आधे साल बाद घर लौटा युवक, बिस्तर पर 100 से अधिक अंडे देखकर रह गया स्तब्ध
कई महीनों तक घर से दूर रहने के बाद लौटे युवक को दरवाजे के पीछे ऐसा दृश्य दिखाई दिया, जिसने…
मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुखद दिन वह था जिसे हमारी ज़िंदगी की सबसे सुनहरी रात होना चाहिए था। साल 1986 के अक्टूबर की वह ठंडी, खुशनुमा शाम आज भी मेरी रूह में किसी नुकीले कांटे की तरह चुभी हुई है। उस रात हम दोनों बहनें—मैं यानी जेसिका और मेरी जुड़वां बहन लौरा—अपना सोलहवां जन्मदिन मना रहे थे। जुड़वां होने के बावजूद हम दोनों में जमीन-आसमान का फर्क था। मैं थोड़ी संकोची, किताबों में खोई रहने वाली और खामोश मिजाज लड़की थी, जबकि लौरा ऊर्जा, हंसी और बेबाक आजादी का दूसरा नाम थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक शरारती मुस्कान खेलती रहती थी और उसकी सुनहरी जुल्फें जब हवा में लहराती थीं, तो लगता था कि पूरी दुनिया की रोशनी उसी के चेहरे पर आकर ठहर गई है।
उस शाम हमारे छोटे से कस्बे वाले घर में खुशियों का सैलाब उमड़ा हुआ था। माँ ने पूरे लिविंग रूम को पीले और गुलाबी गुब्बारों से सजा दिया था। घर के पीछे वाले बगीचे में पापा ने ग्रिल सुलगा रखी थी और रसदार बर्गर की महक पूरे आँगन में तैर रही थी। चाचा, चाची, मौसी और स्कूल के ढेर सारे दोस्त उस छोटे से हॉल में इस कदर ठसाठस भरे हुए थे कि बैठने के लिए कुर्सियां कम पड़ गई थीं। संगीत बज रहा था, हंसी के ठहाके गूँज रहे थे और हर कोई हमारी लंबी उम्र की दुआएं कर रहा था। उस जन्मदिन का सबसे अनमोल तोहफा माँ ने अपने हाथों से तैयार किया था। उन्होंने लगभग छह महीने की दिन-रात की मेहनत के बाद हमारे लिए ऊन के दो बेहद खूबसूरत स्वेटर बुने थे। दोनों स्वेटर एक जैसे बुनावट के थे, लेकिन उनके सामने बने फूल अलग थे। मेरे स्वेटर पर सफेद पंखुड़ियों वाले छोटे-छोटे गुलबहार (daisies) बने हुए थे, जबकि लौरा के स्वेटर के ठीक बीचों-बीच एक बड़ा, चमकीला पीला सूरजमुखी का फूल बुना गया था।

उस स्वेटर को बुनते समय माँ से एक छोटी सी चूक हो गई थी—सूरजमुखी की एक पंखुड़ी गलती से गहरे भूरे रंग के ऊन से बुन दी गई थी। जब माँ ने जन्मदिन के कुछ दिन पहले झिझकते हुए कहा था कि वह उस धागे को उधेड़कर दोबारा पीला कर देंगी, तो लौरा जोर से हंस पड़ी थी। उसने माँ के गले में बाहें डालकर कहा था, “माँ, इसे बिल्कुल मत छूना! यह भूरी पंखुड़ी इस स्वेटर को दुनिया में सबसे अनोखा बनाती है। अब पूरी दुनिया में कोई भी इसे अपना कहकर चुरा नहीं सकता, यह सिर्फ और सिर्फ मेरी पहचान है।” और सचमुच, वह स्वेटर पहनकर जब लौरा उस रात केक के सामने खड़ी हुई, तो वह किसी चमकते हुए सूरजमुखी जैसी ही दमक रही थी।
रात के करीब नौ बज रहे थे। केक काटा जा चुका था, उपहार खोले जा चुके थे और मेहमान धीरे-धीरे विदा ले रहे थे। हॉल में धीमी रोशनी थी और एक पुराना रिकॉर्डर मंद आवाज में बज रहा था। लौरा ने रसोई की मेज पर रखे केक के बचे हुए हिस्से से चुपके से अपनी उंगली से थोड़ी सी क्रीम चुराई, उसे अपने मुंह में डाला और अपनी मीठी शरारत के साथ मुस्कुरा दी। फिर उसने माँ के गालों पर एक हल्का सा प्यार भरा चुंबन दिया और लिविंग रूम के मुख्य दरवाजे की कुंडी घुमाते हुए बोली, “अंदर बहुत गर्मी और उमस हो रही है, मैं बस दो मिनट के लिए बाहर ताजी ठंडी हवा लेने जा रही हूँ। जेसिका, मेरे लिए केक का वह बड़ा वाला टुकड़ा बचाकर रखना, मैं अभी आई।”
वे शब्द… वे आखिरी शब्द थे जो मैंने अपनी बहन की जुबान से सुने थे। उसके बाद, लौरा कभी उस दरवाजे से वापस अंदर नहीं आई।
