Story

पति ने प्रेमिका की 2.5 लाख की ड्रेस के लिए 8 साल की मासूम बेटी पर बेल्ट से किया वार, फिर 9 साल बाद पत्नी ने खोला अपने खानदान का वो राज जिसने दोनों को सड़क पर ला पटका

गुरुग्राम के सेक्टर 42 स्थित उस भव्य और आलीशान विला के लंबे गलियारे में आज जो सन्नाटा पसरा था, वह किसी आने वाले भयंकर तूफान की आहट जैसा लग रहा था। यह वही संगमरमर का घर था जिसे बाहर से देखने वाले लोग किसी महल से कम नहीं समझते थे, मगर इसके भीतर रहने वाली मीरा के लिए यह बीते नौ वर्षों से एक बेहद ठंडी और बेरहम जेल बन चुका था।

मीरा जब हाथ में किराने का थैला और अपनी इवेंट कंपनी की कुछ फाइलें लिए मुख्य द्वार पर पहुँची, तो भीतर से गूंजती सिसकियों ने उसके कदमों को वहीं जड़ कर दिया। उसका चमड़े का हैंडबैग बेआवाज़ फर्श पर जा गिरा। सामने मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था और कमरे के ऐन बीचों-बीच आठ साल की अनाया जमीन पर घुटनों के बल बैठी थर-थर कांप रही थी। उसके नन्हे हाथ उसके चेहरे को ढके हुए थे और उसके कांपते होंठों से सिर्फ एक ही शब्द निकल रहा था—’पापा… प्लीज़ मत मारो… मैंने कुछ नहीं किया।’

कमरे में रोहन खड़ा था। उसकी आँखों में अंधा गुस्सा था, चेहरे की नसें तनी हुई थीं और उसके दाहिने हाथ में वही भारी लेदर की बेल्ट लटक रही थी, जिसकी सरसराहट इस घर में डर का पर्याय बन चुकी थी। बिस्तर के पास खड़ी थी नैना—वही तथाकथित ‘ब्रांड कंसल्टेंट’ और रोहन की प्रेमिका, जिसे रोहन बीते सात-आठ महीनों से खुलेआम घर ला रहा था। नैना के चेहरे पर जीत की एक कुटिल और घमंडी मुस्कान तैर रही थी। बिस्तर पर पन्ना-हरे (एमराल्ड ग्रीन) रंग की एक बेहद महँगी डिज़ायनर ड्रेस पड़ी थी, जो जगह-जगह से कैंची से बेदर्दी से काटी गई थी। रेशमी धागे और जरी के टुकड़े कालीन पर बिखरे पड़े थे।

नैना ने अपनी तिरछी आँखों से मीरा की तरफ देखा और अपने हाथ बांधते हुए बेहद तीखे स्वर में कहा, “देखो अपनी लाडली का कारनामा! पूरे ढाई लाख रुपये की सब्यसाची की गाउन थी ये। कल शाम के फैशन समिट में मुझे यही पहनकर जाना था। इस जंगली लड़की ने पूरी ड्रेस काटकर चिथड़े कर दी।”

रोहन ने अपनी बेल्ट को एक बार फिर हवा में लहराया, जिसकी तीखी फटकार से अनाया और जोर से बिलख पड़ी। रोहन ने गुर्राते हुए कहा, “आधे घंटे से पूछ रहा हूँ, मगर ये बेशर्म लड़की लगातार झूठ बोल रही है। अगर इसने फिर मेरी या नैना की चीज़ों को हाथ लगाया, तो अगली बार मैं बेल्ट पर नहीं रुकूँगा, मीरा! इसे तमीज़ सिखाना तुम्हारा काम था, लेकिन तुम खुद एक नाकाम औरत हो।”

