगतान नहीं हुआ है और उन्होंने मुझे बाहर निकाल दिया। जब मैं ऑटो से रोते हुए अपने पुराने घर पहुंची, तो वहां दरवाजे पर लोहे के बड़े-बड़े नए ताले लटके थे और चौकीदार ने मुझे अंदर जाने से मना कर दिया।”

“आपने तुरंत पुलिस को फोन क्यों नहीं किया, माँजी?” मीरा ने गुस्से से कांपते हुए पूछा।

“निशा ने मुझे अस्पताल में ही धमकी दी थी, मीरा,” सविता देवी ने रोते हुए कहा। “उसने कहा था कि अगर मैंने उनके खिलाफ एक भी शब्द बोला या पुलिस के पास जाने की कोशिश की, तो वे डॉक्टरों से मेरी मानसिक स्थिति खराब होने का सर्टिफिकेट बनवा देंगे और मुझे हमेशा के लिए किसी पागलखाने या वृद्धाश्रम में भिजवा देंगे। मैं डर गई थी, बेटी।”

भाग 3: अहंकार की गूँज और फोन पर चुनौती

मीरा ने अपने कांपते हुए हाथों से रोहन का नंबर डायल किया। फोन की दूसरी घंटी बजते ही उधर से तेज लाउड म्यूजिक, लोगों के हंसने की आवाजें और कांच के गिलासों के टकराने की खनक गूँज उठी। रोहन दिल्ली के एक पॉश पब में अपनी पत्नी निशा और दोस्तों के साथ लाजपत नगर के घर के बिकने का जश्न मना रहा था।

“माँ कहाँ हैं, रोहन?” मीरा की आवाज में गुस्सा और रुलाई दोनों मिक्स्ड थे।

हॉल के शोर के बीच कुछ सेकंड की एक गहरी चुप्पी छाई, फिर रोहन ने बड़े ही बेपरवाह और घमंडी लहजे में जवाब दिया, “ओह, मीरा? तू क्यों परेशान हो रही है? माँ अब हमारी जिम्मेदारी नहीं हैं। वे जहाँ चाहें, जैसे चाहें रह सकती हैं।”

“तुमने उनका वह 6 करोड़ का आशियाना बेच दिया? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई उस घर पर हाथ लगाने की जिसे पापा ने माँ की सुरक्षा के लिए छोड़ा था?” मीरा चिल्लाई।

“देख मीरा, ज्यादा चिल्लाने की जरूरत नहीं है। माँ ने खुद अपनी पूरी चेतना में उन सभी कानूनी दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर और अंगूठे लगाए हैं। तू सालों से दिल्ली से बाहर जयपुर में ऐश कर रही है, अब यहाँ आकर बड़ा भाई-बहन का नाटक मत कर। वह घर मेरा था और मैंने उसे ठिकाने लगा दिया,” रोहन ने कहा।

तभी फोन के पीछे से निशा की चीखने की आवाज आई, उसने रोहन से फोन छीनते हुए कहा, “सुनो मीरा, उसे साफ-साफ बोलो कि प्रॉपर्टी का सौदा कानूनी रूप से पूरा हो चुका है। पैसे हमारे पास आ चुके हैं। अगर तुमने या तुम्हारे उस टैक्स के वकील पति ने हमें परेशान करने की कोशिश की, तो हम तुम दोनों पर कोर्ट में मानहानि (Defamation Case) का मुकदमा ठोक देंगे। दोबारा फोन मत करना।”

इससे पहले कि निशा फोन काट पाती, अर्जुन ने मीरा के हाथ से फोन अपने हाथ में ले लिया। उसकी आवाज इतनी ठंडी और सख्त थी कि फोन के उस पार का लाउड म्यूजिक भी जैसे फीका पड़ गया।

“रोहन, मैं अर्जुन बोल रहा हूँ। मैं तुम्हें एक आखिरी मौका दे रहा हूँ। मुझे उस मकान की बिक्री विलेख (Sale Deed), पावर ऑफ अटॉर्नी (POA), अस्पताल की सहमति के पेपर्स और बैंकों के भुगतान का पूरा रिकॉर्ड अभी इसी वक्त मेरे ईमेल पर भेजो।”

रोहन फोन पर जोर से हँसा। “अरे अर्जुन साहेब! तुम सिर्फ एक मामूली टैक्स के वकील हो, कोई सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं हो जो मैं तुम्हारे सामने अपने कागजात पेश करूँ। अपनी वकालत जयपुर में चलाओ, मेरे दिल्ली के बिजनेस में टांग अड़ाने की कोशिश मत करो।”

