मोबाइल फोन का कैमरा बाईं तरफ ही क्यों होता है? जानिए इसके पीछे का असली कारण
स्मार्टफोन के कैमरे को बाईं तरफ रखने के पीछे का मुख्य वैज्ञानिक कारण। भूमिका: तकनीक और हमारे दैनिक जीवन की…
“तुम्हारे पापा को इस दुनिया से विदा हुए पूरे दो साल का लंबा वक्त बीत चुका है अमन, फिर आज खाने की मेज़ पर उनके नाम की यह थाली लगाने का क्या मतलब है? और यह जगह किसके लिए खाली छोड़ी गई है?”
जब मेरी आवाज़ अचानक उस शांत कमरे में गूंजी, तो मेरे बेटे अमन के हाथ से पानी का कांच का ग्लास लगभग छूटकर फर्श पर गिरने ही वाला था। उसकी उँगलियाँ कांप रही थीं और चेहरे पर एक अजीब सा डर था। उसकी पत्नी नेहा, जो अब तक मेज़ पर बर्तन सजा रही थी, ने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं और वह रसोई की तरफ कदम बढ़ाने लगी, जैसे वह मेरी आँखों में झांकने की हिम्मत न जुटा पा रही हो। डाइनिंग टेबल पर कुल चार प्लेटें सजी हुई थीं। तीन प्लेटें तो हम तीनों—मेरे, अमन और नेहा के लिए थीं, लेकिन सबसे सिरहाने वाली जगह पर वही पुरानी, नक्काशीदार लकड़ी की कुर्सी रखी थी जिस पर मेरे स्वर्गीय पति, महेश मेहता, अपने जीवन के हर पारिवारिक भोजन के दौरान बैठा करते थे। वह कुर्सी केवल एक फर्नीचर नहीं थी, वह इस घर के मुखिया का सिंहासन थी।

मैं उस फ्लैट के मुख्य दरवाज़े पर खड़ी रह गई। मेरे दोनों हाथों में स्टील का एक बड़ा डिब्बा था जिसमें मैं नासिक से विशेष रूप से अमन के लिए गरम-गरम सूजी का हलवा बनाकर लाई थी। रसोई से राजमा और जीरा चावल की वही जानी-पहचानी खुशबू आ रही थी जो महेश को बेहद प्रिय थी, पर उस खाली कुर्सी और सजी हुई थाली को देखकर ऐसा लगा जैसे उस पूरे कमरे की सारी ऑक्सीजन अचानक से सोख ली गई हो। मेरा दम घुटने लगा था। महेश को इस दुनिया से गए पूरे २४ महीने, यानी दो साल हो चुके थे, लेकिन आज भी उनकी मौजूदगी का यह कृत्रिम अहसास मुझे भीतर तक हिला रहा था।
हमने अपनी ज़िंदगी के ३८ साल एक साथ बिताए थे। नासिक के बाहरी इलाके में स्थित हमारा वह छोटा सा खेत, जहाँ हरी-भरी अंगूर की बेलें थीं, दो विशाल पुराने आम के पेड़ थे और एक टीन की छत वाला पुराना, धूल से भरा गोदाम था—वही हमारी पूरी दुनिया थी। नासिक के उस छोटे से गांव में हर किसी की नज़र में महेश एक बेहद साधारण, सीधे-साधे और शांत स्वभाव के किसान थे। उनका जीवन एक बंधी-बंधाई दिनचर्या पर चलता था। वे रोज सुबह ठीक ५ बजे उठते, अपने पुराने ट्रांजिस्टर रेडियो पर सुबह के समाचार सुनते, अपने खेतों का चक्कर लगाते, मज़दूरों से बात करते और घर लौटकर सबसे पहले मेरे हाथ की बनी कड़क अदरक वाली चाय पीते। उनकी मौत भी उतनी ही साधारण मानी गई थी, जैसी एक आम ग्रामीण की होती है। अगस्त की एक बेहद शांत और उमस भरी सुबह, हमारे पुराने वफादार मज़दूर गणपत ने उन्हें खेत के कोने में लगे नीम के पेड़ के नीचे बेसुध गिरा हुआ पाया था। जब तक हम उन्हें अस्पताल ले जाते, उनकी सांसें थम चुकी थीं। सरकारी जिला अस्पताल के डॉक्टर ने एक संक्षिप्त जांच के बाद कहा था कि उन्हें बहुत तेज़ और जानलेवा दिल का दौरा (मैसिव कार्डियक अरेस्ट) पड़ा था। डॉक्टर के वे शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं— “उन्हें दर्द सहने का समय भी नहीं मिला होगा, सुनीता जी। यह एक प्राकृतिक और शांत मृत्यु थी।” मैंने इसी एक वाक्य को अपने दिल से लगाकर पिछले दो साल के अकेलेपन और सन्नाटे को काटा था।
