लौंग का पानी: एक छोटी घूंट जिसमें छिपे हैं स्वास्थ्य के अनगिनत फायदे
रोजाना लौंग का पानी पीने के अद्भुत स्वास्थ्य लाभ और सही तरीका। हमारी भारतीय रसोई केवल तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों…
अस्पताल में टूटी टांग के साथ पड़ी थी, तभी पति ने 52 बार फोन करके कहा, “हाथ तो सही हैं, कैब बुक करो और घर आकर माँ को खाना परोस दो।” मैंने उसकी आवाज़ रिकॉर्ड की, सिर्फ इतना कहा—“अब मेरी वकील जवाब देगी।” उसी रात उसने 1.8 करोड़ और घर छीनने की धमकी दी, लेकिन उसे नहीं पता था कि उसकी नौकरी और जिस कुर्सी पर वह बैठता है, उसकी असली मालकिन वही औरत है जिसे उसने अस्पताल से उठकर रसोई में जाने का आदेश दिया था।
—टांग टूटी है, हाथ नहीं। कैब बुक करो और घर आकर माँ को खाना परोस दो।
राघव की आवाज़ फोन के स्पीकर से इतनी तेज़ और कर्कश आई कि गुरुग्राम के सिविल अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में मेरे पास खड़ी नर्स भी ठिठक गई। मैं अस्पताल की ठंडी स्ट्रैचर पर पड़ी थी। मेरी दाहिनी टांग पर भारी प्लास्टर चढ़ चुका था, पिंडली में 8 गहरे टाँके लगे थे और टखने पर सूख चुका खून अब भी लगा हुआ था। कुछ घंटे पहले गोल्फ कोर्स रोड पर एक बेकाबू एसयूवी ने मेरी कार को साइड से ज़ोरदार टक्कर मारी थी। गाड़ी के एयरबैग ने मेरी जान तो बचा ली, लेकिन मेरी टांग का निचला हिस्सा चकनाचूर हो गया था। जब मुझे होश आया और दर्द के मारे मेरी आँखें खुलीं, तो मैंने देखा कि मेरे फोन पर राघव के 52 मिस्ड कॉल पड़े थे। मुझे लगा कि शायद उसे मेरी दुर्घटना की खबर मिल गई होगी, शायद वह परेशान होकर मुझे ढूँढ रहा होगा। लेकिन जब मैंने कॉल बैक किया, तो उसके पहले ही वाक्य ने मेरे दिल को पत्थर बना दिया।

मैंने दर्द से कराहते हुए कहा, —मैं अस्पताल में हूँ, राघव। मेरी कार का एक्सीडेंट हो गया है और हड्डी टूट गई है। डॉक्टर ऑपरेशन की तैयारी कर रहे हैं।
वह दूसरी तरफ से ज़ोर से हँसा। उसकी हँसी में रत्ती भर भी चिंता नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा अहंकार और खीझ थी।
—आज पापा की तेरहवीं के बाद पूरे बिरादरी का भोजन है, तुम्हें याद है या नहीं? घर 50 रिश्तेदारों से भरा पड़ा है। माँ ने सुबह से एक घूँट पानी तक नहीं पिया है। तेरहवीं का खाना बनाने और परोसने का वादा तुमने किया था। हर छोटी-मोटी बात को नाटक मत बनाओ। तुम महिलाओं की यही आदत होती है, ज़रा सा खरोंच क्या आ जाए, पूरा घर सिर पर उठा लेती हो। मुझे बेवकूफ मत बनाओ। कैब लो और 20 मिनट के भीतर सेक्टर 54 वाले घर पहुँचो।
यह सुनते ही पास खड़े डॉक्टर ने पट्टी बाँधते हुए अपने हाथ रोक दिए। नर्स की आँखों में राघव के लिए साफ़ गुस्सा दिखाई दे रहा था। लेकिन उस पल, मुझे पहली बार अपने ऊपर शर्म नहीं आई। पिछले तीन सालों से मैं जिस घुटन और अपमान को सह रही थी, आज उसका अंतिम बिंदु आ गया था। शादी के तीन सालों में राघव मल्होत्रा और उसकी माँ सविता देवी ने मुझे एक पत्नी और बहू से बदलकर एक अदृश्य, बिना वेतन वाली नौकरानी बना दिया था।
अगर सविता जी की सुबह की अदरक वाली चाय 5 मिनट देर से पहुँचे, तो वे पूरे खानदान में ढिंढोरा पीट देती थीं कि बहू को कोई संस्कार नहीं दिए गए हैं। अगर मैं उनके सामने सोफे पर बैठ जाऊँ, तो इसे मेरा अहंकार मान लिया जाता था। और अगर मैं कभी अपने काम या अपने करियर के बारे में बात करने की कोशिश करती, तो राघव सबके सामने हँसकर कहता, “हमारी बहू को पैसों की क्या ज़रूरत है? मैं कमा तो रहा हूँ, यह बस घर में बैठकर छोटे-मोटे फ्रीलांसिंग काम करती है।”
