अहंकार का पतन: तीन साल का मौन, एक हस्ताक्षर और तबाह हुआ मल्होत्रा साम्राज्य
अध्याय 1: संगमरमर की मेज़ और तीन साल का तिरस्कार
—दस्तखत करो, नंदिनी, और हमारे घर से अलग हो जाओ—सावित्री मल्होत्रा ने तलाक के कागज़ संगमरमर की मेज़ पर इस तरह रखे, जैसे कोई औपचारिक समझौता अंतिम चरण में हो। उनकी आवाज में एक ऐसा ठंडा अहंकार था जो पिछले तीन सालों से इस घर की दीवारों में गूंज रहा था।
नंदिनी चुप रही। उसने अपने चेहरे पर कोई शिकन नहीं आने दी। उसने धीरे से अपनी नजरें उठाईं और उस मेज़ पर पड़े दस्तावेजों को देखा जो उसके तीन साल के वैवाहिक जीवन का अंत करने के लिए तैयार किए गए थे। उसकी उंगलियां शांत थीं, दिल की धड़कन पूरी तरह नियंत्रित थी। उसके इस शांत व्यवहार ने सामने बैठी उसकी सास सावित्री मल्होत्रा को और अधिक चिढ़ा दिया।

दिल्ली के छतरपुर वाले उस भव्य और आलीशान फार्महाउस में पिछले तीन साल से नंदिनी की सादगी को कभी स्वीकार नहीं किया गया था। वह दरियागंज की एक पुरानी, ऐतिहासिक सार्वजनिक लाइब्रेरी में एक साधारण लाइब्रेरियन के रूप में काम करती थी। उसे किताबों के बीच शांत जीवन बिताना पसंद था। वह सूती कुर्ते पहनती थी, दिल्ली मेट्रो की भीड़-भाड़ में यात्रा करती थी और अपने हर छोटे-बड़े खर्च को एक छोटी सी पुरानी डायरी में हाथ से लिखती थी। मल्होत्रा परिवार, जो अपनी अकूत दौलत और दिखावे के लिए जाना जाता था, उसने नंदिनी की इन सादगी भरी आदतों को उसकी आर्थिक कमजोरी और एक “गरीब पृष्ठभूमि” का अचूक प्रमाण मान लिया था। वे हर दिन, हर पारिवारिक समारोह में उसका परोक्ष रूप से मज़ाक उड़ाते थे।
मेज़ के दूसरी तरफ उसका पति आरव मल्होत्रा बैठा था। वह ‘मल्होत्रा इंफ्राटेक’ का प्रबंध निदेशक था, जो शहर की एक बड़ी निर्माण कंपनी थी। आरव ने नंदिनी की तरफ देखा तक नहीं, उसकी नजरें लगातार अपने महंगे स्मार्टफोन की स्क्रीन पर टिकी हुई थीं, मानो अपनी पत्नी के जीवन का इतना बड़ा फैसला उसके लिए किसी मामूली बिजनेस ईमेल को पढ़ने जैसा हो।
—बात को भावुक मत बनाओ—आरव ने बिना कोई भावना दिखाए कहा—तुम्हें इस समझौते के तहत ₹2 करोड़ मिल रहे हैं। एक स्वतंत्र कामकाजी महिला के लिए यह राशि इतनी पर्याप्त है कि तुम्हें अपनी पूरी जिंदगी दोबारा कोई नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारे परिवार ने हमेशा बड़े दिल से काम लिया है, इसलिए हम तुम्हें खाली हाथ नहीं भेज रहे हैं।
कमरे के दूसरे कोने में रिया कपूर बैठी थी। उसने एक बेहद महंगी सफेद जॉर्जेट की साड़ी पहनी हुई थी और उसके कानों में हीरों के बड़े-बड़े झुमके चमक रहे थे। वह अपनी उंगलियों से वाइन के गिलास को घुमा रही थी। पिछले कई महीनों से, रिया को हर बड़े व्यावसायिक और पारिवारिक समारोह में आरव के साथ देखा जाता था। मल्होत्रा परिवार के लोग समाज के सामने उसे आरव की “पुरानी और गहरी दोस्त” कहते थे, पर नंदिनी की तीखी नजरें जानती थीं कि इस कानूनी समझौते के पूरा होते ही इस घर में उसकी जगह कौन लेने वाला है।
