त्याग का अर्धचंद्र: 180 मेहमानों के सामने खुला ग्यारह साल पुराना रहस्य और ढहा कपूर साम्राज्य
अध्याय 1: सगाई की रात और छतरपुर का अहंकार
दिल्ली के छतरपुर में स्थित मल्होत्रा फार्महाउस आज रात रोशनी से नहाया हुआ था। हवा में महंगे इत्र, लाइव सितार की मधुर तान और सफेद लिली के फूलों की महक घुली हुई थी। शहर के 180 सबसे बड़े कारोबारी, राजनेता और उद्योगपति इस भव्य सगाई समारोह के गवाह बनने के लिए एकत्र हुए थे। यह सगाई आरव मल्होत्रा के बेटे अर्जुन मल्होत्रा और शहर के प्रसिद्ध ‘कपूर हेल्थकेयर’ के मालिक देवेंद्र कपूर की बेटी रिया कपूर की थी।
मंच पर लाल रंग के भारी बनारसी गाउन में रिया कपूर खड़ी थी। उसकी उंगलियों में हीरों की अंगूठियां चमक रही थीं और उसका हर एक आदेश ऐसा था मानो वह इस घर, इस अकूत दौलत और अर्जुन की 8 साल की मासूम बेटी अनाया की मालकिन बन चुकी हो। वह मेहमानों के सामने अपनी कृत्रिम मुस्कान बिखेर रही थी, लेकिन उसकी नजरें लगातार घर के कर्मचारियों पर टिकी हुई थीं, जिन्हें वह अपनी उंगलियों के इशारे पर नचा रही थी।

उसी भीड़ के बीच, 34 साल की मीरा शर्मा चुपचाप चांदी की ट्रे में मेहमानों को पानी और पेय पदार्थ परोस रही थी। मीरा एक स्वाभिमानी, शांत और गंभीर महिला थी। वह एक विधवा थी और पिछले छह महीनों से इस मल्होत्रा हाउस में एक सामान्य हाउसकीपिंग और इवेंट मैनेजर के रूप में काम कर रही थी। उसका एक 12 साल का बेटा था, कबीर, जिसे वह अपनी ईमानदारी की कमाई से एक अच्छे स्कूल में पढ़ा रही थी। मीरा ने कभी किसी के सामने अपनी किस्मत का रोना नहीं रोया था। वह अपना काम करते हुए मन ही मन ईश्वर के भजन गुनगुनाती रहती थी। उसके गले में उसकी स्वर्गीय मां द्वारा दी गई एक छोटी सोने की दुर्गा-मूर्ति का लॉकेट हमेशा रहता था, और उसकी ऊंची गर्दन वाली कमीज उसकी दाहिनी हंसली (clavicle) को हमेशा पूरी तरह से ढके रखती थी।
मल्होत्रा परिवार की 8 साल की बेटी अनाया को मीरा से एक गहरा, अनकहा लगाव था। अनाया की मां का देहांत दो साल पहले हो चुका था, जिसके बाद वह पूरी तरह से अकेली हो गई थी। अर्जुन अपनी व्यावसायिक व्यस्तताओं के कारण उसे समय नहीं दे पाता था। जब भी अनाया रात को बुरे सपने देखकर उठती थी, तो रिया कपूर उसे केवल एक “बचकाना नाटक” कहकर डांट देती थी, लेकिन मीरा ही वह महिला थी जो आधी रात को उसके पास बैठती, उसका सिर सहलाती और उसे कहानियां सुनाकर सुलाती थी।
समारोह के बीच में, अनाया चुपके से मीरा के पास आई और उसकी साड़ी का पल्ला पकड़कर धीमे से बोली, “मीरा आंटी, क्या आप कल सुबह मेरे लिए सूजी का हलवा बनाएंगी? मुझे भूख लगी है।”
मीरा ने मुस्कुराकर अनाया के गाल को छुआ और कहा, “बिल्कुल बनाऊंगी, मेरी बच्ची। लेकिन उसके लिए तुम्हें आज रात समय पर सोना होगा और कल सुबह अपना गणित का होमवर्क पूरा करना होगा। वादा?”
