Story

आधी रात जब घर लौटा तो 10 साल का मासूम बेटा ठिठुरते हुए धो रहा था कपड़े, जबकि 11 रिश्तेदारों के साथ क्रूज़ पर करोड़ों उड़ा रही थी सौतेली पत्नी; फिर एक गुप्त लॉकर की फाइलों ने खोला खौफनाक साजिश का पर्दाफाश और बदल दिया सबका मुकद्दर!

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दिसंबर की वह सर्द रात हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड लेकर आई थी। घड़ी की दोनों सुइयां रात के दो बजकर पंद्रह मिनट पर आकर टिक चुकी थीं। दिल्ली के एक शांत और पॉश इलाके में स्थित मेरे आलीशान बंगले के बाहर जब मेरी कैब रुकी, तो पूरा मोहल्ला गहरी नींद की चादर ओढ़े खामोश पड़ा था। लंदन का मेरा बिजनेस दौरा तीन दिन पहले ही अप्रत्याशित रूप से खत्म हो गया था। मैंने सोचा था कि घर पर बिना बताए अचानक पहुंचकर अपने 10 साल के बेटे कबीर और अपनी दूसरी पत्नी नेहा को एक प्यारा सा सरप्राइज दूंगा। मुझे क्या पता था कि उस बंद दरवाजे के पीछे खुशियों का कोई सरप्राइज नहीं, बल्कि मेरी जिंदगी को हिलाकर रख देने वाला एक भयानक सच मेरा इंतजार कर रहा था।

मैंने जेब से चाबी निकालकर घर का मुख्य दरवाजा धीरे से खोला ताकि किसी की नींद में खलल न पड़े। पूरे ड्रॉइंग रूम में स्याह अंधेरा छाया हुआ था। फर्श पर बिछे महंगे कश्मीरी कालीन और इटैलियन फर्नीचर की चमक उस अंधेरे में भी धुंधली सी नजर आ रही थी। मैंने जैसे ही अपना भारी लेदर का ट्रैवल बैग नीचे रखा, मुझे दूर बालकनी से सटे वाश एरिया से पानी के टपकने और बाल्टी में छप-छप होने की धीमी आवाज सुनाई दी। साथ ही वहां की एक अकेली पीली बत्ती जल रही थी।

मेरे मन में अजीब सी बेचैनी कौंधी। इतनी कड़ाके की ठंड में, रात के सवा दो बजे वाश एरिया में कौन हो सकता है? मैंने दबे पांव उस दिशा में कदम बढ़ाए। जैसे ही मैंने वाश एरिया की चौखट पर कदम रखा, वहां का नजारा देखकर मेरी रूह कांप गई और मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई।

ठंडे संगमरमर के फर्श पर, एक फटी हुई पुरानी चटाई पर मेरा दस साल का मासूम बच्चा, कबीर, घुटनों के बल बैठा हुआ था। सामने रखी नीली प्लास्टिक की बाल्टी में उसकी स्कूल की सफेद यूनिफॉर्म और दो पतलूनें भीगी हुई थीं। कड़ाके की इस ठंड में नल से बर्फीला पानी बह रहा था, और कबीर अपने नन्हे-नन्हे, कांपते हाथों से साबुन लगाकर कमीज के कॉलर को पूरी ताकत से रगड़ रहा था। उसके होंठ ठंड से नीले पड़ चुके थे, बदन पर केवल एक पतली सी पुरानी टी-शर्ट और पजामा था, और उसके दोनों हाथ ठंडे पानी में लगातार डूबे रहने के कारण सूजकर लाल हो चुके थे।

“कबीर…?” मेरे गले से एक रुंधी हुई, भारी चीख जैसी आवाज निकली।

वह आवाज सुनते ही बच्चा बुरी तरह सहम गया। उसके हाथ से साबुन छूटकर बाल्टी में गिर गया। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा। उसके मासूम चेहरे पर पहले तो गहरा खौफ और घबराहट तैर गई, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। लेकिन जैसे ही उसकी बड़ी-बड़ी सूजी हुई आंखों ने मुझे पहचाना, उसके चेहरे का डर आंसुओं के समंदर में बदल गया। उसकी आंखें छलक पड़ीं।

“पा… पापा? आप… आप इतनी रात को आ गए?” उसने हकलाते हुए कहा और तुरंत अपने गीले, ठंडे हाथों को अपनी पतली टी-शर्ट से पोंछने की नाकाम कोशिश करने लगा, ताकि मैं उसके भीगे हाथों को न देख लूं।

मैं वहीं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। मैंने उसके नन्हे हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसके हाथ बर्फ के टुकड़े की तरह ठंडे और अकड़े हुए थे। मेरा दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच दिया हो। मेरी आंखों से अनजाने ही आंसू टपक कर उसकी हथेली पर गिर पड़े।

“कबीर! मेरे बच्चे, तुम इस कड़ाके की रात में, सवा दो बजे ठंडे पानी में कपड़े क्यों धो रहे हो? क्या हो रहा है इस घर में?” मेरी आवाज गुस्से और बेबसी से कांप रही थी। “मैंने शाम को तुम्हें फोन करने की कोशिश की थी, लेकिन तुम्हारा फोन लगातार स्विच ऑफ आ रहा था।”

कबीर ने नजरें नीची कर लीं। उसकी आवाज में एक गहरा संकोच था, “पापा… मेरा फोन मम्मी अपने साथ ले गई हैं।”

“नेहा तुम्हारा फोन क्यों ले गई?”

