पिता ने अंधी बेटी को समझा खानदान का बोझ और फेंक दिया फकीर की झोली में, पर जब खुला उस भिखारी का असली सच तो पैरों तले खिसक गई सबकी जमीन
नैना ने कभी इस रंग-बिरंगी दुनिया को अपनी आँखों से नहीं देखा था, लेकिन उसने हर एक सांस के साथ इस बेरहम दुनिया की कड़वाहट और चुभन को महसूस किया था। वह जन्म से ही दृष्टिहीन थी। कुदरत ने उसकी आँखों की रोशनी भले छीन ली थी, मगर उसे एक बेहद कोमल और सच्चा दिल दिया था। दुर्भाग्य से, वह एक ऐसे अमीर और संभ्रांत घराने में पैदा हुई थी जहाँ इंसानों की पहचान उनके रूप-रंग, ठाठ-बाट और बाहरी चमक-दमक से होती थी। नैना के पिता, ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह, शहर के जाने-माने रईस थे। उनकी दो बड़ी बेटियाँ, अंजलि और कृतिका, अपने तीखे नैन-नक्श, गोरे रंग और ख़ूबसूरती के लिए पूरे इलाके में मशहूर थीं। समाज में उनकी सुंदरता के कसीदे पढ़े जाते थे। लेकिन नैना? नैना उनके लिए सिर्फ एक अभिशाप, एक बदकिस्मती और एक ऐसा शर्मनाक राज़ थी जिसे हमेशा बंद दरवाजों के पीछे छुपाकर रखा जाता था।
जब नैना सिर्फ पाँच साल की थी, तब उसकी ममतामयी माँ का साया हमेशा के लिए उसके सिर से उठ गया। माँ के जाने के बाद वीरेंद्र प्रताप पूरी तरह बदल गए। उनका दिल पत्थर बन गया। वे अपनी ज़िंदगी की हर नाकामी और उदासी का जिम्मेदार मासूम नैना को मानने लगे। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी इस छोटी बेटी को उसके नाम से पुकारना भी छोड़ दिया। जब भी उन्हें नैना का ज़िक्र करना होता, वे नफरत से कहते—”वह मनहूस चीज़।” घर में जब भी कोई उत्सव होता, बड़े-बड़े रईस मेहमान आते, तो नैना को हवेली के पिछले हिस्से में मौजूद एक सीलन भरे कमरे में बंद कर दिया जाता। उसे बाकी परिवार के साथ बैठकर खाना खाने की इजाज़त नहीं थी। नौकरों द्वारा छोड़ा गया रूखा-सूखा खाना ही उसकी थाली का हिस्सा बनता था। नैना चुपचाप अपनी बेबसी के घूँट पीती और ब्रेल लिपि में लिखी पुरानी धार्मिक और साहित्यिक किताबों के पन्नों पर अपनी उंगलियाँ फेरती रहती। किताबें ही उसकी दोस्त थीं, उसकी आँखें थीं और उसका सहारा थीं।

साल बीतते गए और नैना इक्कीस साल की हो गई। बड़ी बहनों के लिए बड़े-बड़े घरानों से रिश्तों की कतारें लग रही थीं। वीरेंद्र प्रताप को यह डर सताने लगा कि अगर किसी को इस अंधी लड़की की मौजूदगी का पता चला, तो उनकी खानदानी साख पर बट्टा लग जाएगा और बड़ी बेटियों के रिश्ते टूट जाएंगे। इसलिए उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसने इंसानियत को भी शर्मसार कर दिया।
एक सुबह, वीरेंद्र प्रताप भारी कदमों से नैना के छोटे से कमरे में दाखिल हुए। नैना खाट पर बैठी अपने पन्नों को छू रही थी। कदमों की चाप और उनकी सिगार की तीखी गंध से नैना समझ गई कि पिता आए हैं। वह सहमकर खड़ी हो गई। पिता ने बिना कुछ बोले एक लाल रंग का सस्ता, फटा-पुराना सूती दुपट्टा उसकी गोद में फेंक दिया।
“कल सुबह तुम्हारी शादी है,” उन्होंने बिना किसी भाव के सपाट आवाज़ में कहा।
नैना का पूरा शरीर कांप उठा। शादी? किससे? वह हकलाते हुए बोली, “पिताजी… किससे?”