शुरुआत में किसी को कोई अनहोनी का अहसास नहीं हुआ। हमें लगा कि शायद वह बगीचे में फोन पर किसी दोस्त से बात कर रही होगी या ठंड में टहल रही होगी। लेकिन जब पंद्रह मिनट बीत गए, फिर आधा घंटा बीता और वह नहीं लौटी, तो माँ के चेहरे का रंग उड़ने लगा। हमने बाहर आकर आवाजें लगाईं। रात के सन्नाटे में हमारी आवाजें गूँज रही थीं—”लौरा! लौरा, कहाँ हो तुम? अब मजाक बंद करो!” लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। केवल दूर से सूखी पत्तियों की सरसराहट और जंगल की तरफ से आती ठंडी हवा की सनसनाहट सुनाई दे रही थी।
आधी रात तक पुलिस हमारे घर पहुँच चुकी थी। कस्बे के लोग टॉर्च लेकर सड़कों, गलियों और पास के चीड़ के जंगलों की खाक छान रहे थे। न कोई सुसाइड नोट था, न अलमारी से कोई कपड़ा या बैग गायब था, न ही किसी ने कोई संदिग्ध गाड़ी घर के आसपास देखी थी। लौरा अपने उसी सूरजमुखी वाले स्वेटर में, सोलह साल की उम्र में, उस जन्मदिन की रात हवा में इस तरह विलीन हो गई जैसे उसका कोई वजूद ही न रहा हो।
उस एक रात ने हमारे हँसते-खेलते परिवार को जीते-जी एक खंडहर में तब्दील कर दिया। माँ उस सदमे से कभी उबर ही नहीं पाईं। वे हर दिन लौरा के कमरे की खिड़की पर बैठी रहती थीं, इस उम्मीद में कि अभी उनकी बच्ची मुख्य गेट खोलकर अंदर आएगी और कहेगी कि वह सिर्फ थोड़ी दूर टहलने गई थी। जब भी घर के लैंडलाइन फोन की घंटी बजती, माँ की रूह कांप जाती थी और वे पागलों की तरह दौड़कर रिसीवर उठाती थीं। उन्होंने पुलिस थानों के चक्कर काटे, जासूसों को अपनी बची-खुची जमापूंजी सौंप दी, जंगलों में पोस्टर चिपकाए, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। आखिरकार, लौरा के गायब होने के दस साल बाद, माँ ने अपनी दोनों आंखें इसी अंतहीन इंतजार में मूंद लीं और दुनिया को अलविदा कह दिया।
लेकिन पापा… पापा का बर्ताव उस रात के बाद से एक ऐसा रहस्य बन गया था जिसे मैं कभी समझ नहीं पाई। हादसे के शुरुआती कुछ हफ्तों तक वे बहुत बेचैन और बदहवास रहे, लेकिन फिर अचानक उनके भीतर एक अजीब, पथरीली खामोशी उतर आई। उन्होंने पुलिस की तलाश में शामिल होना बंद कर दिया। उन्होंने पूरे घर से लौरा की हर एक तस्वीर हटाकर गत्ते के पुराने बक्सों में बंद कर दी और उन्हें तहखाने के अंधेरे कोनों में फेंक दिया। घर में अगर कोई भूल से भी लौरा का नाम ले लेता, तो पापा का चेहरा गुस्से और दहशत से तमतमा उठता था। उन्होंने सख्त आदेश दे दिया था कि इस घर में उस लड़की का जिक्र दोबारा कभी नहीं होगा। मैंने हमेशा यही मानकर खुद को तसल्ली दी कि शायद एक जवान बेटी को इस तरह अचानक खो देने का दर्द पापा के सीने में इतना गहरा घाव कर गया था कि वे उसका नाम सुनकर उस असहनीय पीड़ा को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।
वक्त अपनी रफ्तार से बहता रहा। दिन हफ्तों में, हफ्ते सालों में और साल दशकों में बदलते चले गए। मेरी शादी हुई, एक बेटी हुई और फिर उस बेटी की अपनी एक प्यारी सी बच्ची हुई—सोफी। चालीस साल का एक विशाल समंदर उस खौफनाक रात और मेरे आज के बीच बह चुका था।
पापा अब नब्बे साल के एक बेहद कमजोर और लाचार बुजुर्ग हो चुके थे। वे हमारे घर से बीस मिनट की दूरी पर स्थित ‘सेंट मैथ्यूज’ नर्सिंग होम में रहते थे। उनका शरीर भले ही उम्र के बोझ तले झुक गया था, उनके हाथ कांपते थे और वे व्हीलचेयर के बिना एक कदम नहीं चल सकते थे, लेकिन उनका दिमाग आज भी किसी तेज छुरी की तरह सतर्क और पैना था। इन चालीस सालों में मैंने जब भी उनसे अपनी बहन के बारे में बात करने की कोशिश की, उन्होंने अपनी आँखें फेर लीं या नर्सों को बुलाकर मुझे कमरे से बाहर भिजवा दिया। लौरा का नाम उनके लिए एक ऐसा अभिशप्त दरवाजा था जिसे वे कभी खोलना नहीं चाहते थे।

बीते मंगलवार की वह दोपहर बिल्कुल वैसी ही धुंधली और ठंडी थी, जैसी चालीस साल पहले की वह मनहूस शाम थी। यह लौरा के गायब होने की ठीक चालीसवीं बरसी थी। मेरा दिल सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और भारीपन से भरा हुआ था। मैं अपनी आठ साल की नातिन सोफी के स्कूल से लौटने का इंतजार करते हुए रसोई में आलू छील रही थी और पुराने खयालों में डूबी हुई थी। तभी मुख्य दरवाजा खुला और सोफी के छोटे जूतों की आवाज लिविंग रूम में गूँजी।