मीरा ने कमरे में प्रवेश किया। उसके सीने में आग का एक दरिया बह रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर बर्फ जैसी खामोशी थी। उसने रोहन की तरफ देखा भी नहीं। वह सीधे घुटनों के बल अपनी नन्ही बेटी के सामने बैठ गई। जब उसने अनाया के नाजुक, गोरे हाथों को हटाया, तो उसकी कलाई और बांहों पर बेल्ट के नीले और लाल निशान उभरे हुए थे। उस आठ साल की मासूम बच्ची के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। मीरा ने अपने आंसुओं को पलकों के पीछे ही रोक लिया। उसने अनाया को अपनी छाती से चिपका लिया, जैसे कोई परिंदा अपने घायल बच्चे को अपने पंखों में छुपा लेता है।

“बेटा, कहीं और चोट लगी है?” मीरा ने बेहद धीमी और कांपती आवाज़ में पूछा।

अनाया ने बस अपनी माँ की गर्दन में चेहरा छिपाकर धीरे से ‘ना’ में सिर हिलाया।

रोहन ने आगे बढ़कर सोफे पर लात मारी और चिल्लाया, “ये नाटक बंद करो मीरा! ढाई लाख की ड्रेस थी वो। कल दोपहर बारह बजे तक मुझे ढाई लाख रुपये कैश चाहिए। अगर पैसे नहीं दे सकती, तो आज ही अपनी इस मनहूस बेटी को लेकर इस घर से दफा हो जाओ। नौ साल से मेरे टुकड़ों पर पल रही हो, और तुम्हारी औलाद का ये घमंड?”

नैना ने पास आकर अपनी नुकीली सैंडल की ठोकर से कटी हुई ड्रेस का एक टुकड़ा मीरा के पैरों की ओर उछाला। उसने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, “बच्चे को बचपन से ही सिखाना चाहिए कि ऐसी चीज़ों को छूने की हिमाकत न करे, जिन्हें खरीदने की उसकी और उसकी माँ की औकात न हो। वैसे भी, एक बेकार और बेरोजगार औरत से ढाई लाख की उम्मीद करना ही बेवकूफी है।”

मीरा ने एक शब्द नहीं कहा। उसने न तो नैना पर चिल्लाया, न रोहन से कोई भीख मांगी। उसने सिर्फ अनाया को अपनी गोद में उठाया और धीमे कदमों से चलते हुए उसे बच्चों वाले कमरे में ले आई। दरवाज़ा बंद करके उसने अंदर से कुंडी लगा दी।

कमरे की चारदीवारी में आते ही अनाया फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी हिचकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। उसने अपनी माँ का पल्लू कसकर पकड़ लिया और कांपती आवाज़ में फुसफुसाकर कहा, “मम्मा… मैंने ड्रेस नहीं काटी… भगवान कसम मम्मा, मैंने कुछ नहीं किया… नैना आंटी ने आपकी सिलाई वाली बड़ी कैंची ली और खुद अपनी ड्रेस काटी थी। मैं जब ड्रॉइंग की कॉपी लेने कमरे की तरफ जा रही थी, तब मैंने उन्हें देख लिया। उन्होंने मुझे देख लिया और मेरे बाल पकड़कर कहा कि अगर मैंने किसी को बताया तो पापा आपको और मुझे सड़क पर फेंक देंगे। फिर उन्होंने खुद ही चिल्लाना शुरू कर दिया कि मैंने उनकी ड्रेस काट दी… मम्मा, पापा ने मेरी एक बात नहीं सुनी…”

मीरा का खून खौल उठा। उसकी रीढ़ में एक अजीब सी ठंडी लहर दौड़ गई। पिछले चार महीनों से घर से लगातार नकदी और छोटे-मोटे गहने गायब हो रहे थे, और रोहन हर बार इसका इल्जाम घर की पुरानी नौकरानी या मीरा की लापरवाही पर डाल देता था। उसी संदेह के चलते मीरा ने चार महीने पहले कॉरिडोर और मास्टर बेडरूम के गलियारे की ओर मुंह किए हुए एक छोटा सा हिडन वाई-फाई कैमरा लगवा दिया था। रोहन अपनी अय्याशी और अहंकार में इतना अंधा था कि उसने कभी घर की दीवारों या कोनों पर ध्यान ही नहीं दिया था।