“मैं तुम्हें सहयोग करने का आखिरी कानूनी मौका दे रहा हूँ, रोहन। इसके बाद जो होगा, उसके जिम्मेदार तुम खुद होगे,” अर्जुन ने चेतावनी दी।

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“अपना काम देखो, अर्जुन। गुड नाइट!” रोहन ने अहंकार में फोन काट दिया।

रोहन मल्होत्रा इस बात से पूरी तरह अनजान था कि अर्जुन शर्मा सिर्फ एक साधारण टैक्स वकील नहीं था। दिल्ली आने से पहले, उसने लगभग 10 साल तक देश की सबसे बड़ी और ताकतवर वित्तीय जांच एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate – ED) के साथ मुख्य अभियोजक के रूप में काम किया था। वह बड़े-बड़े सफेदपोश अपराधियों और बेनामी संपत्तियों के चक्रव्यूह को एक झटके में तोड़ने का हुनर जानता था। इतना ही नहीं, दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की वर्तमान प्रमुख, एसीपी कविता राव, अर्जुन की बैचमेट और बेहद करीबी सहकर्मी रह चुकी थीं।

भाग 4: बिल्ली का बच्चा और गहराता आक्रोश

अर्जुन ने तुरंत अपने फोन से एक प्राइवेट मेडिकल एम्बुलेंस और सुरक्षा गाड़ी को सरिता विहार फ्लाईओवर के नीचे बुलाया। उसने मीरा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “मीरा, तुम माँजी को लेकर तुरंत हमारे साकेत वाले गुप्त फ्लैट पर जाओ। वहां हमारी लीगल टीम के डॉक्टर भी मौजूद रहेंगे। किसी भी हालत में, चाहे कुछ भी हो जाए, रोहन, निशा या उनके किसी भी रिश्तेदार को इस जगह का नाम पता नहीं चलना चाहिए।”

“और तुम कहाँ जा रहे हो, अर्जुन?” मीरा ने उसकी आँखों में छुपे उस फौलादी इरादे को देखते हुए पूछा।

“मैं पहले उन जाली कागजों को ढूँढ़ूँगा, और फिर उस 6 करोड़ रुपये की छिपाई गई ब्लैक मनी को। आज रात मल्होत्रा परिवार का यह झूठा घमंड हमेशा के लिए खत्म होने वाला है,” अर्जुन ने कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया।

गाड़ी में बैठते समय, सविता देवी ने मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया। उनकी आँखों में घर खोने के दर्द से ज्यादा एक और मासूम जीव की चिंता थी। उन्होंने कहा, “बेटी मीरा… गोलू अभी उसी घर के अंदर था… मेरा छोटा सा, मासूम बिल्ली का बच्चा। जब निशा मुझे होटल ले जा रही थी, तो मैंने उससे कहा कि गोलू को भी साथ ले लो। लेकिन निशा ने हंसते हुए कहा कि उसने उस जानवर को कहीं दूर सड़क पर छोड़ दिया है। वह भूखा होगा, मीरा…”

अपनी बुजुर्ग माँ की यह बात सुनते ही मीरा के भीतर जो दुख और बेबसी थी, वह एक भयानक, धधकते हुए आक्रोश में बदल गई। रोहन और निशा ने उसकी माँ से सिर्फ एक कंक्रीट की छत नहीं छीनी थी, बल्कि उन्होंने माँ के जीवन की उस आखिरी खुशी, उस आखिरी याद को भी मिटा दिया था जो उन्हें उनके बुढ़ापे के अकेलेपन से बचाती थी। मीरा ने मन ही मन कसम खाई कि वह इन दरिंदों को कभी माफ नहीं करेगी।

भाग 5: शेल कंपनी और आईसीयू का जाली अंगूठा

रात के ठीक 11:38 बजे। साकेत के उस फ्लैट में मीरा अपनी माँ को गर्म सूप पिलाकर सुला चुकी थी। तभी उसके फोन पर एक के बाद एक कई दस्तावेजों की तस्वीरें आने लगीं। ये तस्वीरें अर्जुन ने भेजी थीं।

