रक्त शर्करा संतुलन और बालों की देखभाल का प्राकृतिक आयुर्वेदिक रहस्य
प्राकृतिक तत्वों से ब्लड शुगर नियंत्रित करें और बालों को घना बनाएं। परिचय: आयुर्वेद और प्राकृतिक उपचार की शक्ति आज…
सुबह के ठीक 11 बजकर 15 मिनट हो रहे थे जब मेरी टैक्सियाँ जयपुर के वैशाली नगर की उस शांत और हरी-भरी सड़क पर रुकी। 10 साल का लंबा वक्त बीता था—एक ऐसा वक्त जो मैंने अपनों से दूर, एक अजनबी देश में, अपनी खुशियों की बलि देकर काटा था। सिंगापुर की चकाचौंध, बहुमंजिला इमारतों की गगनचुंबी चमक और हर दिन 14 घंटे की असीम थकान के बीच अगर कोई एक सपना मुझे जिंदा रखे हुए था, तो वह था इस घर का चेहरा। 7 साल पहले जब मैंने अपनी पाई-पाई जोड़कर, बैंक के कर्जों से लड़कर 1 करोड़ 15 लाख रुपये में यह दो-मंजिला मकान खरीदा था, तो मेरी सिर्फ एक ही इच्छा थी—मेरी विधवा माँ सावित्री देवी को अपनी ढलती उम्र में छत के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन गाड़ी से उतरते ही जब मेरी नज़र मुख्य द्वार पर लगे उस सफेद संगमरमर के पत्थर पर पड़ी, तो मेरे पैर जमींदोज हो गए। जिस पत्थर पर कभी पीतल के चमचमाते अक्षरों में ‘सावित्री निवास’ उकेरा गया था, उस नाम के ऊपर एक गहरे काले रंग की ऐक्रेलिक पट्टी चिपका दी गई थी। उस नई पट्टी पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’रोहन और नेहा सदन’।
मैं दो मिनट तक उस नाम को बिना पलक झपकाए देखती रही। हवा में अजीब सी गंध थी, जैसे बरसों पुरानी किसी जलती हुई उम्मीद का धुआँ बिखरा हुआ हो। उस पल मेरे भीतर के किसी कोने ने चीखकर कहा कि पूजा, वापस मुड़ जा, यह वह घर नहीं है जिसे तू पीछे छोड़ गई थी। लेकिन विदेश में बिताए उन दस बरसों की एक-एक रात, जब मैं एक कमरे में तीन अनजान लड़कियों के साथ रहकर पैसे बचाती थी ताकि माँ को हर महीने लाख रुपये भेज सकूँ, मेरी आँखों के सामने तैर गई। मैं पीछे नहीं हट सकती थी। मैंने भारी सूटकेसों को खींचा और मुख्य दरवाजे की घंटी बजा दी। पहली घंटी पर सन्नाटा रहा, लेकिन दूसरी घंटी बजते ही अंदर से पैरों की आहट सुनाई दी। भारी लकड़ी का नक्काशीदार दरवाज़ा खुला और सामने मेरी भाभी नेहा खड़ी थी।

नेहा के लिबास को देखकर कोई भी कह सकता था कि वह किसी बड़े राजा-महाराजा के घराने की बहू है। उसने गहरे हरे रंग की कांजीवरम साड़ी पहन रखी थी, जिसकी जरी धूप में चमक रही थी। उसके गले में सोने का एक भारी-भरकम हार झूल रहा था, और हाथों में मैचिंग की चूड़ियाँ खनक रही थीं। उसके पीछे का हॉल किसी फाइव-स्टार होटल के लॉबी जैसा लग रहा था—इतालवी संगमरमर की फर्श, दीवार पर लगा 65 इंच का स्मार्ट टीवी, और महँगे चमड़े के सोफे। नेहा की नज़र सबसे पहले मेरे थके हुए चेहरे पर गई, और फिर ज़मीन पर रखे मेरे दो बड़े ट्रॉली बैग्स पर। उसके चेहरे पर फैली हल्की सी मुस्कान अचानक गायब हो गई, और उसके हाथ दरवाजे के हैंडल पर इतने कस गए कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए। उसकी आवाज में एक अजीब सी कृत्रिम ठंडक थी, “दीदी? आप अचानक? बिना बताए? कोई फोन, कोई मैसेज नहीं?”