रिया ने नंदिनी की तरफ देखा और एक कुटिल मुस्कान बिखेरी। उसने सावित्री की तरफ धीरे से फुसफुसाते हुए कहा—देखो आरव, यह रो भी नहीं रही है। कितनी अजीब और ठंडी महिला है। इतने बड़े घर और परिवार से अलग होने का इसे कोई दुख ही नहीं है।
सावित्री मल्होत्रा ने एक तीखी हंसी हंसते हुए कहा—रिया बेटी, जिन लोगों का स्वभाव बचपन से ही बहुत साधारण और गंभीर होता है, वे इस तरह की चुप्पी को ही अपना स्वाभिमान समझ बैठते हैं। उन्हें लगता है कि चुप रहकर वे अपनी कमजोरी को छिपा सकती हैं।
नंदिनी ने उन कागज़ों के पन्नों को पलटना शुरू किया। उन दस्तावेजों की भाषा बेहद चतुर और शातिर वकीलों द्वारा तैयार की गई थी। उसमें स्पष्ट रूप से लिखा था कि नंदिनी इस छतरपुर वाले फार्महाउस, गुरुग्राम के आलीशान पेंटहाउस, मल्होत्रा इंफ्राटेक के किसी भी शेयर, जयपुर की पैतृक हवेली और किसी भी वैवाहिक संपत्ति पर कभी कोई कानूनी दावा नहीं करेगी। पूरी भाषा ऐसी बनाई गई थी मानो मल्होत्रा साम्राज्य की एक-एक ईंट आरव ने अकेले अपनी मेहनत से खड़ी की हो और नंदिनी केवल एक परजीवी की तरह उस संपत्ति का आनंद ले रही थी।
अध्याय 2: अदृश्य ढाल और खोखला गौरव
नंदिनी ने अपनी कलम उठाई, लेकिन दस्तखत करने से पहले उसने रुककर आरव की आंखों में सीधे देखा। उसकी आंखों में एक ऐसा गहरा ठहराव था जो आरव को अंदर तक बेचैन कर गया।
—मैं हस्ताक्षर करने से पहले एक बात पूरी तरह साफ कर लूँ?—नंदिनी ने पूछा—मेरे इस हस्ताक्षर के बाद, आरव इस साम्राज्य की हर संपत्ति को अपने पास सुरक्षित रखेगा और मेरा इस कंपनी या तुम्हारी जीवनशैली से कोई संबंध नहीं रहेगा? तुम यही चाहते हो ना?
—हाँ—आरव ने पिछले एक घंटे में पहली बार अपने फोन से नजरें हटाकर नंदिनी को सीधे देखा—आखिर तुम्हें यह वास्तविक स्थिति समझ आई। मुझे खुशी है कि तुमने बिना किसी कानूनी ड्रामे के अपनी सही जगह स्वीकार कर ली।
—और तुम्हें पूरा यकीन है आरव कि यह सब कुछ जो तुम देख रहे हो, यह पूरी तरह से सिर्फ तुम्हारा है?—नंदिनी की आवाज में एक रहस्यमयी धीमापन था।

आरव इस सवाल पर बुरी तरह चिढ़ गया। उसने मेज़ पर अपना हाथ मारते हुए कहा—बकवास बंद करो! यह सब मैंने अपनी व्यावसायिक बुद्धिमत्ता से कमाया है। तुमने पिछले तीन सालों में सिर्फ मेरी पत्नी बनकर इस उच्च स्तरीय जीवनशैली और सुविधाओं का आनंद लिया है। तुमने मेरी कंपनी में एक पैसे का भी योगदान नहीं दिया है।
