Story

अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में जब भाई की अंतिम सांसें थमीं, तब अंधी भाभी ने खोले वो खौफनाक और दिल दहला देने वाले राज़—जो सात फेरों के पीछे पाँच सालों से दफ़न थे!

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उस रात अस्पताल के गलियारे की सफेद ट्यूबलाइटें अजीब सी खामोशी उगल रही थीं। फिनाइल की तीखी गंध हवा में इस कदर घुली हुई थी कि सांस लेना भी भारी लग रहा था। ऑपरेशन थिएटर के बाहर का वह लंबा कॉरिडोर केवल सीमेंट और चूने की दीवार नहीं था, बल्कि मेरे और मेरी भाभी माया के लिए एक ऐसा दायरा बन चुका था जहाँ हर एक सेकंड एक सदियों पुराने खौफ की तरह बीत रहा था। मेरे छोटे भाई, मेरे प्राणों से प्यारे रोहन की धड़कनें उस भारी स्टील के दरवाजे के उस पार एक मशीन के सहारे चल रही थीं। ठीक दस घंटे बीत चुके थे। दस घंटे, छह सौ मिनट, छत्तीस हजार सेकंड… और हर एक पल में मैंने अपनी आत्मा को तिल-तिल कर मरते देखा था।

मेरे बगल में बेंच पर माया बैठी थी। उसकी उंगलियाँ अपनी सफेद छड़ी के मूठ को इतनी सख्ती से जकड़े हुए थीं कि उसकी पोरों का रंग उड़कर सफेद पड़ चुका था। वह जन्म से दृष्टिहीन थी। उसने इस दुनिया की धूप, छांव, होली के रंग या दीवाली के दीये कभी अपनी आँखों से नहीं देखे थे। पर उस वक्त, उस अंधेरे में भी उसकी बेबस आँखों से बहते आंसुओं की धार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वह बिना कोई आवाज किए रो रही थी, उसका पूरा शरीर किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। मैंने आगे बढ़कर उसके ठंडे, बर्फ जैसे हाथों को अपने हाथों में ले लिया। रोहन मेरा छोटा भाई था, मुझसे चार साल छोटा, लेकिन माया के लिए वह केवल एक पति नहीं, उसकी पूरी दुनिया, उसकी दोनों आँखें और उसकी जिंदगी की इकलौती रोशनी था।

तभी भारी लोहे का दरवाजा चरमराते हुए खुला। सर्जन बाहर निकले। उनके चेहरे पर छाई थकान और झुकी हुई गर्दन ने बिना कुछ बोले ही सब कुछ बयां कर दिया। मेरा दिल जैसे सीने में ही धड़कना बंद हो गया। डॉक्टर ने अपना मास्क हटाया, एक गहरी सांस ली और धीमी, भर्राई हुई आवाज में कहा, “आई एम सॉरी… हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, पर हम रोहन को बचा नहीं सके। मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर और दिल का दौरा… उनका शरीर और बर्दाश्त नहीं कर सका।”

वह एक वाक्य नहीं था, मेरे पूरे अस्तित्व पर गिरा हुआ बिजली का कहर था। मेरे मुंह से एक चीख भी न निकल सकी, लगा जैसे किसी ने कलेजा नोचकर बाहर फेंक दिया हो। मैं लड़खड़ाकर दीवार के सहारे गिर पड़ी। मेरा रोहन… मेरा चुलबुला, हमेशा मुस्कुराने वाला, सबका सहारा बनने वाला बाईस साल का वह छोटा सा लड़का जो अब सत्ताईस का भरा-पूरा नौजवान था, वह हमें छोड़कर हमेशा के लिए चला गया था।

मैं रोने ही वाली थी कि अचानक माया के कांपते हाथों ने मेरी कलाई को बेहद मजबूती से पकड़ लिया। उसकी पकड़ में कोई साधारण कमजोरी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी, एक अनजाना खौफ और एक ऐसा तनाव था जिसने मेरे बहते आंसुओं को भी पल भर के लिए सुन्न कर दिया।

