आधे साल बाद घर लौटा युवक, बिस्तर पर 100 से अधिक अंडे देखकर रह गया स्तब्ध
कई महीनों तक घर से दूर रहने के बाद लौटे युवक को दरवाजे के पीछे ऐसा दृश्य दिखाई दिया, जिसने…
पेट में असामान्य जीवों के पनपने का चौंकाने वाला सच और बचाव के उपाय।
सोशल मीडिया पर सामने आए इस बेहद चौंकाने वाले मामले में एक आठ वर्षीय बालक को लगातार पेट दर्द, मिचली और हर कुछ दिनों में उल्टी के साथ छोटे, कीड़े जैसे जीवों के बाहर आने की विचित्र समस्या का सामना करना पड़ा। इस असामान्य स्थिति को देखकर परिजन बुरी तरह घबरा गए और बच्चे को तत्काल विशेषज्ञ बाल रोग व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने जब प्रयोगशाला में उल्टी के नमूनों और उन जीवों की सूक्ष्म जांच की, तो एक बेहद चौंकाने वाला लेकिन स्पष्ट वैज्ञानिक कारण सामने आया।

चिकित्सकों के अनुसार, उल्टी में दिखने वाले वे जीव वास्तव में किसी असाधारण बीमारी या आंतरिक संक्रमण से नहीं पैदा हुए थे, बल्कि वे पानी में पनपने वाले छोटे लार्वा (जैसे कि मच्छर या अन्य जलीय कीटों के लार्वा) और सतही परजीवी (स्यूडोपैरासिटिज्म) थे। बच्चे के परिवेश और आदतों की गहन पड़ताल के बाद पता चला कि घर के बाहर रखे पुराने खुले पानी के बर्तनों, बगीचे के स्थिर जलाशय या बिना ढके मटके से सीधे पानी पीने के कारण ये सूक्ष्म अंडे और लार्वा बच्चे के पेट में चले गए थे। पेट के पाचक अम्लों के बावजूद कुछ लार्वा कुछ समय तक पेट के ऊपरी हिस्से में जीवित रहने का प्रयास करते रहे, जिससे पेट की आंतरिक परत में भारी जलन, ऐंठन और संकुचन पैदा हुआ। शरीर के प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र ने इन बाहरी अवांछित तत्वों को बाहर निकालने के लिए बार-बार उल्टी की प्रतिक्रिया शुरू कर दी।
एंटीपैरासिटिक उपचार, पेट के संक्रमण को शांत करने वाली दवाओं और स्वच्छता के सख्त दिशा-निर्देशों के बाद बच्चे की हालत में तेजी से सुधार हुआ और वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित किया कि पीने के पानी और आसपास के वातावरण की अनदेखी बच्चों के नाजुक पाचन तंत्र के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। सही समय पर मिली चिकित्सीय सहायता ने बच्चे को किसी गंभीर आंतरिक क्षति से पूरी तरह बचा लिया।
चिकित्सा विज्ञान में इस प्रकार की घटनाओं को आमतौर पर ‘स्यूडोपैरासिटिज्म’ (Pseudoparasitism) या कभी-कभी ‘एक्सीडेंटल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल माइएसिस’ (Accidental Gastrointestinal Myiasis) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इसका सरल अर्थ यह होता है कि कोई कीट या लार्वा स्वाभाविक रूप से मानव शरीर के भीतर परजीवी की तरह हमेशा नहीं रह सकता, लेकिन असावधानीवश दूषित पानी या बिना धुले खाद्य पदार्थों के माध्यम से शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।
जब कोई व्यक्ति, विशेष रूप से छोटे बच्चे, दूषित पानी पीते हैं जिसमें पहले से ही कीटों के अंडे या छोटे लार्वा तैर रहे होते हैं, तो वे भोजन नली के रास्ते आमाशय तक पहुंच जाते हैं। सामान्य परिस्थितियों में आमाशय में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) कई बाहरी सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने में सक्षम होता है। परंतु यदि पानी अधिक मात्रा में एक साथ पिया जाए, या भोजन के तुरंत बाद न पिया गया हो जब पेट का एसिड हल्का हो, तो कुछ कीटों के लार्वा अपने बाहरी सुरक्षात्मक आवरण के कारण कुछ समय तक निष्क्रिय या जीवित अवस्था में वहां टिके रह सकते हैं।