मीरा ने अपनी अलमारी के सबसे निचले दराज से अपना पुराना फोन निकाला, जिसमें उस कैमरे का गुप्त बैकअप चलता था। उसने कांपती उंगलियों से टाइम-स्टैम्प खोला—दोपहर के 3:45 बजे।

स्क्रीन पर जो दिखा, उसने मीरा के बचे-खुचे भ्रम को भी राख कर दिया।

फुटेज में साफ दिख रहा था कि नैना अकेले कमरे में आई। उसने ड्रेस को बिस्तर पर फैलाया, अपने फोन पर किसी से बात करते हुए हंसी, फिर मीरा की बड़ी वाली स्टील की कैंची उठाई और ड्रेस की आस्तीन तथा कमर के हिस्से को कई जगह से चीर दिया। तभी सात साल की अनाया हाथ में कलर पेंसिल लिए कॉरिडोर से गुजरी और ठिठक कर देखने लगी। नैना ने मुड़कर बच्ची को देखा, कैंची मेज पर पटकी, बच्ची की कलाई पकड़ी और अपनी उंगली होंठों पर रखकर उसे धमकाया। इसके ठीक दो मिनट बाद नैना ने कमरे का दरवाज़ा खोलकर पूरे घर के सिर पर उठाते हुए चीखना शुरू कर दिया था।

मीरा ने उस वीडियो क्लिप की तीन अलग-अलग कॉपियाँ बनाईं—एक पेनड्राइव में, एक क्लाउड स्टोरेज पर और एक अपने ईमेल पर। फिर उसने अनाया की बांहों, पीठ और कलाई पर पड़े नीले निशानों की हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लीं।

इसके बाद मीरा ने अपने फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट खोली। सबसे नीचे, नौ साल से आर्काइव और ब्लॉक की गई लिस्ट में एक व्हाट्सऐप ग्रुप था, जिसका नाम था—”भैया लोग”।

इस ग्रुप में पाँच नाम थे—आदित्य, करण, विवेक, निखिल और समीर।

मीरा कोई लाचार, अनाथ या सड़क से उठाई गई लड़की नहीं थी, जैसा कि रोहन पिछले नौ सालों से दुनिया को और खुद को यकीन दिलाता आ रहा था। मीरा रायज़ादा, लुटियंस दिल्ली के सबसे पुराने, प्रतिष्ठित और ताकतवर रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन टाइकून स्वर्गीय विजयेंद्र रायज़ादा की इकलौती और सबसे लाडली बेटी थी। उसके पिता के गुजरने और माँ के चले जाने के बाद, पारिवारिक वसीयत, सौतेले रिश्तेदारों की साजिशों और व्यापारिक दबावों से तंग आकर 21 साल की मीरा ने बगावत कर दी थी। कॉलेज के दिनों में उसे रोहन मिला था—एक साधारण, मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का जो खुद को एक समर्पित और सीधा-साधा इंसान दिखाता था।

मीरा के सबसे बड़े भाई आदित्य रायज़ादा ने तब रोहन की आंखों में छिपा लालच और खोखलापन पहली ही नज़र में भांप लिया था। उन्होंने मीरा को चेतावनी दी थी, मगर प्रेम के अंधेपन में मीरा ने अपने पूरे खानदान से रिश्ते तोड़ लिए थे। उसने अपने भाइयों से कहा था कि वह अपनी शर्तों पर जिंदगी जिएगी और कभी उनके दरवाजे पर नहीं आएगी।

उस दिन, नौ साल पहले, आदित्य रायज़ादा ने मीरा के जाते वक्त भारी मन से एक ही बात कही थी, “मीरा, तुम हमारी जान हो। भले ही तुम हमसे दस साल बात मत करना, अपनी जिद पूरी कर लो। लेकिन याद रखना, दुनिया जब भी तुम्हें तोड़ने की कोशिश करे और तुम्हें लगे कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, बस एक फोन कर देना। तुम्हारे पाँचों भाई उस दिन तुम्हारे लिए पूरी दुनिया जला देंगे।”