“मम्मी ने कहा था कि सिंगापुर और मलेशिया वाले क्रूज़ पर नेटवर्क की बहुत दिक्कत होती है, इसलिए उन्हें अपने सोशल मीडिया के लाइव वीडियो और फोटो पोस्ट करने के लिए एक बैकअप फोन और एक्स्ट्रा इंटरनेट की जरूरत थी। इसलिए वे मेरा टैबलेट और फोन दोनों ले गईं।” कबीर ने धीरे से कहा।

मेरे दिमाग की नसें फटने लगीं। “और घर की काम वाली बाई, शांति बाई कहां है? कपड़े उसे धोने चाहिए थे, तुम्हारी यूनिफॉर्म धोने का काम उसका है!”

कबीर ने उदास मन से अपनी नन्हीं गर्दन हिलाई, “बाई को नानी ने तीन दिन पहले ही छुट्टी दे दी थी। नानी ने कहा कि जब घर में कोई नहीं है तो बाई को मुफ्त की पगार देने का कोई मतलब नहीं है। नानी ने मुझसे कहा कि मुझे अपने सारे काम खुद करने चाहिए। अगर मैं अपने कपड़े खुद नहीं धोऊंगा और कमरे की सफाई नहीं करूंगा, तो मैं एक बिगड़ैल, आलसी और निकम्मा इंसान बन जाऊंगा… नानी ने कहा कि सौतेली औलादों को अगर अनुशासन में न रखा जाए तो वे सिर पर चढ़ जाती हैं।”

कबीर के मुंह से ‘सौतेली औलाद’ का लफ्ज सुनते ही मेरे सीने में आग लग गई। जिस बच्चे को मैंने कभी खरोंच तक नहीं आने दी थी, उसके कोमल मन में यह जहर किसने घोला था?

मैंने अपने गुस्से को दबाते हुए उसके गाल को छुआ, “तुमने रात का खाना खाया बेटा? क्या बनाया था नानी ने?”

कबीर की आंखें फिर से नम हो गईं, उसने सूखी आवाज में जवाब दिया, “शाम को सात बजे नानी ने दो सूखी रोटियां और थोड़ा सा बचा हुआ अचार दिया था पापा। मुझे बहुत तेज भूख लगी थी, तो मैंने नानी से दूध मांगा… लेकिन नानी ने डांट दिया। उन्होंने कहा कि रात को ज्यादा खाने से पेट खराब होता है।”

“और दोपहर में?”

“कल दोपहर को मैंने पानी पीकर बिस्कुट खाए थे पापा। रसोई का दरवाजा बंद है। मम्मी जब क्रूज़ पर जा रही थीं, तो उन्होंने पेंट्री और रसोई की मुख्य चाबी नानी के हवाले कर दी थी। नानी ने रसोई में ताला लगा दिया है। वे कहती हैं कि बार-बार रसोई खोलने से घर में मक्खी-मच्छर आते हैं और गंदगी फैलती है।”

यह सुनकर मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। मेरे इस दस मंजिला बंगले में, जहां करोड़ों का कारोबार चलता था, जहां फ्रिज हमेशा विदेशी फलों और मिठाइयों से भरा रहता था, वहां मेरा अपना खून, मेरा दस साल का मासूम बेटा भूख से बिलख रहा था और रात के अंधेरे में ठंडे पानी में नौकरों की तरह कपड़े धोने पर मजबूर था!

मैंने तुरंत अपना बैग खोला। उसमें से कुछ काजू, बादाम और लंदन से लाया हुआ चॉकलेट का बड़ा पैकेट निकाला और कबीर के हाथों में थमा दिया। उस मासूम ने जिस तरह भूखी और बेबस नजरों से उस चॉकलेट को देखा और पागलों की तरह खाने लगा, उसने मेरे कलेजे को छलनी कर दिया।

चॉकलेट चबाते हुए कबीर ने मासूमियत से पूछा, “पापा… मम्मी और बाकी सब कब वापस आएंगे?”

“उन्होंने कहा था कि वे अगले हफ्ते सोमवार को लौटेंगी,” मैंने किसी तरह अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा।

“हां पापा, मम्मी ने कल दोपहर नानी को वीडियो कॉल किया था। मैंने नानी के फोन में देखा था… मम्मी बहुत सुंदर गाउन पहनकर क्रूज़ के डेक पर डांस कर रही थीं। उनके साथ मामा, मामी, मौसी, मौसाजी, उनके तीन बच्चे, नानी के भाई और बुआ सब थे। सब बहुत हंस रहे थे और शैंपेन पी रहे थे। कुल ग्यारह लोग गए हैं पापा। नानी कह रही थीं कि पूरे क्रूज़ का खर्च साठ लाख से ज्यादा का है और चिराग मामा की नई नौकरी का जश्न मनाया जा रहा है।”

कबीर की यह एक-एक बात मेरे सीने पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी।

ग्यारह रिश्तेदारों का लग्जरी इंटरनेशनल क्रूज़ ट्रिप! बिजनेस क्लास के टिकट, फाइव स्टार सुइट्स, महंगे ब्रांड्स की शॉपिंग, विदेशी शराब और लाखों का फूहड़ दिखावा—और यह सब किसके पैसों पर हो रहा था? मेरी दिन-रात की मेहनत की कमाई पर! उस पैसे पर जो मैंने अपने पसीने से कमाया था। और दूसरी तरफ, जिस घर की छत के नीचे यह सब ऐशो-आराम फल-फूल रहा था, उसी घर का असली वारिस, मेरा बेटा, भूखा-प्यासा, ठिठुरते हुए अपने ही आंसुओं में अपनी कमीज धो रहा था!