“नानी! नानी, जल्दी बाहर आओ! देखो हमारे स्कूल की नई आंटी ने मुझे क्या दिया है!” सोफी की चहकती हुई आवाज ने मेरे खयालों का ताना-बाना तोड़ दिया।
मैं मुस्कुराती हुई हाथ पोंछते हुए बाहर हॉल में आई, लेकिन मेरी नजर जैसे ही सोफी के बदन पर पड़ी, मेरे हाथ में रखी चीनी मिट्टी की प्लेट छूटकर संगमरमर के फर्श पर गिरी और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। मेरे फेफड़ों से पूरी हवा एक झटके में बाहर निकल गई और मेरा गला सूखकर कांटा हो गया।
सोफी ने एक बहुत बड़ा, ढीला-ढाला ऊन का स्वेटर पहन रखा था जो उसके घुटनों तक झूल रहा था। और उस स्वेटर के ठीक सीने पर… वही बड़ा, पीला सूरजमुखी का फूल चमक रहा था। उस फूल की दाईं तरफ की एक पंखुड़ी गहरे भूरे रंग के ऊन से बुनी गई थी।
मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। मेरे पैर थर-थर कांपने लगे और मुझे दीवार का सहारा लेना पड़ा। यह नामुमकिन था। यह बिल्कुल नामुमकिन था! चालीस साल… चालीस साल पहले यह स्वेटर मेरी जुड़वां बहन के जिस्म पर था जब वह हमेशा के लिए अंधेरे में खो गई थी।
मैं पागलों की तरह घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई। मैंने कांपते हुए हाथों से सोफी के कंधे पकड़े और स्वेटर के पिछले कॉलर को उल्टा किया। कॉलर के अंदरूनी हिस्से पर, हल्के पड़ चुके लाल सूती धागे से वही दो अंग्रेजी अक्षर हाथ से काढ़े गए थे जो मेरी माँ ने चालीस साल पहले अपने आंसुओं और प्यार से सिले थे—L. M. (लौरा मिलर)।
“सोफी…” मेरी आवाज किसी कुएं की गहराई से निकलती हुई लग रही थी, “तुम्हें… तुम्हें यह स्वेटर किसने दिया? सच बताओ, तुम्हें यह कहाँ से मिला?”
सोफी मेरी घबराहट और फटी हुई आँखों को देखकर थोड़ी सहम गई। उसने धीमी आवाज में कहा, “नानी, मैंने बताया तो… हमारे स्कूल में जो नई सफाईकर्मी महिला आई हैं, उन्होंने दिया। आज लंच ब्रेक में जब मैं गलियारे में बैठी थी, तो वे मेरे पास आईं। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरी नानी का नाम जेसिका है। जब मैंने हाँ कहा, तो उन्होंने अपने बैग से यह स्वेटर निकाला और मुझे पहना दिया। उन्होंने कहा कि यह बहुत ठंड का मौसम है और यह स्वेटर खास तुम्हारी नानी के परिवार के लिए ही बना था।”
मेरे पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई। चालीस साल तक जिस चीज का एक धागा तक नहीं मिला था, वह आज एक अजनबी सफाईकर्मी के जरिए मेरी ही नातिन के शरीर पर लौट आया था।
तभी सोफी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मासूमियत से बोली, “अरे हाँ नानी! उन आंटी ने मुझसे एक और बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जब तुम्हारी नानी इस स्वेटर को पहचान लें और रोने लगें, तो उनसे कहना कि वे सूरजमुखी के फूल के नीचे वाली गुप्त जेब की सिलाई को खोलकर देखें। उन्होंने कहा था कि वहाँ चालीस साल पुराना एक जवाब छिपा है।”
“अंदर…?” मेरे कांपते होंठों से बमुश्किल शब्द निकले।
सोफी ने सूरजमुखी की उस भूरी पंखुड़ी के ठीक नीचे, स्वेटर की अंदरूनी सतह की एक बहुत ही बारीक, दोहरी सिलाई की तरफ इशारा किया। मैंने उस स्वेटर को बचपन में सैकड़ों बार देखा था, लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया था कि माँ ने या किसी और ने वहाँ इतनी सफाई से कपड़े की एक छोटी सी जेब बना रखी थी। मैंने अपनी कांपती उंगलियों से उस सिलाई को खींचा। पुराना ऊन चरमरा कर उधड़ गया।
सिलाई खुलते ही मेरे हाथ की उंगलियों ने अंदर किसी ठंडी, बहुत सख्त और धातु जैसी चीज को छुआ। मैंने अपनी सांसें रोक लीं और अपनी दो उंगलियों से उस चीज को बाहर खींचा।
जैसे ही वह चीज मेरी हथेली पर आई, मेरे गले से एक ऐसी भयानक चीख निकली जिसने पूरे घर को हिलाकर रख दिया। सोफी डरकर दो कदम पीछे हट गई और रोने लगी, “नानी! क्या हुआ? वह क्या है?”