राघव के उस एक फोन ने मेरे भीतर बची सहने की आखिरी डोर भी तोड़ दी। दर्द की तीव्रता के बीच भी मेरा दिमाग बिल्कुल शांत और स्पष्ट हो गया। मैंने फोन का रिकॉर्डर ऑन किया और बिल्कुल ठंडे, स्थिर स्वर में कहा:
—राघव, ध्यान से सुनो। आज के बाद मैं तुम्हारी माँ के लिए कभी खाना नहीं बनाऊँगी। तुम्हारे रिश्तेदारों की गुलामी कभी नहीं करूँगी। और सबसे बड़ी बात, अब मैं तुम्हारी पत्नी बनकर इस घर में एक मिनट भी नहीं रहूँगी। मैं तुमसे तलाक ले रही हूँ।
मैंने उसकी बात सुने बिना कॉल काट दी।
अगले आधे घंटे में, अभी डॉक्टर मुझे पेनकिलर का इंजेक्शन लगा ही रहे थे कि अस्पताल के कमरे में दो पुलिसकर्मी दाखिल हुए। राघव ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी पत्नी उसकी बुजुर्ग माँ को एक बड़े पारिवारिक संकट और धार्मिक अनुष्ठान के बीच में अकेला छोड़कर कहीं गायब हो गई है और उसने घर के जेवर चुरा लिए हैं।
पुलिस अधिकारी ने कड़े लहजे में पूछा, —अनन्या मल्होत्रा कौन हैं? आपके पति ने शिकायत दर्ज कराई है कि आप पारिवारिक दायित्वों से भाग रही हैं और कानून का उल्लंघन कर रही हैं।
मैंने शांत भाव से अपने सिरहाने रखी एक्सीडेंट की पुलिस रिपोर्ट, पैथोलॉजी की फाइल, पैर का एक्स-रे और अपने फोन का कॉल लॉग अधिकारी की तरफ बढ़ा दिया।
—मैं कहीं गायब नहीं हुई हूँ, इंस्पेक्टर साहब। आज दोपहर 2 बजे गोल्फ कोर्स रोड पर एक कार ने मुझे टक्कर मारी थी। एनएचएआई की एम्बुलेंस मुझे यहाँ सिविल अस्पताल लाई। मेरे पति को अच्छी तरह पता था कि मेरी टांग टूट चुकी है और मैं अस्पताल में भर्ती हूँ। इसके बावजूद उन्होंने पुलिस को गुमराह किया और झूठी शिकायत दर्ज कराई।
डॉक्टर ने आगे बढ़कर पुलिस को बताया, —मरीज़ की हालत गंभीर है। इनकी टखने की हड्डी तीन जगह से क्रैक है। ये अगले कम से कम 8 हफ्तों तक बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकतीं।
सब कुछ देखकर पुलिस अधिकारी का चेहरा सख्त हो गया। उन्होंने तुरंत अपने सरकारी फोन से राघव को कॉल मिलाया और लाउडस्पीकर ऑन कर दिया। जैसे ही राघव ने सरकारी नंबर देखा, उसका लहजा तुरंत बदल गया। वह गिड़गिड़ाने का नाटक करते हुए बोला:
—अरे साहब, मुझे तो लगा कि उसे बस हल्की-फुल्की खरोंच आई होगी। वह अक्सर घर के कामों से बचने के लिए बीमार होने का नाटक करती है। इसलिए मैंने थोड़ा कड़क होकर बोल दिया था।
मैंने फोन के पास झुककर कहा, —राघव, तुम्हें इसलिए नहीं पता था कि मुझे कितनी चोट लगी है, क्योंकि तुमने फोन पर एक बार भी यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि मैं ज़िंदा हूँ भी या नहीं।
पुलिस अधिकारी की मौजूदगी का अहसास होते ही राघव का पारा चढ़ गया। जब उसे लगा कि उसकी पोल खुल रही है, तो वह फोन पर ही चिल्लाने लगा:
—ठीक है! अगर तुम्हें तलाक ही चाहिए, तो सुन लो अनन्या! सेक्टर 54 का यह 4 बीएचके फ्लैट, गैरेज में खड़ी कंपनी की एसयूवी और हमारे जॉइंट बैंक अकाउंट में पड़े 1.8 करोड़ रुपये—इनमें से एक अठन्नी भी तुम्हें नहीं मिलेगी! सब मेरा है! तुम इस अस्पताल से बाहर निकलोगी तो तुम्हारी जेब में एक रुपया नहीं होगा। रास्ते पर भीख माँगोगी तुम!