वीरेंद्र प्रताप के होठों पर एक क्रूर मुस्कान तैर गई। “शहर के पुराने शिव मंदिर की सीढ़ियों पर जो फकीर बैठता है, उससे। तुम अंधी हो, वह लाचार और भिखारी है। समाज में तुम दोनों की औकात एक जैसी है। एक अपाहिज के लिए एक फकीर से बेहतर और क्या हो सकता है? मेरी हवेली से तुम्हारा यह मनहूस साया हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।”
नैना के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसके हलक से चीख निकलना चाहती थी, लेकिन आवाज़ गले में ही घुटकर रह गई। उसके पिता ने कभी उसे इंसान समझा ही नहीं था, तो भला आज वे उसकी रूह की चीख कैसे सुनते?
अगली सुबह, हवेली के पिछवाड़े में स्थित एक पुराने मंदिर में बहुत ही खामोशी से फेरे करवा दिए गए। कोई शहनाई नहीं बजी, कोई मंगल गीत नहीं गाए गए। नैना के तन पर वही सस्ता लाल कपड़ा था और आँखों में आंसुओं का समंदर। उसने अपने पति का चेहरा नहीं देखा था, न ही किसी ने उसे बताया कि वह कैसा दिखता है। बस उसने महसूस किया कि उसका हाथ एक खुरदरे, मिट्टी से सने हाथ में थमा दिया गया। हवेली के नौकर और उसकी दोनों बहनें दूर खड़ी होकर मुँह पर पल्लू रखकर हंस रही थीं।
“देखो जरा, अंधी राजकुमारी को उसका भिखारी राजकुमार मिल गया!” अंजलि ने उपहास उड़ाते हुए कहा।
शादी की रस्में खत्म होते ही पिता ने नैना के हाथों में एक छोटी सी पोटली थमाई जिसमें उसके दो पुराने कुर्ते थे। उन्होंने उसे उस अजनबी की तरफ धक्का देते हुए नफरत से कहा, “ले जाओ इसे। अब यह तुम्हारी मुसीबत है। दोबारा इस चौखट पर कदम रखने की हिम्मत मत करना।”
उस शख्स का नाम युवान था। उसने बहुत धीरे से नैना का हाथ पकड़ा। वह कुछ नहीं बोला। उसने नैना के कांपते हाथों को मजबूती से सहारा दिया और उसे लेकर शहर की भीड़भाड़ से दूर चल पड़ा। रास्ते में उसने नैना से एक लफ्ज़ भी नहीं कहा, बस जब भी कोई गड्ढा या पत्थर आता, वह बहुत कोमलता से उसे आगाह कर देता, “संभलकर, आगे राह थोड़ी पथरीली है।”
काफी देर चलने के बाद, वे गाँव के एक वीरान कोने में बनी एक कच्ची मिट्टी की झोपड़ी के सामने रुके। चारों तरफ सन्नाटा था। झोपड़ी से सूखी घास, गीली मिट्टी और चूल्हे के धुएँ की भीनी महक आ रही थी।
“नैना जी, यह घर बहुत छोटा और साधारण है,” युवान की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और अदब था। “यहाँ महलों जैसी सुख-सुविधाएं तो नहीं हैं, लेकिन मैं वादा करता हूँ कि इस छत के नीचे आपकी इज़्ज़त और जान पूरी तरह महफ़ूज़ रहेगी।”
नैना अंदर बिछी एक पुरानी चटाई पर बैठ गई। उसका रो-रोकर बुरा हाल था। उसने सोचा था कि किस्मत ने उसे नरक में धकेल दिया है। एक भिखारी की झोपड़ी में वह कैसे अपनी ज़िंदगी काटेगी? लेकिन उस पहली ही रात जो हुआ, उसने नैना के दिल के सारे डर मिटा दिए।
युवान ने चूल्हा जलाया। उसने बहुत ही सादगी और सफाई से चाय बनाई और सूखी रोटियों के साथ दाल परोसी। उसने नैना को अपने हाथों से पानी पिलाया। जब सोने का वक्त आया, तो उसने अपनी इकलौती गर्म चादर नैना को ओढ़ा दी और खुद फटे हुए टाट के बोरे पर दरवाज़े के पास लेट गया। एक सच्चे पहरेदार की तरह, जो अपनी अमानत की रक्षा कर रहा हो।
अगले कुछ हफ्तों में नैना की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस लड़की को उसके अपने पिता ने कभी प्यार का एक शब्द नहीं दिया था, उसे उस टूटी झोपड़ी में बेपनाह इज़्ज़त मिल रही थी। युवान हर सुबह उठता, चूल्हा जलाता और नैना के लिए गर्म पानी की व्यवस्था करता। वह रोज़ सुबह नैना को नदी के किनारे ले जाता।