लेकिन आज की यह शाम कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही थी। उस शाम अमन ने मुझे पुणे वाले अपने इस नए और आलीशान फ्लैट पर विशेष रूप से रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उसने फोन पर कहा था कि वह बहुत दिनों बाद मेरे साथ अकेले में कुछ वक्त बिताना चाहता है, मेरी सेहत के बारे में बात करना चाहता है। मगर जब मैं यहाँ पहुँची, तो नज़ारा पूरी तरह से अप्रत्याशित था। यहाँ नेहा भी मौजूद थी, वह चौथी खाली थाली भी सजी थी और सबसे अजीब और चौंकाने वाली बात यह थी कि उस पूरे बंद कमरे में महेश के पसंदीदा विदेशी इत्र (फॉरेन परफ्यूम) की वही तीखी लेकिन सम्मोहक खुशबू फैली हुई थी, जिसे वे केवल और केवल हमारी शादी की सालगिरह के दिन लगाया करते थे। वह कोई आम इत्र नहीं था, उसकी खुशबू बहुत ही विशिष्ट थी जो भारत में आसानी से नहीं मिलती थी।
मैंने हलवे का वह भारी डिब्बा पास की एक मेज़ पर रखा और अपनी आवाज़ को सख्त करते हुए पूछा, “अमन, मैं दोबारा पूछ रही हूँ, यह सब क्या तमाशा है? नेहा, तुम अंदर क्यों छिप रही हो? मुझे साफ-साफ बताओ कि आज के दिन इस तरह का माहौल बनाने का क्या कारण है?”
अमन ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं। उसका चेहरा बिल्कुल वैसा ही सफेद पड़ गया था जैसा बचपन में कोई बहुत बड़ी गलती या कांच का कीमती बर्तन तोड़ने के बाद छिपाते समय होता था। लेकिन इस बार, उसकी आँखों में केवल एक बच्चे की मासूम झिझक नहीं थी, बल्कि एक गहरा, आदिम डर और अपराधबोध का समंदर लहरा रहा था। उसने आगे बढ़कर मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और बेहद धीमी आवाज़ में कहा, “माँ, प्लीज… आप पहले सोफे पर बैठ जाइए। शांत हो जाइए। जो कुछ भी यहाँ हो रहा है, वह किसी तमाशे का हिस्सा नहीं है। यह एक आदेश का पालन है।”
“कैसा आदेश? और किसका आदेश?” मैंने अपने हाथ छुड़ाते हुए ज़िद की, “मैं तब तक एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाऊंगी जब तक तुम मुझे यह नहीं बताते कि तुम्हारे पिता की खाली कुर्सी यहाँ इस तरह क्यों सजाकर रखी गई है?”
रसोई के भीतर से नेहा के सिसकने की आवाज़ अब साफ सुनाई दे रही थी। वह अपने आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। कमरे का वातावरण इतना भारी हो चुका था कि घड़ी की हर टिक-टिक एक हथौड़े की तरह दिल पर लग रही थी। अमन ने एक बहुत लंबी, गहरी और थकाऊ सांस ली। उसने अपनी नज़रें मेज़ पर रखी उस खाली प्लेट पर टिका दीं और कहा, “पापा ने मुझसे एक बहुत बड़ा और अटूट वादा लिया था, माँ। जब वे अपनी मृत्यु से ठीक तीन हफ्ते पहले मुझसे मिलने पुणे आए थे, तो उन्होंने मुझे अपने पास बैठाया और मेरी कसम दी थी। उन्होंने कहा था कि उनकी मृत्यु के ठीक २ साल बाद, जिस तारीख को वे इस दुनिया से जाएं, उस रात हम तीनों एक साथ बैठें, उनके लिए वही खाना बनाएं जो उन्हें पसंद था और उनके सम्मान में उस मुख्य कुर्सी को खाली रखें।”
यह सुनकर मेरे पैरों तले से जैसे ज़मीन खिसक गई। मेरे दिमाग में विचारों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ। ३८ साल तक जिस इंसान के साथ मैंने एक ही छत के नीचे जीवन के हर सुख-दुख साझा किए थे, उसने अपनी मृत्यु से ठीक पहले मेरे अपने बेटे से एक इतनी बड़ी बात छिपाने को कहा? मैंने कांपती और भर्राई हुई आवाज़ में पूछा, “मरने से पहले उन्होंने तुमसे यह सब कहा था अमन? और तुमने… तुमने अपने पिता की इस रहस्यमयी बात को पूरे दो साल तक अपनी इस बूढ़ी माँ से छिपाकर रखा? तुम्हें ज़रा सा भी तरस नहीं आया कि मैं किस दर्द से गुज़र रही हूँ?”