अर्जुन ने दिल्ली के रजिस्ट्रार ऑफिस के ऑनलाइन पोर्टल और अपने खुफिया सूत्रों का इस्तेमाल करके लाजपत नगर वाले मकान की रजिस्टर्ड सेल डीड (Sale Deed) की मूल कॉपी निकाल ली थी। जब मीरा ने उस दस्तावेज को देखा, तो उसके होश उड़ गए। उस घर को किसी आम खरीदार या किसी तीसरे परिवार को नहीं बेचा गया था।

खरीदार के नाम पर लिखा था—“आर्यन अर्बन होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड”। अर्जुन ने जब इस कंपनी का बैकग्राउंड चेक किया, तो पता चला कि यह कंपनी महज 16 दिन पहले ही कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) में रजिस्टर की गई थी। और सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस कंपनी का एकमात्र मुख्य निदेशक (Director) कोई और नहीं, बल्कि निशा का सगा चचेरा भाई करण था।

इतना ही नहीं, उस दस्तावेज में 6 करोड़ के उस आलीशान मकान की सरकारी कीमत केवल 3 करोड़ 70 लाख रुपये दिखाई गई थी। यह सीधे-सीधे ब्लैक मनी को व्हाइट करने, स्टैम्प ड्यूटी की चोरी करने और आयकर विभाग को धोखा देने का एक बहुत बड़ा संगठित वित्तीय अपराध था।

कुछ ही मिनटों बाद अर्जुन का एक और संदेश आया: “मीरा, उन्होंने घर किसी अजनबी को नहीं बेचा है। यह एक शेल कंपनी है। रोहन ने ब्लैक मनी का इस्तेमाल करके अपने साले के नाम पर यह कंपनी बनाई और माँ का घर अपनी ही कंपनी को कौड़ियों के भाव ट्रांसफर कर दिया ताकि वे उस पर एक बड़ा कमर्शियल लोन ले सकें।”

इसके बाद अर्जुन ने उस कथित पावर ऑफ अटॉर्नी (POA) की फॉरेंसिक स्कैन कॉपी भेजी, जिसके दम पर यह पूरी रजिस्ट्री की गई थी। जब मीरा ने उस दस्तावेज पर दर्ज तारीख और समय को देखा, तो उसका खून खौल उठा। जिस तारीख पर सविता देवी के डिजिटल हस्ताक्षर और अंगूठे का निशान दर्ज दिखाया गया था, ठीक उसी दिन और उसी समय की फोर्टिस अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, सविता देवी ब्रेन स्ट्रोक के कारण आईसीयू में पूरी तरह अचेत (Unconscious) और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। एक इंसान जो कोमा जैसी स्थिति में है, वह उठकर पावर ऑफ अटॉर्नी पर अंगूठा कैसे लगा सकता है?

दस्तावेज के सबसे नीचे एक गवाह (Witness) का नाम दर्ज था—सतीश कुमार। अर्जुन ने तुरंत सतीश कुमार का बैकग्राउंड निकाला। वह उसी अस्पताल का एक साधारण वार्ड बॉय था, जिसकी तीन दिन पहले तक कुल सैलरी महज 12 हजार रुपये थी। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि कल सुबह ही सतीश कुमार ने दिल्ली के एक शोरूम से नकद भुगतान करके डेढ़ लाख रुपये की नई स्पोर्ट्स मोटरसाइकिल खरीदी थी। यह साफ था कि रोहन ने उस वार्ड बॉय को एक मोटी रकम देकर अपनी माँ का अंगूठा उस समय लगवाया था जब वे बेहोश थीं।

मीरा ने इन दस्तावेजों को देखते हुए महसूस किया कि यह कोई अचानक किया गया अपराध नहीं था। यह एक बेहद सोची-समझी, क्रूर और ठंडे दिमाग से रची गई साजिश थी। रोहन और निशा पिछले कई महीनों से माँ को बेघर करने और उनकी पूरी संपत्ति हड़पने की योजना बना रहे थे।

भाग 6: अस्पताल का संदिग्ध और न्याय का अंतिम प्रहार

ठीक रात के 12:15 बजे। साकेत के उस निजी अस्पताल के रिसेप्शन पर, जहाँ सविता देवी को अर्जुन ने सुरक्षा कारणों से शिफ्ट करवाया था, एक अजीब सी हलचल हुई। एक लंबा सा आदमी, जिसके चेहरे पर मास्क था और सिर पर टोपी थी, रिसेप्शनिस्ट के पास जाकर बार-बार सविता देवी के कमरे का नंबर पूछ रहा था। वह खुद को सविता देवी का दूर का रिश्तेदार बता रहा था।