मैं बोल नहीं पा रही थी। मेरी जुबान तालू से चिपक गई थी। मेरी आँखों के सामने चालीस साल पुराना वह मंजर किसी बिजली की कौंध की तरह घूम गया।
मेरी हथेली पर पीतल की एक भारी, पुरानी और जंग लगी चाबी रखी थी। उस चाबी के ऊपरी गोल सिरे पर हाथ से खुरचकर तीन अक्षर लिखे गए थे—B-14। और उस चाबी के साथ एक छोटा सा, फीका पड़ चुका पीला लॉकर का टोकन बंधा हुआ था जिस पर स्थानीय पुराने बस टर्मिनल का नाम छपा था।
यह चाबी… इस चाबी को मैंने अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ एक बार देखा था। 1986 के उस जन्मदिन की रात, जब लौरा के गायब होने के बाद पुलिस हमारे घर आई थी, तब मैंने अपने रोते हुए पापा को हॉल के कोने में खड़े देखा था। वे अपनी पैंट की जेब से बार-बार इसी पीतल की चाबी को निकाल रहे थे, उसे अपनी मुट्ठी में इस तरह भींच रहे थे कि उनकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे, और उनकी आँखों में दुख से ज्यादा एक ऐसा खौफनाक अपराधबोध था जिसे उस सोलह साल की उम्र में मैं समझ नहीं पाई थी।
यह पापा की चाबी थी। लेकिन यह लौरा के स्वेटर के अंदर गुप्त सिलाई में कैसे पहुंची? और वह सफाईकर्मी कौन थी?
मेरे भीतर का सारा डर अचानक एक बेकाबू आग में बदल गया। चालीस साल से जिस सच की तलाश में मेरी माँ कब्र में समा गई थीं, वह सच अब मुझसे सिर्फ कुछ फासलों पर था। मैंने सोफी को कसकर गले लगाया, अपनी पड़ोसी मार्था को फोन करके तुरंत घर बुलाया और सोफी को उसकी देखरेख में छोड़ दिया। मैंने उस स्वेटर को एक बैग में रखा, उस भारी पीतल की चाबी को अपनी मुट्ठी में कसकर भींच लिया और अपनी गाड़ी की तरफ दौड़ी।
मेरा पहला पड़ाव सोफी का स्कूल था। मैं पागलों की तरह गाड़ी चलाते हुए स्कूल पहुँची। उस समय स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी और पूरा परिसर खाली हो रहा था। मैं सीधे प्रिंसिपल के दफ्तर में घुसी। मेरी बिखरी हुई हालत देखकर प्रिंसिपल चौंक गए। जब मैंने उनसे उस नई सफाईकर्मी के बारे में पूछा, तो उन्होंने रजिस्टर देखा और कहा, “जेसिका, आप किसकी बात कर रही हैं? हमारे यहाँ पिछले तीन हफ्तों से केवल एक ही नई महिला काम पर आई थी—एलिना। लेकिन उसने आज दोपहर ठीक दो बजे अपना इस्तीफा मेज पर रख दिया और अपनी आखिरी तनख्वाह लिए बिना ही यहाँ से चली गई।”
“उसका पता? उसका फोन नंबर क्या है?” मैं लगभग चिल्लाई।
प्रिंसिपल ने मुझे वह फॉर्म दिखाया। पते की जगह पर केवल एक स्थानीय सस्ते मोटल का नाम लिखा था—’पाइन व्यू इन’, कमरा नंबर 6।
मैंने एक सेकंड भी नहीं गंवाया। मेरा दिल मेरे सीने में हथौड़े की तरह बज रहा था। जब मैं उस पुराने, बदहाल मोटल के कमरा नंबर 6 के सामने पहुँची, तो मेरे हाथ कांप रहे थे। मैंने दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक दी। “एलिना! दरवाजा खोलो! मुझे पता है तुम अंदर हो!”