मैंने उसकी आंखों में छुपी घबराहट को भांप लिया था, लेकिन इस वक्त मुझे किसी औपचारिकता में नहीं पड़ना था। मैंने सीधे उसकी आंखों में देखते हुए कड़े स्वर में पूछा, “माँ कहाँ हैं?” नेहा ने एक लंबी सांस ली, अपने चेहरे पर एक झूठी सहजता लाने की कोशिश की और बोली, “माँ… माँ तो अपने कमरे में आराम कर रही हैं।” अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि घर के पिछले हिस्से से एक पुराने स्टील के बर्तन के फर्श पर गिरने की खनकती हुई आवाज आई। वह आवाज किसी बड़े हॉल से नहीं, बल्कि रसोई के पार किसी कोने से आई थी। मैं नेहा के जवाब का इंतजार किए बिना, उसके कंधे को दरकिनार करती हुई तेजी से घर के अंदर दाखिल हो गई।
जैसे-जैसे मैं हॉल को पार कर रसोई की तरफ बढ़ रही थी, घर का वैभव धीरे-धीरे गायब हो रहा था। रसोई के ठीक बगल में, पिछले लोहे के दरवाजे के पास जहाँ कबाड़ और फालतू सामान रखा जाता था, वहाँ एक पुरानी, हत्थे टूटी हुई लकड़ी की कुर्सी रखी थी। उस कुर्सी पर मेरी माँ बैठी थीं। उन्हें देखकर मेरे सीने में जैसे किसी ने खौफनाक खंजर घोंप दिया हो। जिस माँ को मैंने 10 साल पहले एक गरिमामयी, रोबदार और साफ-सुथरी महिला के रूप में देखा था, वह अब हड्डियों का एक ढांचा मात्र लग रही थीं। उनकी सादी सूती साड़ी का एक कोना उनके पैर के नीचे दबा हुआ था, उनकी रबड़ की चप्पलें इतनी घिस चुकी थीं कि उनके नंगे पैर ठंडे फर्श को छू रहे थे। उनके सिर के बाल जो कभी घने और काले हुआ करते थे, अब पूरी तरह सफेद और उलझे हुए थे।
मुझे देखते ही माँ के चेहरे पर एक पल के लिए बिजली सी कौंधी। वह अचानक अपनी जगह से खड़ी हुईं, उनकी आँखों में एक असीम चमक आई, लेकिन अगले ही पल, जैसे किसी अनजाने खौफ ने उन्हें जकड़ लिया हो, वे तुरंत पीछे हटीं और वापस उस टूटी कुर्सी पर सिमटकर बैठ गईं। उनकी यह प्रतिक्रिया किसी प्यार करने वाली माँ की नहीं, बल्कि किसी खौफजदा कैदी की थी जो अपने संरक्षक को देखकर भी बोलने से डरता है। मैं बिना एक सेकंड गंवाए उनके सामने ठंडे फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। मैंने कांपते हाथों से उनकी पतली, सुखी हथेली को अपने हाथों में ले लिया। उनकी त्वचा कागज की तरह पतली महसूस हो रही थी। लेकिन तभी मेरी नजर उनके बाएं हाथ के अंगूठे पर पड़ी—वहाँ गहरे नीले रंग की स्टैम्प पैड की स्याही का एक धुंधला, लेकिन स्पष्ट निशान बना हुआ था।
मेरी सांसें अटक गईं। मैंने माँ का ठोड़ी पकड़कर उनका चेहरा ऊपर उठाया। उनकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। मैंने बदहवास होकर पूछा, “माँ… आपका चश्मा कहाँ है? आप ऐसे क्यों बैठी हैं?” माँ ने एक शब्द भी नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी डर से भरी आँखें रसोई की तरफ घुमा दीं, जहाँ नेहा अपनी उंगली पर चाबियों का भारी गुच्छा घुमाते हुए आकर खड़ी हो चुकी थी। नेहा के चेहरे पर अब कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि उस इंसान का अहंकार था जिसे लगता है कि उसने बाजी जीत ली है। नेहा ने अपनी गर्दन मटकाते हुए कहा, “चश्मा? अरे दीदी, वह तो कुछ दिन पहले हाथ से छूटकर टूट गया था। अब इस उम्र में नया बनवाकर भी क्या करना है? कौन सा इन्हें कोई किताबें पढ़नी हैं?”