“वादा, आंटी!” अनाया ने खुशी से कहा।
तभी रिया की तीखी नजरें उन दोनों पर पड़ीं। उसे मीरा और अनाया की यह निकटता हमेशा चुभती थी। उसने अपनी उंगलियां चटकाते हुए मीरा को पास बुलाया और बेहद ठंडे स्वर में कहा, “मीरा, मैंने तुम्हें पहले भी चेतावनी दी है। तुम यहां एक कर्मचारी हो। तुम्हें इस घर की बेटी का हिस्सा बनने या उसके साथ पारिवारिक रिश्ते बनाने की कोई जरूरत नहीं है। अपनी सीमा में रहो और मेहमानों की कैटरिंग पर ध्यान दो।”
अर्जुन मल्होत्रा ने दूर से इस बातचीत को देखा, लेकिन उसने हमेशा की तरह अपनी नजरें फेर लीं। उसकी कंपनी ‘मल्होत्रा इंफ्राटेक’ इस समय भारी कर्ज और निवेश के दबाव से गुजर रही थी। उसे देवेंद्र कपूर के अस्पताल समूह से एक बहुत बड़े निवेश की उम्मीद थी, इसलिए वह रिया की किसी भी बदतमीजी का विरोध नहीं कर पाता था। उसे लगता था कि शादी के बाद शायद रिया का स्वभाव बदल जाएगा। लेकिन अनाया अपने पिता की इस लाचारी को बड़ी होशियार नजरों से देख रही थी।
अध्याय 2: साजिश का ताना-बाना और खोया हुआ आत्मसम्मान
सगाई के मुख्य समारोह से चार दिन पहले, रिया ने खुद गुस्से में एक कीमती इतालवी फूलदान (vase) फर्श पर गिराकर तोड़ दिया था क्योंकि अर्जुन ने उसके पसंद के कैटरर को बदलने से मना कर दिया था।
जब अर्जुन कमरे में आया, तो रिया ने तुरंत सारा दोष मीरा पर मढ़ने की कोशिश की। लेकिन वहां खड़ी छोटी अनाया ने तुरंत आगे बढ़कर कहा, “पापा, मीरा आंटी ने इसे नहीं तोड़ा। रिया आंटी ने खुद इसे गुस्से में फर्श पर फेंका था। मैंने अपनी आंखों से देखा है।”
रिया उस समय पूरी तरह भड़क उठी थी। उसने अर्जुन की तरफ देखते हुए कहा, “आरव, देखो इसे! अब तुम इस घर के एक साधारण कर्मचारी और इस छोटी सी बच्ची की झूठी बात पर विश्वास करोगे? क्या मेरी इस घर में कोई प्रतिष्ठा नहीं है?”
अर्जुन ने उस समय अपनी आंखें नीचे कर ली थीं। उसने केवल इतना कहा, “रिया, शांत हो जाओ। इस विषय पर हम बाद में शांति से बात करेंगे।”
वह ‘बाद में’ कभी नहीं आया। मीरा ने चुपचाप आगे बढ़कर कांच के उन टूटे हुए टुकड़ों को उठाया था, और अनाया ने पहली बार अपने पिता अर्जुन को एक बेहद निराश और बेगाना नजर से देखा था। अनाया को समझ आ गया था कि उसके पिता दौलत के सामने अपना स्वाभिमान खो चुके हैं।
सगाई वाले दिन की सुबह, रिया ने मीरा के हाथ में एक लंबी सूची थमाई थी, जिसमें कपड़ों के कमरे की व्यवस्था, मेहमानों की सुरक्षा, कैटरिंग और विशेष रूप से अनाया को “वीआईपी मेहमानों” की नजरों से दूर रखने का निर्देश शामिल था।
रिया ने मीरा की आंखों में देखते हुए कहा था, “अगर आज रात एक भी छोटी सी गलती हुई, तो तुम्हें इस नौकरी से तुरंत मुक्त कर दिया जाएगा। और हाँ, वह जो तुम गले में मंदिर वाला पुराना लॉकेट पहनती हो, उसे अपनी पोशाक के भीतर छिपा कर रखो। हमारे मेहमान बहुत रसूखदार हैं, उन्हें यह सब पसंद नहीं है।”

मीरा ने बिना कोई प्रतिवाद किए कहा, “जी, मैम।” उसने उस सोने की चेन को अपनी कमीज के भीतर छिपा लिया।
लेकिन तभी, उसकी नजर लॉन में प्रवेश करते हुए रिया के पिता देवेंद्र कपूर पर पड़ी। देवेंद्र कपूर दिल्ली के सबसे बड़े और पुराने अस्पताल समूह ‘कपूर हेल्थकेयर’ के मालिक थे। उन्हें देखते ही मीरा के पैर एक पल के लिए फर्श से जम गए। उसकी आंखों में एक पुराना, गहरा दर्द तैर गया। उसने तुरंत अपने चेहरे को घुमाया और दूसरी तरफ चली गई। देवेंद्र कपूर को इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अतीत का एक जीवित रहस्य उनके सामने खड़ा था।
रात के ठीक नौ बजे, जब समारोह अपने चरम पर था, एक नया और अनुभवहीन वेटर मेहमानों के बीच से गुजर रहा था। अचानक उसका पैर संगमरमर के फर्श पर फिसला और उसकी ट्रे में रखा हुआ लाल रंग का अनार का जूस रिया के कीमती सफेद और लाल गाउन पर जा गिरा।
“मैम, मुझे माफ कर दीजिए! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई!” वेटर डर से कांपने लगा।
रिया ने उस गरीब वेटर की तरफ देखा तक नहीं। उसका पूरा ध्यान तीन मीटर दूर खड़ी मीरा पर गया। उसने इस दुर्घटना को मीरा को बदनाम करने का एक अचूक हथियार मान लिया। उसने सबके सामने मीरा की ओर अपनी उंगली उठाई और चिल्लाकर कहा—
—यह सब तुम्हारी लापरवाही की वजह से हुआ है, मीरा! तुमने इस नए वेटर को जानबूझकर इस तरफ भेजा ताकि मेरा गाउन खराब हो सके!