युवान की भाषा में एक अद्भुत जादू था। वह नदी की बहती लहरों, पत्तों की सरसराहट, पूरब से उगते हुए लाल सूरज, आकाश में उड़ते परिंदों और खिले हुए चंपा के फूलों का वर्णन इतनी गहराई और खूबसूरती से करता कि नैना को लगता मानो वह अपनी बंद आँखों से भी उन नज़ारों को साक्षात देख पा रही हो। युवान जब कपड़े धोता या झोपड़ी की मरम्मत करता, तो वह पुराने सूफी तराने और राग गाता था। उसकी आवाज़ में एक ऐसी मिठास और दर्द था जो केवल गहरे साधना में लीन किसी आत्मा की हो सकती थी।

नैना ने ज़िंदगी में पहली बार मुस्कुराना सीखा था। पहली बार उसे महसूस हुआ कि दृष्टिहीन होना कोई गुनाह नहीं है। युवान उससे पूछता था, “नैना, तुम्हें किस बात से सबसे ज्यादा खुशी मिलती है? तुम्हें कौन से सपने देखना पसंद है?”
एक दिन नैना ने युवान की कलाई को अपनी उंगलियों से टटोला। वह हाथ बेहद मजबूत और तराशा हुआ था, किसी भिखारी का हाथ ऐसा नहीं हो सकता था। नैना ने बड़ी मासूमियत से पूछा, “युवान… क्या तुम सचमुच हमेशा से मंदिर की सीढ़ियों पर भीख मांगते थे?”
युवान पल भर के लिए खामोश हो गया। एक ठंडी आह भरकर उसने धीमे स्वर में कहा, “नहीं नैना… हमेशा से नहीं। ज़िंदगी कई इम्तिहान लेती है। कभी-कभी इंसान को वो बनना पड़ता है जो दुनिया देखना चाहती है।”
उसने बात को टाल दिया और नैना ने भी अपने पति के अतीत को कुरेदना ठीक नहीं समझा। उस टूटी झोपड़ी में, जहाँ गरीबी का डेरा था, वहाँ प्यार का एक ऐसा पवित्र मंदिर बन चुका था जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल थी। नैना को उस फकीर से बेइंतहा मोहब्बत हो चुकी थी।
एक दिन, युवान किसी काम से पास के गाँव गया था। नैना ने सोचा कि वह आज युवान के लिए खुद खाना बनाएगी। युवान ने उसे झोपड़ी से बाज़ार तक का सीधा रास्ता कदमों की गिनती के हिसाब से कई बार सिखाया था। नैना अपनी लकड़ी की छड़ी लेकर बाज़ार की ओर चल पड़ी। उसने बाज़ार से ताज़ी सब्ज़ियाँ खरीदीं और गर्व से मुस्कुराते हुए लौटने लगी।
तभी रास्ते में एक तेज़ झटका लगा और किसी ने उसकी कलाई को बेरहमी से मरोड़ दिया। सब्ज़ियों का थैला हाथ से छूटकर धूल में गिर गया।
“अरे देखो तो! यह अंधी मनहूस अभी तक ज़िंदा है?” एक बहुत ही जानी-पहचानी, तीखी और ज़हरीली आवाज़ गूंजी।
वह उसकी बड़ी बहन अंजलि थी। उसके साथ उसकी सहेलियाँ भी थीं जो बाज़ार में खरीदारी करने आई थीं।
“अंजलि दीदी…” नैना ने कांपते हुए अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश की।
अंजलि जोर-जोर से हंसने लगी। “दीदी मत कह मुझे! शर्म आती है मुझे यह सोचकर कि तू मेरी बहन है। सुन, कैसी कट रही है तेरी ज़िंदगी उस सड़क छाप भिखारी के साथ? मंदिर के बाहर से जो चंद सिक्के वो मांगकर लाता है, क्या उसी से तेरा पेट भर रहा है? पिताजी ने तुझे बिल्कुल तेरी सही जगह पहुँचाया है।”
नैना ने अपने आंसुओं को पी लिया। उसने अपनी रीढ़ सीधी की और पूरे आत्मसम्मान के साथ बोली, “दीदी, आप जिसे भिखारी कह रही हैं, उनका दिल आपके जैसे पत्थर के महलों में रहने वालों से लाख गुना बड़ा है। उन्होंने मुझे वो इज़्ज़त और प्यार दिया है जो मुझे मेरे अपने सगे बाप ने कभी नहीं दिया। मैं उनके साथ बेहद खुश हूँ।”
अंजलि का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने नैना को धक्का दिया और उसके कान के पास आकर फुसफुसाई, “खुश है तू? बेवकूफ अंधी! तू सोचती है कि तू किसी फकीर की बीवी है? तुझे तो सच का ‘स’ भी नहीं पता। तू जिस युवान को सीधा-साधा भिखारी समझकर पूज रही है, वो कोई मामूली इंसान नहीं है। तुझे एक बहुत बड़े धोखे में रखा गया है!”
