थायराइड को स्वस्थ रखने के लिए आज ही छोड़ें ये 6 चीजें, वरना बढ़ सकती है परेशानी
थायराइड ग्रंथि को स्वस्थ रखने के आसान उपाय जानें। हमारे गले के निचले हिस्से में तितली के आकार की एक…
— लो, अपनी दादी को संभालो। घर की सबसे समझदार लड़की बनती हो न, कम से कम जीवन में एक बार यही काम आ जाओगी। अब से इनकी ज़िम्मेदारी तुम्हारी है।
सुबह के ठीक 6 बजकर 40 मिनट हो रहे थे। महाराष्ट्र के पुणे शहर की जुलाई वाली मूसलाधार और ठंडी बारिश मेरी छोटी सी किराए की बिल्डिंग की सीढ़ियों तक भर आई थी। चारों तरफ धुंध और पानी का शोर था। मेरे सगे चाचा राजीव ने एक पुराना, टूटा हुआ सूटकेस हमारे फ्लैट के दरवाजे के सामने ज़ोर से पटका और मेरी अस्वस्थ दादी सावित्री को बिना किसी संकोच के मेरी ओर आगे बढ़ा दिया। दादी इस ठंडे और अनपेक्षित मौसम में बहुत असहज महसूस कर रही थीं। उन्होंने एक साधारण और पुरानी सूती नाइटी पहन रखी थी, उनकी चप्पलें कीचड़ से पूरी तरह भरी हुई थीं, सफ़ेद बाल चेहरे से चिपके थे और उनके दोनों हाथ ठंड और अनजान डर के कारण लगातार कांप रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी बहुत गहरे मानसिक आघात में हों।

मैंने उन्हें नीचे गिरने से पहले ही अपने दोनों हाथों से मजबूती से संभाल लिया। उनका कांपता हुआ शरीर मेरे सीने से लग गया।
— “चाचा, आप सुबह-सुबह इस तूफ़ानी बारिश में यह क्या कर रहे हैं? दादी की यह हालत किसने की?” मैंने अपनी आँखों में आए गुस्से और आंसुओं को रोकते हुए पूछा।
तभी नीचे सड़क पर खड़ी आलीशान कार का शीशा धीरे से नीचे हुआ और उसमें बैठी मेरी चाची मीना ने बड़े ही उदासीन और तीखे लहजे में कहा— “हमसे अब इनकी देखरेख और नाटक बर्दाश्त नहीं होता, अनन्या। बढ़ती उम्र के कारण रात-रात भर जागना, अजीब बातें करना और सब कुछ भूल जाना अब इनकी रोज़ की आदत बन गई है। डॉक्टर ने भी साफ़ कह दिया है कि इन्हें किसी विशेष और महँगे चिकित्सा केंद्र में रखने की ज़रूरत है, जिसका खर्च उठाना हमारे बस की बात नहीं है। वैसे भी उनका डेक्कन जिमखाना वाला वह आलीशान पुश्तैनी बंगला अब बिक चुका है। उसकी बिक्री से मिला सारा पैसा उनके पिछले इलाज और हमारी पुरानी देनदारियों को चुकाने में चला गया है।”
— “क्या? आपने दादा जी का वह ऐतिहासिक बंगला बेच दिया? लेकिन दादी ने उस संपत्ति को बेचने के कागजातों पर कब और कैसे सहमति दी थी?” मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा था क्योंकि वह बंगला सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं, मेरी माँ की यादों का आखिरी हिस्सा भी था।
राजीव चाचा ने एक बड़ा कानूनी लिफाफा मेरी तरफ लापरवाही से फेंकते हुए कहा— “इस कागज़ पर उनके हस्ताक्षर और अंगूठे का साफ़ निशान है। सब कुछ पूरी तरह से कानूनी और नियमानुसार है। अब उनके नाम पर इस दुनिया में एक रुपया भी नहीं बचा है। हम आज ही दोपहर की फ्लाइट से हमेशा के लिए दुबई के लिए रवाना हो रहे हैं। हम इस पारिवारिक झंझट के कारण अपनी इतनी महँगी अंतरराष्ट्रीय यात्रा के टिकट रद्द नहीं कर सकते। अब जो करना है, तुम करो।”
तभी व्हीलचेयर जैसी स्थिति में खड़ी बूढ़ी दादी ने सड़क की ओर अपनी धुंधली आँखों से देखा और लड़खड़ाती आवाज़ में कहा— “राजू… मेरे बच्चे, मुझे मेरे पुराने घर ले चल। तेरे बाबूजी शाम को दफ़्तर से आएंगे तो मुझे इस अनजान जगह पर कहाँ ढूंढेंगे? मुझे यहाँ डर लग रहा है।”