दरवाजा बंद नहीं था। मेरे धक्के से वह चरमराता हुआ धीरे-धीरे खुल गया।
कमरे के भीतर की हवा में पुराने सीलन, सिगरेट के धुएं और एक बहुत ही जानी-पहचानी खुशबू का मिश्रण था—वही लैवेंडर का इत्र जो लौरा अपनी किशोरावस्था में लगाया करती थी। कमरे की छोटी सी मेज पर एक लैंप जल रहा था। बिस्तर के पास एक सूटकेस खुला पड़ा था, जैसे कोई जल्दबाजी में वहाँ से निकला हो। और उस मेज के ठीक बीचों-बीच, एक सफेद लिफाफा रखा था जिस पर नीली स्याही से साफ अक्षरों में लिखा था: “मेरी प्यारी जुड़वां बहन, जेसिका के लिए।”
उस लिखावट को देखकर मेरी रूह कांप गई। वह लिखावट… वह घुमावदार अक्षर… वे ठीक वैसे ही थे जैसे लौरा अपनी स्कूल की कॉपियों में लिखा करती थी।
मैंने लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़कर उस लिफाफे को उठाया। लिफाफे के अंदर एक लंबा, कई पन्नों का पत्र था, जिसके कई हिस्से आंसुओं की बूंदों से धुंधले हो चुके थे। उस कमरे के मंद पीले प्रकाश में, मैंने कांपती हुई उंगलियों से उस खत को पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे शब्द मेरी आँखों के सामने से गुजर रहे थे, मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही थी और मुझे लग रहा था कि मैं सांस लेना भूल जाऊंगी।
उस खत में लिखा था:
“जेसिका, मेरी प्यारी बहन…
अगर यह खत तुम्हारे हाथों में है, तो इसका मतलब है कि सोफी ने तुम्हें वह स्वेटर दे दिया है। और इसका यह भी मतलब है कि आखिरकार चालीस साल बाद, हमारे परिवार के उस सबसे काले और भयानक राज का पर्दाफाश होने का वक्त आ गया है, जिसे हमारे पिता ने अपनी चुप्पी की कब्र में दफन कर दिया था।
तुम सोच रही होगी कि मैं कौन हूँ? क्या मैं लौरा हूँ? काश कि मैं लौरा होती, जेसिका। काश कि मैं तुम्हारी वही हंसमुख, चुलबुली बहन होती जिसे तुम उस रात छोड़कर गई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि लौरा उस रात नहीं मरी थी… लौरा आज भी जिंदा है। मैं ही वह अभागन हूँ जिसे दुनिया ने चालीस साल पहले मरा हुआ मान लिया था।
मुझे पता है कि तुम्हारे दिमाग में सवालों का एक भयानक बवंडर उठ रहा होगा। तुम सोच रही होगी कि अगर मैं जिंदा थी, तो मैं वापस क्यों नहीं आई? मैंने माँ को रोते-रोते मरने के लिए क्यों छोड़ दिया? मैंने तुम्हें इस अंतहीन दर्द में क्यों जलने दिया? जेसिका, इसका जवाब उस पीतल की चाबी में छिपा है जो तुम्हें उस स्वेटर के अंदर मिली है।
उस रात की हकीकत वह नहीं थी जो तुम समझती रही हो। 1986 के हमारे सोलहवें जन्मदिन की उस रात, जब मैं ताजी हवा लेने बाहर निकली थी, तो मेरा इरादा सिर्फ कुछ मिनटों में लौटने का था। मैं घर के पिछले हिस्से वाले पुराने गैरेज के पास टहल रही थी। तभी मैंने गैरेज के अंदर एक धीमी सी रोशनी और कुछ फुसफुसाहट सुनी। मुझे लगा कि शायद पापा वहाँ कुछ सामान रख रहे हैं। मैं चुपके से खिड़की के पास गई ताकि उन्हें पीछे से डरा सकूं।
लेकिन खिड़की के अंदर जो मैंने देखा, उसने मेरे खून को जमा दिया। गैरेज के अंदर पापा खड़े थे… और उनके सामने कस्बे की एक सत्रह साल की बेसहारा लड़की, रेचल, खड़ी थी। रेचल, जो कुछ हफ्तों से कस्बे से गायब बताई जा रही थी और जिसके पोस्टर पूरे शहर में लगे हुए थे। रेचल रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी और पापा के पैरों में गिरकर कह रही थी कि वह पुलिस को सब कुछ बता देगी कि कैसे पापा ने अपनी रसूख और पैसे के दम पर उसके साथ दरिंदगी की थी और उसे चुप रहने की धमकी दी थी।
पापा का चेहरा उस वक्त किसी हैवान जैसा लग रहा था। उनके चेहरे पर वह प्यार नहीं था जो वे हम पर लुटाते थे। उनके हाथ में एक भारी लोहे का रिंच था। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती या चीख पाती, पापा ने अपना आपा खो दिया। एक भयानक गुस्से में, उन्होंने उस रिंच से रेचल के सिर पर वार कर दिया। रेचल बिना किसी आवाज के खून के फव्वारे के साथ फर्श पर गिर पड़ी और उसकी सांसें हमेशा के लिए थम गईं।