नैना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। “धोखा? कैसा धोखा?”
अंजलि ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, “जाकर पूछ अपने उस तथाकथित पति से, कि वह शहर के सबसे बड़े खानदान का वारिस होकर भी फकीर का चोला क्यों ओढ़े बैठा है! जाकर पूछ कि उसकी असलियत क्या है!”
अंजलि अपनी सहेलियों के साथ हंसती हुई वहाँ से चली गई, लेकिन उसके वो शब्द नैना के सीने में खंजर की तरह चुभ गए। नैना किसी तरह रोती-बिलखती, ठोकरें खाती हुई अपनी झोपड़ी में पहुँची। उसका सिर चकरा रहा था। क्या युवान उससे झूठ बोल रहा था? क्या यह सब कोई खेल था?
शाम ढलते ही युवान झोपड़ी में लौटा। उसके हाथ में कुछ ताज़े फल और नैना के लिए चमेली के फूलों का गजरा था। उसने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए आवाज़ दी, “नैना, देखो आज मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ…”
लेकिन नैना कोने में गुमसुम बैठी थी। उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
युवान तुरंत उसके पास आया और घबराकर उसके आँसू पोंछते हुए बोला, “नैना! क्या हुआ? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? किसी ने कुछ कहा क्या?”
नैना ने युवान के हाथ को झटक दिया। वह उठ खड़ी हुई और कांपती हुई आवाज़ में बोली, “बस करो युवान! अब और झूठ मत बोलो। मुझे बताओ कि तुम कौन हो? तुम इस झोपड़ी में फकीर बनकर क्यों रह रहे हो? क्या मेरा अंधापन तुम्हारे किसी खेल का हिस्सा था? मुझे सच बताओ, वरना मैं अभी इसी वक्त नदी में कूदकर अपनी जान दे दूँगी!”
नैना की यह बात सुनकर युवान का कलेजा कांप गया। झोपड़ी में एक गहरा सन्नाटा छा गया। हवा में केवल उन दोनों की भारी सांसों की आवाज़ थी।
कुछ पलों बाद, युवान ने एक गहरी सांस ली। वह नैना के सामने ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया। उसने नैना के कांपते हुए ठंडे हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द और सच्चाई थी।
“नैना… मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोलना चाहा था। लेकिन वक्त से पहले सच बताना मेरी मजबूरी नहीं थी। अब जब बात यहाँ तक आ गई है, तो सुनो मेरी हकीकत।”
युवान ने बताना शुरू किया, “मेरा पूरा नाम युवान हर्षवर्धन सिंघानिया है। इस राज्य के सबसे बड़े उद्योगपति और समाजसेवी स्वर्गीय देवव्रत सिंघानिया का मैं इकलौता बेटा हूँ।”
नैना स्तब्ध रह गई। सिंघानिया खानदान का नाम पूरे देश में प्रसिद्ध था। उनकी दौलत और रुतबे की बराबरी कोई नहीं कर सकता था।
नैना ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा, “अगर तुम इतने बड़े रईस हो… तो फिर इस फटेहाल झोपड़ी में क्यों? मंदिर की सीढ़ियों पर फकीर बनकर क्यों बैठे थे?”