चाची मीना कार के भीतर से ही ज़ोर से हँस पड़ीं, उनकी हँसी में कोई संवेदना नहीं थी— “इन्हें अब यह भी याद नहीं है कि बाबूजी को गए हुए पूरे 11 साल बीत चुके हैं। तुम तो बचपन में इनकी सबसे लाडली पोती थीं अनन्या, अब देखते हैं कि तुम अपनी इस मामूली सी 8,000 रुपये वाली ऑनलाइन नौकरी में इनकी सेवा कितने दिन कर पाती हो। हमारी तरफ से अब यह रिश्ता ख़त्म।”
इतना कहकर कार तेज़ी से आगे बढ़ गई। दादी बारिश के बीच उड़ती हुई धूल, पानी की बौछारों और उस गाड़ी की लाल ब्रेक लाइट को तब तक टकटकी लगाए देखती रहीं, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गई।
मेरे पास बैठकर रोने या अपनी किस्मत को कोसने का बिल्कुल भी समय नहीं था। मकान मालिक का पिछले दो महीने का घर का किराया अभी भी देना बाकी था। मैं घर बैठे विभिन्न ऑनलाइन वेबसाइटों और दुकानों के लिए उत्पादों का विवरण (Product Descriptions) लिखने का फ्रीलांस काम करती थी। मेरी महीने की कमाई कभी 18,000 रुपये होती तो कभी काम न मिलने पर मुश्किल से 9,000 रुपये पर सिमट जाती थी। उस विशेष सुबह जब मैंने अपना बैंक खाता चेक किया, तो उसमें केवल 612 रुपये बचे थे। यह एक ऐसी चुनौती थी जिससे कोई भी सामान्य लड़की टूट जाती। फिर भी, मैंने अपने भीतर की ममता और स्वाभिमान को जगाया। मैं दादी को धीरे से अपने छोटे से कमरे के भीतर लेकर आई, उनके भीगे हुए कपड़े बदलकर उन्हें सूखी और गर्म साड़ी पहनाई। उनके ठंडे पड़ चुके पैरों को हल्के गर्म पानी से धोया और पड़ोस में रहने वाली दयालु उमा काकू से उनके लिए थोड़ी सी गर्म खिचड़ी मांगी।
शुरुआती कुछ रातें किसी भयानक सपने जैसी थीं। उम्र के इस पड़ाव पर दादी की याददाश्त बहुत कमज़ोर हो चुकी थी। वे पहली रात में लगभग 17 बार उठकर मुझसे पूछती रहीं कि उनका कमरा कहाँ है और उनका राजू कहाँ गया है। दूसरी रात वे अचानक भ्रम की स्थिति में बालकनी का दरवाज़ा खोलकर नीचे जाने लगीं, उन्हें लगा कि वे अपने पुराने डेक्शन वाले बंगले के बगीचे में टहल रही हैं। तीसरे दिन सुबह उन्होंने आईने में अपने ही चेहरे को देखा और डर के मारे ज़ोर से चीख उठीं— “यह बूढ़ी औरत मेरे घर में क्यों छिपी है? इसे बाहर निकालो अनन्या!”
ऐसी परिस्थितियों में मैं अक्सर खुद को संभालने के लिए बाथरूम में जाकर नल खोल देती और अकेले रोती थी, फिर अपना चेहरा ठंडे पानी से धोकर मुस्कुराते हुए उनके पास लौट आती थी। जब भी उनका मानसिक तनाव या अनजान डर बहुत बढ़ जाता, मैं उनके पास ज़मीन पर बैठ जाती और उनके सिर पर अपना हाथ रखकर वही पुराना पारंपरिक भजन बहुत धीमी और मधुर आवाज़ में गाती, जो वे बचपन में मेरी चोटी बनाते समय मुझे सुनाती थीं—“रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम…” इस पवित्र भजन की धुन सुनते ही उनकी आँखें धीरे-धीरे शांत हो जाती थीं और वे बच्चों की तरह मेरे कंधे पर सिर रखकर सो जाती थीं।

एक रात जब बाहर बहुत शांत माहौल था, दादी ने अचानक अपनी कमज़ोर उंगलियों से मेरा चेहरा छुआ। उनकी आँखों में उस पल एक अजीब सी समझदारी और पहचान थी। वे बोलीं— “अनु… मेरी बच्ची, तू आई थी न उस दिन भी मेरे पास?”