जैसे ही ये लार्वा पेट की संवेदनशील आंतरिक श्लेष्मा झिल्ली (म्यूकोसा) को छूते हैं या वहां हलचल शुरू करते हैं, तंत्रिका तंत्र तुरंत सक्रिय हो जाता है। मस्तिष्क को यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि पेट में कोई विषैला या हानिकारक पदार्थ मौजूद है। इसके उत्तर में शरीर गैस्ट्रिक रिफ्लेक्स के जरिए तीव्र उल्टी करवाता है, ताकि वे हानिकारक जीव बाहर निकल जाएं। यही कारण था कि बच्चे को रुक-रुक कर पेट में तेज दर्द उठता था और उसके तुरंत बाद उल्टी में ये जीव तैरते हुए दिखाई देते थे। यह शरीर की एक अत्यंत तीव्र और प्राकृतिक सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया थी।
हमारे घरों और आसपास के खुले स्थानों में स्थिर पानी की उपस्थिति अनेक प्रकार के कीटों और सूक्ष्मजीवों के लिए आदर्श प्रजनन स्थल बन जाती है। अक्सर हम यह मान लेते हैं कि अगर पानी पारदर्शी और साफ दिखाई दे रहा है, तो वह पीने के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित होगा। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है।
बरसात के मौसम के बाद या गर्मियों के दिनों में बगीचे के गमलों, पुराने बर्तनों, पानी की खुली टंकियों, एयर कूलर के टैंकों या खुले ड्रमों में पानी दिनों तक जमा रहता है। कई कीट अपने सूक्ष्म अंडे इन्हीं स्थिर जलस्रोतों की सतह पर देते हैं। कुछ ही दिनों में ये अंडे फूटकर नन्हे लार्वा में बदल जाते हैं, जो पानी में तेजी से तैरते रहते हैं। बच्चे खेलते-कूदते समय अत्यधिक प्यास लगने पर अक्सर बिना सोचे-समझे ऐसे बर्तनों, बगीचे के पाइपों या खुले रखे बर्तनों से सीधे पानी पी लेते हैं।
इसके अलावा, कई क्षेत्रों में उपयोग होने वाले खुले कुएं, बावलियां या बिना ढके रखे गए पारंपरिक मिट्टी के घड़े भी यदि नियमित रूप से साफ न किए जाएं, तो वे ऐसे जीवों के पनपने का प्रमुख केंद्र बन जाते हैं। यह घटना बताती है कि पानी की भौतिक स्वच्छता और जैविक स्वच्छता में बहुत बड़ा अंतर होता है। केवल साफ दिखने वाला पानी ही शुद्ध नहीं होता, जब तक कि वह पूरी तरह से शुद्धिकरण की उचित प्रक्रिया से न गुजरा हो। घर में खुला पड़ा कोई भी जलपात्र अनजाने में स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।
बच्चों का पाचन तंत्र वयस्कों की तुलना में कहीं अधिक नाजुक, संवेदनशील और विकासशील होता है। उनकी प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं होती, जिससे वे खाद्य और जल जनित संक्रमणों के प्रति बहुत जल्दी संवेदनशील हो जाते हैं। यदि किसी बच्चे के पेट में किसी प्रकार का परजीवी या बाहरी तत्व प्रवेश कर जाए, तो शरीर निम्नलिखित स्पष्ट संकेत और चेतावनी देने लगता है:
पेट के ऊपरी हिस्से में अचानक तेज मरोड़ या ऐंठन उठना इसका पहला प्रमुख लक्षण है। बच्चा बार-बार पेट पकड़कर बैठ जाता है या अत्यधिक बेचैनी महसूस करता है। इसके साथ ही लगातार जी मिचलाना, मुंह में असामान्य रूप से अधिक लार बनना और भोजन के तुरंत बाद उल्टी की तीव्र इच्छा होना बेहद सामान्य देखा जाता है। कई बार उल्टी में बिना पचा भोजन, झागदार पित्त या असामान्य तैरते हुए कण बाहर आते हैं।
भूख में अचानक भारी कमी आना या खाने के प्रति पूरी तरह अनिच्छा जताना भी एक अहम चेतावनी है। इसके विपरीत, कुछ मामलों में पेट के कीड़ों के कारण बच्चा लगातार कुछ न कुछ खाने की मांग करता है लेकिन फिर भी उसका वजन नहीं बढ़ता और शरीर क्षीण दिखता है। पेट में भारीपन, गैस, पेट फूलना और बार-बार दस्त या अनियमित शौच भी इस बात का प्रमाण हैं कि आंतों का प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है।