उसने अपना सिर मेरी तरफ घुमाया। उसकी अंधी आँखें खाली थीं, पर उन खाली कोटरों में एक ऐसा राज़ तैर रहा था जिसकी कल्पना भी मैंने कभी नहीं की थी। उसने बेहद धीमी, कांपती हुई कानाफूसी में कहा, “दीदी… रोइए मत। अभी हमारे पास बिखरने का वक्त नहीं है। माँ-बाबूजी के अस्पताल पहुँचने से पहले मुझे आपको एक बात बतानी है। एक ऐसा सच, जिसे रोहन ने पाँच सालों से अपनी सांसों में छुपा रखा था। एक ऐसा सच, जो अगर आज इस दहलीज से बाहर गलत तरीके से निकला, तो हमारे पूरे खानदान की रूह कांप उठेगी।”

मैंने चौंककर उसकी तरफ देखा। “माया! यह तुम क्या कह रही हो? रोहन चला गया… हमारा सब कुछ लुट गया और तुम… तुम इस वक्त किस सच की बात कर रही हो? कोई वसीयत? कोई कर्जा? या रोहन पर कोई मुसीबत थी?”

माया ने अपनी गर्दन ना में हिलाई। उसके सूखे होठों पर एक दर्दनाक, रहस्यमयी मुस्कान कौंधी। “काश दीदी, काश यह सिर्फ पैसों या जायदाद का मामला होता। यह उस कुर्बानी का सच है जिसके दम पर मैं पिछले पाँच सालों से सुहागन बनकर जी रही थी। यह उस गुनाह और उस प्रायश्चित का सच है जिसकी शुरुआत तब हुई थी जब रोहन सिर्फ सात साल का था।”

उसकी बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। सात साल? जब रोहन पहली बार माया को हमारे घर लेकर आया था?

मेरी यादों के पन्ने हवा के झोंके की तरह फड़फड़ाने लगे। मुझे वह दिन आज भी साफ याद था। दिल्ली के करोल बाग की तंग गलियों में हमारा छोटा सा खुशहाल घर था। रोहन सात साल का था और एक दिन स्कूल से लौटते वक्त उसने माया का हाथ पकड़ रखा था। माया, जो सेंट पीटर्स स्कूल में उसी की कक्षा में एक कोने में अकेले बैठी रहती थी। वह एक अनाथ बच्ची थी जिसे शहर के एक सीधे-सादे बुजुर्ग दंपति, मिस्टर और मिसेज वर्मा ने तब गोद लिया था जब किसी निर्दयी माँ ने जन्म के तुरंत बाद उसे एक चैरिटेबल अस्पताल के पालने में लावारिस छोड़ दिया था। उसके दृष्टिहीन होने की वजह से समाज, रिश्तेदार और यहाँ तक कि स्कूल के बाकी बच्चे भी उससे कतराते थे। कोई उसे ‘अंधी’ कहकर चिढ़ाता, तो कोई दया की झूठी भीख देकर दूर हट जाता।

मगर रोहन अलग था। उस सात साल के मासूम बच्चे ने न जाने किस मिट्टी का दिल पाया था कि उसने पहले ही दिन से माया को अपनी जिम्मेदारी मान लिया था। स्कूल की प्रार्थना सभा से लेकर छुट्टी की घंटी बजने तक, रोहन माया की परछाई बन गया था। वह उसका भारी बस्ता अपने नन्हे कंधों पर उठाता, कैंटीन में सबसे पहले दौड़कर उसके लिए कुर्सी रोकता, और सड़क पार करते समय उसका हाथ ऐसे थामता मानो उसके हाथ में कांच का कोई अनमोल खिलौना हो।

बचपन की वह निस्वार्थ दोस्ती कब जवानी की दहलीज पर पहुँचकर एक अटूट, रूहानी मोहब्बत में बदल गई, हमें पता ही नहीं चला। जब कॉलेज के दिनों में रोहन ने पूरे परिवार के सामने खड़े होकर कहा था कि वह माया से शादी करेगा, तो रिश्तेदारी में कोहराम मच गया था। चाचियों, बुआओं और पड़ोसियों ने हजार ताने मारे—”एक अंधी लड़की खानदान की बहू बनेगी? जिंदगी भर उसकी सेवा कौन करेगा? वंश कैसे चलेगा?”