“नानी कहां हैं अभी?” मैंने बेहद भारी और ठंडी आवाज में पूछा।

कबीर ने डरते हुए मास्टर बेडरूम की तरफ इशारा किया, “वे अपने एसी वाले कमरे में हीटर चलाकर सो रही हैं पापा। उन्होंने सख्त हिदायत दी थी कि अगर कपड़े सुबह तक सूखकर प्रेस नहीं मिले, या मैंने जरा सी भी आवाज करके उनकी नींद खराब की, तो वे मुझे किसी दूर-दराज के मिलिट्री बोर्डिंग स्कूल में फिंकवा देंगी जहां मुझे कोई देखने भी नहीं आएगा।”

मैंने कबीर को अपनी बांहों में समेट लिया और उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया। मेरा कोट उसके भीगे चेहरे से गीला हो गया। “बस मेरे बच्चे… बस। अब तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है। तुम्हारा पापा आ गया है। अब इस घर में किसी की हिम्मत नहीं होगी कि तुम्हारी तरफ आंख उठाकर भी देख सके।”

मैंने उसे गोद में उठाया, उसके गीले कपड़े बदले, उसे एक गरम शॉल में लपेटा और अपने कमरे में ले जाकर हीटर चालू किया। उसे बिस्तर पर लिटाकर गरम दूध बनाकर पिलाया और तब तक उसका सिर सहलाता रहा जब तक कि वह गहरी और सुकून भरी नींद में नहीं सो गया।

कबीर के सोने के बाद मैं वापस वाश एरिया में गया। मैंने उस बाल्टी को उठाया, अपने हाथों से उसकी यूनिफॉर्म धोई, उसे सुखाया और फिर बालकनी में खड़े होकर सिगरेट का एक कश खींचा। सुबह के चार बज चुके थे। बाहर घना कोहरा छाया हुआ था, लेकिन मेरे दिमाग के भीतर का कोहरा अब पूरी तरह छंट चुका था।

मेरी पहली पत्नी, प्रिया, आज से चार साल पहले एक गंभीर बीमारी के कारण मुझे और कबीर को हमेशा के लिए छोड़कर चली गई थी। प्रिया एक बेहद सुलझी हुई, संस्कारी और ममतामयी स्त्री थी। उसके जाने के बाद मेरा पूरा संसार उजड़ गया था। कबीर उस वक्त सिर्फ छह साल का था। वह अपनी मां को ढूंढते हुए रातों को रोता था। मैं अपने बिजनेस में व्यस्त रहता था और मुझे लगा कि कबीर को एक मां के साए और प्यार की सख्त जरूरत है।

तीन साल पहले, मेरे कुछ रिश्तेदारों के जरिए नेहा का रिश्ता आया था। नेहा के पिता का देहांत हो चुका था, उसका परिवार मध्यमवर्गीय था। उसके भाई चिराग की कोई पक्की नौकरी नहीं थी। जब नेहा पहली बार हमारे घर आई, तो उसने कबीर को अपनी गोद में बिठाकर जिस तरह दुलारा था, उसने मेरी आंखों में आंसू ला दिए थे। उसकी मां शकुंतला देवी ने हाथ जोड़कर कहा था, “समीर बेटा, नेहा सिर्फ तुम्हारी पत्नी नहीं बनेगी, वह कबीर की ऐसी मां बनेगी कि दुनिया मिसाल देगी। हम तो खानदानी लोग हैं, हमारे लिए बच्चों की परवरिश से बढ़कर कुछ नहीं।”

मैंने उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया। मैंने नेहा से धूमधाम से शादी की। शादी के बाद मैंने नेहा के पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली। उसके बेरोजगार भाई चिराग को अपने संपर्कों के जरिए एक बड़ी कंपनी में नौकरी दिलवाई, उसकी बहनों की शादियों में लाखों का खर्च उठाया, और शकुंतला देवी को अपने घर में एक महारानी का दर्जा दिया। मैंने नेहा को अपने सारे बैंक अकाउंट्स, क्रेडिट कार्ड्स और बिजनेस के खर्चों का पूरा अधिकार दे दिया था ताकि उसे कभी यह न लगे कि वह इस घर में पराई है।

लेकिन आज मुझे समझ आया कि मैं कितना अंधा, कितना मूर्ख और कितना बड़ा बेवकूफ था। जिस औरत को मैंने अपने घर की लक्ष्मी और अपने अनाथ बच्चे की मां बनाया था, वह असल में एक लालची, बेरहम और शातिर नागिन थी जो मेरे ही घर में बैठकर मेरे बच्चे के वजूद को डस रही थी।

सुबह के 7:30 बज चुके थे। सूरज की हल्की किरणें कोहरे को चीरती हुई बाहर आ रही थीं।

मैंने सीधे गेस्ट रूम का दरवाजा बिना खटखटाए जोर से खोला।

अंदर शकुंतला देवी सिल्क का मखमली नाइटगाउन पहने, हीटर की गर्माहट में आराम से तकिया लगाए चाय की चुस्कियां ले रही थीं। सामने टेबल पर ताजे काजू, बादाम और मेवों की प्लेट सजी हुई थी।

मुझे अचानक सामने खड़ा देखकर उनके हाथ से कप हिल गया। चाय की कुछ बूंदें चादर पर गिरीं। उनके चेहरे पर पहले तो एक जबरदस्त घबराहट की बिजली कौंधी, लेकिन अगले ही पल उन्होंने अपने चेहरे पर शातिर चालाकी का एक नकली मुखौटा चढ़ा लिया।