“माँ, मुझे माफ़ कर दीजिए,” अमन की आँखों से भी अब आंसू बहने लगे थे, “उन्होंने मुझे आपकी और इस पूरे परिवार की सुरक्षा की कसम दी थी। उन्होंने साफ कहा था कि अगर यह बात तय समय से एक दिन पहले भी आपको पता चली, तो पूरे परिवार की जान को बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। मैं मजबूर था, माँ।”
तभी नेहा रसोई से बाहर आई। उसके चेहरे पर आंसू के निशान थे, और उसके दोनों हाथों में गहरे भूरे रंग की एक छोटी सी, भारी लकड़ी की पेटी (बॉक्स) थी। उस पेटी के किनारों पर पीतल की पुरानी, जंग लगी पट्टियाँ लगी थीं और उस पर एक प्राचीन शैली का ताला लगा हुआ था। उस पेटी को देखते ही मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और मेरी उँगलियाँ बर्फ की तरह ठंडी पड़ गईं। वह कोई आम पेटी नहीं थी। वह पेटी महेश के स्वर्गीय पिता ने उनके बचपन में अपने हाथों से बनाई थी। पिछले तीन दशकों से, जब से हमारी शादी हुई थी, वह पेटी हमेशा हमारे नासिक वाले पुराने खेत के गोदाम की सबसे धूल भरी और अंधेरी अलमारी के भीतर सुरक्षित रखी रहती थी। महेश हमेशा कहते थे कि इसमें उनके बचपन के कुछ पुराने खिलौने, उनके पिता के कुछ खत और सिक्के रखे हैं, इसलिए मैंने कभी उसे खोलने या उसकी जांच करने की कोशिश नहीं की थी। वह हमारे घर का एक ऐसा कोना था जिसे पवित्र और अछूता माना जाता था।
मैंने लगभग चिल्लाते हुए पूछा, “यह… यह पेटी यहाँ पुणे में कैसे आई? पिछले महीने ही जब मैं नासिक गई थी, तो मैंने खुद उस गोदाम की अलमारी में इस पेटी को अपनी आँखों से देखा था! तुम लोग नासिक गए थे क्या?”
अमन ने अपनी माँ के कांपते कंधों को पकड़ा और उन्हें सोफे पर बैठाते हुए बेहद गंभीर और धीमी आवाज़ में कहा, “नहीं माँ, हम नासिक नहीं गए थे। और जो पेटी आप आज भी नासिक के उस पुराने गोदाम की अलमारी में देख रही हैं, वह महज़ एक धोखा है, वह असली नहीं है। पापा ने बहुत साल पहले अपनी उस पुश्तैनी पेटी की एक हूबहू नकल (रेप्लिका) बनवाई थी और उसे वहाँ रख दिया था, ताकि अगर कभी कोई उस गोदाम की तलाशी ले, तो उसे लगे कि सब कुछ सुरक्षित है। असली पेटी तो पिछले कई सालों से पुणे के एक गुप्त बैंक लॉकर में बंद थी, जिसे पापा ने अपनी मौत से पहले मेरे नाम ट्रांसफर किया था।”
मैं पूरी तरह से स्तब्ध, सन्न और मूक रह गई। मेरा दिमाग इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि एक सीधा-साधा किसान, जो रोज़ सुबह बैलों की जोड़ी लेकर खेत पर जाता था, फसलों के दामों के लिए मंडियों के चक्कर काटता था, वह अपनी निजी ज़िंदगी में इतनी बड़ी, गहरी और जटिल साजिशें रच रहा था। एक मामूली लकड़ी की पेटी को अपनी ही पत्नी की नज़रों से छिपाने के लिए मेरे पति ने इस स्तर की योजना बनाई थी? हमारी ३८ साल की लंबी शादी, जिसे मैं दुनिया का सबसे पवित्र और पारदर्शी रिश्ता मानती थी, क्या वह किसी बहुत बड़े, खौफनाक रहस्य की बुनियाद पर टिकी थी? क्या वह सब एक झूठ था?