मगर रोहन अपने फैसले पर चट्टान की तरह अडिग रहा। उसने बाबूजी की आँखों में आँखें डालकर कहा था, “बाबूजी, मोहब्बत आँखों से चेहरे देखकर नहीं, रूह से की जाती है। अगर माया दुनिया नहीं देख सकती, तो मैं उसकी आँखें बनूँगा। यह मेरा फैसला भी है और मेरी जिंदगी का इकलौता मकसद भी।” रोहन की उस जिद और पवित्र प्रेम के आगे पूरे परिवार को झुकना पड़ा था। जब रोहन ने माया की मांग में सिंदूर भरा था, तो मेरी आँखों में खुशी और गर्व के आंसू थे।

शादी के बाद के वो पाँच साल किसी परियों की कहानी जैसे थे। रोहन ने अपने हर वादे को खुदा की इबादत की तरह निभाया था। वह रोज़ शाम को छत पर बैठकर माया का हाथ अपने हाथों में लेता और उसे आसमान के बदलते रंगों के बारे में बताता। वह कहता, “माया, आज जब सूरज डूब रहा था, तो आसमान का रंग बिल्कुल तुम्हारी उस गुलाबी साड़ी जैसा था जो मैंने तुम्हें पहली सालगिरह पर दी थी। और वो जो बादल का टुकड़ा पूरब की तरफ जा रहा है, वह बिल्कुल उस सफेद चमेली के फूल जैसा महक रहा है जो तुम अपने जूड़े में लगाती हो।”

रोहन की बातों से माया की अंधी दुनिया में भी इंद्रधनुष खिल उठते थे। वह रोहन की धड़कनों से पहचान लेती थी कि वह कब खुश है, कब थका हुआ है और कब किसी गहरी सोच में डूबा है। लेकिन आज… आज अस्पताल के इस मनहूस गलियारे में माया जो कुछ कहने जा रही थी, वह उस खूबसूरत प्रेम कहानी की नींव को ही हिला देने वाला था।

माया ने मेरे हाथों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर दी। उसने अपनी आवाज को फुसफुसाहट में बदलते हुए कहा, “दीदी, सुनिए… जो मैं बताने जा रही हूँ, उसे अपने सीने में दफन रखने की हिम्मत जुटाइए। रोहन की यह मौत कोई अचानक हुआ हादसा नहीं है। वह पिछले तीन सालों से एक भयानक बीमारी से जूझ रहा था। उसे एक बेहद दुर्लभ कार्डियक और न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर था, जिसे डॉक्टर्स ने लाइलाज घोषित कर दिया था। उसका दिल धीरे-धीरे काम करना बंद कर रहा था।”

मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। “क्या?! तीन साल से? और उसने हमसे… अपने माँ-बाप से, अपनी सगी बहन से यह बात छुपाई? और तुमने… तुमने भी हमें कुछ नहीं बताया माया? तुम कैसी पत्नी हो?” मेरे गुस्से और सदमे का बांध टूटने लगा था।

“दीदी, पहले पूरी बात सुनिए!” माया की आँखों से आंसुओं का नया सैलाब फूट पड़ा। “उसने मुझसे भी यह बात छुपाई थी। उसने दुनिया के हर इंसान से अपनी बीमारी को एक भयानक राज़ की तरह छुपाया। वह रोज़ रात को जब मेरे सोने का इंतज़ार करता, तब बाथरूम में जाकर खून की उल्टियाँ करता था और नल चला देता था ताकि किसी को उसकी कराहने की आवाज़ न सुनाई दे। वह हर महीने जो कहता था कि वह ऑफिस के काम से टूर पर जा रहा है, दरअसल वह एम्स के प्राइवेट वार्ड में अपनी कीमो और पेन-थेरेपी के लिए भर्ती होता था ताकि अपनी जिंदगी के कुछ दिन और खरीद सके।”

“पर क्यों? उसने ऐसा क्यों किया? हमारे पास पैसे थे, हम इलाज के लिए विदेश जा सकते थे, बाबूजी अपना सब कुछ बेच देते!” मैंने रोते हुए माया के कंधे झकझोर दिए।