युवान की आँखों में नमी तैर गई। उसने कहा, “नैना, दौलत इंसान को सब कुछ दे सकती है, लेकिन सच्चा दिल और सच्ची मोहब्बत नहीं दे सकती। आज से दो साल पहले, मेरे पिता की मृत्यु के बाद हमारे पूरे खानदान में जायदाद की जंग छिड़ गई। मेरे अपने सगे चाचा और रिश्तेदारों ने मुझे बर्बाद करने की साजिशें रचीं। जिस लड़की से मेरी शादी तय हुई थी, उसने मुझे सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसे लगा कि मेरे चाचा कोर्ट केस जीतकर सारी संपत्ति हड़प लेंगे। दुनिया के उस लालच, मक्कारी और फरेब ने मुझे अंदर से तोड़ दिया था। मुझे इंसानों के दोहरे चेहरों से नफरत हो गई थी।”
युवान आगे बोला, “मैंने फैसला किया कि मैं अपनी सारी दौलत एक ट्रस्ट को सौंप दूंगा और खुद एक सन्यासी का जीवन बिताऊंगा। मैं यह देखना चाहता था कि क्या इस दुनिया में कोई ऐसा भी इंसान है जो बिना किसी लालच, बिना किसी स्वार्थ के सिर्फ मेरी रूह से प्यार कर सके? इसलिए मैं अपनी पहचान छुपाकर, फकीर का चोला पहनकर उस शिव मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गया। वहाँ बैठकर मैंने दुनिया का असली रंग देखा—अमीरों का घमंड और गरीबों की बेबसी।”
“फिर तुम्हारी ज़िंदगी में मेरे पिता कैसे आए?” नैना ने पूछा।
युवान ने गहरी सांस ली, “तुम्हारे पिता अपनी दौलत के नशे में चूर होकर रोज़ उस मंदिर में आते थे। वे अपनी सामाजिक छवि चमकाने के लिए गरीबों में सिक्के फेंकते थे। एक दिन मैंने सुना कि वे पंडित जी से बात कर रहे थे कि कैसे भी करके अपनी अंधी बेटी का सौदा किसी भिखारी से कर दें ताकि उनका पीछा छूटे। जब मैंने उनके मुँह से तुम्हारी बेबसी और उन पर तुम्हारे होने वाले जुल्म की दास्तान सुनी, तो मेरा खून खौल उठा। मैंने पंडित जी के ज़रिए तुम्हारे पिता तक यह संदेश भिजवाया कि मैं तुमसे शादी करने को तैयार हूँ।”
नैना की आँखें फटी की फटी रह गईं।
युवान ने उसके हाथों को चूमते हुए कहा, “नैना, शुरुआत में यह सिर्फ एक बेसहारा लड़की को बचाने का मेरा फैसला था। मैं तुम्हें एक सुरक्षित छत देना चाहता था। लेकिन जब तुम इस झोपड़ी में आईं… जब मैंने तुम्हारी सादगी, तुम्हारी सहनशीलता, तुम्हारा पवित्र मन और बिना किसी शर्त के तुम्हारा मुझ पर किया गया भरोसा देखा, तो मुझे समझ आया कि ईश्वर ने मुझे फकीर बनाकर इस राह पर क्यों भेजा था। मुझे इस टूटी झोपड़ी में ज़िंदगी की सबसे कीमती दौलत मिल गई थी—तुम्हारा प्यार। मैंने तुमसे सच इसलिए छुपाया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं दौलत की यह दीवार हमारे इस पवित्र रिश्ते के बीच न आ जाए। मैं चाहता था कि कोर्ट से चाचा के सारे मुकदमों का फैसला आ जाए, फिर मैं तुम्हें पूरी इज़्ज़त के साथ अपने महल में ले जाऊं।”
युवान की एक-एक बात नैना की रूह में उतर रही थी। नैना के आंसुओं का बांध टूट गया। उसने युवान के चेहरे को दोनों हाथों से छुआ। उसकी दाढ़ी, उसकी आँखें, उसके माथे की लकीरें… नैना ने महसूस किया कि इस चेहरे के पीछे कोई फरेबी नहीं, बल्कि एक फरिश्ता छुपा था जो उसकी ज़िंदगी को रौशन करने आया था।