नंदिनी के होंठों पर एक बहुत हल्की, दुखद मुस्कान आई। उसने आरव के इस खोखले अहंकार का कोई विरोध नहीं किया। वह चुपचाप अतीत की यादों में चली गई। दो साल पहले, जब मल्होत्रा इंफ्राटेक एक बहुत बड़े वित्तीय संकट (financial crunch) से गुजर रही थी और बैंकों ने उनकी संपत्तियों को कुर्क करने का नोटिस दे दिया था, तब नंदिनी ने ही बिना अपना नाम उजागर किए, एक अंतरराष्ट्रीय निवेश फंड (international investment fund) के माध्यम से आरव की कंपनी को रातों-रात करोड़ों रुपये की वित्तीय राहत दिलवाई थी।
इतना ही नहीं, पिछले साल जब सावित्री मल्होत्रा की रीढ़ की हड्डी की एक बेहद जटिल सर्जरी होनी थी और देश के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे, तब नंदिनी ने अपने व्यक्तिगत प्रभाव का इस्तेमाल करके लंदन से दुनिया के सबसे शीर्ष न्यूरोसर्जन को विशेष चार्टर विमान से दिल्ली बुलवाया था। उस समय भी आरव ने बड़ी चालाकी से उस डॉक्टर के आने का पूरा श्रेय खुद ले लिया था और समाज में अपनी झूठी वाहवाही लूटी थी। बदले में नंदिनी को हर दिन इस घर में सिर्फ एक ही ताना सुनने को मिलता था कि मल्होत्रा परिवार ने उसे एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि से उठाकर इस राजसी महल में जगह दी है।
मल्होत्रा परिवार के पुराने और बेहद शातिर वकील मनीष सेठी ने, जो इस पूरी कार्यवाही को देख रहे थे, फाइल को नंदिनी की तरफ और आगे खिसकाया।
—मैडम, कृपया यहाँ हस्ताक्षर कीजिए। समय बहुत कीमती है—मनीष सेठी ने औपचारिक आवाज में कहा।
नंदिनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के कलम पकड़ी और कागज़ के निचले हिस्से पर बेहद साफ, सुंदर और बड़े अक्षरों में अपने हस्ताक्षर कर दिए। उसने लिखा—“नंदिनी देवव्रत”।
जैसे ही कलम की नोक कागज़ से हटी, वकील मनीष सेठी ने फाइल को अपनी तरफ खींचा ताकि वे हस्ताक्षर की पुष्टि कर सकें। लेकिन जैसे ही उनकी नजरें उस नाम पर पड़ीं, मनीष सेठी के हाथ वहीं जम गए। उनकी आँखें पूरी तरह फैल गईं और उनके चेहरे का रंग पल भर में उड़ गया।
—देवव्रत? कौन-सा देवव्रत?—मनीष सेठी की आवाज में एक अजीब सी घबराहट थी, जो उनके जैसे अनुभवी कॉर्पोरेट वकील के लिए अस्वाभाविक थी।
आरव इस बात पर झुँझला गया। उसने वकील की तरफ देखते हुए कहा—मनीष, तुम इतने बड़े वकील होकर एक उपनाम को लेकर क्यों चौंक रहे हो? उसकी माँ का कोई पुराना उपनाम होगा, या उसके नाना का नाम होगा। कागज़ जमा कीजिए और इस मामले को यहीं रफा-दफा कीजिए। हमारे पास कोर्ट में जमा करने के लिए और भी बहुत काम हैं।
लेकिन मनीष सेठी अपनी जगह पर अचानक सीधे खड़े हो गए। उनके माथे पर पसीने की बूंदें साफ दिखाई दे रही थीं। उन्होंने कांपती आवाज में नंदिनी की तरफ देखा और पूछा—मैडम… क्या आप… क्या आप स्वर्गीय सर विक्रम देवव्रत की इकलौती पोती हैं?