मैंने बहुत ही शांत आवाज़ में जवाब दिया, —मैं तुम्हारे घर से नहीं निकल रही हूँ, राघव। मैं तुम्हारी इस घटिया ज़िंदगी से अपना नाम और अपना वजूद हमेशा के लिए बाहर निकाल रही हूँ। और जहाँ तक पैसों की बात है, तुम्हें जल्द ही पता चल जाएगा कि किसका क्या है।
पुलिसकर्मी राघव को कड़ी चेतावनी देकर चले गए कि अगर उसने दोबारा अस्पताल में आकर हंगामा किया या झूठी शिकायत दर्ज कराई, तो उसे सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा।

पुलिस के जाते ही मैंने नर्स से एक नोटबुक और पेन माँगा। मेरे पैर में भीषण टीस उठ रही थी, लेकिन मेरा दिमाग किसी शतरंज के खिलाड़ी की तरह काम कर रहा था। मैंने अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड्स की तीन कॉपी बनवाईं और तुरंत चार फोन मिलाए।
पहला फोन मैंने अपने प्राइवेट बैंक के रीजनल हेड को किया और निर्देश दिया कि मेरे और राघव के संयुक्त खाते से मेरे हिस्से की राशि तुरंत फ़्रीज़ कर दी जाए और क्रेडिट कार्ड्स ब्लॉक कर दिए जाएं।
दूसरा फोन मैंने अपनी बचपन की सबसे भरोसेमंद दोस्त मीरा को किया, जो शहर की जानी-मानी पीआर मैनेजर थी।
तीसरा फोन मैंने देश की सबसे कड़क फैमिली कोर्ट वकील, मेरी सीनियर अदिति राव को मिलाया। मैंने उन्हें संक्षेप में स्थिति समझाई और तलाक का ड्राफ्ट तैयार करने को कहा।
और चौथा फोन… चौथा फोन मैंने उस व्यक्ति को मिलाया जिसका नाम सुनते ही कॉर्पोरेट जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते थे। निखिल सूद—आर्या होल्डिंग्स के ग्रुप चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO)।
फोन तीन रिंग के बाद उठा।
—हेलो, मैम? आप कैसी हैं? आपने इतने सालों बाद पर्सनल लाइन पर कॉल किया? निखिल की आवाज़ में सम्मान और घबराहट साफ़ महसूस की जा सकती थी।
—निखिल, मुझे विद्युतवन एनर्जी (Vidyutvan Energy) के उत्तर भारत के क्षेत्रीय निदेशक राघव मल्होत्रा की पूरी पर्सनल और प्रोफेशनल फाइल अगले 10 मिनट में मेरी ईमेल पर चाहिए। इसके अलावा, कल सुबह 9 बजे विद्युतवन की गुड़गांव शाखा में बिना किसी पूर्व सूचना के एक इमरजेंसी कॉर्पोरेट ऑडिट शुरू होना चाहिए। मुझे उनकी हर एक फाइल, हर एक बिल और हर एक वेंडर का हिसाब चाहिए। इसे एक नियमित वार्षिक समीक्षा की तरह दर्शाया जाए।
दूसरी तरफ कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया। निखिल ने फिर धीरे से पूछा:
—मैम… क्या मुझे ऑडिट टीम को आपकी असली पहचान बता देनी चाहिए? क्या मैं उन्हें बता दूँ कि आर्या होल्डिंग्स की संस्थापक और चेयरपर्सन खुद इस केस को लीड कर रही हैं?
मैंने अपने प्लास्टर से बंधे पैर की तरफ देखा, जहाँ से अभी भी दर्द की लहरें उठ रही थीं।
—अभी नहीं, निखिल। शिकार को जब तक पता चलता है कि वह जाल में फँस चुका है, तब तक बहुत देर हो चुकी होनी चाहिए।
बहुत कम लोग यह बात जानते थे कि 3 साल पहले राघव से शादी करने के बाद मैंने आर्या होल्डिंग्स के दैनिक संचालन से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया था। यह 12,000 करोड़ रुपये की वही बहुराष्ट्रीय कंपनी थी जिसे मैंने अपने दम पर, 27 साल की उम्र में अपनी मेहनत और दूरदर्शिता से खड़ा किया था। आज इस ग्रुप के अधीन ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और रिटेल की 6 बड़ी-बड़ी कंपनियाँ काम कर रही थीं।
विद्युतवन एनर्जी—जहाँ राघव खुद को “उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली और असरदार क्षेत्रीय निदेशक” कहकर सोसायटियों और पार्टियों में डींगें हांकता था—वह दरअसल मेरी ही आर्या होल्डिंग्स की एक छोटी सी सहायक (subsidiary) कंपनी थी।
शादी के समय मेरे पिता का देहांत हो चुका था और मैं कॉर्पोरेट की इस अंधी दौड़ से थोड़ी मानसिक शांति चाहती थी। इसलिए मैंने तय किया था कि मैं कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में बतौर ‘साइलेंट चेयरपर्सन’ रहूँगी और सारे प्रशासनिक फैसले निखिल सूद के ज़रिये ही होंगे। राघव से जब मेरी पहली मुलाकात एक बिजनेस कॉन्फ्रेंस में हुई थी, तब मैंने उसे सिर्फ इतना बताया था कि मैं एक छोटी सी फर्म के लिए फ्रीलांस कंसल्टिंग का काम करती हूँ।
राघव ने कभी मेरी असलियत जानने की कोशिश ही नहीं की। उसका पुरुष दंभ इतना बड़ा था कि वह कभी यह सोच ही नहीं पाया कि उसकी साधारण सी दिखने वाली, घर में चुपचाप रहने वाली पत्नी उसके मालिक से भी ऊपर की हैसियत रखती है। राघव को बस इस बात में खुशी मिलती थी कि मैं घर पर रहकर उसकी बीमार और कड़वी माँ सविता देवी की सेवा करूँ, उसके रिश्तेदारों के लिए भारी-भरकम पकवान बनाऊँ, और जब वह रात को दफ़्तर से लौटे तो उसकी तथाकथित ‘सफलता’ पर तालियाँ बजाऊँ।
कॉल खत्म होने के ठीक 15 मिनट बाद, अस्पताल के कमरे का दरवाज़ा धड़ाम से खुला।
राघव और उसकी माँ सविता देवी पूरे रोब के साथ कमरे में दाखिल हुए। सविता देवी के चेहरे पर वही पुरानी नफ़रत थी, जो मैंने पिछले तीन सालों से हर रोज़ देखी थी। कमरे में आते ही उन्होंने मेरी हालत या पैर पर बंधे प्लास्टर की तरफ एक बार भी नहीं देखा।
सविता जी चिल्लाकर बोलीं, —कलमुँही! बहू होकर शोक के घर से भाग आई! तेरहवीं के दिन घर में रिश्तेदारों के सामने हमारी नाक कटवा दी! ऐसी बेशर्म और कुलक्षणी औरत के लिए तो हमारे घर के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो जाने चाहिए! राघव, इसे अभी के अभी धक्के देकर बाहर निकालो!