मेरी चीख मेरे गले में ही घुट गई। खिड़की का शीशा मेरे हाथ से हल्का सा हिल गया और उसकी आवाज सुनकर पापा ने बाहर की तरफ देखा। उन्होंने मुझे देख लिया था। उन्होंने मुझे अपनी आँखों से एक कत्ल का गवाह बनते हुए देख लिया था।
मैं अपनी जान बचाकर भागी। मैं जंगल की तरफ दौड़ी, लेकिन पापा की कद-काठी और रफ्तार मुझसे कहीं ज्यादा थी। उन्होंने मुझे जंगल के मुहाने पर ही दबोच लिया। उन्होंने मेरे मुंह पर अपना भारी हाथ रख दिया ताकि मेरी आवाज घर में बज रहे संगीत के शोर को पार न कर सके। उन्होंने मुझे घसीटते हुए अपनी पुरानी शेवरले गाड़ी की डिक्की में बंद कर दिया। मैं अंधेरे में चीखती रही, अपने स्वेटर से अपने आंसू पोंछती रही, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
पापा ने उस रात रेचल की लाश को जंगल के उस पुराने सूखे कुएं में फेंक दिया जिसे कोई नहीं जानता था। और मेरे साथ… मेरे साथ वे क्या करते? मैं उनकी अपनी बेटी थी, लेकिन साथ ही मैं उनके उस खौफनाक अपराध की एकमात्र चश्मदीद गवाह भी थी जो उन्हें सीधे फांसी के फंदे तक पहुँचा सकती थी। पापा ने अपनी इज्जत, अपनी दौलत और अपनी झूठी शराफत को बचाने के लिए एक ऐसा फैसला किया जिसने मुझे जीते-जी मार डाला।
उसी रात, उन्होंने मुझे उस गाड़ी में बेहोश किया और शहर से तीन सौ मील दूर एक अंजान राज्य के एक अवैध, बंद पड़े अनाथालय जैसे सुधार गृह के हवाले कर दिया, जिसका मालिक पापा का एक पुराना भ्रष्ट दोस्त था। उन्होंने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने कभी अपना मुंह खोला या अपने असली परिवार से संपर्क करने की कोशिश की, तो वे घर जाकर तुम्हें और माँ को भी खत्म कर देंगे। उन्होंने कहा कि उनका यह राज सिर्फ तभी तक दफन रहेगा जब तक मैं दुनिया के लिए ‘गायब’ रहूंगी।
कस्बे में लौटकर उन्होंने झूठी गुमशुदगी का नाटक रचा। उन्होंने तुम्हें और माँ को अंधेरे में रखा। और उस स्वेटर का क्या? उस रात जब वे मुझे उस अनाथालय में बंद कर रहे थे, उन्होंने मेरा वह स्वेटर जबरन उतार लिया था ताकि मेरी पहचान मिटाई जा सके। लेकिन मैंने किसी तरह मौका पाकर उस स्वेटर के अंदर वह चाबी सिल दी थी, जो पापा की जेब से डिक्की में गिर गई थी। यह उस लॉकर की चाबी थी जहाँ पापा ने रेचल के कत्ल से जुड़े सबूत—उसका खून से सना पर्स, उसकी आईडी और वह लोहे का रिंच—छुपाकर रखे थे ताकि अगर कभी पुलिस उन तक पहुँचे, तो वे उसे नष्ट कर सकें।
सालों बाद, जब वह अवैध सुधार गृह बंद हुआ, तो मैं एक टूटी हुई, पहचान-विहीन इंसान बन चुकी थी। मैं कानूनी रूप से मर चुकी थी। मेरे पास कोई दस्तावेज नहीं थे। मैं दर-दर की ठोकरें खाती रही, छोटे-मोटे काम करती रही। जब मुझे पता चला कि माँ मर चुकी हैं, तो मेरी आत्मा का आखिरी हिस्सा भी टूट गया। लेकिन जब मुझे पता चला कि पापा अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हैं और नर्सिंग होम में हैं, तो मेरे भीतर का वह दबा हुआ सच ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा।
मैं अपना बदला लेने नहीं आई हूँ, जेसिका। मैं सिर्फ अपनी पहचान वापस चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि दुनिया जाने कि जिस बाप को तुम एक शरीफ, गमजदा पिता समझती रही हो, वह वास्तव में एक कातिल था जिसने अपने गुनाह को छुपाने के लिए अपनी ही सोलह साल की बेटी की पूरी जिंदगी निगल ली।
वह चाबी बस टर्मिनल के पुराने लॉकर नंबर B-14 की है। वह सबूत आज भी वहाँ सुरक्षित हैं क्योंकि उस लावारिस लॉकर को पिछले चालीस सालों से किसी ने नहीं खोला है। पुलिस को वहाँ ले जाओ, जेसिका। और पापा से जाकर पूछो… पूछो कि अपनी ही बेटी का जीवन छीनकर उन्हें कैसी नींद आती थी?