मीरा ने नौ साल तक रोहन के हर ताने, हर अपमान और हर ज़्यादती को सिर्फ इसलिए सहा था क्योंकि वह अपने भाइयों के सामने गलत साबित नहीं होना चाहती थी। जब अनाया पैदा हुई, तो रोहन ने धीरे-धीरे अपना असली रंग दिखाना शुरू किया। उसने मीरा की इवेंट कंपनी बंद करवा दी, उसका बैंक खाता अपने कंट्रोल में ले लिया, और हर दिन उसे यह एहसास दिलाता रहा कि उसके सिर पर जो छत है, वह रोहन की मेहरबानी है।

मगर आज… आज उस कायर ने उसकी बेटी पर हाथ उठाया था। एक माँ के भीतर की स्वाभिमानी औरत जाग चुकी थी, और उस औरत ने अपनी पुरानी ज़िद को अनाया के आंसुओं में विसर्जित कर दिया था।

मीरा ने कांपती उंगलियों से उस ग्रुप में नौ साल बाद पहला संदेश टाइप किया: “रोहन ने अनाया को बेल्ट से मारा है।”

संदेश भेजने के ठीक बारह सेकंड बाद, फोन की स्क्रीन जगमगा उठी।

सबसे बड़े भाई आदित्य, जो आज उत्तर भारत के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रुप के मालिक थे, का सीधा और सपाट संदेश आया: “लाइव लोकेशन भेज मीरा। हम निकल रहे हैं।”

दूसरे नंबर के भाई करण, जो सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने क्रिमिनल लॉयर थे, ने तुरंत लिखा: “मीरा, बच्ची को कमरे में रखो। कोई सबूत, कोई तस्वीर या वीडियो डिलीट मत करना। अनाया के घावों की साफ तस्वीरें लो। मैं सीधे हरियाणा के डीजीपी और गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर से बात कर रहा हूँ। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और डोमेस्टिक वायलेंस के गैर-जमानती वारंट तैयार करवा रहा हूँ।”

मीरा ने फौरन लोकेशन और वीडियो क्लिप्स ग्रुप में डाल दीं।

वीडियो देखकर तीसरे भाई विवेक (जो पूर्व पैरा-कमांडो और अब एक अंतरराष्ट्रीय सिक्योरिटी फर्म के प्रमुख थे) का संदेश आया: “उस जानवर को कहना कि हाथ संभाल कर रखे। अगर उसने बच्ची या तुम्हें दोबारा छुआ, तो उसका हाथ शरीर से अलग करने में मुझे दो मिनट भी नहीं लगेंगे।”

कमरे में शांति थी, लेकिन मीरा के फोन पर करण का एक और संदेश आया। यह एक दस्तावेज़ की पीडीएफ फाइल थी। साथ में करण का ऑडियो नोट आया। मीरा ने ईयरफोन लगाया और सुना।

करण की गंभीर आवाज़ गूंजी: “मीरा, मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो और उस घर से एक कदम भी बाहर मत निकलना। जब तुमने लोकेशन भेजी, तो मुझे शक हुआ। मैंने तुरंत गुरुग्राम म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और टाउन प्लानिंग के डायरेक्टर से बात करके उस प्रॉपर्टी के रजिस्ट्री रिकॉर्ड निकलवाए हैं। रोहन पिछले नौ साल से जिस घर, जिस विला के दम पर तुम्हें सड़क पर फेंकने की धमकी देता रहा है… वह घर उसका है ही नहीं!”

मीरा की सांसें थम गईं। उसने पूछा, “क्या मतलब, भैया?”