यदि संक्रमण लंबे समय तक बना रहे, तो बच्चा शारीरिक रूप से सुस्त, चिड़चिड़ा और थका हुआ रहने लगता है। चेहरे पर असामान्य पीलापन, आंखों के नीचे हल्के काले घेरे और रात में सोते समय दांत किटकिटाने की आदत भी पेट के आंतरिक परजीवियों के सामान्य लक्षणों में शामिल हैं। माता-पिता को इन संकेतों को कभी भी सामान्य बदहजमी या गैस समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
जब इस तरह के असाधारण और डरावने मामले अस्पताल पहुंचते हैं, तो डॉक्टरों की पहली प्राथमिकता सटीक पहचान और बच्चे के शरीर से उन बाहरी तत्वों को पूरी तरह सुरक्षित रूप से बाहर निकालना होती है। इस मामले में भी डॉक्टरों ने कई वैज्ञानिक और नैदानिक चरणों का कड़ाई से पालन किया ताकि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में आ सके।
सर्वप्रथम, उल्टी में निकले नमूनों को सुरक्षित करके माइक्रोबायोलॉजी और मेडिकल एंटोमोलॉजी लैब में भेजा गया। वहां उच्च क्षमता वाले सूक्ष्मदर्शी से यह पुष्टि की गई कि ये जीव किस प्रजाति के लार्वा हैं और क्या उनके भीतर कोई अतिरिक्त विषैले जीवाणु मौजूद हैं। इसके साथ ही, बच्चे के पेट का अल्ट्रासाउंड और आवश्यक रक्त जांच कराई गई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पेट या आंतों की आंतरिक परत में कोई गहरा घाव, अल्सर या गंभीर सूजन तो उत्पन्न नहीं हुई है।
जांच पूरी होने के बाद बाल रोग विशेषज्ञों ने लक्षित और सुरक्षित चिकित्सा शुरू की। इसके अंतर्गत सुरक्षित एंटीपैरासिटिक दवाओं की एक नियंत्रित खुराक दी गई, जो पेट और आंतों में बचे किसी भी संभावित लार्वा या अंडे को तुरंत निष्क्रिय कर देती है। साथ ही, पेट की नाजुक परत को ठंडक पहुंचाने और एसिडिटी को शांत करने के लिए एंटासिड और उल्टी रोकने वाली दवाएं दी गईं।
शरीर में पानी और आवश्यक लवणों की कमी को पूरा करने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) और आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स का नियमित सेवन कराया गया। कुछ ही दिनों के भीतर बच्चे के पाचन तंत्र ने पुनः सामान्य कार्य करना शुरू कर दिया और अनुवर्ती जांच में पेट पूरी तरह से संक्रमण-मुक्त पाया गया। डॉक्टरों ने परिजनों को घर की स्वच्छता और पानी के स्रोतों की संपूर्ण सफाई करने के कड़े निर्देश दिए, जिससे दोबारा ऐसी स्थिति कभी न बने।
अशुद्ध और असुरक्षित जल केवल लार्वा या कीटों के खतरे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर में पाचन तंत्र से जुड़े दर्जनों गंभीर विकारों का मुख्य स्रोत है। जब हम जल स्वच्छता की अनदेखी करते हैं, तो हम अनजाने में अपने परिवार को कई अदृश्य और सूक्ष्म खतरों के सामने खड़ा कर देते हैं जो धीरे-धीरे स्वास्थ्य को खोखला कर सकते हैं।
दूषित पानी में अमीबा (Entamoeba histolytica) और जिआर्डिया (Giardia lamblia) जैसे सूक्ष्म प्रोटोजोआ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये आंतों में पहुंचकर गंभीर पेचिश, दस्त, पेट दर्द और आंतों में सूजन पैदा करते हैं। विशेष रूप से जिआर्डिया संक्रमण के कारण आंतों में आवश्यक पोषक तत्वों का अवशोषण रुक जाता है, जिससे शरीर में कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द और वजन में भारी गिरावट आ सकती है।
इसके अलावा, हानिकारक बैक्टीरिया जैसे ई-कोलाई (E. coli) और साल्मोनेला दूषित जल स्रोतों में अत्यंत तेजी से पनपते हैं। इनके संक्रमण के कारण तेज बुखार, मरोड़ वाले दस्त और शरीर में गंभीर निर्जलीकरण की समस्या हो जाती है। विशेष रूप से छोटे बच्चों में यदि पानी की कमी तेजी से हो जाए, तो उनकी शारीरिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील और नाजुक बन सकती है।