अध्याय 3: देवव्रत साम्राज्य का उदय और सन्नाटा
जैसे ही “विक्रम देवव्रत” का नाम उस बंद कमरे में गूंजा, पूरे हॉल की हवा जैसे एक पल में थम गई। आरव और सावित्री मल्होत्रा एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
विक्रम देवव्रत का नाम भारत के व्यापारिक इतिहास में एक किंवदंती की तरह था। देश के बड़े-बड़े बंदरगाह (ports), अक्षय ऊर्जा (renewable energy) के विशाल प्लांट, देश के शीर्ष निजी बैंक और अत्याधुनिक तकनीक के बड़े बोर्डरूमों में उनका नाम बेहद सम्मान और डर के साथ लिया जाता था। ‘देवव्रत होल्डिंग्स’ एक ऐसा अदृश्य कॉर्पोरेट दैत्य था जो देश की अर्थव्यवस्था के कई बड़े हिस्सों को नियंत्रित करता था। विक्रम देवव्रत की केवल एक ही वारिस थी—उनकी इकलौती पोती, जो अपने दादा की वसीयत के अनुसार पिछले कई वर्षों से पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन और मीडिया की चकाचौंध से दूर थी। बहुत कम लोगों ने उसका चेहरा देखा था, और किसी को नहीं पता था कि वह दिल्ली की एक शांत लाइब्रेरी में ज्ञान के बीच अपना समय बिता रही है।
सावित्री मल्होत्रा ने इस पूरी स्थिति को एक नाटक समझते हुए बेहद तिरस्कार से कहा—मनीष, यह क्या बकवास है? तुम इस साधारण लड़की को देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने से जोड़ रहे हो? यह नाटक बंद करो और कागज़ात को फाइल में रखो।
नंदिनी ने कुछ नहीं कहा, उसने केवल अपनी कलाई पर बंधी एक साधारण घड़ी की तरफ देखा। सुबह के ठीक 11 बज कर 30 मिनट हो चुके थे।
तभी, फार्महाउस के बाहर भारी और शक्तिशाली गाड़ियों के एक साथ रुकने की तेज आवाज आई। मुख्य लोहे का फाटक भारी आवाज के साथ खुला। खिड़की से बाहर देखने पर आरव के होश उड़ गए। काले रंग की छह अत्याधुनिक बुलेटप्रूफ एसयूवी (SUVs) की एक कतार लॉन में आकर रुकी थी। गाड़ियों के रुकते ही, काले सूट पहने कम से कम एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ अधिकारी और सुरक्षा गार्ड सीलबंद फाइलों और डिजिटल टैबलेट के साथ नीचे उतरे। पूरे घर में कोई शोर नहीं था, लेकिन उन अधिकारियों के चलने के अंदाज और उनके रसूख से ऐसा लग रहा था कि पूरा फार्महाउस अब उनके पूर्ण नियंत्रण में आ चुका था।
आरव घबराकर अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसने नंदिनी की तरफ देखा, उसकी आवाज में पहली बार एक अज्ञात डर साफ महसूस हो रहा था—नंदिनी, तुमने यह क्या किया है? यह कौन लोग हैं जो हमारे निजी फार्महाउस में इस तरह बिना अनुमति के घुस आए हैं?
तभी अध्ययन कक्ष (study room) का बड़ा मुख्य दरवाज़ा खुला। सफेद बालों वाले एक बेहद प्रभावशाली और सम्मानित बुजुर्ग व्यक्ति अंदर आए। वे कोई और नहीं, बल्कि अशोक मेहता थे—’देवव्रत ग्लोबल ट्रस्ट’ के मुख्य न्यासी (Chief Trustee) और देश के सबसे प्रभावशाली वित्तीय और रणनीतिक सलाहकार, जिनके एक बयान से शेयर बाजार में भूचाल आ जाता था।
अशोक मेहता ने कमरे में मौजूद किसी भी व्यक्ति की तरफ ध्यान नहीं दिया। वे सीधे नंदिनी के पास पहुँचे, अपने दोनों हाथों को जोड़ा और बेहद सम्मान से अपना सिर झुकाया।
—शुभ संध्या, चेयरपर्सन नंदिनी देवव्रत। मुझे आपको यह सूचित करते हुए अत्यंत गर्व हो रहा है कि देवव्रत होल्डिंग्स का पूर्ण हस्तांतरण (legal transition of power) आज सुबह ठीक 11 बजे पूरी तरह से संपन्न हो चुका है। आपके सभी बैंकिंग वीआईपी अधिकार अब सक्रिय कर दिए गए हैं। ग्लोबल बोर्ड ने सर्वसम्मति से आपके नाम को चेयरपर्सन के रूप में मंजूरी दे दी है, और हमारे समूह की सभी नियंत्रक हिस्सेदारियाँ (controlling stakes) अब सीधे आपके डिजिटल हस्ताक्षर के अधीन हैं।
यह सुनते ही रिया कपूर के हाथ से वाइन का कीमती कांच का गिलास छूटकर फर्श पर गिर गया और चकनाचूर हो गया। उसका पूरा चेहरा पीला पड़ गया।
आरव ने एक झूठी और घबराई हुई हँसी हँसने की कोशिश की। उसने अशोक मेहता की तरफ देखते हुए कहा—मेहता साहब, आप देश के इतने बड़े फाइनेंसर हैं, आप किस चेयरपर्सन की बात कर रहे हैं? यह नंदिनी है, मेरी पत्नी… मेरा मतलब है, मेरी पूर्व पत्नी। यह एक साधारण लाइब्रेरी में काम करती है। यह किस चीज़ की चेयरपर्सन हो सकती है?