राघव अपनी महंगी घड़ी को ठीक करते हुए आगे बढ़ा। उसके चेहरे पर घमंड की एक क्रूर मुस्कान थी।
—देखा तुमने अनन्या? माँ बिल्कुल सही कह रही हैं। तुम समझती क्या हो खुद को? मैं महीने के 14 लाख रुपये कमाता हूँ। कॉर्पोरेट जगत में मेरी थूक से भी चिराग जलते हैं। मेरे बिना तुम्हारा वजूद क्या है? एक अनाथ औरत, जिसकी कोई हैसियत नहीं है। मेरे बिना तुम्हें दो वक्त का खाना तक नसीब नहीं होगा। अगर अब भी पैरों में गिरकर माँ से माफ़ी माँग लो, तो शायद मैं तुम्हें अपने घर के नौकरों वाले कमरे में रहने की जगह दे दूँ।
मैं चुपचाप बेड पर लेटी रही। मेरे चेहरे पर ना तो गुस्सा था और ना ही कोई डर। मेरी यह खामोशी देखकर राघव को लगा कि मैं डर गई हूँ।
तभी कमरे का दरवाज़ा दोबारा खुला। इस बार मीरा और मेरी सीनियर एडवोकेट अदिति राव हाथ में कुछ कानूनी दस्तावेज़ लिए कमरे में दाखिल हुईं। अदिति जी का रोबदार व्यक्तित्व और हाथ में लेदर का महंगा ब्रीफकेस देखकर राघव थोड़ा ठिठका।
अदिति जी ने बिना कोई समय गंवाए टेबल पर अपना विजिटिंग कार्ड और एक लीगल नोटिस रख दिया।
—मिस्टर राघव मल्होत्रा, मैं आर्या होल्डिंग्स और सुप्रीम कोर्ट की सीनियर काउंसिल अदिति राव हूँ। मैं यहाँ श्रीमती अनन्या मल्होत्रा की आधिकारिक कानूनी प्रतिनिधि बनकर आई हूँ। आज के बाद से तलाक, संपत्ति का बंटवारा, घरेलु हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और किसी भी तरह के संपर्क की हर एक बात सीधे मेरे माध्यम से होगी। अगर आपने या आपकी माँ ने अनन्या जी को एक भी कॉल या मैसेज करने की कोशिश की, तो मैं आपके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करवा दूँगी।
राघव यह सुनकर खिलखिलाकर हँस पड़ा। वह अपनी जेब में हाथ डालकर टहलने लगा।
—अरे वकील साहिबा! आप शायद गलतफहमी की शिकार हैं। यह औरत दिन भर घर में खाली बैठी रहती है। इसका कोई स्थायी काम नहीं है, कोई आय का स्रोत नहीं है। और मैं? मैं विद्युतवन एनर्जी का नॉर्थ इंडिया का डायरेक्टर हूँ! मेरी पहुँच सरकार तक है। अदालत में पैसा और पावर चलता है, और वो दोनों मेरे पास हैं। जीत हमेशा मेरी ही होगी। मैं इसे रास्ते पर लाकर छोड़ूँगा।
मैं बिस्तर पर थोड़ा ऊपर उठी। मेरे चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो राघव ने पिछले तीन सालों में कभी नहीं देखी थी—एक ऐसी मुस्कान जो किसी साम्राज्य की रानी के चेहरे पर तब आती है जब वह किसी तिनके को कुचलने वाली होती है।
मैंने उसकी आँखों में आँखें डालकर, बहुत ही धीमी और ज़हरीली आवाज़ में कहा:
—तो फिर राघव… अपनी उस चमचमाती निदेशक की कुर्सी को ज़रा कसकर पकड़ लो। क्योंकि कल सुबह जब सूरज उगेगा, तो तुम्हारी ज़िंदगी में एक ऐसी आँधी आने वाली है जो तुम्हारी हर एक झूठी शान, तुम्हारे घमंड और तुम्हारे वजूद को उखाड़कर फेंक देगी।
राघव ने उपहास उड़ाते हुए कहा, —अच्छा? हम भी देखेंगे कि एक टूटी टांग वाली लाचार औरत मेरा क्या बिगाड़ सकती है। चलिये माँ, इस ड्रामा क्वीन के पास खड़े रहने का भी कोई फायदा नहीं है।
वे दोनों बड़बड़ाते हुए कमरे से बाहर निकल गए। राघव को अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस कुर्सी पर बैठकर वह खुद को खुदा समझता था और मुझे गरीब और बेसहारा समझकर दुत्कार रहा था, उस कुर्सी की असली मालिक वही औरत थी जिसे उसने अस्पताल के स्ट्रैचर से उठकर रसोई में जाकर बर्तन धोने का आदेश दिया था।
और जैसा कि मैंने वादा किया था, अगली सुबह ठीक 9 बजे उसकी नकली दुनिया का पहला दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद होने वाला था।
अगली सुबह 8:45 बजे।