“क्योंकि अगर आप सबको पता चल जाता, तो रोहन का वह अंतिम सपना कभी पूरा नहीं हो पाता जिसके लिए वह पिछले पाँच सालों से जी रहा था,” माया ने अपनी अंधी आँखों को छत की तरफ उठाया और एक ऐसी बात कही जिसने मेरे होश उड़ा दिए। “दीदी, रोहन मुझसे सिर्फ इसलिए प्यार नहीं करता था कि मैं बेबस थी। रोहन मुझसे इसलिए जुड़ा था क्योंकि हमारे परिवारों के बीच एक ऐसा खूनी अतीत था जिसका बोझ उसका मासूम दिल बचपन से उठा रहा था।”

मेरे मुंह से आवाज नहीं निकली। मैंने सिर्फ हक्का-बक्का होकर उसकी तरफ देखा।

माया ने गहरी सांस ली, उसकी आवाज में गजब का ठहराव और असीमित दर्द था। “दीदी, क्या आपको याद है… आज से छब्बीस साल पहले, जब आप सिर्फ आठ साल की थीं और रोहन दो साल का था, आपके बाबूजी का अलीगढ़ के पास एक भयंकर कार एक्सीडेंट हुआ था?”

मेरी याददाश्त के धुंधले कोहरे में एक खौफनाक मंजर कौंध गया। हाँ, मुझे याद था। बाबूजी की नई फिएट कार हाईवे पर एक पेड़ से टकरा गई थी। उस हादसे में बाबूजी महीनों अस्पताल में रहे थे। पूरा परिवार उजड़ते-उजड़ते बचा था।

“हाँ… मुझे याद है,” मेरी आवाज कांप रही थी। “पर उसका तुमसे क्या ताल्लुक?”

“उस हादसे में सिर्फ आपके बाबूजी की कार नहीं टकराई थी दीदी,” माया ने रोते हुए कहा। “उस रात हाईवे पर एक गरीब परिवार अपनी बीमार नवजात बच्ची को लेकर पैदल अस्पताल जा रहा था। बारिश बहुत तेज थी। आपके बाबूजी की कार बेकाबू होकर उस परिवार से टकराई थी। उस टक्कर में उस बच्ची के पिता की मौके पर ही मौत हो गई थी, और माँ गंभीर रूप से घायल हो गई थी। वह नवजात बच्ची उछलकर सड़क किनारे पत्थरों पर जा गिरी थी, जिससे उसके सिर और आँखों की नसों पर ऐसी गहरी चोट आई कि उसने अपनी आँखों की रोशनी हमेशा-हमेशा के लिए खो दी।”

मेरे पूरे शरीर में कंपकंपी छूट गई। मेरा गला सूख गया। “नहीं… ऐसा नहीं हो सकता… बाबूजी ने तो कहा था कि कार सिर्फ पेड़ से टकराई थी…”

“बाबूजी डर गए थे दीदी,” माया ने कहा। “उस ज़माने में पुलिस केस और बदनामी के डर से बाबूजी के साथ मौजूद उनके रिश्तेदारों ने उस घायल महिला और उस अंधी बच्ची को पास के एक छोटे से चैरिटेबल मिशनरी अस्पताल में भर्ती करा दिया और भारी रकम देकर मामला रफा-दफा करवा दिया। वह घायल माँ अस्पताल में कई दिनों तक कोमा में रही, और होश आने पर जब उसे पता चला कि उसका पति मर चुका है और उसकी बच्ची हमेशा के लिए अंधी हो चुकी है, तो गहरे डिप्रेशन में आकर वह उस बच्ची को उसी अस्पताल के अनाथ पालने में छोड़कर कहीं गायब हो गई। वह अनाथ, अंधी बच्ची… मैं थी दीदी। मैं वही बच्ची थी जिसकी दुनिया आपके परिवार की एक लापरवाही ने छीन ली थी।”

मुझे लगा जैसे मेरे ऊपर कोई विशाल पहाड़ टूट पड़ा हो। मेरे सिर में चक्कर आने लगे। मैं जिस परिवार को शहर का सबसे शरीफ और नेक परिवार समझती थी, उसके दामन पर इतना बड़ा दाग लगा था?