“माँ का कमरा कौन-सा है, नेहा?” मैंने अपनी आवाज के गुबार को दबाते हुए पूछा। नेहा के होंठों पर एक कड़वी, जहरीली मुस्कान तैर गई। उसने रसोई के पीछे बने एक बेहद छोटे, सीलन भरे दरवाजे की तरफ अपनी चाबियों के गुच्छे से इशारा किया, “इसी में आराम करती हैं अम्मा जी। अपनी पसंद का कमरा चुना है इन्होंने।” मैंने आगे बढ़कर उस पतले दरवाजे को जोर से धकेला। दरवाजा खुलते ही एक अजीब सी घुटन, सीलन और कबाड़ की बदबू मेरे नथुनों से टकराई। अंदर कोई खिड़की नहीं थी, धूप या हवा का कोई रास्ता नहीं था। दीवार से सटकर एक जंग लगी लोहे की खाट रखी थी, जिस पर बमुश्किल दो इंच का एक गंदा, पतला गद्दा बिछा हुआ था। छत पर एक पीला, कम रोशनी वाला बल्ब लटक रहा था। कमरे के कोनों में प्लास्टिक के खाली डिब्बे, पुरानी झाड़ू, फटे हुए गत्ते और मकड़ी के जाले लटक रहे थे।
उस खाट के नीचे एक कोने में माँ की दवाइयों की आधी-अधूरी पट्टियाँ रखी थीं, और वहीं पास में उनका लाल रंग का प्लास्टिक का चश्मे का डिब्बा पड़ा था, जिसका ढक्कन टूटा हुआ था। 1 करोड़ 15 लाख रुपये के उस आलीशान मकान में मेरी माँ को इस अंधेरे, बदबूदार स्टोर रूम में फेंक दिया गया था। मैंने नेहा की तरफ घूमा, मेरी आँखें गुस्से से जल रही थीं, “माँ यहाँ सोती हैं? इस कबाड़खाने में?” नेहा ने बड़े ही बेपरवाह अंदाज में अपने कंधे मटकाए और ठंडे स्वर में बोली, “तो और क्या? इनके लिए इतना ही काफी है। अब इस उम्र में उन्हें कौन-सा पूरे दिन आलीशान कमरों में टहलना है या नाच-गाना करना है? बाहर वाले कमरों में एसी चलता है, इन्हें ठंड लगती है। तो यहीं शांति से पड़ी रहती हैं।”
नेहा का वह एक-एक शब्द मेरे कानों में उबलते हुए तेजाब की तरह गिरा। मेरे भीतर 10 साल से दबा हुआ सारा दर्द, त्याग और गुस्सा एक पल में ज्वालामुखी बनकर फटने लगा। सिंगापुर के वे दिन मेरी आँखों के सामने एक दुःस्वप्न की तरह घूमने लगे। जब मैं 2014 में विदेश गई थी, तो मेरे पास केवल एक छोटा सा सूटकेस और सिर पर भारी कर्ज था। मैंने सिंगापुर की गर्मी में, कम वेतन वाली एक लॉजिस्टिक्स कंपनी में काम करना शुरू किया था। पैसे बचाने के लिए मैंने 10 सालों में 5 बार बेहद सस्ते और गंदे हॉस्टल बदले थे। एक छोटे से बिना एसी वाले कमरे में मेरे साथ तीन और लड़कियाँ रहती थीं। मैं हफ्ते में सात दिन, दिन-रात ओवरटाइम करती थी ताकि हर महीने की 1 तारीख को माँ के बैंक खाते में 1,00,000 रुपये जमा हो सकें। अपने लिए मैंने कभी एक नया कपड़ा नहीं खरीदा, कभी किसी महंगे होटल में खाना नहीं खाया।