करण ने आगे बताया, “रोहन ने तुमसे कहा था कि यह विला उसने अपने होम लोन और स्टार्टअप के मुनाफे से खरीदा है, सच? सच्चाई यह है कि यह विला ‘विजयेंद्र रायज़ादा एंड संस ट्रस्ट’ की एक सिस्टर कंपनी ‘आर-होल्डिंग्स’ के नाम पर रजिस्टर्ड है। पिताजी ने अपने जीवित रहते हुए तुम्हारे 18वें जन्मदिन पर यह जमीन तुम्हारे नाम पर ट्रस्ट के जरिए खरीदी थी। जब तुम घर छोड़कर भागी थीं, तो रोहन ने हमारे पुराने मुंशी और एक भ्रष्ट वकील से साठगांठ करके इस प्रॉपर्टी की पावर ऑफ अटॉर्नी फर्जी तरीके से अपने नाम करा ली थी और इसका लीज रेंट हमारी ही एक शेल कंपनी से अपने खाते में ट्रांसफर करवा रहा था। कानूनी तौर पर इस विला की 100% मालकिन तुम हो, मीरा! रोहन उस घर में सिर्फ एक गैर-कानूनी घुसपैठिया (ट्र trespasser) है। उसके पास इस घर के बाथरूम की टाइल तक का मालिकाना हक नहीं है।”

मीरा ने स्क्रीन पर खुली रजिस्ट्री कॉपी देखी। उसके पिता के हस्ताक्षर और उसकी खुद की पुरानी तस्वीर उस पर चस्पा थी।

नीचे लिविंग रूम से ठहाकों की आवाज़ें आ रही थीं। रोहन और नैना विदेशी शराब की बोतल खोलकर इस बात का जश्न मना रहे थे कि उन्होंने कैसे मीरा और अनाया को उनकी ‘औकात’ दिखा दी थी। रोहन ऊंची आवाज़ में कह रहा था, “देखना नैना, कल सुबह तक ये औरत अपने गहने बेचकर तुम्हारे ढाई लाख रुपये टेबल पर रखेगी। जाएगी कहाँ? अनाथ है, कोई सगा नहीं है उसका इस शहर में।”

मीरा के चेहरे पर पहली बार एक सर्द, जानलेवा मुस्कान उभरी। उसने अनाया के आंसू पोंछे, उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे और उसे एक गिलास दूध पिलाया।

“अनाया, मेरी जान, इधर देखो,” मीरा ने अपनी बेटी की आँखों में देखते हुए कहा। “आज के बाद तुम्हें इस घर में या इस दुनिया में किसी से डरने की जरूरत नहीं है। आज तुम्हारे बड़े पापा और तुम्हारे सारे मामा आ रहे हैं।”

अनाया की बड़ी-बड़ी आँखों में हैरानी थी। उसने कभी अपने मामाओं के बारे में सिर्फ परियों की कहानियों की तरह सुना था।

रात के ठीक 9:30 बजे थे।

बाहर गेट पर एक साथ पांच काली एसयूवी गाड़ियाँ आकर रुकीं। गाड़ियों की हेडलाइट्स की चकाचौंध से विला का पूरा बगीचा दिन की तरह रोशन हो गया। गाड़ियों के दरवाज़े एक साथ खुले। सबसे आगे से आदित्य रायज़ादा उतरे—लंबा कद, ग्रे सूट और चेहरे पर वह रौब जिसे देखकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने कांपते थे। उनके पीछे करण, विवेक, निखिल और समीर उतरे। विवेक के साथ चार निजी सुरक्षा गार्ड थे, जिनके पास आधिकारिक हथियार थे, और उनके ठीक पीछे गुरुग्राम पुलिस की दो पीसीआर वैन सायरन बजाते हुए गेट के भीतर दाखिल हुईं।

दरवाज़े की घंटी नहीं बजी, बल्कि विला का भारी सागौन की लकड़ी का मुख्य दरवाज़ा एक झटके में खुला।

लिविंग रूम के सोफे पर शराब का ग्लास हाथ में लिए बैठे रोहन ने चौंक कर देखा। नैना हड़बड़ा कर खड़ी हो गई।

“हू द हेल आर यू पीपल? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर में इस तरह घुसने की? गार्ड्स! कहाँ मर गए सारे?” रोहन नशे और गुस्से में चिल्लाया।