अमन ने उस भारी लकड़ी की पेटी को मेज़ के ठीक बीचोबीच, उस खाली थाली के ठीक बगल में रख दिया। चाबी का एक पुराना गुच्छा उसके हाथ में था। लेकिन ताला खोलने से पहले उसने एक बार फिर बड़े आदर, चिंता और ममता से मेरा हाथ थाम लिया। उसकी आँखों में एक अनकही चेतावनी थी। उसने कहा, “माँ, जो सच अब इस पेटी के खुलने के साथ आपके और हमारे सामने आने वाला है, वह बहुत भारी है। उसे सहने के लिए आपको अपने दिल को पत्थर बनाना होगा। पापा केवल वह इंसान नहीं थे जिन्हें आपने देखा था। वे सिर्फ एक किसान नहीं थे।”
नेहा ने कांपते हाथों से ताला खोला और पेटी का भारी ढक्कन ऊपर उठा दिया। जैसे ही पेटी खुली, कमरे में उस विदेशी इत्र की खुशबू और तेज़ हो गई। उसके भीतर का नज़ारा देखकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। अंदर कोई पुराने खिलौने या सिक्के नहीं थे। उस पेटी के भीतर कुछ बहुत पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट और कुछ रंगीन तस्वीरें थीं जिनमें महेश बिल्कुल अलग वेशभूषा में, मिलिट्री जैसी वर्दी में और कुछ विदेशी नागरिकों के साथ खड़े दिखाई दे रहे थे। इसके अलावा, वहाँ अंग्रेज़ी, मराठी और कुछ विदेशी भाषाओं (शायद जर्मन या रशियन) के अखबारों की बहुत पुरानी कतरनें रखी थीं, जिनमें कुछ बड़े हादसों और ऑपरेशन्स की खबरें थीं। पेटी के एक कोने में काले चमड़े की एक मोटी डायरी थी, विदेशी इत्र की दो सीलबंद कांच की शीशियाँ थीं, और सबसे ऊपर एक पीले रंग का पुराना, मोटा लिफाफा रखा था। उस लिफाफे पर महेश के जाने-पहचाने, साफ और सुंदर हस्ताक्षरों में लिखा था— “मेरी प्रिय सुनीता के लिए। मेरी मृत्यु के ठीक २ साल बाद ही इसे खोला जाए।”
अमन ने भारी मन से बताना शुरू किया, “माँ, पापा अपनी अचानक हुई मृत्यु से लगभग तीन हफ्ते पहले बहुत डरे हुए थे। वे चुपचाप मेरे पास पुणे आए थे, उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी जो मैंने बचपन से आज तक कभी नहीं देखी थी। उन्होंने बड़े गोपनीय तरीके से यह असली पेटी मुझे सौंपी और कहा कि यदि उनके साथ अचानक कोई अप्रत्याशित घटना (अनहोनी) हो जाए, तो मैं इस पेटी को दुनिया की हर नज़र से, यहाँ तक कि पुलिस और रिश्तेदारों से भी छिपाकर रखूँ। उन्होंने मुझसे यह भी कहा था कि मैं इस पेटी को इस विशेष तारीख और समय से पहले कभी न खोलूँ।”
मैंने अपनी कांपती आवाज़ को बटोरा और पूछा, “लेकिन क्यों अमन? ऐसा क्या डर था उन्हें? वे तो एक सीधे-साधे इंसान थे, उनका किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी? उन्हें अपनी जान का खतरा क्यों लग रहा था?”