पेट के कीड़े जैसे राउंडवॉर्म (एस्केरिस), पिनवॉर्म और हुकवॉर्म भी अक्सर गंदे पानी या बिना धुली सब्जियों के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। ये परजीवी आंतों की दीवारों से चिपककर शरीर के पोषक तत्वों को सोखते रहते हैं, जिससे शरीर में खून की कमी (एनीमिया) और शारीरिक विकास में रुकावट पैदा होती है। इसलिए पानी की शुद्धता को किसी भी परिस्थिति में हल्के में नहीं लिया जा सकता।
परिवार और विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए प्रत्येक घर में जल शोधन के कड़े और व्यावहारिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है। आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सावधानियों का सही तालमेल हमें ऐसे हर संकट से पूरी तरह दूर रख सकता है:
पानी को उबालना शुद्धिकरण का सबसे पुराना, सरल और सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक तरीका है। पानी को कम से कम दस से पंद्रह मिनट तक तेज आंच पर खौलाने से उसमें मौजूद लगभग सभी प्रकार के बैक्टीरिया, वायरस, परजीवियों के अंडे और सूक्ष्म लार्वा पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। उबाले गए पानी को ठंडा करके पूरी तरह साफ, सूखे और ढके हुए बर्तनों में ही रखना चाहिए।
घरों में लगे वॉटर प्यूरीफायर (RO, UV और UF सिस्टम) की नियमित सर्विसिंग बेहद जरूरी होती है। कई बार लोग फिल्टर को कई महीनों तक नहीं बदलते, जिसके कारण फिल्टर की झिल्ली के भीतर ही गंदगी, काई और सूक्ष्मजीव जमा होने लगते हैं। सुनिश्चित करें कि प्यूरीफायर के स्टोरेज टैंक को भी हर हफ्ते खाली करके अंदर से अच्छी तरह साफ किया जाए ताकि उसमें कोई जैविक परत न जमे।
पीने के पानी के बर्तनों और घड़ों को हमेशा जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर रखें और उन्हें मजबूत, जालीदार या ठोस ढक्कन से कसकर ढकें। कभी भी पानी निकालते समय बर्तन में सीधे हाथ न डालें, बल्कि लंबी डंडी वाले लोटे या स्वच्छ टोटी का उपयोग करें। यदि घर में मिट्टी के मटके इस्तेमाल होते हैं, तो उन्हें हर दो दिन में खाली करके धूप में सुखाना चाहिए।
पानी की बड़ी टंकियों की सफाई वर्ष में कम से कम तीन से चार बार किसी विशेषज्ञ सफाई सेवा से करानी चाहिए। टंकी के ढक्कन को हमेशा पूरी तरह सील रखें ताकि उसमें पक्षी, धूल या कीट-पतंगे किसी भी हालत में प्रवेश न कर सकें।
बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु, ऊर्जावान और चंचल होते हैं। वे खेलते समय मिट्टी, पानी, पौधों और आसपास की अनजानी वस्तुओं को छूते हैं और फिर उन्हीं गंदे हाथों से सीधे भोजन कर लेते हैं या मुंह में उंगलियां डाल लेते हैं। इसलिए बच्चों को स्वच्छता की बुनियादी आदतें खेल-खेल में सिखाना माता-पिता का पहला कर्तव्य है।
हाथ धोने की सही आदत बच्चों के स्वास्थ्य की सबसे मजबूत ढाल साबित होती है। बच्चों को सिखाएं कि बाहर से खेलकर आने के बाद, पालतू जानवरों को छूने के बाद, शौचालय के उपयोग के बाद और खाना खाने से पहले कम से कम बीस सेकंड तक साबुन और बहते पानी से हाथ अच्छी तरह रगड़कर धोएं। नाखूनों को नियमित रूप से काटते रहें, क्योंकि नाखूनों के भीतर जमा होने वाली मैल में परजीवियों के सूक्ष्म अंडे छिपे हो सकते हैं।
बाहर खेलते समय बच्चों को यह स्पष्ट रूप से समझाएं कि वे बगीचे के पाइप, फव्वारों, किसी गड्ढे या अज्ञात खुले स्रोतों में जमा पानी को भूलकर भी न पिएं। जब भी बच्चे पार्क, खेल के मैदान या स्कूल जाएं, तो उनके साथ घर से साफ पानी की बोतल जरूर भेजें, ताकि प्यास लगने पर वे किसी असुरक्षित जलस्रोत की ओर न भागें।