“युवान…” नैना फफक पड़ी, “मुझे तुम्हारी दौलत से कोई मतलब नहीं है। मेरे लिए तुम वही युवान हो जिसने नदी के किनारे मुझे उड़ते परिंदों को देखना सिखाया था।”
युवान ने उसे सीने से लगा लिया। “मैं जानता हूँ नैना। और अब वक्त आ गया है कि इस दुनिया को, और खासकर तुम्हारे पिता को, उनके कर्मों का जवाब दिया जाए।”
अगले ही दिन, शहर की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला सुना दिया। युवान के चाचा की सारी साजिशें बेनकाब हो चुकी थीं और कोर्ट ने सिंघानिया एम्पायर की पूरी मिल्कियत कानूनी तौर पर युवान के नाम बहाल कर दी थी। युवान अब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि पूरे राज्य का सबसे ताकतवर और अमीर शख्स बन चुका था।
उधर, हवेली में ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह एक बहुत बड़े संकट में घिर चुके थे। उन्होंने जिस विदेशी कंपनी के साथ अपनी पूरी जायदाद दांव पर लगाकर साझेदारी की थी, उसने उनके साथ भारी धोखाधड़ी कर दी थी। रातों-रात वीरेंद्र प्रताप का कारोबार दिवालिया हो गया। बैंकों के नोटिस हवेली पर चिपक गए। रिश्तेदारों ने मुँह मोड़ लिया। बड़ी बेटियों अंजलि और कृतिका के अमीर मंगेतरों के परिवारों ने रिश्ते तोड़ दिए। समाज में उनकी थू-थू होने लगी।
हवेली की नीलामी का दिन तय हो चुका था। वीरेंद्र प्रताप अपनी दोनों बेटियों के साथ हवेली के मुख्य हॉल में सिर पकड़कर बैठे थे। बैंक के अधिकारी और पुलिस की गाड़ियाँ बाहर खड़ी थीं। वीरेंद्र प्रताप के आंसू रुक नहीं रहे थे। जिस शानो-शौकत पर उन्हें नाज़ था, वह तिनके की तरह बिखर चुकी थी।
तभी हवेली के मुख्य द्वार पर काली मर्सिडीज और रोल्स रॉयस गाड़ियों का एक लंबा काफिला आकर रुका। सुरक्षाकर्मियों ने दौड़कर दरवाज़ा खोला। गाड़ियों से उतरने वाले शख्स के ठाठ-बाट देखकर बैंक के बड़े-बड़े अफसर झुककर सलाम करने लगे।
वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि युवान हर्षवर्धन सिंघानिया था। उसने राजसी शेरवानी पहन रखी थी और उसके चेहरे पर गजब का तेज था। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उसने बड़े ही नाज़ और प्यार से एक बेहद खूबसूरत, रेशमी बनारसी साड़ी में लिपटी महिला का हाथ थाम रखा था। वह महिला कोई और नहीं, बल्कि नैना थी। नैना के चेहरे पर ऐसा नूर और गरिमा थी, जैसे वह किसी देश की महारानी हो।
जब यह जोड़ा हवेली के अंदर दाखिल हुआ, तो वीरेंद्र प्रताप, अंजलि और कृतिका की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वीरेंद्र प्रताप कांपती आवाज़ में बुदबुदाए, “नैना?… और यह… यह तो वही…”
बैंक के मुख्य प्रबंधक ने आगे बढ़कर कहा, “ठाकुर साहब, आपकी इस हवेली और आपकी सारी गिरवी संपत्तियों को सिंघानिया ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के मालिक, मिस्टर युवान सिंघानिया ने पूरा कर्ज चुकाकर खरीद लिया है। अब इस पूरी जायदाद के नए मालिक यह हैं।”
यह सुनते ही वीरेंद्र प्रताप के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उनके दिल की धड़कनें रुकने जैसी हो गईं। जिस आदमी को उन्होंने एक लाचार, गंदा भिखारी समझकर अपनी बेटी फेंक दी थी, वह पूरे सूबे का सबसे बड़ा रईस निकला!