तभी पुलिस वैन से एसीपी स्तर का एक सीनियर अधिकारी अंदर आया और उसने रोहन को अपनी जगह पर जम जाने का इशारा किया। “अपनी आवाज़ नीची रखिए, मिस्टर रोहन मल्होत्रा।”

आदित्य रायज़ादा आगे बढ़े। उन्होंने अपनी जेब से सोने की घंटी जैसी एक सिगरेट केस निकाली, उसे बंद किया और शांत कदमों से सोफे के सामने आकर खड़े हो गए। उनकी नज़रें सीधे रोहन की आँखों में गड़ी थीं।

“तुम्हारा घर?” आदित्य की आवाज़ इतनी भारी और शांत थी कि कमरे का तापमान अचानक गिर गया। “रोहन मल्होत्रा, जिस जमीन पर तुम खड़े हो, उसकी धूल भी खरीदने की तुम्हारी हैसियत नहीं है।”

रोहन का नशा धीरे-धीरे उतरने लगा था। उसे चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा। नौ साल पहले, दिल्ली के एक पांच सितारा होटल की लॉबी में इसी शख्स ने रोहन के मुंह पर एक करोड़ का चेक फेंककर कहा था कि मेरी बहन की जिंदगी से दूर रहो।

“आ… आदित्य रायज़ादा?” रोहन की जुबान लड़खड़ाई। उसका रंग पीला पड़ने लगा। उसने घबराकर सीढ़ियों की तरफ देखा।

सीढ़ियों से मीरा नीचे उतर रही थी। लेकिन यह वह मीरा नहीं थी जो सुबह सिर झुकाए सब्जियां लेकर आई थी। उसने गहरा नीला सिल्क का कुर्ता पहना था, उसके बाल बंधे हुए थे और उसकी आँखों में वह ज्वाला थी जो किसी भी साम्राज्य को भस्म कर सकती थी। उसके पीछे-पीछे अनाया आ रही थी, जिसका हाथ निखिल और समीर ने थाम रखा था।

“भैया,” मीरा ने सिर्फ एक शब्द कहा।

आदित्य ने अपनी बहन को देखा। नौ साल का फासला, नौ साल का दर्द और पछतावा सिर्फ उस एक नज़र में पिघल गया। आदित्य ने आगे बढ़कर मीरा के सिर पर हाथ रखा और फिर अनाया को अपनी गोद में उठा लिया। जब आदित्य की नज़र अनाया की बांह पर पड़े नीले निशानों पर पड़ी, तो उनकी जबड़े की नसें खिंच गईं।

उन्होंने अनाया को धीरे से विवेक की गोद में दिया और मुड़कर रोहन की तरफ देखा।

“तुमने इस बच्ची पर हाथ उठाया?” आदित्य ने पूछा।

रोहन ने हकलाते हुए नैना की तरफ देखा और बचाव की मुद्रा में हाथ उठाए, “सु… सुनिए मिस्टर रायज़ादा, यह हमारा घरेलू मामला है। मीरा मेरी पत्नी है और अनाया मेरी बेटी। इसने आज नैना की ढाई लाख की ड्रेस कैंची से फाड़ दी। एक बाप होने के नाते मैंने सिर्फ इसे अनुशासन सिखाने के लिए हल्का सा…”

“झूठ!”

करण रायज़ादा ने आगे बढ़कर अपना आईपैड निकाला और उसका स्क्रीन सीधे रोहन और एसीपी के सामने कर दिया। कमरे के बड़े टीवी स्क्रीन पर वायरलेस तरीके से वही वीडियो चलने लगा।

वीडियो में नैना को साफ तौर पर खुद ड्रेस काटते, अनाया को धमकाते और फिर झूठा ड्रामा रचते हुए देखा जा सकता था।

वीडियो खत्म होते ही नैना के हाथ से शराब का ग्लास छूटकर फर्श पर गिरा और चकनाचूर हो गया। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। वह थर-थर कांपते हुए पीछे हटने लगी, “रो… रोहन, ये… ये सच नहीं है… ये वीडियो एडिटेड है…”