— “कौन से दिन, दादी? मुझे साफ़-साफ़ बताइए,” मैंने उनके हाथों को चूमते हुए पूछा।
लेकिन उनका दिमाग फिर से पुरानी यादों के धुंधलके में खो गया। वे धीरे से फुसफुसाईं— “उस दिन मीना ने मेरा फोन छीनकर स्विच ऑफ कर दिया था। राजू बहुत गुस्से में था, वह बोला कि अगर मैंने इस सफ़ेद कागज़ पर अपना अंगूठा नहीं लगाया, तो वे मुझे किसी दूर के अनाथ आश्रम या वृद्धाश्रम में अकेला छोड़ देंगे। अनु, मुझे उस काले कमरे से बहुत डर लग रहा था।”
यह सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे समझ आ गया कि यह कोई सामान्य संपत्ति की बिक्री नहीं थी, बल्कि मेरी अस्वस्थ दादी की स्थिति का फायदा उठाकर किया गया एक बहुत बड़ा वित्तीय अपराध था। अगली ही सुबह मैंने तुरंत वरिष्ठ नागरिक सहायता केंद्र (Senior Citizen Helpline) पर फोन किया। वहाँ के अधिकारियों ने मेरी स्थिति को समझा और मुझे जिला समाज कल्याण कार्यालय और शहर की एक बेहद प्रतिष्ठित और निडर महिला वकील नैना देशमुख का नंबर दिया। एडवोकेट नैना ने जब मेरे छोटे से फ्लैट पर आकर मेरी और दादी की पूरी आपबीती सुनी, तो उनके चेहरे पर कानून की कड़वाहट साफ़ दिखी।
वे बोलीं— “अनन्या, यह सिर्फ एक सामान्य पारिवारिक संपत्ति का झगड़ा या मतभेद नहीं है। यह कानूनी भाषा में एक वरिष्ठ नागरिक का परित्याग (Abandonment), उनके अधिकारों का आर्थिक शोषण और साफ़ तौर पर जालसाजी (Forgery) का गंभीर मामला है। हम इस तरह उन अपराधियों को दुबई भागने और चैन से रहने नहीं दे सकते। सबसे पहले हमें कोर्ट से तुम्हारी देखरेख में दादी की सुरक्षा और चिकित्सा अधिकारों का स्थायी आदेश प्राप्त करना होगा।”
इसके बाद के कई सप्ताह कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने, सरकारी डॉक्टरों द्वारा दादी की मेडिकल जांच कराने, समाज कल्याण अधिकारियों द्वारा मेरे छोटे से घर का निरीक्षण करने और गवाहों के बयान दर्ज कराने में बीते। इस कठिन दौर में पड़ोस की उमा काकू मेरे लिए एक देवदूत की तरह साबित हुईं। जब मैं काम के सिलसिले में या कोर्ट की तारीखों पर बाहर जाती, उमा काकू दिन भर दादी के पास बैठती थीं। वे उन्हें अपने हाथों से पोहे खिलातीं, पुराने मराठी भावगीत सुनातीं और उनकी हर भ्रमित बात का उत्तर इतनी आत्मीयता से देती थीं जैसे दादी की कोई भी बात बेकार या फालतू न हो।
इस अपनत्व और सही इलाज के कारण धीरे-धीरे दादी के अच्छे और सचेत रहने के पल बढ़ने लगे। वे अब दिन में कई बार मेरा नाम सही से पहचान लेती थीं, तो कभी-कभी मुझे मेरी दिवंगत माँ समझकर प्यार करने लगती थीं। मगर इन सबके बीच, वे अपनी अचेतन अवस्था में कुछ अजीब और रहस्यमयी वाक्य बार-बार दोहराती थीं, जो किसी कोड वर्ड जैसे लगते थे।
वे कहती थीं— “लोहे के दो शेर हमेशा पहरा देते हैं।”
फिर कहती थीं— “बिना गाने वाली मैना के पेट के भीतर ही असली रास्ता जाता है।”
और इसके साथ ही वे एक विशेष चार अंकों की संख्या लगातार बोलती थीं— “सात… तीन… एक… नौ।”
मुझे लगा कि इन वाक्यों का कोई न कोई गहरा मतलब ज़रूर है, इसलिए मैंने उन सभी बातों को अपनी एक व्यक्तिगत डायरी में शब्द-ब-शब्द लिख लिया।
एक दोपहर जब धूप खिड़की से अंदर आ रही थी, दादी ने अचानक मुझसे बहुत ही गंभीर होकर पूछा— “अनु, उस लालची राजू ने हमारा वह पुश्तैनी घर बेचकर क्या तुम्हारी दिवंगत माँ के हिस्से का कानूनी अधिकार भी पूरी तरह से हड़प लिया? क्या उसने तुम्हें कुछ नहीं दिया?”