अंजलि और कृतिका शर्म और ईर्ष्या के मारे ज़मीन में गड़ी जा रही थीं। जिस अंधी बहन को वे ज़िंदगी भर ‘मनहूस’ कहकर दुत्कारती रहीं, आज वह ऐसी किस्मत लेकर उनके सामने खड़ी थी जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकती थीं।
युवान आगे बढ़ा और उसने वीरेंद्र प्रताप के हाथ में हवेली के मालिकाना हक के कागज़ात देखे। उसकी आवाज़ पूरी हवेली में गूंज उठी।
“ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह! याद है आपको यह चेहरा? आपने अपनी जन्म से अंधी बेटी को सिर्फ इसलिए एक भिखारी की झोली में फेंक दिया था क्योंकि वह देख नहीं सकती थी। आपने सोचा था कि आपने उसका जीवन बर्बाद कर दिया। लेकिन आप भूल गए थे कि जिसे दुनिया ठुकराती है, ऊपर वाला उसे अपनी गोद में पनाह देता है।”
वीरेंद्र प्रताप के हाथ कांप रहे थे। वे घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़े। उन्होंने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, “दामाद जी… मुझे माफ कर दीजिए! मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया। मैंने अपनी ही औलाद को नहीं पहचाना। मुझे सड़क पर मत निकालिए… मेरी इन बेटियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा!”
अंजलि भी रोते हुए नैना के पैरों में गिर पड़ी, “नैना… मुझे माफ कर दे मेरी बहन! मैंने तेरे साथ बहुत जुल्म किए हैं। हमें बेघर मत करो!”
नैना खामोश खड़ी रही। उसकी आँखों से दो बूँद आंसू टपके, लेकिन ये आंसू बेबसी के नहीं, बल्कि उस दर्द के थे जो उसके अपनों ने बरसों से उसे दिया था। उसने युवान का हाथ थोड़ा कसकर पकड़ा।
नैना ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “पिताजी… और अंजलि दीदी… उठिए। आप लोगों ने मुझे ज़िंदगी भर यह अहसास कराया कि मैं एक बोझ हूँ, एक अभिशाप हूँ। आपने मेरी आँखों की रोशनी न होने का ताना दिया, लेकिन आज मुझे समझ आया कि असली दृष्टिहीन मैं नहीं, बल्कि आप लोग थे। आपकी आँखें सलामत थीं, फिर भी आप इंसानियत, प्यार और रिश्तों की कद्र नहीं देख सके।”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया।
नैना ने आगे कहा, “युवान जी, यह हवेली आप पिताजी को वापस सौंप दीजिए। मुझे इस हवेली की एक ईंट भी नहीं चाहिए। इस हवेली की दीवारों में सिर्फ नफरत, दिखावा और कड़वाहट भरी है। मेरा असली घर वह मिट्टी की कच्ची झोपड़ी है जहाँ मुझे पहली बार इंसान समझा गया, जहाँ मुझे पहली बार सच्चा प्यार और सम्मान मिला।”
युवान ने गर्व से अपनी पत्नी की ओर देखा। उसने बैंक अधिकारियों को कागज़ात वीरेंद्र प्रताप के हाथों में देने का इशारा किया और कहा, “ठाकुर साहब, यह हवेली आपकी बेटी की दया के कारण आपको वापस मिल रही है। लेकिन याद रखिएगा, आज के बाद इस अंधी बेटी का आपके और आपके झूठे घमंड से कोई वास्ता नहीं रहेगा।”
युवान ने नैना को बाहों में सहारा दिया और दोनों पलटकर हवेली के दरवाज़े की ओर बढ़ गए। बाहर खिली धूप उन दोनों के चेहरों को रौशन कर रही थी।
वीरेंद्र प्रताप उस खाली कागज़ के टुकड़ों को हाथ में लिए अपनी आलीशान हवेली के फर्श पर बैठकर अपनी किस्मत पर रो रहे थे। उनके पास उनकी दौलत तो बच गई थी, लेकिन वे अपनी ज़िंदगी की सबसे अनमोल दौलत—अपनी बेटी का प्यार और अपनी आत्मा का सम्मान—हमेशा के लिए खो चुके थे।
युवान और नैना अपनी नई दुनिया की ओर निकल पड़े, एक ऐसी दुनिया जहाँ आँखों की रोशनी से नहीं, बल्कि दिलों की पाकीज़गी और प्यार के उजाले से ज़िंदगी संवरती है।