अध्याय 3: 180 मेहमानों के सामने खींचतान और पुराना निशान
पूरे हॉल में अचानक एक गहरा सन्नाटा पसर गया। सितार की आवाज बंद हो गई। 180 मेहमानों के हाथ में लगे वाइन के गिलास वहीं रुक गए और कई लोगों ने अपने स्मार्टफोन के कैमरे ऑन कर लिए।
मीरा ने शांति से आगे बढ़कर कहा, “मैम, मैं उस समय मेहमानों की दूसरी कतार में थी। मैं इस वेटर के पास भी नहीं थी। यह केवल एक आकस्मिक दुर्घटना है।”
—मुझसे बहस करती हो? तुम्हारी यह हिम्मत!—रिया कपूर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वह मंच से नीचे उतरी और मीरा के बिल्कुल करीब आ गई।
अर्जुन मल्होत्रा ने स्थिति को संभालने के लिए आगे बढ़ने की कोशिश की, “रिया, शांत हो जाओ। बहुत से मेहमान देख रहे हैं। हम कपड़े बदल सकते हैं।”
लेकिन रिया रुकने वाली नहीं थी। उसने अर्जुन को पीछे धकेलते हुए कहा, “नहीं अर्जुन! यह महिला पिछले छह महीनों से मेरी हर बात का विरोध कर रही है। यह अनाया को मेरे खिलाफ भड़काती है। आज इसने मेरी सगाई की रात को सबके सामने मुझे असहज करने की यह घिनौनी साजिश रची है। तुम जैसी महिलाओं को उनकी सही जगह याद दिलानी बहुत जरूरी है!”
यह कहते हुए रिया ने अत्यंत गुस्से में मीरा का हाथ पकड़ा और उसकी पोशाक के ऊपरी हिस्से को पूरी ताकत से पीछे की तरफ खींच दिया। रिया का इरादा मीरा को मंच से नीचे धकेलने का था। इस अचानक हुई खींचतान और धक्का-मुक्की में, मीरा की ऊंची कमीज का कंधा एक तरफ से बुरी तरह खिसक गया और उसका कपड़ा थोड़ा सा फट गया। Mira लड़खड़ाकर पीछे गिरी, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।
जैसे ही मीरा का दाहिना कंधा और हंसली का हिस्सा मेहमानों के सामने खुला, वहां की तेज झूमर की रोशनी सीधे उसकी त्वचा पर पड़ी। उसकी दाहिनी हंसली (clavicle bone) के ठीक नीचे, एक बहुत ही अजीब, गहरे नीले रंग का स्कार (scar) था, जो बिल्कुल आधे चाँद (crescent moon) के आकार का था। यह कोई सामान्य चोट नहीं थी, बल्कि एक जटिल सर्जिकल कैथेटर के बाद बना हुआ स्थायी निशान था। और उसी निशान के ठीक ऊपर, उसकी मां का दिया हुआ सोने का दुर्गा लॉकेट बाहर आकर लटक गया था।
मंच के पास खड़े अर्जुन मल्होत्रा की नजर जैसे ही उस अर्धचंद्र के निशान और उस दुर्गा लॉकेट पर पड़ी, उसके हाथ में पकड़ा हुआ क्रिस्टल का कीमती गिलास फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया। अर्जुन का पूरा शरीर कांपने लगा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया मानो उसने कोई भूत देख लिया हो।
अतीत की यादें एक भयानक तूफान की तरह अर्जुन के दिमाग में गूंजने लगीं। ग्यारह साल पहले, 2015 में, अर्जुन एक साधारण अकाउंटेंट था और उसके पास कोई संपत्ति नहीं थी। उस समय वह ब्लड कैंसर (रक्त कैंसर) जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ रहा था। दिल्ली के केंद्रीय कैंसर संस्थान में डॉक्टरों ने कह दिया था कि यदि अगले 48 घंटों में उसे एक उपयुक्त बोन मैरो दाता (Bone Marrow Donor) नहीं मिला, तो उसकी जान नहीं बचेगी।