अध्याय 4: कर्ज़ का जाल और मुखौटों का उतरना
अशोक मेहता ने आरव की तरफ एक बेहद ठंडी और हिकारत भरी नजर डाली। उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी हुई डिजिटल फाइल को ऑन किया और अत्यंत आधिकारिक आवाज में कहा—
—मिस्टर आरव मल्होत्रा, मैडम नंदिनी अब ‘देवव्रत होल्डिंग्स’ की एकमात्र सर्वेसर्वा हैं। और शायद आपके सीमित व्यावसायिक ज्ञान में यह बात नहीं है कि ‘मल्होत्रा इंफ्राटेक’ का इस समय देश में सबसे बड़ा ऋणदाता (biggest lender and creditor) कोई बैंक नहीं, बल्कि यही देवव्रत समूह है। दो साल पहले जब आपकी कंपनी दिवालिया होने की कगार पर थी, तब मैडम के गुप्त आदेश पर ही हमारे एक वेंचर कैपिटल फंड ने आपको डूबने से बचाया था।
अशोक मेहता ने रुककर सावित्री मल्होत्रा की तरफ देखा और आगे कहा—इस समय जिस छतरपुर फार्महाउस में आप बैठे हैं, उसकी मूल गिरवी (mortgage deed), आपकी कंपनी की महत्वाकांक्षी गुरुग्राम एक्सप्रेसवे परियोजना का पूरा कॉर्पोरेट ऋण, आपका निजी व्यावसायिक विमान जिसका पट्टा (aircraft lease) अगले महीने समाप्त हो रहा है, और आपकी तकनीकी इकाई के सभी मुख्य लाइसेंस… ये सब के सब कानूनी रूप से हमारी संस्थाओं के पूर्ण वित्तीय नियंत्रण में हैं। हम जब चाहें, एक बटन दबाकर आपके पूरे साम्राज्य को एक कानूनी नोटिस के जरिए कुर्क कर सकते हैं।
सावित्री मल्होत्रा का अहंकार पल भर में हवा हो गया। उनके पैर कांपने लगे और वे वापस अपनी सोफे पर गिर पड़ीं। लेकिन उन्होंने अपने ढहते हुए गौरव को समेटने की आखिरी कोशिश करते हुए कहा—लेकिन… लेकिन इसने अभी-अभी तलाक के कागजात पर हस्ताक्षर किए हैं! मनीष, तुम बताओ, इसने खुद लिखा है कि यह हमारी किसी भी संपत्ति पर दावा नहीं करेगी। अब इसका हमसे और हमारी कंपनी से कोई कानूनी संबंध नहीं है!
नंदिनी ने मेज़ के पास आकर अपनी फाइल उठाई। उसकी आवाज में एक ऐसा शांत और घातक प्रभाव था जिसने सावित्री को अंदर तक हिला दिया।
—सावित्री जी, आपने बिल्कुल सही कहा। पारिवारिक और वैवाहिक संबंध अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है। मैं आपके घर की बहू अब नहीं हूँ। लेकिन हमारे बीच का व्यावसायिक और वित्तीय लेन-देन का संबंध (corporate debt relationship) अभी पूरी तरह बाकी है। और एक लेनदार के रूप में, मैं अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना बहुत अच्छी तरह जानती हूँ।
ठीक उसी पल, आरव मल्होत्रा का फोन लगातार और बेहद आक्रामक तरीके से बजने लगा। आरव ने कांपते हाथों से फोन उठाया। स्क्रीन पर उसकी कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO), उसके मुख्य निवेशकों और उसके कंसोर्टियम बैंक के चेयरमैन के नाम फ्लैश हो रहे थे।
उसने जैसे ही पहला फोन उठाया, दूसरी तरफ से सीएफओ की बदहवास आवाज आई—”सर! सर, सब कुछ बर्बाद हो गया! देवव्रत होल्डिंग्स ने हमारे सभी शॉर्ट-टर्म लोन को तत्काल वापस लेने का नोटिस जारी कर दिया है! हमारे बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया है और शेयर बाजार में हमारे शेयर 40% तक गिर चुके हैं! निवेशक अपनी हिस्सेदारी वापस मांग रहे हैं! अगर अगले 48 घंटों में हमने ऋण का भुगतान नहीं किया, तो हमारी कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाएगा!”