अमन के होंठ बुरी तरह कांप रहे थे, उसने अपनी पत्नी नेहा की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ मुड़कर कहा, “क्योंकि माँ, उन्हें पूरा अंदेशा हो चुका था कि उनकी आने वाली मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं होने वाली है। उन्हें डर था कि पुरानी ज़िंदगी के कुछ काले साए, कुछ दुश्मन उनका पता ढूंढ चुके हैं। उन्हें डर था कि कोई ऐसी गुप्त और शक्तिशाली ताकत है जो उनकी जान के पीछे पड़ी है, और वे लोग इतने शातिर हैं कि उनकी हत्या को भी एक सामान्य, प्राकृतिक बीमारी या दिल के दौरे का रूप दे सकते हैं ताकि कोई शक न करे।”
यह सुनते ही मेरे भीतर का गुस्सा और दुख एक साथ फट पड़ा। मैंने अविश्वास में अपनी पूरी ताकत से डाइनिंग टेबल पर हाथ मारा, जिससे बर्तन खनखना उठे। मैंने चिल्लाकर कहा, “यह तुम क्या मनगढ़ंत और बकवास कहानियां गढ़ रहे हो अमन? अपने मरे हुए पिता के बारे में ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती? सरकारी जिला अस्पताल के सबसे वरिष्ठ डॉक्टर ने मुझे खुद अपने केबिन में बुलाकर साफ-साफ शब्दों में कहा था कि महेश को बहुत तेज़ दिल का दौरा पड़ा था! क्या वे डॉक्टर भी झूठ बोल रहे थे?”
“डॉक्टर झूठ नहीं बोल रहे थे माँ, उन्हें वही दिखा जो उन्हें दिखाया गया,” अमन ने बेहद गंभीर और ठंडे स्वर में कहा, “पापा को इसी बात का सबसे बड़ा खौफ था कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और कुछ विशेष रसायनों (टॉक्सिन्स) की मदद से किसी भी इंसान को इस तरह मारा जा सकता है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी वह महज़ एक आम दिल का दौरा ही दिखाई दे। पापा जानते थे कि उनका समय आ चुका है।”
अमन की इन भयानक और रहस्यमयी बातों को सुनते ही मेरे दिमाग के किसी बंद कोने में पिछले कुछ महीनों की वे छोटी-छोटी, धुंधली यादें अचानक से बिजली की तरह कौंधने लगीं जिन्हें मैंने तब बहुत ही सामान्य और बुढ़ापे का वहम समझकर पूरी तरह से टाल दिया था। मुझे याद आया कि अपनी मौत से करीब छह महीने पहले, महेश ने अचानक हमारे उस शांत और एकांत खेत के चारों तरफ बहुत महंगे और गुप्त सुरक्षा कैमरे (सीसीटीवी) लगवा दिए थे। वे रात को दो-तीन बार उठ-उठकर घर के मुख्य दरवाज़े और खिड़कियों के लॉक्स को बार-बार जांचते थे, जैसे कोई बाहर खड़ा उनका इंतज़ार कर रहा हो। कई बार शाम की चाय पीते समय उन्होंने मुझसे बहुत ही अजीब तरीके से एक अज्ञात, काले रंग की बड़ी एसयूवी गाड़ी के बारे में पूछा था कि क्या मैंने उस गाड़ी को पिछले कुछ दिनों से हमारे खेत के बाहर की मुख्य सड़क पर चक्कर काटते हुए देखा है। मैंने तब उनकी इस घबराहट का मज़ाक उड़ाया था और हंसते हुए कहा था कि बुढ़ापे में शायद उन्हें दूरदर्शन पर आने वाली जासूसी फ़िल्में और थ्रिलर कहानियाँ कुछ ज़्यादा ही पसंद आने लगी हैं। आज उन सभी कड़ियों को जोड़कर जो सच उभर रहा था, वह एक भयानक हकीकत थी। वे डर में जी रहे थे।
मैंने अपनी कांपती, पसीने से तर उँगलियों से उस पीले लिफाफे को उठाया। लिफाफे का गोंद पुराना होने के कारण आसानी से छूट गया। अंदर से चार पन्नों का एक लंबा खत निकला, जो महेश के हाथ का लिखा हुआ था। मैंने उस पत्र को खोला और उसकी पहली ही पंक्ति पढ़ी। उस पहली पंक्ति को पढ़ते ही मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे पूरे वजूद पर एक बहुत बड़ा पत्थर दे मारा हो। मेरे पैरों तले से फर्श जैसे गायब हो गया। पत्र में लिखा था—