तभी एक अनजान, युवा कॉलेज की लड़की ने आगे बढ़कर अपनी जान जोखिम में डालते हुए उसे अपना बोन मैरो दान किया था। दान की प्रक्रिया के दौरान, लड़की की हंसली के पास कैथेटर से भारी आंतरिक रक्तस्राव (internal bleeding) हुआ था, जिसके कारण डॉक्टरों को आपातकालीन स्थिति में उसकी हंसली के नीचे एक जटिल ऑपरेशन करना पड़ा था, जिससे वहां आधे चांद जैसा निशान बन गया था।
चिकित्सा नियमों के अनुसार दाता की पहचान पूरी तरह गुप्त रखी गई थी। लेकिन अर्जुन की स्वर्गीय मां वसुधा मल्होत्रा के बार-बार रोने और मिन्नतें करने पर, अस्पताल के एक वफादार क्लर्क ने चुपके से दाता की एक संदर्भ फोटो अर्जुन की मां को भेजी थी। उस फोटो में लड़की का चेहरा छिपा हुआ था, लेकिन उसकी हंसली पर बना वह नया ‘आधे चांद का निशान’ और उसके गले में चमकता हुआ वह ‘दुर्गा लॉकेट’ साफ दिखाई दे रहा था। वह फोटो आज भी अर्जुन ने अपने जीवन की सबसे बड़ी अमानत के रूप में अपने निजी लॉकर में सुरक्षित रखी थी।
अर्जुन ने कांपते हुए कदमों से मीरा की तरफ कदम बढ़ाया। उसकी आवाज पूरी तरह से रुंध चुकी थी, “मीरा… यह लॉकेट… और यह निशान… तुम्हें कहां से मिला?”
मीरा ने अपने फटे हुए कपड़े को अपने हाथ से समेटा और अपनी गरिमा को बनाए रखते हुए कहा, “यह लॉकेट मेरी स्वर्गीय मां का था, मिस्टर मल्होत्रा। और यह निशान मेरे जीवन के एक ऐसे फैसले का है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकती।”
“क्या तुम… क्या तुम वर्ष 2015 में दिल्ली के उसी कैंसर अनुसंधान संस्थान में थीं?” अर्जुन की आंखों से आंसू बहने लगे।
अध्याय 4: 11 साल पुरानी रसीद और कपूर हेल्थकेयर का पाप
मंच पर खड़ी रिया कपूर अपनी जगह से दो कदम पीछे हट गई। उसने अर्जुन की आंखों में वह खौफ और सम्मान देखा जो उसने कभी किसी के लिए नहीं देखा था। वहीं, हॉल के प्रवेश द्वार के पास खड़े रिया के पिता देवेंद्र कपूर का चेहरा पूरी तरह से पीला पड़ चुका था। उन्होंने धीरे-धीरे भीड़ के पीछे छिपकर मुख्य दरवाजे की ओर भागने की कोशिश की।
मीरा की आंखें भी भर आई थीं, लेकिन उसकी आवाज में एक अजीब सी शक्ति थी। उसने अर्जुन की तरफ देखकर कहा, “हाँ, अर्जुन। मैं ही वह लड़की थी। मैंने उस समय अस्पताल प्रशासन से लिखित अनुरोध किया था कि मेरा नाम और पहचान कभी सार्वजनिक न की जाए, क्योंकि मेरे पिता का मानना था कि जीवन का दान कभी व्यापार या प्रसिद्धि के लिए नहीं किया जाना चाहिए।”
“तो तुमने… तुमने मेरी जान बचाई थी? मैं आज जो कुछ भी हूँ, इस दुनिया में जीवित हूँ, वह तुम्हारी बदौलत हूँ?” अर्जुन घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया। 180 मेहमान इस महा-ड्रामा को देखकर पूरी तरह स्तब्ध थे।
मीरा ने अपनी नजरें अर्जुन से हटाकर सीधे उस दरवाजे की तरफ की, जहाँ देवेंद्र कपूर भागने की कोशिश कर रहे थे। उसने बेहद बुलंद और गूंजती हुई आवाज में कहा—
—रुकिए, कपूर साहब! आज आपकी बेटी 180 मेहमानों के सामने मेरी पोशाक खींचकर मेरी इज्जत और मेरे आत्मसम्मान पर सवाल उठा रही है। लेकिन क्या आप इस समाज को बताएंगे कि ग्यारह साल पहले, जब मैं आपके ‘कपूर हेल्थकेयर’ अस्पताल में इस मासूम की जान बचाने के लिए अपने जीवन की बाजी लगा रही थी, तब आपने और आपके अस्पताल प्रबंधन ने मेरे परिवार के साथ क्या किया था?