गुड़गांव के साइबर सिटी स्थित विद्युतवन एनर्जी के विशाल कॉर्पोरेट दफ़्तर में हमेशा की तरह चहल-पहल थी। राघव मल्होत्रा अपनी चमचमाती काले रंग की मर्सिडीज से उतरा। उसने अपनी इटैलियन सूट का बटन बंद किया और हाथ में रोलेक्स की घड़ी पहनकर पूरी ठसक के साथ दफ़्तर के मुख्य द्वार में प्रवेश किया। उसके आगे-पीछे दो जूनियर एग्जीक्यूटिव्स फाइलों का पुलिंदा लिए चल रहे थे।
राघव का हमेशा से यह नियम था कि जब वह कॉरिडोर से गुज़रे, तो हर कर्मचारी अपनी सीट से खड़ा होकर उसे “गुड मॉर्निंग, सर” कहे। वह खुद को उस इमारत का राजा समझता था।
जैसे ही वह अपने शीशे वाले आलीशान ‘रीजनल डायरेक्टर’ के केबिन के पास पहुँचा, उसने देखा कि उसके दफ़्तर का माहौल बदला हुआ था। दफ़्तर के बाहर दो सीआईएसएफ (CISF) के गार्ड खड़े थे और उसके केबिन के भीतर चार अजनबी लोग ब्लैक सूट पहने, लैपटॉप खोले बैठे थे। उनकी टेबल पर राघव की पिछले तीन सालों की सभी फाइलों के ढेर लगे थे।
राघव का पारा चढ़ गया। वह तेज़ी से केबिन का दरवाज़ा खोलकर भीतर घुसा।
—व्हाट द हेल इज़ गोइंग ऑन हियर? (यह सब क्या बकवास चल रही है?) तुम लोग मेरे केबिन में क्या कर रहे हो? किसकी इजाज़त से मेरे पेपर्स को हाथ लगाया गया? गेट आउट ऑफ माय ऑफिस राइट नाउ! राघव चिल्लाया।
उन चार लोगों में से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसने अपनी जेब से एक कार्ड निकाला।
—शांत हो जाइये, मिस्टर मल्होत्रा। मैं समीर वर्मा हूँ, आर्या होल्डिंग्स का चीफ इंटरनल ऑडिट हेड। हम यहाँ ग्रुप हेडक्वार्टर के सीधे आदेश पर विद्युतवन एनर्जी की उत्तर क्षेत्रीय शाखा का इमरजेंसी फॉरेंसिक ऑडिट करने आए हैं।
राघव ने ज़ोर से ठहाका लगाया। —फॉरेंसिक ऑडिट? तुम्हें पता भी है कि तुम किससे बात कर रहे हो? मैं इस रीजन का डायरेक्टर हूँ! निखिल सूद—जो तुम्हारे ग्रुप के सीईओ हैं—वे मेरे पर्सनल दोस्त हैं! मैं अभी उन्हें फोन लगाता हूँ और तुम सबको 5 मिनट में नौकरी से बाहर करवाता हूँ!
राघव ने तुरंत अपना आईफोन निकाला और निखिल सूद का नंबर मिलाया। उसने फोन को स्पीकर पर डाल दिया ताकि कमरे में मौजूद ऑडिटर्स डर जाएं।
तीन सेकंड में फोन उठ गया।
—निखिल! राघव बोल रहा हूँ। तुम्हारे कुछ सिरफिरे ऑडिटर्स मेरे दफ़्तर में घुस आए हैं और मेरी गोपनीय फाइलों को छेड़ रहे हैं। इन्हें अभी यहाँ से हटाओ, वरना मैं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से तुम्हारी शिकायत कर दूँगा! राघव ने रोब जमाते हुए कहा।
दूसरी तरफ से निखिल सूद की आवाज़ आई। लेकिन उस आवाज़ में वह पुरानी गर्मजोशी या दोस्ताना लहजा बिल्कुल गायब था। आवाज़ बर्फ की तरह ठंडी थी।
—मिस्टर मल्होत्रा, ऑडिट टीम सीधे ‘चेयरपर्सन ऑफिस’ के विशेष निर्देशों के तहत काम कर रही है। आर्या होल्डिंग्स के नियमों के अनुसार, ऑडिट के दौरान किसी भी क्षेत्रीय निदेशक के अधिकार तत्काल प्रभाव से निलंबित (suspended) कर दिए जाते हैं। कृपया अपने पद का लैपटॉप, एक्सेस कार्ड और कंपनी की गाड़ी की चाबियाँ मिस्टर वर्मा को सौंप दें और ऑडिट में सहयोग करें।
राघव के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदें उभर आई थीं।
—च… चेयरपर्सन ऑफिस? निखिल, तुम मज़ाक कर रहे हो न? आज तक कभी बोर्ड ने ऐसा डायरेक्ट इंटरवेंशन नहीं किया! चेयरपर्सन तो पिछले तीन सालों से लंदन में हैं ना? तुमने तो कहा था कि वे सिर्फ रिपोर्ट्स देखती हैं?
—मिस्टर मल्होत्रा, चेयरपर्सन कहाँ हैं और क्या कर रही हैं, यह जानने की आपकी हैसियत नहीं है। फिलहाल आप एक संदिग्ध आरोपी हैं। ऑडिट टीम को अपना सहयोग दें। फोन कट गया।
राघव का दिमाग सन्न रह गया। पिछले तीन सालों से जिस चेयरपर्सन के नाम का खौफ पूरे कॉर्पोरेट वर्ल्ड में था, जिसे उसने कभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं देखा था, वह अचानक उसके पीछे क्यों पड़ गई थी?