“लेकिन… लेकिन रोहन को यह सब कैसे पता चला?” मैंने लड़खड़ाती जुबान से पूछा।

“जब रोहन सात साल का था, तब उसने बाबूजी की पुरानी अलमारी में से एक सीक्रेट फाइल और बाबूजी की वह डायरी पढ़ ली थी जिसमें बाबूजी ने अपने उस गुनाह का पश्चाताप हर पन्ने पर आंसुओं से लिखा था। बाबूजी हर साल उस चैरिटेबल ट्रस्ट को गुप्त दान भेजते थे जहाँ से मुझे मिस्टर वर्मा ने गोद लिया था। रोहन ने जब उस डायरी में उस अनाथ अंधी बच्ची का नाम ‘माया’ और उस स्कूल का पता पढ़ा, तो उस सात साल के बच्चे के नन्हे से दिमाग में सिर्फ एक ही बात बैठ गई—कि उसके परिवार ने एक मासूम की आँखें छीनी हैं, और अब उसकी पूरी जिंदगी का इकलौता फर्ज है उस मासूम को उसकी आँखें लौटाना!”

माया की बातें किसी जलते हुए तीर की तरह मेरे सीने में उतर रही थीं। मुझे अब समझ आ रहा था कि बचपन में रोहन जब भी माया को देखता था, तो उसकी आँखों में सिर्फ हमदर्दी नहीं, बल्कि एक अजीब सी आत्मग्लानि और समर्पण क्यों होता था। वह सात साल का बच्चा अपने पिता के गुनाह का प्रायश्चित अपनी नन्हीं हथेलियों पर उठाकर चल रहा था।

“दीदी,” माया ने आगे कहा, “रोहन ने जब मुझसे शादी की, तब तक उसका मकसद सिर्फ मेरा सहारा बनना था। लेकिन शादी के दो साल बाद जब उसे अपनी जानलेवा दिल की बीमारी के बारे में पता चला, तो उसने टूट जाने के बजाय एक खौफनाक और अविश्वसनीय फैसला किया। उसने डॉक्टरों से सलाह ली। उसने देश के सबसे बड़े आई-स्पेशलिस्ट से मिलकर मेरी आँखों की पूरी मेडिकल हिस्ट्री की जांच करवाई। डॉक्टरों ने बताया कि मेरी आँखों की ऑप्टिक नर्व पूरी तरह मृत नहीं हैं, अगर किसी स्वस्थ इंसान की कॉर्निया और खास टिशू तुरंत ट्रांसप्लांट किए जाएं, तो मैं यह खूबसूरत दुनिया देख सकती हूँ।”

माया की आवाज अब इतनी भारी हो चुकी थी कि उसके शब्द सिसकियों में बदल रहे थे। “रोहन जानता था कि उसकी जिंदगी के दिन गिने-चुने हैं। इसलिए उसने पिछले तीन सालों में हर एक दर्द, हर एक तकलीफ सिर्फ इसलिए सही ताकि वह अपने अंगों को इस ऑपरेशन के लायक स्वस्थ रख सके। उसने लीगल पेपरवर्क तैयार करवाया। उसने अपनी वसीयत में अपनी आँखें, अपनी कॉर्निया मेरे नाम डोनेट करने का लीगल एफिडेविट बनवाया। उसने डॉक्टरों को सख्त हिदायत दी थी कि उसकी मौत के तुरंत छह घंटे के भीतर मेरी आँखों की सर्जरी शुरू हो जानी चाहिए।”

मेरे मुंह से एक बेतहाशा चीख निकली। मैंने अपना मुंह अपने दोनों हाथों से दबा लिया। हे भगवान! रोहन… मेरा भाई… उसने अपनी मौत को भी एक तोहफे में बदल दिया था? वह अपनी आँखों से माया को दुनिया दिखाने की अपनी उस बचपन की कसम को पूरा करने के लिए अपनी जान की आहुति दे गया था?

“दीदी, लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती…” माया ने मेरा हाथ अपने सीने पर रख दिया। उसकी धड़कनें पागलों की तरह भाग रही थीं। “असली राज़ वह है जो रोहन भी नहीं जानता था।”

मैंने चौंककर उसकी तरफ देखा। “क्या मतलब? और क्या बाकी है माया?”