करण ने एक सर्द हंसी हंसते हुए पुलिस कमिश्नर द्वारा हस्ताक्षरित वारंट निकाला। “मिस्टर रोहन मल्होत्रा और मिस नैना वर्मा। आपके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 75 (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट – बच्चे पर क्रूरता), धारा 323, 506 (धमकाना और प्रताड़ना), और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है। और मिस वर्मा, आपने जो ढाई लाख का झूठा फ्रॉड क्लेम किया है, उसके लिए एक्सटॉर्शन और बच्चे को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का अलग से मुकदमा दर्ज हो चुका है।”

नैना रोते हुए पुलिस ऑफिसर के पैरों में गिरने लगी, “सर, मैंने कुछ नहीं किया! मुझे रोहन ने कहा था कि मीरा को इस घर से निकालने का कोई बहाना चाहिए ताकि यह प्रॉपर्टी पूरी तरह रोहन के नाम हो सके! यह सब रोहन का प्लान था!”

रोहन का दिमाग सुन्न हो गया। उसने अपनी आखिरी चाल चलने की कोशिश की। उसने चिल्लाकर कहा, “मीरा! तुम अपने भाइयों को लेकर मेरे घर पर गुंडागर्दी नहीं कर सकतीं! यह घर मेरा है! मैंने खरीदा है इसे! पुलिस ऑफिसर, इन लोगों को बाहर निकालिए, ये ट्रेसपासिंग कर रहे हैं!”

करण ने एक मोटी कानूनी फाइल रोहन के चेहरे पर दे मारी। पन्ने बिखर गए।

“पढ़ इसे, अनपढ़ मक्कार!” करण की आवाज़ शेर की तरह गूंजी। “यह विला ‘आर-होल्डिंग्स’ की संपत्ति है, जिसकी 100% शेयरहोल्डर मीरा रायज़ादा है। तुमने पिछले छह साल से जो फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी बनाकर इस घर पर कब्जा कर रखा था, उसे आज शाम चार बजे हाईकोर्ट की स्पेशल बेंच ने नल एंड वॉयड (अमान्य) घोषित कर दिया है। तुम्हारे खिलाफ बैंक फ्रॉड, जालसाजी और फोर्जरी की एफआईआर अलग से दर्ज हो चुकी है।”

रोहन के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसने अविश्वास से मीरा की ओर देखा, “मीरा… मीरा, तुम ऐसा नहीं कर सकतीं… मैं तुम्हारा पति हूँ। हमने नौ साल साथ बिताए हैं… तुम अपनी ही बेटी के बाप को जेल भेजोगी?”

मीरा एक कदम आगे बढ़ी। उसकी आँखों में नफरत की जगह केवल घिन थी। उसने रोहन के हाथ में लटकती वही बेल्ट छीन ली, जिसे उसने अनाया पर चलाया था। मीरा ने उस बेल्ट को रोहन के पैरों के पास फर्श पर फेंक दिया।

“जब तुमने आज दोपहर उस आठ साल की बच्ची पर यह बेल्ट उठाई थी, तब तुमने बाप होने का हक हमेशा के लिए खो दिया था, रोहन,” मीरा ने सपाट और ठंडे लहजे में कहा। “तुमने नौ साल तक मुझे यह कहकर डराया कि तुम्हारे बिना मेरी कोई पहचान नहीं है, मेरे सिर पर कोई छत नहीं है। तुमने सोचा था कि मेरे पीछे कोई नहीं है? आज देख लो। यह घर मेरा था, मेरा है और मेरी बेटी का रहेगा। तुम इस घर में सिर्फ एक नौकर की हैसियत से भी रहने लायक नहीं हो।”

एसीपी ने अपने कांस्टेबल को इशारा किया। दो हट्टे-कट्टे पुलिसकर्मियों ने आगे बढ़कर रोहन के दोनों हाथ पीछे किए और उसकी कलाइयों में लोहे की ठंडी हथकड़ी पहना दी। ठीक उसी तरह नैना को महिला पुलिसकर्मियों ने पकड़ लिया।