“मेरी प्यारी सुनीता, तुमने पिछले ३८ सालों में जिस महेश मेहता से बेपनाह प्रेम किया, जिसके साथ एक साधारण किसान की पत्नी बनकर सुख-दुख के दिन बिताए, वह महेश झूठ नहीं था; वह मेरा दिल था, मेरा प्यार था। लेकिन सुनीता, वह मेरा पूरा सच भी नहीं था। वह मेरी संपूर्ण पहचान नहीं थी। मेरी एक दूसरी, बेहद अंधेरी और खतरनाक पहचान भी थी, जिसे इस देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता के लिए मुझे अपने जीवन के आखिरी क्षण तक तुमसे, अपने बेटे से और इस पूरी दुनिया से छिपाकर रखना पड़ा। मैं मेहता नहीं हूँ, सुनीता।”
मेरी आँखों से आंसू लगातार बहने लगे और पत्र के पन्नों पर गिरकर स्याही को धुंधला करने लगे। अमन तुरंत सोफे से उठकर मेरे पास घुटनों के बल बैठ गया और उसने मुझे कसकर थाम लिया, ताकि मैं फर्श पर न गिर जाऊँ। उसने बहुत ही शांत और कांपती आवाज़ में मेरे कान के पास कहा, “माँ, प्लीज खुद को संभालिए। पापा अपनी शादी से पहले और उसके बाद भी कई दशकों तक भारत सरकार की एक बेहद गुप्त, अत्यंत संवेदनशील खुफिया सुरक्षा इकाई (विदेशी इंटेलिजेंस विंग) के लिए एक अंडरकवर स्पेशल ऑपरेशन्स ऑफिसर के रूप में काम कर रहे थे। उनका वह नासिक का किसान का रूप, वह धोती, वह बैलगाड़ी, वह सादगी… वह सब महज़ एक बेहद गहरी और सुरक्षित ढाल (कवर स्टोरी) थी ताकि उनके अतीत के दुश्मन कभी हमारे इस छोटे से परिवार तक न पहुँच सकें। उन्होंने देश के लिए अपनी पूरी पहचान की आहुति दे दी थी।”
मैंने अपने बेटे के चेहरे को फटी-फटी और पथराई आँखों से घूरा। मेरा दिमाग अंदर से चीख-चीख कर कह रहा था कि यह सब झूठ है, यह कोई बहुत ही गंदा, क्रूर और भयानक पारिवारिक मज़ाक है जो मेरा बेटा और बहू मेरे साथ कर रहे हैं। एक सीधा-साधा इंसान जो मेरे हाथ की बनी अदरक वाली चाय के बिना एक कदम नहीं चलता था, जो फटे हुए जूतों को सिलवाकर पहनता था, वह देश का एक इतना बड़ा और शक्तिशाली गुप्त रक्षक (स्पाई) कैसे हो सकता है? क्या ३८ साल तक मैं एक अजनबी के साथ सो रही थी? क्या हमारी शादी, हमारे बच्चे का जन्म, हमारी पूरी ज़िंदगी महज़ एक मिशन का हिस्सा थी?
अभी मैं इस भयानक और ऐतिहासिक सच को अपने भीतर ठीक से आत्मसात (डाइजेस्ट) भी नहीं कर पाई थी कि अचानक उस बेहद शांत और तनावपूर्ण कमरे में एक और तीखी आवाज़ गूंजी। डाइनिंग टेबल पर रखे अमन के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी।
कमरे का तापमान जैसे एक बार फिर शून्य से नीचे गिर गया। हम तीनों की सांसें थम गईं और हमारी छह आँखें उस मोबाइल की चमकती हुई स्क्रीन पर टिक गईं। स्क्रीन पर जो कॉलर आईडी और नंबर चमक रहा था, उसे देखकर मेरे दिल की धड़कन रुकने वाली हो गई। स्क्रीन पर साफ-साफ शब्दों में लिखा था— “नासिक फार्महाउस लैंडलाइन।”
यह हमारे नासिक वाले उसी पुराने, सुनसान खेत के घर का लैंडलाइन नंबर था। वही घर जहाँ से मैं कल सुबह ताला लगाकर पुणे आई थी। उस घर में इस समय कोई भी नहीं था, वहाँ पूरी तरह से अंधेरा था, मुख्य गेट पर भारी ताले लटके हुए थे और सुरक्षा गार्ड गणपत भी अपने गांव गया हुआ था। फिर उस बंद पड़े, खाली घर के भीतर से कोई हमें कैसे फोन कर सकता था?