मेरी माँ की मृत्यु बहुत साल पहले ही हो चुकी थी और उनके जाने के बाद चाचा-चाची ने कभी भी परिवार में हमारे अधिकारों या माँ के हिस्से की बात नहीं की थी, बल्कि हमें हमेशा एक बोझ की तरह देखा था। मैंने दादी से और गहराई से पूछना चाहा, पर वे अपनी आदत के अनुसार फिर से पूरी तरह शांत हो गईं।
इस घटना के लगभग दो महीने बाद, जिला अधिकरण (Tribunal) ने कानूनी रूप से यह स्वीकार किया कि दादी सावित्री देवी मेरे साथ पूरी तरह से सुरक्षित और खुश हैं। कोर्ट ने चाचा राजीव के दावों को ख़ारिज करते हुए मुझे दादी की स्थायी कानूनी देखरेख और उनके स्वास्थ्य व संपत्ति से जुड़े सभी फैसलों का वैध अधिकार सौंप दिया। उस रात मैंने और उमा काकू ने अपनी इस छोटी सी कानूनी जीत की खुशी में एक-एक कप चाय और 10 रुपये वाले बिस्कुट के पैकेट से छोटी सी पार्टी मनाई।
रात के समय दादी खिड़की के पास बैठी बाहर हो रही रिमझिम बारिश को देख रही थीं। अचानक उनके चेहरे पर एक अद्भूत शांति आई और उनकी आवाज़ पूरी तरह से साफ़ और गंभीर हो गई, जैसी कई सालों पहले हुआ करती थी।
वे बोलीं— “डेक्कन सहकारी बैंक। मुख्य शाखा। लॉकर नंबर 739। राजू और मीना ने मेरे अलमारी के सारे कागज़ात और चाबियां छान मारीं, उन्होंने उस लॉकर को बहुत खोजने की कोशिश की, पर वे मूर्ख नहीं जानते थे कि उसकी असली चाबी कहाँ है।”
यह सुनते ही मेरे हाथ में पकड़ा हुआ चाय का कप नीचे गिरते-गिरते बचा। मेरा पूरा शरीर रोमांच से भर गया।
— “दादी! उस लॉकर की चाबी कहाँ है? मुझे बताइए, आज हमारा सब कुछ दांव पर लगा है,” मैंने उनके घुटनों के पास बैठकर उनके दोनों हाथ थामते हुए कहा।
उन्होंने अपने होंठों पर उंगली रखी और बहुत धीरे से रहस्यमयी अंदाज़ में फुसफुसाईं— “पुश्तैनी घर के कबाड़ वाले बक्से में… जो लकड़ी की मैना रखी है, जो कभी गाती नहीं है… उसके पेट के भीतर एक गुप्त दराज है, चाबी उसी के भीतर छिपी है। और उस लॉकर का गुप्त कोड वही है जो मैंने तुम्हें बताया था।”
इतना कहते ही वे फिर से एक छोटे बच्चे की तरह अपना पुराना भजन गुनगुनाने लगीं, जैसे उन्होंने पिछले एक मिनट में कुछ कहा ही न हो।
मैंने तुरंत अपनी डायरी खोली। पहली बार मेरे सामने पूरी तस्वीर साफ़ हो चुकी थी। मुझे समझ आया कि मेरे चालाक चाचा-चाची ने किसी बेसहारा और बीमार बूढ़ी औरत को सिर्फ एक बोझ समझकर नहीं छोड़ा था, बल्कि वे अपनी अज्ञानता में उस स्त्री को छोड़ गए थे जिसके दिमाग के किसी सुरक्षित कोने में आज भी यह बात पूरी तरह से महफ़ूज़ थी कि इस पूरे परिवार की वास्तविक और विशाल संपत्ति कहाँ छिपी है।