2019 में जब मैंने अपनी जमा पूंजी और लोन मिलाकर 1 करोड़ 15 लाख रुपये का यह घर खरीदा, तो वकीलों ने कहा था कि मकान अपने नाम पर ले लो। लेकिन मैंने मना कर दिया था। मैंने कहा था कि नहीं, यह घर मेरी माँ सावित्री देवी के नाम पर दर्ज होगा। मुझे लगा था कि अगर मकान माँ के नाम रहेगा, तो मेरे पिता के जाने के बाद उन्हें कभी किसी के सामने लाचार नहीं होना पड़ेगा, कोई उन्हें बेघर करने की धमकी नहीं दे पाएगा। लेकिन उस अँधेरे, बदबूदार स्टोर रूम में खड़े होकर आज मुझे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा और कड़वा सबक मिला था—कि अपनी कमाई से मकान खरीदकर किसी के नाम कर देना और उस इंसान को वास्तव में सुरक्षा देना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं। कागजों का टुकड़ा किसी की नीयत नहीं बदल सकता।
मेरी नजर अचानक खाट के नीचे पड़ी एक पुरानी, धूल से ढकी नीली फाइल पर पड़ी। उसमें से कुछ कागजात बाहर झांक रहे थे। जैसे ही मैंने झुककर उस फाइल को उठाना चाहा, माँ ने झटके से मेरी कलाई थाम ली। माँ की उंगलियों में शारीरिक ताकत तो बिलकुल नहीं बची थी, लेकिन उनकी उस पकड़ में एक अजीब सा खौफ और याचना थी। माँ ने कांपती, भीगी हुई आवाज में मुझसे फुसफुसाकर कहा, “इसे मत छू, पूजा… हाथ मत लगा बेटी! इसे यहीं रहने दे… वरना रोहन और नेहा बहुत गुस्सा करेंगे।” उस नीली फाइल के कवर पर शहर के एक प्रसिद्ध आई हॉस्पिटल का लोगो छपा हुआ था, और उसके कोने से एक सरकारी मुहर वाला काला कागज़ बाहर निकला हुआ था। मैंने माँ की आँखों में देखते हुए पूछा, “माँ, इस फाइल में क्या है? आप इतनी डरी हुई क्यों हैं? मुझे देखने दीजिए।” लेकिन माँ ने अपनी आँखें फेर लीं और चुपचाप रोने लगीं।
ठीक दोपहर के 12 बजकर 5 मिनट पर घर का मुख्य दरवाजा खुला और मेरा छोटा भाई रोहन अंदर दाखिल हुआ। रोहन के हाथ में महँगी बेकरी के डिब्बे थे और उसने ब्रांडेड कपड़े पहन रखे थे। मुझे देखकर उसके चेहरे पर एक पल के लिए झूठी, बनावटी मुस्कान आई, “दीदी! तुम? अचानक? अरे, मुझे फोन तो किया होता, मैं तुम्हें लेने एयरपोर्ट आ जाता!” लेकिन जैसे ही उसकी नजर खुली हुई रसोई, स्टोर रूम के खुले दरवाजे और फर्श पर बैठी माँ के पास खड़ी मुझ पर पड़ी, उसके चेहरे का सारा रंग उड़ गया। उसकी झूठी मुस्कान गायब हो गई और आँखों में एक गहरा डर तैर गया। उसने अपने हाथ का डिब्बा मेज पर पटक दिया।
मैंने खाट और उस सीलन भरे स्टोर रूम की तरफ उंगली उठाई, मेरी आवाज गुस्से से कांप रही थी, “रोहन… यह क्या तमाशा है? यह क्या बना रखा है तुमने इस घर को? और माँ इस कबाड़खाने में क्या कर रही हैं?” रोहन ने पहले अपनी पत्नी नेहा की तरफ देखा, जिसने उसे अपनी आँखों ही आँखों में चुप रहने का इशारा किया, फिर वह मेरी तरफ मुड़ा और लीपापोती करते हुए बोला, “दीदी… तुम बात को बेवजह बढ़ा रही हो। असल में… माँ को वहीं शांति मिलती है। बाहर वाले बेडरूम्स में टीवी की आवाज आती है, सड़क से गाड़ियों का शोर आता है। माँ खुद कहती हैं कि उन्हें छोटे कमरे में अकेला रहना पसंद है। हमने तो उनके आराम के लिए…”