मैं शहर छोड़ रही हूँ, क्योंकि मैं तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। मैं अपनी नन्हीं सोफी के चेहरे पर वही मुस्कान देखकर जा रही हूँ जो कभी मेरी हुआ करती थी। अगर तुम मुझे माफ कर सको, तो बस यह याद रखना कि तुम्हारी बहन ने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा था… उसे छीन लिया गया था।
तुम्हारी अपनी,
लौरा।”
खत खत्म होते-होते मेरी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था। मेरे हाथ इतने जोर से कांप रहे थे कि कागज के पन्ने मेज पर बिखर गए। मेरा पूरा वजूद, मेरा पूरा अतीत, मेरे माँ-बाप की यादें—सब कुछ एक झटके में जलकर राख हो चुका था। जिस पिता की कमजोरी पर मैं तरस खाती थी, जिस पिता की सेवा मैंने अपनी पूरी जिंदगी एक कर्तव्यपरायण बेटी की तरह की थी, वह एक दरिंदा था? उसने मेरी जुड़वां बहन की सांसें, उसकी जवानी, उसका पूरा जीवन सिर्फ अपनी चमड़ी बचाने के लिए छीन लिया था?
मेरे भीतर का दुख अचानक एक भयानक, हिंसक प्रतिशोध में बदल गया। मैंने उस खत को समेटा, उस पीतल की चाबी को अपनी मुट्ठी में इस कदर दबाया कि उसकी धारदार नोक मेरी हथेली में धंस गई और खून की एक पतली लकीर मेरी कलाई पर बह निकली। लेकिन मुझे कोई दर्द महसूस नहीं हुआ। असली दर्द तो मेरी रूह में हो रहा था।
मैं अपनी गाड़ी में बैठी और सीधे ‘सेंट मैथ्यूज’ नर्सिंग होम की तरफ चल पड़ी। रास्ते में सड़क पर फैला कोहरा और गहरा होता जा रहा था, लेकिन मेरी आँखों के सामने चालीस साल पुराना वह अंधेरा अब पूरी तरह छंट चुका था।
जब मैं नर्सिंग होम के कमरा नंबर 108 के सामने पहुँची, तो शाम के सात बज रहे थे। कमरे के अंदर केवल एक मंद नाइट-बल्ब जल रहा था। टीवी पर कोई पुराना ब्लैक-एंड-व्हाइट शो बिना आवाज के चल रहा था। बिस्तर पर नब्बे साल के आर्थर मिलर यानी मेरे पिता लेटे हुए थे। उनका सफेद चेहरा झुर्रियों से भरा था, उनकी सांसें भारी थीं और उनके कमजोर, कंपकंपाते हाथ चादर पर रखे हुए थे।
मैंने दरवाजा अंदर से बंद किया और उसकी कुंडी चढ़ा दी। उस खटके की आवाज से पापा ने धीरे से अपनी कमजोर पलकें उठाईं। उन्होंने मुझे देखा और उनके सूखे होंठों पर एक बहुत ही धीमी, थकी हुई मुस्कान आई।
“जेसिका… बेटी… तुम इस वक्त? सब ठीक तो है ना?” उनकी आवाज लड़खड़ा रही थी।
मैं कोई जवाब दिए बिना चुपचाप उनके बिस्तर के पास आई। मैंने अपने बैग की चेन खोली।
मैंने वह बड़ा, भारी ऊनी स्वेटर निकाला और उसे पूरी तरह खोलकर पापा के कमजोर, कांपते सीने पर फैला दिया। वह पीला सूरजमुखी… और उसकी वह भूरी पंखुड़ी… सीधे उनके चेहरे के सामने थी।
उस स्वेटर को देखते ही, जैसे किसी ने नब्बे साल के उस बूढ़े इंसान के सीने में करंट का तार छू दिया हो। पापा की आँखें दहशत से इस कदर बाहर निकल आईं मानो उनका दम घुटने लगा हो। उनका मुंह खुला का खुला रह गया और उनकी सांसें गले में ही अटक गईं। उनके सूखे हाथ उस स्वेटर को छूने के लिए उठे, लेकिन खौफ के मारे हवा में ही जम गए।
“य… यह… यह कहाँ से…” उनकी जुबान हकलाने लगी।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली और वह पीतल की भारी चाबी, जिस पर उनका खून और मेरा खून एक साथ लगा हुआ था, सीधे उनके सीने पर, उस सूरजमुखी के फूल के ठीक बीच में पटक दी। चाबी की धात्विक खनक उस खामोश कमरे में किसी मौत की घंटी की तरह गूँज उठी।
“पहचानते हैं इसे, पापा?” मेरी आवाज इतनी सर्द और सपाट थी कि कमरे का तापमान शून्य से नीचे गिरता हुआ महसूस हुआ। “बस टर्मिनल… लॉकर नंबर B-14। और रेचल का वह खून जो आपके हाथों से कभी नहीं धुला।”
पापा का पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। मॉनिटर पर उनकी दिल की धड़कनें बेकाबू होकर तेज आवाज में बीप करने लगीं। उनके माथे पर पसीने की ठंडी बूंदें चमकने लगीं। वे अपनी दोनों हथेलियों से अपना चेहरा छुपाने की कोशिश करने लगे, ठीक वैसे ही जैसे चालीस साल पहले उन्होंने अपने गुनाह को छुपाने की कोशिश की थी।
“जेसिका… मेरी बात सुनो… वह… वह एक हादसा था… मैंने जानबूझकर नहीं किया था…” वे बच्चों की तरह सुबकने लगे। उनके आंसुओं में कोई पश्चाताप नहीं था, केवल पकड़े जाने का वही पुराना, घिनौना खौफ था।
“हादसा?” मैं उनके चेहरे पर झुक गई। मेरी आँखें अंगारों की तरह दहक रही थीं। “रेचल को मारना शायद आपका एक वहशी गुस्सा था, पापा। लेकिन अपनी ही सोलह साल की बेटी को, अपने ही खून को चालीस साल तक एक जिंदा लाश बनाकर अनाथालय के नरक में झोंक देना… क्या वह भी एक हादसा था? माँ को तड़पा-तड़पा कर मार देना… क्या वह भी एक हादसा था?”