अगली ही सुबह, मैं एडवोकेट नैना देशमुख और कोर्ट के आदेश की कॉपी के साथ डेक्कन सहकारी बैंक की मुख्य शाखा में पहुँची। बैंक के मैनेजर ने हमारे कानूनी दस्तावेज़ों की बारीकी से जांच की। मैंने दादी के उस पुराने कबाड़ के सामान से वह लकड़ी की मैना ढूंढ निकाली थी, जिसके निचले हिस्से को घुमाने पर सचमुच एक छोटी सी प्राचीन चाबी और चार अंकों का कोड “7319” काम कर गया। जब बैंक के सुरक्षा गार्ड हमें लेकर बेसमेंट में स्थित मुख्य तिजोरी के कमरे में गए, जहाँ लोहे के दो विशाल शेरों की मूर्तियां पहरे के रूप में बनी हुई थीं, तब मुझे दादी के पहले कोड वर्ड का असली मतलब समझ आया।
मैनेजर ने लॉकर नंबर 739 में वह चाबी लगाई और कोड दर्ज किया। एक भारी आवाज़ के साथ वह बड़ा लॉकर हमारे सामने खुल गया। उस लॉकर के भीतर जो कुछ भी रखा था, उसे देखकर बैंक मैनेजर और वकील नैना देशमुख की आँखें भी फटी की फटी रह गईं।
उस लॉकर के भीतर किसी ज़माने के ब्लू-चिप कंपनियों के करोड़ों रुपये के शेयर्स के मूल सर्टिफिकेट्स, सोने के प्राचीन आभूषण और सबसे महत्वपूर्ण—एक गुप्त वसीयतनामा और डिजिटल पेन ड्राइव रखी हुई थी। उस वसीयत में मेरे स्वर्गीय दादा जी ने साफ़-साफ़ लिखा था कि डेक्कन वाले बंगले और उनकी कुल संपत्ति का 60 प्रतिशत हिस्सा केवल उनकी पोती अनन्या और उनकी दिवंगत बहू के नाम रहेगा, और राजीव को सिर्फ व्यापार के लिए एक छोटा हिस्सा मिलेगा। इसके अलावा, उस पेन ड्राइव में राजीव चाचा और चाची मीना की कुछ ऐसी वॉयस रिकॉर्डिंग्स और बैंक कूटनीति के दस्तावेज़ थे, जो यह साबित करने के लिए काफी थे कि उन्होंने दादा जी के जाली हस्ताक्षर करके कई अन्य संपत्तियों को अवैध तरीके से अपने नाम ट्रांसफर किया था और बैंक के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलकर करोड़ों का घोटाला किया था। यह एक ऐसा अचूक सबूत था जो मेरे पूरे लालची परिवार को हमेशा के लिए जेल की सलाखों के पीछे भेजने और उन्हें पूरी तरह से बर्बाद करने के लिए काफी था।
मैंने उस वसीयत और पेन ड्राइव को अपने हाथ में लिया। मेरी आँखों से बहने वाले आँसू अब कमज़ोरी के नहीं, बल्कि न्याय की उस जीत के थे जिसकी कल्पना मेरे चाचा-चाची ने अपने सबसे बुरे सपने में भी नहीं की होगी।
ज़मीन पर बैठकर अपनों के धोखे का शिकार हुई अनन्या आज कानून के उस सबसे ऊंचे मुकाम पर खड़ी थी, जहाँ से वह अपनी दादी को उनका खोया हुआ सम्मान और खुद को अपना अधिकार वापस दिलाने जा रही थी।
आपकी राय में इस पूरे वृत्तांत में सबसे बड़ी और प्रेरणादायक बात क्या थी—मुश्किल परिस्थितियों में भी अपनी अस्वस्थ दादी का साथ न छोड़ने वाला अनन्या का अटूट स्वाभिमान, लालच में आकर अपनी ही माँ और भतीजी को धोखा देने वाले चाचा राजीव का कर्मों का फल (कर्मा), या विपरीत समय में एक सच्ची सहेली की तरह साथ निभाने वाली उमा काकू और पड़ोसियों का निस्वार्थ मानवीय प्रेम?
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