कमरे में केवल फोन की रिंगटोन बज रही थी जो किसी हॉरर फिल्म के बैकग्राउंड म्यूज़िक जैसी लग रही था। अमन का पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था। उसने बहुत ही हिचकिचाते और कांपते हाथों से फोन को उठाया। उसकी उँगलियाँ स्क्रीन पर स्वाइप नहीं कर पा रही थीं। उसने किसी तरह कॉल उठाया और बिना कुछ बोले तुरंत उसका स्पीकर ऑन करके फोन को मेज़ के बीचोबीच, उस लकड़ी की पेटी के ऊपर रख दिया।
शुरुआत के लगभग पांच से छह सेकंड तक दूसरी तरफ से केवल एक भयानक, गहरी और भारी सांसों की आवाज़ आती रही। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत दूर से, किसी गुफा के भीतर से सांस ले रहा हो। हम तीनों अपनी सांसें रोके उस फोन को घूर रहे थे।
फिर अचानक, उस फोन के स्पीकर से एक बेहद भारी, ठंडी, उम्रदराज और एक अजीब सी विदेशी टोन (एक्सेंट) वाली पुरुष-आवाज़ गूंजी। उस आवाज़ में कोई घबराहट नहीं थी, केवल एक क्रूर, शांत और खतरनाक स्पष्टता थी। उस आवाज़ ने मराठी या हिंदी में नहीं, बल्कि बेहद साफ अंग्रेज़ी और टूटी-फूटी हिंदी के मिश्रण में कहा—
“मिस्टर अमन मेहता और मिसेज सुनीता मेहता… उस पुरानी लकड़ी की पेटी को खोलना और महेश के दफन हो चुके अतीत को दोबारा ज़िंदा करना आप लोगों के जीवन की सबसे बड़ी और आखिरी भूल साबित होने वाली है। जिस सच को महेश अपने साथ कब्र में ले गया था, उसे वहीं दफन रहने देना चाहिए था। अब जब तुमने इस चक्रव्यूह का दरवाज़ा खोल ही दिया है, तो याद रखो… खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। हम बहुत जल्द आ रहे हैं।”
इसके तुरंत बाद, एक तीखी ‘बीप’ की आवाज़ के साथ कॉल अपने आप कट गया। फोन की स्क्रीन एक बार फिर काली और सूनी हो गई।
कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। बाहर पुणे की सड़कों पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन उस फ्लैट के भीतर ऐसा लग रहा था जैसे हम तीनों किसी मौत के कुएं में खड़े हों। खाने की मेज़ पर सजी हुई वह ठंडी हो रही राजमा-चावल की थाली, वह पुरानी खाली लकड़ी की कुर्सी, वह खुली हुई रहस्यमयी पेटी, महेश की डायरी और नासिक के उस खाली घर से आया वह खौफनाक फोन कॉल… ये सब इस बात के गवाह थे कि हमारी ३८ साल की साधारण सी दिखने वाली ज़िंदगी आज रात एक बेहद खतरनाक, अंतरराष्ट्रीय और खूनी जासूसी के नाटक के बीचोबीच आकर खड़ी हो गई थी।
महेश मेहता जा चुके थे, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसा चक्रव्यूह छोड़ गए थे जिसमें अब मुझे और मेरे पूरे परिवार को अपनी जान बचाने के लिए लड़ना था। सच सामने था, पर वह सच इतना भयानक था कि उसने मेरी पूरी ज़िंदगी के वजूद को ही मिटा दिया था।
उस खौफनाक फोन कॉल के कटते ही पुणे के उस आलीशान फ्लैट में जैसे समय ठहर गया था। अमन का हाथ अभी भी फोन पर था, नेहा सोफे का कोना पकड़े कांप रही थी, और मैं… मैं ३८ साल के उस खूबसूरत झूठ के मलबे पर खड़ी अपने आंसुओं को सुखा रही थी। महेश ने पत्र में लिखा था कि वह मुझसे प्यार करता था, और उस एक लाइन ने मुझे इस गहरे दलदल में खड़े होने की ताकत दी। मैंने आगे बढ़कर मेज़ पर रखी चमड़े की उस डायरी को उठाया।
“रोने का समय चला गया अमन,” मैंने अपनी आवाज़ को इतना सख्त किया कि खुद मुझे भी अचरज हुआ। “अगर तुम्हारे पापा ने इस सच को २ साल तक छुपाया, तो इसलिए कि हम आज की रात का सामना कर सकें। डायरी खोलो।”