अभी वह इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि समीर वर्मा ने एक मोटी फाइल राघव के सामने फेंकी।
—मिस्टर राघव मल्होत्रा, पिछले तीन सालों में आपने ‘वेंडर वेंडिंग’ और नकली लॉजिस्टिक्स बिलों के ज़रिये विद्युतवन एनर्जी से लगभग 14.5 करोड़ रुपये का गबन (embezzlement) किया है। आपने सेक्टर 54 वाला अपना व्यक्तिगत 4 बीएचके फ्लैट और जो मर्सिडीज कार आप चलाते हैं, उसे कंपनी के ‘शेल वेंडर्स’ के खातों से मनी लॉन्ड्रिंग करके खरीदा है।
राघव का रंग हल्दी की तरह पीला पड़ गया। उसके पैर कांपने लगे। वह जिस गबन को बहुत सफाई से छिपा रहा था, उसे ऑडिटर्स ने महज 2 घंटे में ढूँढ निकाला था।
—यह… यह सब झूठ है! यह एक साज़िश है! राघव हकलाने लगा।
—यह सच है या झूठ, यह अब सीबीआय (CBI) और इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) तय करेगी। समीर वर्मा ने एक और पेपर आगे बढ़ाया। —यह आपका सस्पेंशन लेटर है। और हाँ, आर्या होल्डिंग्स लीगल टीम ने आपके सभी व्यक्तिगत बैंक खातों को सीज करने के लिए हाइकोर्ट से स्टे ऑर्डर प्राप्त कर लिया है।
—क्या??? मेरे बैंक खाते? लेकिन उसमें मेरे 1.8 करोड़ रुपये पड़े हैं! मेरी माँ के गहने लॉकर में हैं! राघव लगभग चीख पड़ा।
—वे खाते अब फ्रीज़ हो चुके हैं मिस्टर मल्होत्रा। जब तक फॉरेंसिक जांच पूरी नहीं हो जाती, आप एक रुपया भी इस्तेमाल नहीं कर सकते। अब कृपया अपना सामान उठाइये और दफ़्तर से बाहर निकलिए। गार्ड्स! इन्हें एस्कॉर्ट करके बाहर निकालिए।
दो सीआईएसएफ के गार्ड्स ने राघव को दोनों बाहों से पकड़ा और पूरे दफ़्तर के कर्मचारियों के सामने, कॉरिडोर से घसीटते हुए मुख्य सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया। वही कर्मचारी, जो सुबह तक उसे झुककर सलाम करते थे, आज उस पर हँस रहे थे, उसकी तस्वीरें खींच रहे थे और फुसफुसा रहे थे।
राघव सड़क के किनारे खड़ा था। उसकी महंगी मर्सिडीज कार की चाबी छीन ली गई थी। उसके पास ना तो अपना वॉलेट था, ना ही काम करने वाला कोई क्रेडिट कार्ड। उसके फोन पर बार-बार बैंक के मैसेज आ रहे थे—’Your Account Has Been Frozen By Court Order.’
तभी उसके फोन पर उसकी माँ सविता देवी का कॉल आया। सविता जी रो रही थीं और हांप रही थीं।
—राघव! बेटा जल्दी घर आ! पता नहीं कौन लोग आए हैं! वे कह रहे हैं कि यह घर हमारा नहीं है! वे घर का सामान बाहर फेंक रहे हैं! पुलिस भी उनके साथ है! जल्दी आ बेटा!
राघव के सिर पर जैसे आसमान टूट पड़ा। उसने तुरंत एक ऑटो वाले को रोका।
—भैया, सेक्टर 54 चलो! जल्दी!
—पचास रुपये लगेंगे साहब, ऑटो वाले ने कहा।
राघव ने अपनी जेब टटोली। उसकी जेब में केवल 20 रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट पड़ा था। जिस आदमी के पास सुबह तक 14 लाख महीने की सैलरी और करोड़ों के एसेट्स थे, उसके पास ऑटो का किराया देने तक के पैसे नहीं थे। वह बदहवास होकर सड़क पर दौड़ने लगा।
जब राघव हांफता हुआ अपने सेक्टर 54 वाले आलीशान सोसाइटी के फ्लैट के बाहर पहुँचा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए।
सोसाइटी के कंपाउंड में उसके घर के महंगे सोफे, इटैलियन झूमर और कपड़ों से भरे बैग बिखरे पड़े थे। उसकी माँ सविता देवी ज़मीन पर बैठी अपना सिर पीट-पीटकर रो रही थीं। आसपास सोसाइटी के दर्जनों लोग जमा होकर तमाशा देख रहे थे।
घर के दरवाज़े पर दो महिला पुलिसकर्मी और आर्या होल्डिंग्स की लीगल टीम की प्रमुख एडवोकेट अदिति राव खड़ी थीं।
राघव चिल्लाते हुए आगे बढ़ा, —यह क्या बदतमीज़ी है! यह मेरा घर है! मैंने इसे अपने पैसों से खरीदा है! तुम लोग मेरी माँ का सामान सड़क पर कैसे फेंक सकते हो?