कच्चे फलों और सलाद की सब्जियों को बच्चों को देने से पहले गुनगुने पानी या हल्के नमक वाले पानी से कम से कम दो से तीन बार अच्छी तरह धोना चाहिए। कई बार पत्तागोभी, सलाद के पत्ते, सेब या अमरूद की सतह पर कीटों के नन्हे अंडे चिपके रहते हैं, जो बिना ठीक से धोए खा लेने पर सीधे पाचन तंत्र में पहुंच जाते हैं। थोड़ी सी जागरूकता बच्चों को बड़े कष्टों से बचा सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के नियमित स्वास्थ्य और विकास कार्यक्रम में डीवर्मिंग को शामिल करना अत्यंत आवश्यक और लाभकारी कदम है। साल में कम से कम एक या दो बार डॉक्टर की उचित सलाह से बच्चे को पेट के कीड़े मारने की दवा देना एक सुरक्षित, प्रमाणित और प्रभावी बचाव उपाय माना जाता है।
डीवर्मिंग की दवाएं पेट और आंतों में किसी भी रूप में मौजूद परजीवियों को पूरी तरह निष्क्रिय करके स्वाभाविक रूप से बाहर निकाल देती हैं। इससे बच्चे का पाचन तंत्र हल्का, स्वच्छ और सक्रिय बना रहता है। जब आंतें परजीवी-मुक्त होती हैं, तो बच्चा जो कुछ भी पौष्टिक आहार लेता है, उसके सभी विटामिन, खनिज और प्रोटीन शरीर को पूरी तरह प्राप्त होते हैं। इससे बच्चे का शारीरिक विकास सही गति से होता है और उसकी मानसिक एकाग्रता में भी निरंतर सुधार आता है।
यह दवा केवल पीड़ित बच्चे को ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ लेनी चाहिए, क्योंकि घरेलू निकटता और सामान्य बर्तनों के संपर्क से परजीवियों के सूक्ष्म अंडे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक आसानी से स्थानांतरित हो सकते हैं। अपने नजदीकी डॉक्टर से परामर्श लेकर इस सरल कदम को अपनी वार्षिक पारिवारिक दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए। यह नन्हे बच्चों के संपूर्ण स्वास्थ्य को एक मजबूत सुरक्षा घेरा प्रदान करता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि जब भी घर के किसी सदस्य या बच्चे में इस तरह के असामान्य लक्षण दिखें, तो कभी भी घरेलू स्तर पर बिना डॉक्टर की सलाह के कोई कड़वी दवा या तीखे काढ़े न पिलाएं। ऐसा करने से पेट की आंतरिक परत और अधिक छिल सकती है। हमेशा किसी योग्य चिकित्सक के पास जाकर प्रयोगशाला जांच के आधार पर ही सटीक दवा का चयन करना चाहिए।
इसके साथ ही, स्कूलों, डे-केयर सेंटरों और खेल परिसरों में भी पानी की शुद्धता की नियमित जांच होनी चाहिए। जहां बच्चे अधिक समय बिताते हैं, वहां के वाटर कूलर और फिल्टर की समय पर सफाई सुनिश्चित करना प्रबंधन और अभिभावकों दोनों का साझा दायित्व है। स्वस्थ आदतें और शुद्ध वातावरण ही आने वाली पीढ़ी को बीमारियों से मुक्त रख सकते हैं।
आठ वर्षीय बच्चे के साथ घटी यह असामान्य और विचलित करने वाली घटना हम सभी के लिए एक गंभीर सबक और चेतावनी है। यह घटना हमें यह गहराई से सोचने पर विवश करती है कि हमारे दैनिक जीवन में पीने के पानी और भोजन के रख-रखाव में होने वाली एक छोटी सी लापरवाही भी किसी मासूम के स्वास्थ्य को कितने बड़े और अप्रत्याशित संकट में डाल सकती है।
शरीर की आंतरिक तंदुरुस्ती का वास्तविक आधार वह जल और अन्न है जिसे हम हर रोज ग्रहण करते हैं। जब हम अपने घर और आसपास के परिवेश को स्वच्छ रखते हैं, पानी को हमेशा सुरक्षित, शुद्ध और ढके हुए बर्तनों में रखते हैं और बच्चों को साफ-सफाई के बुनियादी नियमों के प्रति जागरूक बनाते हैं, तो हम ऐसी किसी भी गंभीर और अवांछित परिस्थिति से पूरी तरह सुरक्षित रह सकते हैं।
चिकित्सा विज्ञान के पास हर समस्या का समाधान और उपचार मौजूद है, लेकिन ‘इलाज से बेहतर हमेशा बचाव होता है’ का सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण है। अपने घर के हर कोने में पानी के स्रोतों की पुनः जांच करें, खुले बर्तनों को तुरंत ढकें, फिल्टर की स्थिति परखें और अपने बच्चों को एक सुरक्षित, स्वस्थ और खुशहाल वातावरण प्रदान करें ताकि उनका बचपन बिना किसी बीमारी के खिलता रहे।
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