मीरा ने अपनी फटी हुई पोशाक के भीतर की गुप्त जेब से एक बेहद पुरानी, पीली पड़ चुकी दस्तावेज़ी रसीद निकाली और उसे हवा में लहराया। उस रसीद पर ‘कपूर हेल्थकेयर’ और ‘मल्होत्रा फाउंडेशन’ दोनों के आधिकारिक कॉर्पोरेट सील और लोगो लगे हुए थे।
मीरा ने कहा, “मैं इस घर में किसी संयोग से नहीं आई हूँ, अर्जुन। ग्यारह साल पहले, जब मैं अस्पताल के बिस्तर पर बेहोश थी, तब देवेंद्र कपूर ने मेरे सीधे-साधे पिता पर एक झूठा मेडिकल मुकदमा दायर करने की धमकी दी थी। उन्होंने दावा किया था कि मैंने अस्पताल के नियमों का उल्लंघन किया है। मेरे पिता ने अपनी इकलौती बेटी को जेल जाने से बचाने के लिए हमारा पुश्तैनी घर और हमारी पूरी ज़मीन ‘कपूर हेल्थकेयर’ के नाम कौड़ियों के भाव ट्रांसफर कर दी थी। देवेंद्र कपूर ने मेरे परोपकार के बदले मेरे पूरे परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया था!”
पूरे हॉल में एक सामूहिक सिसकी गूंज उठी। मेहमान देवेंद्र कपूर की तरफ थू-थू करने लगे।
मीरा ने आगे बढ़ते हुए अर्जुन की आंखों में देखा, “और धोखा केवल कपूर परिवार ने नहीं किया था, अर्जुन। तुम्हारे अपने इस आलीशान घर में भी कोई ऐसा था, जिसने मेरी उस बोन मैरो फाइल और मेरी पहचान को पिछले ग्यारह सालों से जानबूझकर इस दुनिया से छिपा कर रखा, ताकि तुम्हें कभी उस कर्ज का अहसास न हो जो तुम्हारे जीवन पर था।”
मीरा ने उस रसीद के निचले हिस्से की तरफ इशारा किया। वहां नीली स्याही से एक हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे अर्जुन बहुत अच्छी तरह से पहचानता था। वह हस्ताक्षर किसी और के नहीं, बल्कि अर्जुन की अपनी स्वर्गीय मां वसुधा मल्होत्रा के थे।
अध्याय 5: न्याय का तराजू और एक नई शुरुआत
अर्जुन ने जब अपनी मां के हस्ताक्षर उस रसीद पर देखे, तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह समझ गया कि उसकी मां ने उसकी जान बचाने के बदले में मीरा के परिवार के साथ हुए उस भयानक अन्याय को मौन सहमति दी थी। वसुधा मल्होत्रा को डर था कि अगर अर्जुन को पता चला कि उसकी जान एक गरीब लड़की के परिवार की बर्बादी की कीमत पर बची है, तो वह कभी उस जीवन को स्वीकार नहीं कर पाएगा। इसलिए उन्होंने कपूर परिवार के उस पाप की फाइल को हमेशा के लिए दबा दिया था।
देवेंद्र कपूर को सुरक्षा गार्डों ने मुख्य द्वार पर ही रोक लिया था। पुलिस की एक गाड़ी, जिसे एडवोकेट राघव मलोत्रा (जो मीरा के कानूनी सलाहकार थे) ने पहले ही सूचित कर दिया था, फार्महाउस के सायरन बजाते हुए लॉन में आकर रुकी।
मीरा ने उस रसीद को अर्जुन के हाथ में थमा दिया। उसने अत्यंत शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “अर्जुन, मैं यहाँ छह महीने पहले कोई बदला लेने नहीं आई थी। मैं केवल यह देखना चाहती थी कि जिस मल्होत्रा परिवार के लिए मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, उनका आंतरिक चरित्र कैसा है। आज तुम्हारी मंगेतर ने मेरी पोशाक खींचकर मुझे नहीं, बल्कि तुम्हारी मां की उस पूरी याद को और तुम्हारे इस खोखले साम्राज्य के गौरव को तार-तार कर दिया है।”
रिया कपूर का चेहरा डर और शर्म से काला पड़ चुका था। उसने अर्जुन का हाथ पकड़ने की कोशिश की, “अर्जुन, मुझे माफ कर दो! मुझे इस अतीत के बारे में कुछ नहीं पता था! मेरे पापा ने जो किया, उसमें मेरा कोई हाथ नहीं है!”