“अरे… समीर बेटा! तुम? तुम तो अगले हफ्ते आने वाले थे ना?” उन्होंने बनावटी मिठास घोलते हुए कहा। “अचानक कैसे आना हुआ? फोन तो कर दिया होता, मैं नाश्ते का इंतजाम करवाती।”

मैंने अपनी दोनों जेबों में हाथ डाले, बेहद सर्द और सख्त आवाज में कहा, “मैं रात को सवा दो बजे ही आ गया था, शकुंतला जी।”

‘शकुंतला जी’ का संबोधन सुनते ही उनकी भवें तन गईं। पहले मैं उन्हें हमेशा ‘मां जी’ कहकर बुलाता था। उन्होंने बात संभालते हुए कहा, “अच्छा… रात को आए? बहुत थक गए होगे। नेहा तो पूरे परिवार को लेकर क्रूज़ पर गई हुई है। चिराग की तरक्की की मन्नत थी ना, इसलिए सब गंगा-दर्शन और समंदर की सैर पर निकल गए। बेचारी नेहा कह रही थी कि समीर होता तो कितना अच्छा होता।”

“क्रूज़ की बात बाद में करेंगे,” मैंने एक कदम आगे बढ़ाया, मेरी आंखों में जलते हुए अंगारे थे। “मुझे सिर्फ यह बताइए कि रात के दो बजकर पंद्रह मिनट पर, कड़ाके की ठंड में मेरा दस साल का बेटा कबीर ठंडे पानी में अपने कपड़े क्यों धो रहा था? और उसे पिछले चौबीस घंटों से भरपेट खाना क्यों नहीं दिया गया था?”

शकुंतला देवी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं, लेकिन वे एक पक्की और घाघ औरत थीं। उन्होंने तुरंत अपनी गर्दन मटकाई, मुंह बनाया और बेपरवाही से बोलीं, “अरे राम राम! तुम उस जरा सी बात का इतना बड़ा बतंगड़ बना रहे हो समीर? लड़का है वो! कल को बड़ा होकर जिम्मेदारी संभालनी है। अगर बचपन से हाथ-पैर नहीं चलाएगा, तो निकम्मा और आलसी बन जाएगा। उसकी अपनी सगी मां तो दुनिया में रही नहीं, अब अगर हम नानी और मौसी होकर उसे अनुशासन नहीं सिखाएंगी, तो कौन सिखाएगा?”

“अनुशासन?” मेरी आवाज इतनी तेज थी कि कमरे की खिड़कियों के शीशे हिल गए। “दस साल के मासूम बच्चे को भूखा रखकर, रात के दो बजे बर्फ जैसे पानी में कपड़े धुलवाना अनुशासन है? या यह आपकी घिनौनी, बेरहम और सौतेली मानसिकता का नंगा नाच है?”

शकुंतला देवी का असली रंग बाहर आ गया। उन्होंने तकिया एक तरफ फेंका और तीखी आवाज में बोलीं, “देखो समीर, अपनी जुबान पर लगाम रखो! मैंने अपनी बेटी नेहा को तुम्हारे जैसे विधुर और एक बच्चे के बाप के साथ ब्याहा है, कोई एहसान नहीं लिया तुमसे। मेरी उम्र अब इस उम्र में तुम्हारे बच्चे की गुलामी करने की नहीं है। मैंने उसे खाना दिया था, अब वो नखरे दिखाकर न खाए तो इसमें मेरा क्या कसूर? और वैसे भी, नेहा ने इस घर के लिए अपनी जवानी दी है, अगर वो अपने मायके वालों को थोड़ा घुमाने ले गई तो तुम्हारे पेट में दर्द क्यों हो रहा है?”

मैंने शकुंतला देवी के उस जहरीले चेहरे को देखा। मुझे अहसास हो गया कि इस औरत के भीतर इंसानियत का एक कतरा भी नहीं बचा है। इनसे बात करना या अपनी ऊर्जा बर्बाद करना सिर्फ कीचड़ में पत्थर फेंकना था।

“ठीक है,” मैंने अपनी आवाज को पूरी तरह शांत कर लिया। एक ऐसी शांति जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले समुद्र पर छा जाती है। “आज के बाद आपको इस घर में किसी की गुलामी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं कबीर को लेकर अभी इसी वक्त इस घर से बाहर जा रहा हूं।”

“कहां ले जाओगे? तुम्हारा तो हफ्तों-हफ्तों का बिजनेस टूर रहता है। इसे अनाथालय में छोड़ोगे क्या?” शकुंतला देवी ने ताना मारा।

“मैं अपनी सारी बिजनेस मीटिंग्स और विदेशी दौरे अगले दो महीने के लिए रद्द कर रहा हूं,” मैंने साफ शब्दों में कहा और मुड़कर बाहर निकल गया।

मैं कबीर के कमरे में पहुंचा। कबीर अब जाग चुका था और सहमी हुई नजरों से मुझे देख रहा था। मैंने प्यार से उसके माथे को चूमा, “कबीर, अपना स्कूल का बैग और अपनी जरूरी किताबें समेटो बेटा, हम कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं।”