“चुप रहो रोहन! एकदम चुप!” मैं चीख पड़ी। मेरी चीख से पूरा घर गूंज उठा। मैं सीधे घर के मुख्य मास्टर बेडरूम की तरफ बढ़ी। वहाँ का नजारा देखकर मेरी आत्मा तक कांप गई। जिस बेडरूम को मैंने माँ के लिए बनवाया था, जहाँ सबसे महंगा गद्दा और वेंटिलेशन का ध्यान रखा गया था, वहाँ नेहा की महंगे कपड़ों और साड़ियों से भरी तीन बड़ी अलमारियाँ रखी थीं। एसी 18 डिग्री पर चल रहा था, और शीशे के ड्रेसिंग टेबल पर हजारों रुपये की विदेशी कॉस्मेटिक्स, परफ्यूम और जेवरों के डिब्बे सजे हुए थे। रोहन और नेहा उस कमरे को किसी राजा की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि जिस माँ के नाम पर वह घर था, वह रसोई के पीछे सीलन में पड़ी थी।

मैं वापस हॉल में आई। मेरी नजर नेहा के गले में पड़े उस सोने के हार पर दोबारा टिक गई। इस बार मैंने उसे बहुत ध्यान से देखा। हार का डिजाइन पारंपरिक राजस्थानी नक्काशी का था, और उसके पीछे के हुक पर एक छोटा सा, घिसा हुआ लाल धागा बँधा हुआ था। वह लाल धागा देखकर मेरा दिल दहल गया। उस लाल धागे की कहानी मुझे बहुत अच्छी तरह याद थी। जब मैं 15 साल की थी, तब मेरे पिता ने माँ के पुश्तैनी हार का हुक ढीला होने पर उसमें अपने हाथों से वह लाल रेशमी धागा बाँधा था। पिता जी के गुजर जाने के बाद माँ ने उस हार को अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखा था। वह हार माँ का स्त्रीधन था, उनकी आखिरी निशानी थी।
मैंने नेहा के करीब जाकर उस हार की तरफ उंगली की, “नेहा… यह हार तुम्हारे गले में क्या कर रहा है? यह तो माँ का पुश्तैनी हार है!” नेहा का चेहरा पल भर के लिए जर्द पड़ा, लेकिन वह तुरंत दो कदम पीछे हटी और अपने गले के हार को अपने पल्लू से ढकते हुए नफरत से बोली, “क्या बकवास कर रही हैं दीदी? ऐसे हार बाजार में हजारों मिलते हैं! कोई आपका ही हार अनोखा नहीं है। ऐसे दूसरों के जेवरों पर नीयत मत बिगाड़िए और मुझे ऐसे घूरना बंद कीजिए!”
तभी माँ घिसटती हुई आई और उन्होंने मेरी बांह पकड़ ली। माँ के चेहरे पर असीम डर था, वे रोते हुए गिड़गिड़ाने लगीं, “पूजा… शांत हो जा मेरी बेटी! कोई बात मत बढ़ा! नेहा को कुछ मत कह… वरना रोहन मुसीबत में पड़ जाएगा! वे लोग… वे लोग बहुत बुरे हैं बेटी, तू चुपचाप वापस चली जा!” मैंने माँ के चेहरे को देखा। माँ रोहन या नेहा के डर से नहीं बोल रही थीं, उनकी नजर बार-बार उस खाट के नीचे पड़ी नीली फाइल पर जा रही थी। वे उस फाइल के राज को बाहर आने से बचाना चाहती थीं ताकि उनका बेटा जेल न चला जाए।
मेरी सहनशक्ति का बांध अब पूरी तरह टूट चुका था। मैंने अपनी जींस की जेब से अपना आईफोन निकाला और उसमें से एक नंबर डायल करने लगी। रोहन तेजी से आगे बढ़ा और उसने मेरा हाथ रोकने की कोशिश की, “दीदी! तुम किसे फोन मिला रही हो? घर का मामला है, बैठकर बात करते हैं ना!” मैंने उसका हाथ झटक दिया और बर्फीली आवाज में कहा, “मैं किसे फोन कर रही हूँ? मैं एडवोकेट मीरा शर्मा को फोन कर रही हूँ। मैं वैशाली नगर सोसायटी के सिक्योरिटी हेड को बुला रही हूँ। और मैं उस सब-रजिस्ट्रार अफसर को फोन कर रही हूँ, जिसने 3 दिन पहले मुझे इस घर के कागज़ों की असली और खौफनाक हकीकत बताई थी!”