माया के चेहरे पर एक ऐसी रूहानी चमक आ गई जो मैंने किसी इंसान के चेहरे पर कभी नहीं देखी थी। उसने धीरे से कहा, “रोहन को लगता था कि वह मुझसे अपनी बीमारी छुपाने में कामयाब रहा। उसे लगता था कि वह रोज़ रात को जो दर्द सहता था, वह मैं अपनी अंधी आँखों की वजह से देख नहीं पाती थी। लेकिन दीदी, आँखें भले ही अंधी हों, एक औरत का दिल कभी अंधा नहीं होता। मैं पिछले दो सालों से जानती थी कि रोहन धीरे-धीरे मुझसे दूर जा रहा है।”

मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। “तुम… तुम जानती थीं?”

“हाँ दीदी,” माया की आँखों से गिरता हर आंसू अब किसी पवित्र गंगाजल की तरह लग रहा था। “जब वह रात को मेरे पास सोता था, तो उसकी छाती पर सिर रखकर मैं उसकी धड़कनों की अनियमित रफ्तार सुनती थी। जब वह मुझे खाना खिलाता था, तो उसके कांपते हुए हाथों का कंपन मेरी रूह तक महसूस होता था। जब वह मुझे गले लगाता था, तो उसके बदन से आने वाली दवाओं और अस्पताल की गंध को मैं अपनी सांसों में पहचानती थी। मैंने उसके कोट की जेब में छिपी हुई पेन-किलर्स और एम्स की वो मेडिकल रिपोर्ट्स छूकर ब्रेल लिपि की तरह पढ़ ली थीं।”

“तो फिर तुम चुप क्यों रहीं माया? तुमने उसे इलाज के लिए क्यों नहीं रोका? तुमने उसे अपनी जिंदगी की कुर्बानी देने क्यों दिया?” मेरी आवाज में बेबसी और गुस्सा दोनों थे।

“क्योंकि अगर मैं उसके सामने यह जाहिर कर देती कि मैं सब जानती हूँ, तो वह अंदर से टूट जाता दीदी!” माया फफक-फफक कर रो पड़ी। “रोहन का पूरा आत्मसम्मान, उसका पूरा वजूद इसी बात पर टिका था कि वह मेरा रक्षक है, वह मेरा मसीहा है। अगर मैं उससे कह देती कि मुझे सच पता है, तो वह अपने आखिरी दिनों में उस आत्मग्लानि और बेबसी के बोझ तले दबकर रोज मरता। वह अपनी नज़र में एक नाकाम पति बन जाता जो अपनी पत्नी को हमेशा के लिए बेसहारा छोड़कर जा रहा था। मैंने अपने सीने पर पत्थर रखकर दो साल तक रोज़ उसके सामने मुस्कुराने का नाटक किया। मैंने रोज़ उसके उस झूठ को सच माना ताकि वह जब भी मुझे देखे, उसे अपनी कामयाबी पर गर्व हो। मैंने हर रोज़ उसके दिए हुए उस दर्द को अपनी इबादत बनाया ताकि वह शांति से, एक विजेता की तरह अपनी अंतिम सांस ले सके!”

उस अंधी लड़की के प्यार और उसके त्याग की गहराई को देखकर मेरा रोम-रोम कांप उठा। यह किस स्तर का प्रेम था? जहाँ एक पति अपनी जान देकर पत्नी को रोशनी देना चाहता था, और दूसरी तरफ पत्नी अपने पति के सम्मान और सुकून की खातिर दो साल तक अपने कलेजे पर जलते हुए अंगारे रखकर मुस्कुराती रही थी!

तभी अस्पताल के मुख्य द्वार से रोने-धोने की तेज आवाजें आने लगीं। बाबूजी और माँ, रिश्तेदारों के साथ बदहवास हालत में कॉरिडोर की तरफ दौड़े चले आ रहे थे। माँ की चीखें उस शांत गलियारे को चीर रही थीं—”मेरा रोहन कहाँ है? कोई मेरे बच्चे को बुला दो! रोहन… बेटा!”