मैं कबीर के कपड़े और जरूरी सामान पैक करने के लिए नेहा के मास्टर बेडरूम की ड्रेसिंग और अलमारी की तरफ बढ़ा। वहां नेहा की एक निजी विंटेज अलमारी थी, जिसे वह हमेशा पासवर्ड और खास चाबियों से बंद रखती थी। वह किसी को भी उस अलमारी के पास फटकने तक नहीं देती थी। लेकिन शायद हड़बड़ाहट में, क्रूज़ पर निकलने की जल्दी में, चाबियों का वह गुच्छा ड्रेसिंग टेबल के नीचे रखे एक छोटे से लकड़ी के डिब्बे में ही छूट गया था।

मेरे मन में एक अजीब सा संदेह पैदा हुआ। मैंने वह चाबी उठाई और अलमारी का मुख्य लॉकर खोल दिया।

अंदर का नजारा देखकर मेरे होश उड़ गए।

लॉकर के अंदर गहनों के खाली डिब्बे पड़े थे—वे सारे खानदानी सोने और हीरों के गहने जो मेरी मां और मेरी पहली पत्नी प्रिया के थे, वे सब वहां से गायब थे! उनकी जगह अंदर तीन मोटी, काले रंग की लीगल फाइलें रखी हुई थीं।

मैंने कांपते हाथों से पहली फाइल निकाली और उसे खोला।

फाइल के पहले ही पन्ने ने मेरे पैरों तले की जमीन पूरी तरह खींच ली।

वह दिल्ली के सबसे महंगे और पॉश इलाके में बने एक अल्ट्रा-लग्जरी फोर-बीएचके पेंटहाउस के मालिकाना हक के दस्तावेज थे। उस पेंटहाउस की कीमत तीन करोड़ पचास लाख रुपये थी, और वह फ्लैट पूरी तरह और केवल ‘नेहा शर्मा’ के नाम पर रजिस्टर्ड था!

मैंने दूसरी फाइल खोली। उसमें गुड़गांव के हाईवे पर स्थित एक बहुत बड़े कमर्शियल प्लॉट की रजिस्ट्री थी। उस जमीन की कीमत एक करोड़ बीस लाख रुपये थी, और वह जमीन सीधे ‘शकुंतला देवी’ और उनके बेटे ‘चिराग’ के संयुक्त नाम पर खरीदी गई थी!

लेकिन सबसे बड़ा झटका तो अभी तीसरी फाइल में मेरा इंतजार कर रहा था।

तीसरी फाइल में मेरे निजी बैंक खातों, मेरे मुख्य बिजनेस करंट अकाउंट और सबसे बढ़कर—उस ‘प्रिया मेमोरियल ट्रस्ट’ के दस्तावेज थे, जो मैंने अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद में और कबीर के अटठारह साल की उम्र पूरी होने पर उसकी उच्च शिक्षा और सुरक्षा के लिए बनाया था!

उस ट्रस्ट फंड में मैंने एक-एक पाई जोड़कर करीब दो करोड़ रुपये की फिक्स डिपॉजिट रखी थी। उन सभी बैंक पेपर्स, ट्रांसफर वाउचर्स, चेकबुक्स और पॉवर ऑफ अटॉर्नी के पेपर्स पर मेरे हस्ताक्षर मौजूद थे।

मैंने अपनी उंगलियों से उन हस्ताक्षरों को छुआ।

वे मेरे हस्ताक्षर नहीं थे! वे इतनी बारीक, शातिर और पेशेवर तरीके से बनाए गए जाली दस्तखत (फॉरगेरी) थे कि पहली नजर में कोई भी धोखा खा जाए।

बैंक के पिछले नौ महीनों के विस्तृत स्टेटमेंट देखने पर पता चला कि मेरे बिजनेस और कबीर के ट्रस्ट अकाउंट से धीरे-धीरे करके, टुकड़ों में, कुल एक करोड़ अस्सी लाख रुपये नेहा के निजी शेल खातों और उसकी मां के अकाउंट में ट्रांसफर किए जा चुके थे!

इतना ही नहीं, मेरे नाम पर शहर के दो बड़े प्राइवेट बैंकों से पैंसठ लाख रुपये का पर्सनल और बिजनेस लोन भी मेरे जाली हस्ताक्षरों के दम पर स्वीकृत करवाकर निकाल लिया गया था!

मेरे पूरे बदन में एक भयानक सिहरन दौड़ गई। मेरा सिर चकराने लगा।

यह सिर्फ एक सौतेली मां की बेरुखी या बच्चे के प्रति उपेक्षा का मामला नहीं था। यह एक बेहद शातिर, संगठित, आपराधिक और पूर्वनियोजित षड्यंत्र था! नेहा, उसकी मां शकुंतला, और उसका भाई चिराग पिछले तीन सालों से दीमक की तरह मेरे पूरे साम्राज्य, मेरी दौलत, मेरी इज्जत और मेरे मासूम बच्चे के भविष्य को चाट रहे थे। वे मुझे आर्थिक रूप से पूरी तरह पंगु बनाकर, कबीर को बेसहारा छोड़कर, इस पूरे साम्राज्य को हड़पने की अंतिम साजिश रच चुके थे।

और आज, उसी लूटी हुई दौलत के दम पर वह पूरा कुनबा समंदर के सीने पर तैरते हुए लग्जरी क्रूज़ पर जश्न मना रहा था!

तभी कबीर दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। उसने अपना छोटा सा बैग कंधे पर टांग रखा था। “पापा… मैं तैयार हूं। क्या हम चलें?”