अमन ने कांपते हाथों से डायरी के पन्ने पलटने शुरू किए। डायरी के आखिरी पन्नों पर नासिक के हमारे उस साधारण से टीन की छत वाले गोदाम का एक नक्शा बना हुआ था। उसमें लिखा था कि गोदाम की ज़मीन के नीचे एक भूमिगत तिजोरी (अंडरग्राउंड सेफ) है, जिसमें उस गुप्त मिशन के आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल दस्तावेज़ (डेटा ड्राइव) रखे हैं—वही डेटा जिसके पीछे वह अज्ञात काली गाड़ी और वे विदेशी साए पड़े हुए थे। महेश को जब अपनी बीमारी और खतरे का अहसास हुआ था, तो उन्होंने उस डेटा को नष्ट करने के बजाय वहां सुरक्षित रख दिया था ताकि सही समय पर वह सरकार तक पहुँच सके।
तभी फ्लैट के बाहर एक ज़ोरदार आवाज़ हुई। बिल्डिंग की बिजली अचानक गुल हो गई। पूरा कमरा घने अंधेरे में डूब गया। केवल खिड़की से आ रही स्ट्रीट लाइट की मद्धम रोशनी में हमें बाहर तीन परछाइयाँ अपार्टमेंट की बालकनी की तरफ बढ़ती हुई दिखीं।
“वे यहाँ पहुँच चुके हैं,” अमन ने फुसफुसाते हुए कहा और नेहा को अपने पीछे छिपा लिया।
लेकिन वे लोग यह भूल गए थे कि वे एक साधारण किसान के परिवार पर हाथ डालने आए थे, जिसके घर का मुखिया खुद एक अव्वल दर्जे का खुफिया अधिकारी था। महेश ने अपनी मौत से पहले अमन को केवल यह पेटी नहीं सौंपी थी, बल्कि घर के सुरक्षा तंत्र को एक गुप्त पैनिक बटन से जोड़ रखा था, जो सीधे दिल्ली स्थित राष्ट्रीय सुरक्षा मुख्यालय (National Security Headquarters) से जुड़ा था। अमन ने बिना एक सेकंड गंवाए अपनी जेब से वह पैनिक रिमोट निकाला और बटन दबा दिया।
कमरे का दरवाज़ा टूटता, उससे पहले ही अपार्टमेंट के चारों तरफ अंधाधुंध लाइटें चमक उठीं। ब्लैक सूट और अत्याधुनिक हथियारों से लैस भारत सरकार के विशेष सुरक्षा बलों (Special Forces) की दो गाड़ियां सीधे कंपाउंड में आकर रुकीं। बालकनी से घुसने की कोशिश कर रहे उन तीनों संदिग्ध हमलावरों को पलक झपकते ही कमांडोज़ ने दबोच लिया। वे कोई आम चोर नहीं थे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार से संचालित होने वाले एक बहुत बड़े नेटवर्क के गुर्गे थे।
तभी एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कमरे में प्रवेश किया। उनके चेहरे पर महेश के लिए एक गहरा सम्मान था। उन्होंने आगे बढ़कर मेरे सामने अपना सिर झुकाया, “जय हिंद, सुनीता जी। मेजर महेश ने देश के लिए जो बलिदान दिया, उसकी कोई तुलना नहीं है। पिछले दो सालों से हम भी इस नेटवर्क पर नज़र रख रहे थे, और आज महेश सर की आखिरी योजना के कारण ये सभी पकड़े गए।”
अगले दिन, हम सुरक्षा बलों की निगरानी में नासिक के अपने उसी पुराने खेत पर पहुँचे। गोदाम की धूल भरी ज़मीन को जब खोदा गया, तो नीचे से एक छोटा सा मेटल बॉक्स निकला। उसमें मौजूद डेटा ड्राइव को मेजर अधिकारी के हवाले करते हुए मेरे दिल का बोझ हमेशा के लिए हल्का हो गया।
मैंने गोदाम से बाहर निकलकर उस पुराने नीम के पेड़ की तरफ देखा, जहाँ महेश ने आखिरी सांस ली थी। हवा में अब कोई खौफ नहीं था, बस अंगूर की बेलों की वही सोंधी महूक थी। ३८ साल की मेरी शादी किसी झूठ पर नहीं, बल्कि इस देश के सबसे बड़े और पवित्र सच पर टिकी थी। महेश मेरे लिए कोई अजनबी नहीं थे, वे मेरे वही गौरवशाली पति थे जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने परिवार और अपने देश की रक्षा की थी।
मेहता परिवार का यह चक्रव्यूह अब हमेशा के लिए शांत हो चुका था।
इस सस्पेंस और ड्रामा से भरी कहानी का पूरा अंत यहाँ नीचे दिया गया है।
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