रोहन गिड़गिड़ाने लगा, उसकी आँखों से आंसू बहने लगे, “मीरा! मुझे माफ कर दो! भैया जी, प्लीज़ मुझे बचा लीजिए! मेरी कंपनी डूब जाएगी, मेरी बदनामी हो जाएगी! मीरा, अनाया की खातिर…”

आदित्य रायज़ादा ने आगे आकर रोहन के कंधे पर हाथ रखा और बेहद धीमी आवाज़ में कहा, “तुम्हारी कंपनी? जिस फिनटेक फर्म में तुम डायरेक्टर बने फिरते हो, उसमें 60% एंजेल फंडिंग ‘रायज़ादा कैपिटल्स’ की लगी हुई है। कल सुबह नौ बजे तक तुम्हारी कंपनी दिवालिया घोषित हो जाएगी और तुम्हारा बैंक खाता सील। तुमने मेरी बहन को बेसहारा समझा था ना? अब तुम देखोगे कि जब रायज़ादा परिवार किसी का हिसाब चुकता करता है, तो उसे सड़क पर भी भीख मांगने की जगह नहीं मिलती।”

पुलिस रोहन और नैना को घसीटते हुए बाहर ले गई। बाहर कॉलोनी के तमाम पड़ोसी अपने-अपने घरों की बालकनियों से यह तमाशा देख रहे थे। वही रोहन जो कल तक इस विला के बाहर अपनी महँगी गाड़ियों का रौब दिखाता था, आज सिर झुकाए पुलिस की जीप में कैदियों की तरह धकेला जा रहा था।

विला के भीतर अब केवल परिवार बचा था।

समीर और निखिल ने मिलकर घर के सारे ताले बदलवा दिए। विवेक ने अपने कमांडो गार्ड्स को विला की सुरक्षा में तैनात कर दिया। लिविंग रूम में बिखरे सामान और टूटे हुए कांच को साफ कर दिया गया।

आदित्य सोफे पर बैठे थे और अनाया उनकी गोद में बैठी उनकी कलाई घड़ी के साथ खेल रही थी। बच्ची के चेहरे पर अब डर का कोई निशान नहीं था। उसे समझ आ गया था कि उसके चारों तरफ जो पांच पहाड़ जैसे लोग खड़े हैं, वे किसी भी तूफान को उसके पास आने से पहले ही रोक लेंगे।

मीरा खिड़की के पास खड़ी बाहर अंधेरे आकाश को देख रही थी। नौ साल का एक लंबा, घुटन भरा दुःस्वप्न आज आखिरकार खत्म हो गया था। उसे ऐसा लग रहा था मानो उसने आज नौ साल बाद पहली बार खुलकर सांस ली हो।

पीछे से आकर आदित्य ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा। मीरा मुड़ी और अपने बड़े भाई के सीने से लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी। यह आंसुओं की कमजोरी नहीं थी, यह उस बोझ का उतरना था जिसे वह इतने सालों से अकेले ढो रही थी।

“बस, मीरा… बस,” आदित्य ने प्यार से उसके सिर को सहलाते हुए कहा। “गुड़िया, घर वापस आने में तुमने नौ साल लगा दिए। लेकिन देर आए, दुरुस्त आए। अब तुम कभी अकेली नहीं होगी। यह घर, यह शहर और तुम्हारे यह पाँचों भाई हमेशा तुम्हारे साथ हैं।”

मीरा ने अपने आंसू पोंछे और मुड़कर अपनी बेटी को देखा, जो अपने मामाओं के साथ खिलखिलाकर हंस रही थी। विला की नेमप्लेट से ‘रोहन मल्होत्रा’ का नाम हमेशा के लिए हटाया जा चुका था, और उस घर के दरवाजे पर अब गर्व से लिखा जाने वाला था—’अनाया और मीरा रायज़ादा’।

-

You Might Also Enjoy