मेरे यह शब्द सुनते ही कमरे में एक ऐसा भयानक सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने हवा खींच ली हो। रोहन के चेहरे का बचा-कुचा रंग उड़ गया, और नेहा जो अब तक सोफे पर रानी बनी बैठी थी, उसके चेहरे पर पहली बार एक खौफनाक शिकन उभरी।
सच तो यह था कि मैं सिंगापुर से बिना बताए सिर्फ माँ से मिलने नहीं आई थी। तीन दिन पहले, वैशाली नगर सोसायटी के सेक्रेटरी रमेश अंकल का मेरे सिंगापुर वाले नंबर पर एक गोपनीय फोन आया था। रमेश अंकल मेरे स्वर्गीय पिता के बहुत पुराने और भरोसेमंद दोस्त थे। उन्होंने मुझे बताया था कि ‘सावित्री निवास’ के मालिकाना हक के सरकारी रिकॉर्ड में कुछ बहुत बड़ा हेरफेर हुआ है। जो घर नगर निगम और सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में सावित्री देवी के नाम पर दर्ज था, वह अब अचानक रोहन और नेहा के नाम पर दिखाई दे रहा था। उसी रात मैंने अपनी कॉलेज की दोस्त और राजस्थान हाईकोर्ट की जानी-मानी प्रॉपर्टी वकील मीरा शर्मा से संपर्क किया था। मीरा ने मुझे सरकारी पोर्टल से कुछ शुरुआती दस्तावेज निकालकर दिखाए थे, जिन्हें देखकर मेरे पैर उखड़ गए थे। मैं उसी वक्त अगली सुबह की फ्लाइट पकड़कर भारत आई थी। मुझे यह तो पता था कि कागजों में कोई बड़ा घोटाला हुआ है, लेकिन मुझे यह कतई अंदाजा नहीं था कि मेरी माँ को इस घर के अंदर एक जानवर की तरह स्टोर रूम में कैद करके रखा गया होगा।
नेहा ने अपनी घबराहट को छुपाने के लिए तुरंत अपना रुख बदला। वह सोफे पर बैठकर अकड़ते हुए तीखे स्वर में बोली, “हाँ तो बुला लो! जिसे बुलाना है बुला लो! हम भी देखते हैं कि कौन कानून का सूरमा आता है जो हमें हमारे ही घर से बाहर निकाल देगा! कागज़ हमारे नाम हैं, समझे तुम? कोर्ट-कचहरी में बरसों लग जाते हैं, हम भी देखेंगे कि सिंगापुर से आकर तुम यहाँ क्या उखाड़ लोगी!”
दोपहर के ठीक 1 बजकर 10 मिनट पर घर की घंटी दोबारा बजी। दरवाजा खुला और एडवोकेट मीरा शर्मा अंदर दाखिल हुईं। उनके हाथ में एक भारी, मोटा सफेद लिफाफा था जिसमें कोर्ट और रजिस्ट्रार ऑफिस की मुहर लगे कानूनी दस्तावेज थे। उनके ठीक पीछे वैशाली नगर सोसायटी के सेक्रेटरी रमेश अंकल और सोसायटी के दो बड़े, तगड़े सुरक्षा गार्ड खड़े थे। रोहन का पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था। वह एक के बाद एक कांच के गिलास से पानी पिए जा रहा था। नेहा दूर कोने में खड़ी होकर अपने भाई सुरेश को बार-बार फोन मिला रही थी, लेकिन दूसरी तरफ से लगातार आ रहा था कि ‘नंबर पहुंच से बाहर है’।
मीरा शर्मा ने बिना कोई वक्त गंवाए उस सफेद लिफाफे को हॉल की कांच की मेज पर जोर से रखा। उन्होंने सबसे पहले माँ का हाथ थामा और उन्हें बेहद सम्मान के साथ सोफे पर बैठाया। फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा और अपनी गंभीर, पेशेवर आवाज में बोलना शुरू किया, “पूजा… जैसा कि तुमने मुझे जांच करने को कहा था, सच उससे कहीं ज्यादा भयानक और गैर-कानूनी है। यह घर आज से ठीक 14 महीने पहले, सावित्री देवी के नाम से हटाकर पूरी तरह से रोहन और नेहा के नाम पर ट्रांसफर कर दिया गया है।”
यह सुनते ही माँ ने झटके से अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में असीम हैरानी थी। मीरा ने लिफाफे में से एक और आधिकारिक कागज़ निकाला और उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा, “और इस धोखाधड़ी का सबसे घिनौना हिस्सा यह है कि ट्रांसफर डीड बनने के ठीक 18 दिन बाद, रोहन और नेहा ने इस पूरे मकान को एक प्राइवेट फाइनेंस संस्था के पास गिरवी रखकर उस पर 85 लाख रुपये का भारी-भरकम लोन ले लिया है!”