अदिति राव ने अपने हाथ में पकड़े दस्तावेज़ राघव के चेहरे के सामने लहराए।
—मिस्टर मल्होत्रा, थोड़ा कानूनी ज्ञान बढ़ाइए। यह घर आपके नाम पर कभी था ही नहीं। इस प्रॉपर्टी की 100% ओनरशिप ‘आर्या होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड’ के नाम पर है, जिसे कंपनी ने अपने एक एक्जीक्यूटिव लीज़ एग्रीमेंट के तहत आपको रहने के लिए दिया था। चूंकि आज सुबह आपको कंपनी से निलंबित कर दिया गया है, इसलिए आपका इस लीज़ पर से अधिकार तुरंत समाप्त होता है।
—और रही बात इस घर के भीतर के सामान की, अदिति जी ने आगे कहा, —यह सब सामान उस 14.5 करोड़ रुपये के रिकवरी प्रोसीडिंग्स का हिस्सा है जो आपने कंपनी से चुराए हैं। कोर्ट के बेलिफ़ ने इस संपत्ति को कुर्क (attach) कर लिया है।
सविता देवी रोते हुए राघव के पास आईं और उसका हाथ पकड़कर बोलीं, —बेटा राघव! इस कुलक्षणी अनन्या को फोन कर! उसने ही कोई जादू-टोना किया है! उसे बोल कि अपनी वकील को रोके! हम उसे घर में वापस रख लेंगे, उसे कोई काम नहीं करने देंगे, बस यह सब रुकवा!
राघव ने थरथराते हाथों से अपने पर्सनल फोन से मेरा नंबर मिलाया।
दूसरी तरफ, मैं गुड़गांव के सबसे प्रीमियम प्राइवेट अस्पताल के वीआईपी सूट में आराम कर रही थी। मेरे पैर पर एक हल्का और आधुनिक फाइबर-कास्ट चढ़ चुका था, जिससे मुझे दर्द में काफी राहत थी। कमरे में बड़ी सी एलसीडी टीवी पर विद्युतवन एनर्जी के शेयर गिरने की खबरें चल रही थीं।
मैंने फोन उठाया और लाउडस्पीकर ऑन कर दिया।
—अ… अनन्या! राघव की आवाज़ में अब कोई घमंड नहीं था। उसकी आवाज़ में सिर्फ खौफ और लाचारगी थी। —अनन्या, यह सब क्या हो रहा है? दफ़्तर में ऑडिटर्स बैठ गए हैं, मेरा अकाउंट फ्रीज़ हो गया है, पुलिस ने घर से बाहर निकाल दिया है… क्या तुमने यह सब कराया है? तुम उस वकील अदिति राव को कैसे जानती हो? और आर्या होल्डिंग्स के लोग तुम्हारे कहने पर काम क्यों कर रहे हैं?
मैंने आराम से अपनी ब्लैक कॉफ़ी का एक घूँट लिया और शांत स्वर में कहा:
—राघव, क्या तुम्हें याद है कि कल अस्पताल में तुमने मुझसे क्या कहा था? तुमने कहा था कि मैं टूटी टांग के साथ बाहर निकलूँगी और मेरी जेब में एक रुपया नहीं होगा। तुमने कहा था कि तुम 14 लाख कमाते हो और तुम्हारे बिना मेरा कोई वजूद नहीं है।
—अनन्या, मुझे माफ कर दो! मुझे गुस्सा आ गया था! राघव गिड़गिड़ाने लगा। —हम बैठकर बात कर सकते हैं ना? माँ भी बहुत परेशान हैं, वे रो रही हैं। हम सब भूलकर एक नई शुरुआत करेंगे। तुम घर वापस आ जाओ, मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें कभी रसोई में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी!
—एक नई शुरुआत? मैंने ठंडी हँसी हँसते हुए कहा। —राघव, तुम तीन सालों से जिस औरत को अपनी दासी समझकर उसके वजूद को कुचल रहे थे, तुमने कभी उसकी आँखों में छिपी सच्चाई को पढ़ने की कोशिश ही नहीं की। तुमने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिस ‘कंसल्टिंग’ के काम को तुम तुच्छ समझते थे, वह काम दरअसल क्या था।
—क्या… क्या मतलब? राघव की सांसें अटक गईं।
—मतलब यह, राघव मल्होत्रा… कि आर्या होल्डिंग्स को किसी और ने नहीं, बल्कि इस ‘अनाथ और बेसहारा’ अनन्या ने अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया है। आर्या होल्डिंग्स की 85% शेयरहोल्डिंग मेरी व्यक्तिगत संपत्ति है। मैं उस बोर्ड की चेयरपर्सन हूँ जिसकी एक छोटी सी कंपनी में तुम महज़ एक वेतनभोगी कर्मचारी थे।
सन्नाटा… ऐसा भयानक सन्नाटा छा गया कि फोन के ज़रिये मुझे राघव और सविता देवी की रुकती हुई सांसों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
—न… नहीं… यह नहीं हो सकता! तुम झूठ बोल रही हो! राघव चीखा, लेकिन उसकी चीख में अब कोई दम नहीं था। —अगर तुम चेयरपर्सन थीं, तो तुमने मुझसे शादी क्यों की? तुमने तीन साल तक रसोई में बर्तन क्यों धोए? तुमने मेरी माँ के ताने क्यों सहे?