आरव के हाथ से फोन छूटकर मेज़ पर गिर गया। उसकी पूरी दुनिया उसकी आंखों के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह रही थी। उसने नंदिनी की तरफ देखा, उसकी आंखों में अब केवल भीख मांगने वाले भाव थे।
—नंदिनी… तुमने तीन साल तक यह सब मुझसे क्यों छिपाया? तुमने मुझे क्यों नहीं बताया कि तुम इतनी बड़ी हस्ती हो? अगर मैं जानता… अगर मुझे एक बार भी अंदाजा होता, तो मैं कभी तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता! तुमने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?—वह चिल्लाया, उसकी आवाज में रोना मिला हुआ था।
अध्याय 5: अंतिम विदाई और नौ दिनों का अल्टीमेटम
नंदिनी ने अपने कंधे पर अपना साधारण सा सूती झोला (bag) लटकाया। उसने आरव की तरफ देखा, उसकी आंखों में न तो कोई गुस्सा था और न ही बदला लेने की खुशी। वहां केवल एक जज की बेटी का न्यायपूर्ण न्याय था।
—आरव, मैंने यह सब इसलिए छिपाया क्योंकि मैं देखना चाहती थी कि जब एक इंसान के पास से उसका नाम, उसका पैसा और उसका रसूख हटा दिया जाए, तो तुम एक साधारण इंसान को कितना सम्मान दे सकते हो। मैं तुम्हारी पत्नी बनकर तुम्हारी आत्मा को परखना चाहती थी। और पिछले तीन सालों में, हर एक दिन, तुम्हारी मां के हर एक ताने ने, और तुम्हारे हर एक झूठ ने मुझे तुम्हारा असली जवाब दे दिया। तुम लोग केवल पैसे और ताकत की भाषा समझते हो, इंसानियत की नहीं।
नंदिनी मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ी, जहाँ उसके सुरक्षा अधिकारी उसके लिए रास्ता बना रहे थे। दरवाजे पर पहुंचकर वह एक पल के लिए रुकी और उसने मुड़कर आरव और सावित्री की तरफ देखा, जो अब केवल दो असहाय मूर्तियां बनकर रह गए थे। रिया कपूर कमरे के एक कोने में खुद को छिपाने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि वह जानती थी कि आरव के बर्बाद होते ही उसका अपना भविष्य भी अंधकार में डूब चुका था।
—मैंने यह तलाक का समझौता इसलिए स्वीकार नहीं किया कि मैं सब कुछ हार गई हूँ, आरव—नंदिनी ने बेहद स्पष्ट आवाज में कहा—मैंने यह हस्ताक्षर इसलिए किए हैं क्योंकि आज से मैंने तुम्हें, तुम्हारी मां को और तुम्हारी इस खोखली कंपनी को वित्तीय रूप से बचाना पूरी तरह बंद कर दिया है। अब तक तुम मेरी अदृश्य ढाल के पीछे सुरक्षित थे, अब बिना ढाल के इस कॉर्पोरेट युद्ध का सामना करो।
अशोक मेहता ने नंदिनी के लिए गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए धीमे और पेशेवर स्वर में कहा—मैडम, आपके आदेशानुसार मल्होत्रा इंफ्राटेक की वित्तीय समीक्षा पूरी कर ली गई है। आज से ठीक नौ दिन बाद हमारी संस्था की एक आपातकालीन बोर्ड बैठक (emergency board meeting) बुलाई गई है, जहां हम इनकी संपत्तियों के अधिग्रहण (takeover) की अंतिम कानूनी प्रक्रिया शुरू करेंगे।
आरव ने वहीं फर्श पर बैठते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं। उसने पहली बार यह समझा कि आज जो अपमान उसने नंदिनी को देने की कोशिश की थी, वह नंदिनी का अंत नहीं था, बल्कि उसके अपने मल्होत्रा साम्राज्य के अंत की शुरुआत थी। और अगले नौ दिनों में देवव्रत होल्डिंग्स के जो कानूनी और वित्तीय खुलासे कोर्ट के सामने होने वाले थे, उस पर विश्वास करना कॉर्पोरेट जगत के किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होने वाला था। Nandini जा चुकी थी, अपने पीछे अहंकार के एक जलते हुए मलबे को छोड़कर।
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