यह शब्द सुनते ही रोहन के कांपते हाथों से कांच का गिलास छूटकर फर्श पर गिरा और चकनाचूर हो गया। पानी और कांच के टुकड़े पूरे संगमरमर पर बिखर गए। माँ अपनी जगह से बदहवास होकर खड़ी हो गईं। उनकी कांपती, रोती हुई आवाज पूरे कमरे में गूंज उठी, “क्या? लोन? घर का ट्रांसफर? यह तुम क्या कह रही हो बेटी? मैंने तो कभी किसी कागज़ पर अपना दस्तखत नहीं किया! मैंने तो कभी अपना घर किसी के नाम नहीं किया! यह घर तो मेरी पूजा की पसीने की कमाई है, मैं इसे किसी को कैसे दे सकती हूँ?”
नेहा ने जब देखा कि अब उसकी पूरी पोल खुल चुकी है, तो वह अचानक एक घायल नागिन की तरह मेज की तरफ झपटी और उस नीली फाइल को उठाकर फाड़ने की कोशिश करने लगी। लेकिन वहां खड़े सोसायटी के गार्ड ने तुरंत सतर्कता दिखाते हुए नेहा का रास्ता रोक लिया और फाइल को उसके हाथ से छीनकर मीरा शर्मा के सुपुर्द कर दिया।
मीरा ने उस नीली फाइल को खोला, जिसके कवर पर आई अस्पताल का नाम लिखा था। जैसे ही फाइल के पन्ने पलटे गए, कमरे में मौजूद हर शख्स की रूह कांप गई। उस फाइल में किसी मोतियाबिंद के ऑपरेशन के फर्जी कागजात थे।
मीरा ने उन कागजों को पढ़ते हुए कड़क आवाज में खुलासा किया, “तो यह है असली खेल! रोहन और नेहा ने 14 महीने पहले माँ का मोतियाबिंद का फर्जी ऑपरेशन करवाने के नाम पर उन्हें एक डॉक्टर के क्लिनिक पर ले गए थे। वहां आँखों की जांच और दवाइयों के कागजों के नाम पर, माँ की आँखों में धुंधलापन होने का फायदा उठाकर, उनसे गिफ्ट डीड और ट्रांसफर पेपर्स पर अँगूठे के निशान लगवाए गए थे! माँ को लगा कि वे अपनी आँखों के इलाज के पर्चे पर अँगूठा लगा रही हैं, जबकि असल में वे अपनी ही जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई अपने बेटे और बहू के नाम छल से ट्रांसफर कर रही थीं!”
“यह सब झूठ है! यह फाइल फर्जी है! यह औरत हमें फंसा रही है!” नेहा चीखने लगी, लेकिन उसकी आवाज में अब केवल हार का खौफ था।
मीरा शर्मा ने फाइल में से एक और काला कागज़ निकाला, “नहीं नेहा, झूठ तुम बोल रही हो। इस फाइल में केवल ट्रांसफर पेपर्स ही नहीं हैं, बल्कि इसमें रोहन के कसीनो और सट्टेबाजी के 50 लाख रुपये के कर्ज के कागजात भी हैं। तुमने और रोहन ने इस 85 लाख के लोन के पैसों से अपना कर्ज चुकाया, महँगी कार खरीदी, और इस घर का रिनोवेशन करवाकर अपनी ऐश-आराम की जिंदगी बनाई। और जब माँ को धीरे-धीरे इस बात का अहसास होने लगा और उन्होंने विरोध करना चाहा, तो तुमने उनका चश्मा तोड़ दिया, उनका मोबाइल छीन लिया, उनके सारे पुश्तैनी जेवर चुरा लिए और उन्हें इस अँधेरे स्टोर रूम में बंद कर दिया ताकि कोई बाहरी इंसान उनसे न मिल सके!”