—क्योंकि मैं एक सच्चे परिवार की तलाश में थी, राघव, मैंने दुख और कड़वाहट से कहा। —मुझे लगा था कि कॉर्पोरेट की इस चमक-धमक से दूर, मुझे एक ऐसा घर मिलेगा जहाँ प्यार और सम्मान होगा। इसलिए मैंने अपनी पहचान छिपाकर एक साधारण बहू की तरह तुम्हारे घर में कदम रखा था। मुझे पैसों का घमंड नहीं था। मैं तुम्हें अपना पति मानकर तुम्हारी सफलता में खुश होती थी। लेकिन तुमने और तुम्हारी माँ ने मेरी सादगी को मेरी कमजोरी समझ लिया। तुमने प्यार के बदले मुझे सिर्फ अपमान, दुत्कार और गुलामी दी।
—अनन्या! मुझे बख्श दो! सविता देवी फोन पर चीख पड़ीं, —बहू! मुझे माफ कर दो! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई! हम तुम्हारी गुलामी करेंगे, बस राघव की नौकरी बचा लो! हमें बेघर मत करो!
—सविता जी, अब बहुत देर हो चुकी है, मैंने कड़े शब्दों में कहा। —जब मैं अस्पताल में दर्द से तड़प रही थी और मेरी टांग टूटी हुई थी, तब आपने मुझसे पूछा तक नहीं कि मैं ज़िंदा हूँ या नहीं। आपने बस इतना सोचा कि आपकी चाय और खाने का क्या होगा। आपने मुझे इंसान ही नहीं समझा। अब आपको अपने संस्कारों का फल भुगतना होगा।
—अनन्या! सुनो! राघव रोने लगा था, —कम से कम मेरा अकाउंट अनफ़्रीज़ करवा दो! मेरे पास सड़क पर खड़े रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं है!
—जो 14.5 करोड़ रुपये तुमने कंपनी से चुराए हैं, जब तक उनकी एक-एक पाई वसूल नहीं हो जाती, तब तक तुम्हारे सारे एसेट्स सीज रहेंगे, राघव। सीबीआय किसी भी वक्त तुम्हें गिरफ्तार करने पहुँचती होगी। तुमने जो बोया है, वही काटोगे।
मैंने कॉल काट दी और नंबर को हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया।
छह महीने बाद।
दिल्ली के सबसे बड़े फाइव स्टार होटल के ग्रैंड बॉलरूम में आर्या होल्डिंग्स की वार्षिक एनुअल जनरल मीटिंग (AGM) चल रही थी। देश-विदेश के सैकड़ों बिजनेसमैन, इन्वेस्टर्स और मीडिया के कैमरे हॉल में मौजूद थे।
स्टेज पर, एक हल्के नीले रंग के सिल्क सूट में, मैं व्हीलचेयर से उठकर, एक पतली सी वॉकिंग स्टिक के सहारे माइक के पास खड़ी हुई। अब मेरे पैर में कोई दर्द नहीं था, और ना ही मेरे चेहरे पर अतीत का कोई साया था। मीडिया के कैमरे लगातार फ्लैश कर रहे थे।
—लेडीज़ एंड जेंटलमेन, माइक पर मेरी आवाज़ गूँजी, —पिछले तीन सालों में आर्या होल्डिंग्स ने 40% का मुनाफा दर्ज किया है। लेकिन एक लीडर के तौर पर, मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि मैंने यह सीखा कि जब आपकी कद्र ना हो, तो वहाँ से चुपचाप हट जाना ही सबसे बड़ा आत्मसम्मान होता है। सही शक्ति वह नहीं है जो दूसरों को दबाए, बल्कि वह है जो सही समय पर अन्याय के खिलाफ खड़ी हो सके।
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
उसी शाम, जब मेरी मर्सिडीज कार गुड़गांव के एक व्यस्त चौराहे पर रेड लाइट पर रुकी, तो मैंने खिड़की से बाहर देखा।
सड़क के किनारे, बारिश की हल्की बूँदों के बीच, एक जर्जर से चाय के टपरे पर दो लोग काम कर रहे थे।
एक आदमी, जिसने फटे-पुराने कपड़े पहन रखे थे, बर्तन धो रहा था और ग्राहकों के झूठे कप उठा रहा था। वह राघव था। सीबीआय केस में उसकी जमानत तो हो गई थी, लेकिन गबन के आरोप और भारी जुर्माने की वजह से उसकी सारी जायदाद नीलाम हो चुकी थी। कोई भी कंपनी एक भ्रष्ट और सस्पेंडेड एग्जीक्यूटिव को नौकरी देने को तैयार नहीं थी।
और टपरे के पीछे, एक टूटी हुई बेंच पर बैठी एक बूढ़ी औरत ग्राहकों के लिए चाय उबाल रही थी। वह सविता देवी थीं। जो औरत कभी अपने घर में बहू के हाथ की चाय देर से आने पर हंगामा खड़ा कर देती थी, आज वही औरत सड़क के किनारे अनजान लोगों के लिए चाय बनाने को मजबूर थी।
राघव ने अचानक मुड़कर मेरी गाड़ी की तरफ देखा। गाड़ी के काले शीशे के पार, उसने मेरी आँखों को देखा। उसकी आँखों में पछतावे, शर्म और लाचारगी का एक ऐसा समंदर था जो कभी खत्म नहीं होने वाला था।
मेरी कार की रेड लाइट ग्रीन हुई। ड्राइवर ने एक्सीलेटर दबाया, और मेरी गाड़ी उस गंदे चौराहे और राघव के अतीत को पीछे छोड़ते हुए, एक नए और सुनहरे भविष्य की ओर आगे बढ़ गई।
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