मैंने उस फाइल को बहुत सावधानी से अपने बैग में छिपाया, लॉकर को उसी तरह बंद किया, और कबीर की तरफ देखा। उसकी मासूम, बेदाग आंखों ने मेरे अंदर सुलगती हुई आग को एक फौलादी संकल्प में बदल दिया।

मैंने आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

“हां मेरे बच्चे… चलो। अब इस घर में अंधेरे का अंत होगा और इंसाफ का एक नया सूरज उगेगा।”

मैं कबीर को लेकर सीधे शहर के एक बेहद सुरक्षित, फाइव स्टार होटल के प्रेसिडेंशियल सुइट में ले गया। वहां मैंने उसे शहर के सबसे बेहतरीन चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट और डॉक्टरों की देखरेख में रखा ताकि उसके मन से उस डर और उपेक्षा के घाव मिटाए जा सकें। मैंने अपनी सबसे भरोसेमंद चचेरी बहन, अंजलि, जो एक जानी-मानी प्रोफेसर थी, को कबीर की देखभाल के लिए अपने पास बुला लिया।

इसके बाद, मैंने उस युद्ध की तैयारी शुरू की जिसमें कोई दया, कोई माफी और कोई समझौता नहीं होने वाला था।

मैंने देश के सबसे प्रख्यात क्रिमिनल लॉयर और कॉर्पोरेट फ्रॉड के विशेषज्ञ, सीनियर एडवोकेट राघवेंद्र मल्होत्रा से संपर्क किया। जब एडवोकेट मल्होत्रा ने वे तीनों फाइलें, बैंक स्टेटमेंट्स और फॉरगेरी के दस्तावेज देखे, तो उनकी आंखें भी गुस्से से भर गईं।

“समीर जी,” एडवोकेट मल्होत्रा ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, “यह सिर्फ धोखाधड़ी नहीं है। यह भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेजों को असली के रूप में इस्तेमाल करना), 406 (आपराधिक विश्वासघात), 120B (आपराधिक षड्यंत्र) और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) की धारा 75 के तहत बच्चों पर क्रूरता का एक गंभीर और गैर-जमानती मामला बनता है।”

“मुझे सिर्फ इन धाराओं की सजा नहीं चाहिए मल्होत्रा साहब,” मेरी आवाज में बर्फ जैसी ठंडक थी। “मुझे मेरी पहली पत्नी के खानदानी गहने, मेरे बच्चे के ट्रस्ट का एक-एक पैसा, और इन शातिर लुटेरों के चेहरों से वह झूठी रईसी का नकाब हमेशा के लिए उतारना है। मुझे कानून के दायरे में रहकर ऐसा सबक सिखाना है कि सात पुश्तों तक कोई किसी मासूम बच्चे का हक छीनने की हिम्मत न करे।”

एडवोकेट मल्होत्रा मुस्कुराए, “आप बिल्कुल सही जगह आए हैं समीर जी। कानून का ऐसा शिकंजा तैयार होगा कि इनका क्रूज़ का यह नशा सीधे तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे उतरेगा।”

अगले चार दिनों तक मैंने दिन-रात एक कर दिया।

सबसे पहले, मैंने भारत के सबसे बड़े फॉरेंसिक हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स की टीम बुलाई और जाली हस्ताक्षरों की एक प्रमाणित सरकारी रिपोर्ट तैयार करवाई। इसके बाद, हमने इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW), क्राइम ब्रांच, और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की स्पेशल कोर्ट में एक आपातकालीन सीलबंद याचिका दायर की।

अदालत ने सबूतों की गंभीरता और बच्चे के साथ हुए अमानवीय व्यवहार को देखते हुए बिना किसी देरी के नेहा, शकुंतला देवी, चिराग और उनके तमाम संबंधित बैंक खातों को तत्काल प्रभाव से ‘फ्रीज’ करने का आदेश जारी कर दिया। साथ ही, उस साढ़े तीन करोड़ के पेंटहाउस, गुड़गांव के कमर्शियल प्लॉट और चिराग के नाम पर खरीदी गई लग्जरी गाड़ियों पर सरकारी कुर्की और जब्ती (Attachment of Property) का अंतरिम नोटिस चस्पा करने का आदेश दे दिया।

इतना ही नहीं, मैंने अपने घर के वाश एरिया, ड्रॉइंग रूम और किचन के पिछले छह महीनों के गुप्त सीसीटीवी फुटेज भी रिकवर करवा लिए थे, जिनमें कबीर के साथ शकुंतला देवी की बदसलूकी और आधी रात को कपड़े धुलवाने के रोंगटे खड़े कर देने वाले वीडियो सबूत दर्ज थे।

अब बस इंतजार था उस सोमवार की सुबह का, जब वह क्रूज़ भारत की सरजमीं पर लौटने वाला था।

सोमवार, सुबह के 11:00 बजे।

मेरे आलीशान बंगले के बाहर का माहौल देखने लायक था। शकुंतला देवी सुबह से ही नए सिल्क के सूट में सज-धजकर बाहर लॉन में खड़ी थीं। उन्होंने पड़ोसियों और रिश्तेदारों को बता रखा था कि आज उनकी बेटी और बेटा एक बहुत बड़े इंटरनेशनल क्रूज़ टूर से लौट रहे हैं और चिराग के नए पेंटहाउस की खुशी में एक बहुत बड़ी दावत होने वाली है।