माया ने तुरंत मेरे आंसुओं को अपने हाथों से छुआ और फुसफुसाते हुए कहा, “दीदी, माँ-बाबूजी आ गए हैं। इस बात को हमेशा के लिए अपने सीने में दफन कर लीजिए। बाबूजी को कभी यह मत पता चलने दीजिएगा कि रोहन को उस पुराने एक्सीडेंट का सच पता था। अगर बाबूजी को यह पता चल गया कि उनके बेटे ने उनके पुराने गुनाह का प्रायश्चित करने के लिए अपनी जान दी है, तो वह एक पल भी जिंदा नहीं बचेंगे। उनका कलेजा फट जाएगा। और माँ… माँ इस सदमे को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी। दुनिया के लिए, रोहन सिर्फ एक बीमारी से हारा है… और अपनी वसीयत में अपनी अंधी पत्नी को अपनी आँखें दान करके एक महान काम कर गया है। बस… यही सच इस दुनिया के सामने रहना चाहिए।”

मैंने माया को देखा। उस सात साल की अनाथ बच्ची से लेकर आज इस विधवा की चौखट तक, उसने जितना सहा था, उसके आगे हम सबका दुख बहुत छोटा था। मैंने रोते हुए उसे अपने सीने से भींच लिया। उस पल मुझे एहसास हुआ कि रोहन ने गलत इंसान से प्यार नहीं किया था। माया उस प्यार के हर एक कतरे के काबिल थी।

अगले चार घंटे अस्पताल में कयामत जैसे गुजरे। माँ का रो-रोकर बुरा हाल था, बाबूजी बेसुध होकर एक कोने में बैठे रोहन का नाम पुकार रहे थे। रिश्तेदारों की भीड़ जमा थी। और उसी गहमागहमी के बीच, रोहन के साइन किए हुए अंगदान के कानूनी दस्तावेजों के आधार पर, डॉक्टरों की एक स्पेशल टीम ने माया को तुरंत आई-सर्जरी यूनिट में शिफ्ट करने की तैयारी शुरू कर दी।

जब माया को स्ट्रेचर पर ले जाया जा रहा था, तब उसने मेरा हाथ पकड़कर अपने तकिए के नीचे से एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी डायरी निकाली। यह रोहन की पर्सनल डायरी थी। माया ने कहा, “दीदी, रोहन ने कहा था कि जिस दिन यह सर्जरी हो, उस दिन मैं यह डायरी अपने पास रखूँ। इसमें उसके उन शब्दों की स्याही है जो उसने मेरी आने वाली उस जिंदगी के लिए लिखे थे जब मैं अपनी आँखों से देख सकूँगी। इसे आप अपने पास रखिए… और जब मैं पहली बार अपनी आँखें खोलूँ, तब इसे मुझे पढ़कर सुनाइएगा।”

ऑपरेशन थिएटर का लाल बल्ब जल उठा। बाहर हम सब खड़े थे—एक तरफ अपने जवान बेटे को खोने का मातम था, और दूसरी तरफ उसी बेटे की आँखों से उसकी पत्नी की दुनिया में रोशनी लौटने की अंतिम उम्मीद। वह रात हमारे खानदान की जिंदगी की सबसे लंबी, सबसे दर्दनाक और सबसे पावन रात थी।

सर्जरी सफल रही। डॉक्टरों ने बताया कि रोहन की कॉर्निया माया की आँखों में पूरी तरह मैच कर गई थी।

तीन दिन बाद, जब माया की आँखों की पट्टियाँ खोली जाने वाली थीं, पूरा कमरा रिश्तेदारों, माँ, बाबूजी और डॉक्टरों से भरा हुआ था। कमरे की खिड़कियों पर हल्के पर्दे गिराए गए थे ताकि सीधी रोशनी उसकी नई आँखों को नुकसान न पहुँचाए। वातावरण में एक ऐसा सन्नाटा था कि हर किसी की सांसों की आवाज सुनी जा सकती थी।

डॉक्टर ने धीरे-धीरे माया की आँखों की आखिरी सफेद पट्टी खोली।

माया की पलकें धीरे-धीरे कांपीं। उसने अपनी आँखें खोलीं। शुरू में सब कुछ धुंधला था, पर धीरे-धीरे चेहरे साफ होने लगे।