“मुझे… मुझे जेल जाने से डर लगता था…” पापा की आवाज एक घिनौनी फुसफुसाहट में बदल गई। “अगर मैं पकड़ा जाता, तो मेरा सब कुछ खत्म हो जाता… मेरा नाम, मेरी इज्जत… लौरा मेरी बात नहीं मानती, वह सबको बता देती… मैंने उसे मारा तो नहीं ना जेसिका! मैंने उसे जिंदा रखा… मैंने उस पर दया की थी!”
“दया?” उस एक शब्द ने मेरे सीने के आखिरी सब्र को भी तोड़ दिया। “आपने उसे मारा नहीं, आपने उसे हर रोज, हर एक पल चालीस साल तक मारा! आपने हम सबको मार दिया!”
मैंने अपनी जेब से फोन निकाला। पापा ने फटी हुई आँखों से मुझे देखा। “किसे… किसे फोन कर रही हो जेसिका?”
“पुलिस को,” मैंने डायल पैड पर उंगली रखते हुए कहा। “और काउंटी शेरिफ को। वे बस टर्मिनल के उस लॉकर को खोलने जा रहे हैं। और उसके बाद, वे यहाँ आ रहे हैं। आप अपनी जिंदगी के आखिरी चंद दिन इस आरामदायक नर्सिंग होम में नहीं, बल्कि जेल की उसी कालकोठरी में काटेंगे जहाँ आपको चालीस साल पहले होना चाहिए था।”
“नहीं! जेसिका, प्लीज! मैं तुम्हारा बाप हूँ! मैं मर जाऊंगा… मेरी सांसे उखड़ रही हैं!” पापा हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगे। वे बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगे, लेकिन उनके कमजोर अंग उनका साथ नहीं दे रहे थे।
मैंने एक कदम पीछे हटाया। मेरी आँखों में उनके लिए न कोई नफरत बची थी, न कोई दया। वे मेरे लिए केवल एक ऐसा मुजरिम थे जिसका हिसाब होना बाकी था।
“आप मेरे पिता उसी रात मर चुके थे, जिस रात आपने लौरा की खुशियों का कत्ल किया था,” मैंने फोन कान से लगाते हुए कहा। “अब यहाँ सिर्फ एक हत्यारा बचा है, और कानून उसका इंतजार कर रहा है।”
पुलिस की सायरन की आवाजें कुछ ही मिनटों में नर्सिंग होम के बाहर गूँजने लगीं। उस रात, चालीस साल पुराना वह रहस्यमयी अंधेरा हमेशा के लिए टूट गया। स्थानीय पुलिस ने बस टर्मिनल के उस पुराने, जंग लगे लॉकर से वह सारा सामान बरामद कर लिया जिसने रेचल के अनसुलझे कत्ल की गुत्थी को हमेशा के लिए सुलझा दिया।
अगली सुबह, जब शहर के हर अखबार के पहले पन्ने पर नब्बे साल के आर्थर मिलर की हथकड़ियों में जकड़ी तस्वीर छपी, तो पूरा कस्बा सन्न रह गया। लेकिन मुझे अब उस शहर से कोई मतलब नहीं था।
मैंने उस पीले सूरजमुखी वाले स्वेटर को अपनी छाती से चिपका लिया। उस भूरी पंखुड़ी को छूते हुए, मैंने पहली बार महसूस किया कि मेरी बहन कभी मुझसे दूर नहीं गई थी। उसका दर्द, उसका संघर्ष और उसकी सच्चाई उस स्वेटर के हर धागे में जिंदा थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ सुबह का हल्का सूरज बादलों को चीरकर निकल रहा था।
मुझे नहीं पता था कि मैं लौरा को दोबारा कभी ढूंढ पाऊंगी या नहीं, लेकिन उस सुबह मुझे इतना यकीन जरूर था कि कहीं न कहीं, किसी अनजान शहर की ठंडी हवा में सांस लेते हुए, मेरी जुड़वां बहन आखिरकार चालीस साल बाद उस भयानक डर और बंदिशों से पूरी तरह आजाद हो चुकी थी।
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