तभी बाहर तीन बड़ी लग्जरी टैक्सियां आकर रुकीं।

टैक्सियों के दरवाजे खुले और उसमें से नेहा, उसका भाई चिराग, उसकी बहनें, मौसी, मौसाजी और उनके बच्चे—पूरे ग्यारह लोग बड़े ठाठ-बाट से उतरे। सबने डिजाइनर चश्मे, महंगे विदेशी कपड़े और हाथों में ड्यूटी-फ्री शॉपिंग के बड़े-बड़े बैग थाम रखे थे। नेहा के चेहरे पर एक अजीब सा घमंड और अहंकार चमक रहा था। उसके गले में मेरी स्वर्गीय पत्नी प्रिया का वह खानदानी हीरों का हार चमक रहा था, जिसे देखकर मेरे सीने में खून खौल उठा।

“अरे मां!” नेहा ने कार से उतरते ही शकुंतला देवी को गले लगाया। “क्या शानदार ट्रिप था! चिराग ने तो क्रूज़ के कसीनो में लाखों उड़ा दिए। हमने पेरिस और मिलान के ब्रांड्स की इतनी शॉपिंग की है कि बैग रखने की जगह नहीं बची!”

चिराग ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, “हां मां, अब बस जल्दी से उस नए पेंटहाउस का गृह-प्रवेश करवाओ। इस पुराने बंगले में अब मन नहीं लगता। वैसे, वह समीर कहां है? दिखा नहीं कहीं? और वह छोटा नौकर कबीर कहां गया? हमारा सामान अंदर कौन उठाएगा?”

चिराग के मुंह से यह बात अभी पूरी निकली भी नहीं थी कि बंगले के मुख्य हॉल का डबल दरवाजा खुला।

अंदर से मैं बाहर निकला। मेरे साथ एडवोकेट राघवेंद्र मल्होत्रा, दिल्ली पुलिस की एक पूरी टीम, महिला पुलिस अधिकारी, और फॉरेंसिक डिपार्टमेंट के दो सरकारी इंस्पेक्टर मौजूद थे।

पुलिस और सरकारी अधिकारियों को देखकर नेहा के हाथ से शॉपिंग बैग छूटकर नीचे गिर गया। चिराग का मुंह खुला का खुला रह गया और शकुंतला देवी का चेहरा एक सेकंड में पीला पड़ गया।

“स… समीर?” नेहा ने हकलाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की, “यह… यह सब क्या है? यह पुलिस हमारे घर में क्या कर रही है? तुम इतने दिनों से कहां थे?”

मैंने अपनी नजरें उसके गले में लटके हीरों के हार पर टिकाईं। मेरी आवाज इतनी भारी और गूंजने वाली थी कि वहां मौजूद सभी ग्यारह रिश्तेदारों के चेहरे का रंग उड़ गया।

“यह तुम्हारा घर नहीं है नेहा शर्मा,” मैंने सीधे उसकी आंखों में देखते हुए कहा। “और न ही यह कोई ड्रामा है। यह तुम्हारे उस तीन साल के घिनौने, लालची और आपराधिक साम्राज्य के अंत की शुरुआत है!”

चिराग गुस्से में आगे बढ़ा, “जीजाजी! होश में बात कीजिए! आप मेरी बहन और मेरी मां पर इस तरह पुलिस का रौब नहीं झाड़ सकते। हम भी कोई ऐरे-गैरे नहीं हैं, कानून जानते हैं!”

एडवोकेट मल्होत्रा ने तुरंत आगे बढ़कर अरेस्ट वारंट और अदालत की कुर्की का आदेश चिराग के मुंह पर दे मारा।

“मिस्टर चिराग शर्मा, कानून आप कितना जानते हैं यह तो अब तिहाड़ जेल में तय होगा!” एडवोकेट मल्होत्रा ने कड़क आवाज में कहा। “आपके, आपकी बहन नेहा और आपकी मां शकुंतला देवी के खिलाफ धारा 420, 467, 468, 471, 406, 120B और जेजे एक्ट के तहत गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है!”

यह सुनते ही पूरे आंगन में सन्नाटा छा गया। रिश्तेदारों के हाथ से लगेज के बैग छूटने लगे।

“क्या बकवास है यह?” नेहा चीख पड़ी। “समीर, तुम पागल हो गए हो? मैंने क्या किया है? मैं तुम्हारी पत्नी हूं!”

“पत्नी?” मैंने अपनी जेब से एक पेन ड्राइव और फॉरेंसिक रिपोर्ट निकाली और पुलिस इंस्पेक्टर को थमाई।

“एक पत्नी जो मेरे पीठ पीछे मेरे जाली दस्तखत बनाकर मेरे बिजनेस से पौने दो करोड़ रुपये चुराती है? एक पत्नी जो मेरे अनाथ बेटे के ट्रस्ट फंड का पैसा लूटकर अपने नाम पर साढ़े तीन करोड़ का पेंटहाउस खरीदती है? एक पत्नी जो अपनी मां के साथ मिलकर मेरे दस साल के मासूम बच्चे को कड़ाके की ठंड में भूखा रखकर रात के दो बजे नौकरों की तरह कपड़े धुलवाती है?”

मैंने महिला पुलिस इंस्पेक्टर की तरफ इशारा किया, “इंस्पेक्टर साहिबा, वह हार जो इस औरत के गले में है, वह मेरी स्वर्गीय पत्नी का खानदानी गहना है जिसकी चोरी की एफआईआर मैंने दर्ज करवाई है। कृपया इसे इसी वक्त बरामद किया जाए।”

महिला इंस्पेक्टर ने बिना किसी झिझक के आगे बढ़कर नेहा के गले से वह हीरों का हार एक झटके में उतार लिया और उसे सीलबंद लिफाफे में रख लिया।

नेहा की सारी हेकड़ी एक पल में हवा हो गई। वह कांपने लगी। “नहीं… समीर, ऐसा मत करो! मुझे माफ कर दो! मेरी बात तो सुनो… मां ने मुझसे कहा था, सब मां का प्लान था!”