उसकी नज़र सबसे पहले सामने दीवार पर टंगी रोहन की उस तस्वीर पर पड़ी, जिस पर ताजे गुलाब के फूलों का हार चढ़ा हुआ था। माया की आँखों से आंसुओं की दो बूंदें ढुलक कर उसके गालों पर गिर पड़ीं। उसने अपनी पूरी जिंदगी में जिस चेहरे को सिर्फ अपनी उंगलियों के पोरों से छुआ था, आज पहली बार उसने उस चेहरे को अपनी आँखों से देखा—वही तीखे नैन-नक्श, वही मासूम मुस्कान, और वही गहरी आँखें जो अब तस्वीर में नहीं, बल्कि माया के अपने चेहरे पर जिंदा थीं।

माया ने धीरे से अपना हाथ उठाया और अपने गालों पर, अपनी नई आँखों पर हाथ फेरा। वह रो नहीं रही थी, बल्कि उसकी आँखों में एक ऐसी शांति थी जैसे कोई भटका हुआ मुसाफिर अपनी मंजिल पर पहुँच गया हो।

उसने कमरे में चारों तरफ देखा। उसने बिलखती हुई माँ को देखा, पश्चाताप की आग में बूढ़े हो चुके बाबूजी को देखा, और फिर मेरी तरफ देखा।

मैंने आगे बढ़कर उसके हाथ में रोहन की वह डायरी थमा दी और उसका पहला पन्ना खोला। उस पन्ने पर रोहन की खूबसूरत लिखावट में लिखा था:

“मेरी प्यारी माया, अगर तुम आज यह खत अपनी आँखों से पढ़ रही हो, तो इसका मतलब है कि मैं दुनिया के उस पार पहुँच चुका हूँ जहाँ न कोई दर्द है, न कोई बीमारी और न कोई अंधेरा। रोना मत माया, क्योंकि तुम्हारी इन आँखों में अब जो आंसू गिरेंगे, वो मेरी आँखों को भिगोएंगे। मैंने सात साल की उम्र में तुमसे वादा किया था कि मैं तुम्हें पूरी दुनिया दिखाऊंगा। मैं खुदा का शुक्रगुजार हूँ कि उसने मुझे अपना वादा पूरा करने का यह रास्ता दिया।

तुम जब भी सुबह सूरज की पहली किरण देखोगी, समझना मैं तुम्हें छू रहा हूँ। जब भी तुम किसी गरीब, बेबस बच्चे को देखकर मुस्कुराओगी, समझना मेरी आँखें तुम्हारे साथ मुस्कुरा रही हैं। मैंने तुम्हें अपनी आँखें सिर्फ इसलिए नहीं दीं कि तुम दुनिया के रंग देख सको, बल्कि इसलिए दी हैं ताकि तुम मेरे माँ-बाबूजी और मेरी दीदी का ख्याल उस तरह रख सको जैसे मैं रखता था। तुम अब सिर्फ माया नहीं हो… तुम मेरा जिंदा वजूद हो। जियो माया… मेरे हिस्से की जिंदगी भी तुम शान से जियो।”

कमरे में मौजूद हर शख्स की आँखें नम थीं। माँ ने आगे बढ़कर माया को अपने गले से लगा लिया, और बाबूजी ने रोते हुए उसके सिर पर हाथ रख दिया।

उस दिन के बाद से, हमारे घर की हवा बदल गई। रोहन जिस्मानी तौर पर हमारे बीच नहीं था, लेकिन माया की हर एक नज़र में, उसकी हर एक मुस्कान में और उसकी उन रोशन आँखों में रोहन हर पल हमारे साथ सांस ले रहा था। माया ने अपनी जिंदगी को रोहन के सपनों का मंदिर बना दिया। उसने दृष्टिहीन अनाथ बच्चों के लिए एक स्कूल खोला, जहाँ वह हर उस बच्चे की आँखें और सहारा बनी जिसे दुनिया ने लावारिस छोड़ दिया था।

और मैं… मैं जब भी माया की उन खूबसूरत, गहरी आँखों में देखती थी, मुझे करोल बाग की उस धूप खिली दोपहर में स्कूल का बस्ता उठाए वह सात साल का नन्हा रोहन मुस्कुराता हुआ दिखाई देता था, जो आज भी अपनी मोहब्बत और अपने वादे की हिफाजत अमर होकर कर रहा था।

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