रोहन घुटनों के बल फर्श पर गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा, “दीदी… मुझे माफ कर दो! नेहा ने जैसा कहा मैंने वैसा ही किया! मुझे कसीनो वालों से जान का खतरा था, वे मुझे मार डालते! इसलिए मुझे यह सब करना पड़ा! दीदी, मुझे पुलिस से बचा लो!”
माँ जो अब तक सोफे पर बैठी सब सुन रही थीं, उनकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उन्होंने अपने उस बेटे को देखा जिसे उन्होंने पेट काटकर पाला था, और फिर उस बेटी को देखा जिसने अपनी जिंदगी के 10 साल विदेश में गला दिए थे। माँ की कांपती आवाज में अब कोई डर नहीं था, बल्कि एक आत्म-सम्मान की ज्वाला थी। माँ ने रोहन की तरफ देखा और कहा, “मैंने तुझे जन्म दिया रोहन… लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि तू मेरा बेटा कहलाने के लायक नहीं है। जिसने अपनी माँ की आँखों का फायदा उठाकर उसका घर छीन लिया, वह मेरा बेटा कैसे हो सकता है?”
मीरा शर्मा ने तुरंत अपने फोन से शहर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के अधिकारियों को फोन मिलाया। उन्होंने फोन पर साफ शब्दों में कहा, “हेलो सर, मैं एडवोकेट मीरा शर्मा बोल रही हूँ। वैशाली नगर के सावित्री निवास में सीनियर सिटीजन एब्यूज, बुजुर्ग महिला को बंधक बनाने, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज बनाने और करोड़ों की संपत्ति के गबन का एक बेहद गंभीर आपराधिक मामला सामने आया है। आप तुरंत अपनी टीम भेजिए।”
नेहा का सारा घमंड पल भर में राख हो गया। वह जानती थी कि जालसाजी और बुजुर्ग महिला के साथ अत्याचार के इस मामले में गैर-जमानती धाराएं लगेंगी और उन्हें बरसों जेल में सड़ना पड़ेगा। वह भागकर दरवाजे की तरफ जाने लगी, लेकिन बाहर खड़े सुरक्षा गार्ड्स ने रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया था।
उसी समय, नीचे का मुख्य लोहे का गेट एक जोर की आवाज के साथ खुला। सीढ़ियों पर कई लोगों के भारी, पुलिसिया जूतों की धमक गूंजने लगी। राजस्थान पुलिस की एक विशेष टीम, जिसमें दो महिला अधिकारी भी शामिल थीं, तेजी से ऊपर आ रही थी।
मैंने आगे बढ़कर माँ को अपने सीने से लगा लिया। 10 साल की थकान, दर्द और अकेलापन जैसे उस एक आलिंगन में बह गया। मैंने माँ के सफेद बालों को चूमा और उनके कान में फुसफुसाकर कहा, “माँ… अब आपको किसी से डरने की जरूरत नहीं है। आपकी बेटी वापस आ गई है। अब यह ‘सावित्री निवास’ फिर से आपका होगा, और इस घर से उस काले नाम को मिटाकर मैं खुद अपने हाथों से फिर से आपका नाम लिखूँगी।”
माँ ने मुझे कसकर पकड़ लिया। बाहर पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई खड़ी थीं, और अंदर उस अँधेरे स्टोर रूम के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो रहे थे, ताकि एक माँ को उसका खोया हुआ सम्मान, उसकी छत और उसकी बेटी का अटूट प्यार वापस मिल सके।
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तस्वीर को ध्यान से देखें और पहचानें सबसे जोखिम भरी स्थिति! पहेली का सही उत्तर और विस्तृत विश्लेषण तस्वीर में…
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सुबह के ठीक 11 बजकर 15 मिनट हो रहे थे जब मेरी टैक्सियाँ जयपुर के वैशाली नगर की उस शांत…
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