लेकिन अस्पताल के सुरक्षा गार्ड्स, जिन्हें अर्जुन ने पहले ही अलर्ट कर रखा था, ने उस आदमी को घेर लिया। जब पुलिस की पीसीआर वैन वहां पहुंची और उस आदमी की तलाशी ली गई, तो उसकी जेब से एक स्मार्टफोन मिला। उस फोन के व्हाट्सएप पर रोहन मल्होत्रा द्वारा भेजी गई सविता देवी की एक हालिया तस्वीर थी और नीचे एक मैसेज लिखा था: “कमरा नंबर ढूंढो, और डॉक्टर से कहकर उन्हें किसी दूसरे सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करवा दो ताकि मीरा उन तक न पहुंच सके।”

रोहन सिर्फ लालची नहीं था, वह अब अपनी माँ को पूरी तरह से गायब करने की फिराक में था ताकि उसका यह जाली अंगूठे का राज कभी बाहर न आ सके।

लेकिन अब खेल मल्होत्रा परिवार के हाथों से पूरी तरह निकल चुका था। सुबह के ठीक 4:00 बजे, जब दिल्ली की सड़कों पर अभी अंधेरा ही था, आर्थिक अपराध शाखा (EOW) और दिल्ली पुलिस की चार गाड़ियां लाजपत नगर के उस पुश्तैनी मकान के सामने आकर रुकीं। गाड़ियों में से एसीपी कविता राव और अर्जुन शर्मा अपनी पूरी टीम के साथ उतरे। उनके हाथों में न सिर्फ कोर्ट का सीलबंद जब्ती आदेश (Seizure Order) था, बल्कि रोहन, निशा और उनके चचेरे भाई करण के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट भी था।

जब पुलिस ने रोहन के पब और उसके बाद उसके पॉश फ्लैट पर छापा मारा, तो रोहन और निशा शराब के नशे में चूर थे। पुलिस को देखते ही निशा चिल्लाने लगी, “तुम जानते हो मेरे पिता कौन हैं? हम तुम्हें सस्पेंड करवा देंगे!”

एसीपी कविता राव ने आगे बढ़कर निशा के हाथ में लगे महंगे कंगन को झटके से पकड़ा और उसके हाथ में लोहे की हथकड़ी पहना दी। “निशा मल्होत्रा, आपके पिता जो भी हों, लेकिन आज रात आप एक बुजुर्ग महिला की हत्या की साजिश, जाली दस्तावेज बनाने और करोड़ों रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जेल जा रही हैं। आपके चचेरे भाई करण को पहले ही एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया जा चुका है।”

रोहन ने जब अर्जुन की आँखों में देखा, तो उसका वह सारा अहंकार, वह सारी रसूखदारी पल भर में गायब हो गई। वह अर्जुन के पैरों में गिरकर रोने लगा, “जीजाजी, मुझे माफ कर दीजिए! मैं माँ का घर वापस कर दूंगा। मुझे पुलिस से बचा लीजिए।”

अर्जुन ने बड़े ही शांत लेकिन फौलादी लहजे में रोहन का हाथ अपने पैरों से हटाया और कहा, “रोहन, तुमने कहा था कि मैं सिर्फ एक टैक्स का वकील हूँ, जज नहीं। तुम बिल्कुल सही थे। मैं जज नहीं हूँ, मैं तो सिर्फ वो जरिया हूँ जो तुम्हारे जैसे गद्दारों को उनके सही मुकाम यानी सलाखों के पीछे पहुंचाता है। तुमने अपनी माँ का आशियाना छीना था, अब कानून तुम्हारी पूरी जिंदगी की छत छीन लेगा।”

सुबह की पहली किरण के साथ, लाजपत नगर के उस दोमंजिले मकान के दरवाजे पर दिल्ली पुलिस की आधिकारिक सील लग चुकी थी। मीरा अपनी माँ का हाथ पकड़कर खड़ी थी, और सविता देवी की गोद में उनका वह छोटा सा बिल्ली का बच्चा ‘गोलू’ वापस आ चुका था, जिसे पुलिस ने रोहन के फ्लैट से बरामद किया था। मल्होत्रा परिवार का वह अहंकार का साम्राज्य अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका था, और मायके की उस साख और एक बेटी के न्याय ने साबित कर दिया था कि जाली अंगूठे से किस्मत की लकीरें नहीं बदली जा सकतीं।

 

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