अर्जुन ने रिया का हाथ झटक दिया। उसकी आंखों में अब केवल घृणा और आत्मग्लानि थी। उसने सीधे देवेंद्र कपूर और रिया की तरफ देखते हुए पुलिस अधिकारी से कहा, “अधिकारी जी, इस ग्यारह साल पुराने धोखाधड़ी, जबरन संपत्ति हड़पने और आज रात एक महिला के साथ हुए इस सार्वजनिक दुर्व्यवहार के मामले में इन दोनों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। मैं खुद इस केस में मुख्य गवाह बनूंगा।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा, उसकी आवाज कांप रही थी, “मीरा… मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा यह कर्ज सात जन्मों में भी नहीं उतार सकता। यह घर, यह पूरी दौलत तुम्हारी है। कृपया मुझे इस पाप के बोझ से मुक्त होने का एक मौका दो।”
मीरा ने अपने बिखरे हुए कपड़ों को गरिमा के साथ ठीक किया। उसने फर्श पर पड़ी अपनी चांदी की ट्रे को उठाया और उसे एक तरफ रख दिया। उसने अर्जुन से कहा, “आरव, जीवन का दान कभी वापस नहीं मांगा जाता। और जो संपत्ति धोखे की बुनियाद पर खड़ी हो, मीरा शर्मा उसके साए में भी रहना पसंद नहीं करती। मुझे तुम्हारी इस दौलत की कोई जरूरत नहीं है। मैंने अदालत में कपूर हेल्थकेयर के खिलाफ हमारी पैतृक संपत्ति की वापसी का मुकदमा पहले ही जीत लिया है, जिसके कागजात कल सुबह तुम्हारे पास पहुंच जाएंगे।”
तभी, छोटी अनाया दौड़ती हुई आई और उसने मीरा के पैर पकड़ लिए। वह रोते हुए बोली, “मीरा आंटी, कृपया मुझे छोड़कर मत जाओ। पापा बहुत बुरे हैं, लेकिन मैं आपके बिना नहीं रह सकती।”
मीरा की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने झुककर अनाया को अपनी छाती से लगा लिया। उसने अर्जुन की तरफ देखा और कहा, “मैं अनाया को इस नफरत और धोखे के माहौल में बड़ा नहीं होने दे सकती। यदि तुम्हारे भीतर थोड़ी सी भी इंसानियत बाकी है, तो अनाया की कानूनी कस्टडी (legal custody) मुझे सौंप दो, ताकि मैं इसे एक सच्चा और स्वाभिमानी इंसान बना सकूं।”
अर्जुन ने बिना एक पल गंवाए रोते हुए अपना सिर हिला दिया। वह जानता था कि अनाया के लिए मीरा से बेहतर इस दुनिया में कोई नहीं हो सकता।
मीरा ने अनाया का हाथ पकड़ा और कबीर को साथ लेकर उस आलीशान फार्महाउस के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गई। 180 मेहमानों की भीड़ ने झुककर मीरा के लिए रास्ता बनाया। सितार की धुन अब पूरी तरह शांत थी, लेकिन हवा में न्याय की एक नई और गूंजती हुई तान साफ महसूस हो रही थी। छतरपुर का वह खोखला साम्राज्य आज रात हमेशा के लिए ढह चुका था, और मीरा अपने आत्मसम्मान और न्याय की जीत के साथ एक नए सुनहरे सवेरे की ओर कदम बढ़ा चुकी थी।
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