शकुंतला देवी ने तुरंत अपनी बेटी को धक्का दिया और चिल्लाईं, “झूठ बोल रही है यह कलमुंही! समीर बेटा, मुझे कुछ नहीं पता! सब इस नेहा और चिराग का किया-धरा है। मैं तो बस इस घर में एक बूढ़ी औरत की तरह पड़ी रहती थी!”

मां-बेटी को एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते और एक-दूसरे की पोल खोलते देखकर वहां खड़े सभी रिश्तेदार शर्म से नजरें झुकाने लगे। वे ग्यारह रिश्तेदार जो कुछ देर पहले तक मुफ्त की रईसी पर इतरा रहे थे, अब एक-एक करके वहां से चुपचाप खिसकने की कोशिश करने लगे।

“कोई कहीं नहीं जाएगा!” पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अपनी रिवॉल्वर की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कड़क आवाज में कहा। “क्रूज़ का पूरा खर्च जिस अवैध पैसे से हुआ है, उसके सह-आरोपी के रूप में आप सभी के बयान दर्ज होंगे और आप सबकी गाड़ियों और विदेशी सामान की तलाशी ली जाएगी।”

चिराग रोते हुए मेरे पैरों में गिर पड़ा। “जीजाजी… मुझे बचा लीजिए! मेरी नई नौकरी चली जाएगी, मेरी पूरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी! मैंने तो बस नेहा के कहने पर उस जमीन के पेपर्स पर साइन किए थे। मुझे जेल मत भेजिए!”

मैंने अपने पैर उसके हाथ से झटक कर पीछे खींच लिए।

“जब मेरा दस साल का मासूम बच्चा भूख से तड़प रहा था, जब वह ठंड में अपने छोटे-छोटे हाथों से कपड़े रगड़ रहा था, तब तुम्हारी इंसानियत कहां थी चिराग? जब तुम मेरे खून-पसीने की कमाई से कसीनो में लाखों उड़ा रहे थे, तब तुम्हें अपने जीजाजी की मेहनत याद नहीं आई? जिस बेटे का हक तुमने छीना है, आज उसी की आंसुओं की कीमत चुकाने का वक्त आ गया है।”

इंस्पेक्टर ने एक झटके में हथकड़ी निकाली और चिराग और नेहा दोनों की कलाइयों में ठक-ठक करके डाल दी।

शकुंतला देवी, नेहा और चिराग को जब पुलिस वैन की तरफ घसीट कर ले जाया जाने लगा, तो पूरे मोहल्ले के लोग तालियां बजा रहे थे और उन पर लानत भेज रहे थे। नेहा रोते-चीखते हुए मेरी तरफ हाथ जोड़ रही थी, लेकिन मेरी आंखों में उसके लिए नफरत का एक कतरा भी नहीं बचा था—सिर्फ एक गहरा, बर्फ जैसा शून्य था।

पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाती हुई उस लालची कुनबे को लेकर जेल की अंधेरी कोठरियों की तरफ रवाना हो गईं।

एडवोकेट मल्होत्रा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, “समीर जी, अदालत के आदेश के अनुसार वह साढ़े तीन करोड़ का पेंटहाउस और गुड़गांव की जमीन अब पूरी तरह अटैच होकर कबीर के ट्रस्ट के नाम ट्रांसफर कर दी गई है। आपके बैंक का एक-एक पैसा और हर्जाना इनकी जब्त की गई संपत्तियों की नीलामी से वसूला जाएगा।”

मैंने एडवोकेट साहब का हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।

शाम ढल चुकी थी।

मैं होटल गया और कबीर को लेकर अपने उस बंगले पर वापस लौटा। उस घर से अब सारा जहरीला धुआं, सारा फरेब और सारा लालच हमेशा-हमेशा के लिए साफ हो चुका था।

मैंने ड्राइंग रूम की दीवार पर अपनी पहली पत्नी प्रिया की बड़ी सी तस्वीर पर ताजे मोगरे के फूलों का हार चढ़ाया और उसके सामने घी का एक पावन दीपक जलाया। कबीर मेरे पास आकर खड़ा हो गया। उसने अपना नन्हा हाथ मेरे हाथ में दे दिया।

“पापा… क्या अब हमें कभी कोई डराएगा नहीं?” कबीर ने मासूमियत से पूछा।

मैंने घुटनों के बल बैठकर अपने बेटे को अपने सीने से लगा लिया। मेरी आंखों से गिरे आंसू इस बार दर्द के नहीं, बल्कि अपने बच्चे की रक्षा करने के आत्मसम्मान और असीम प्रेम के आंसू थे।

“कभी नहीं मेरे बच्चे… कभी नहीं। जब तक तुम्हारा पापा तुम्हारे साथ है, इस दुनिया की कोई ताकत तुम्हें छू भी नहीं सकती। अब यह घर तुम्हारा है, यह जिंदगी तुम्हारी है, और तुम्हारा यह पापा हमेशा सिर्फ तुम्हारा है।”

हल्की-हल्की शाम की हवा में दीये की लौ पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रही थी, और उस रोशन घर में पंद्रह सालों के अंधकार के बाद एक सच्चे, निष्कपट और अटूट पिता-पुत्र के प्रेम का नया सवेरा हो चुका था।

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