Story

शादी के सिर्फ दो दिन बाद उठा हाथ, पर जब ससुराल की बंद अलमारी से निकला 25 साल पुराना डायरी का पन्ना, तो पति के पैरों तले खिसक गई जमीन!

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हर लड़की की तरह मैंने भी अपनी शादी को लेकर अनगिनत सपने देखे थे। मेरी परवरिश दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय, खुले विचारों वाले और शिक्षित परिवार में हुई थी। मेरे पिता हमेशा कहते थे कि एक आत्मनिर्भर महिला ही समाज में अपना सिर ऊंचा करके जी सकती है। मैंने उनकी हर सीख को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया था। 29 वर्ष की उम्र में, मैं गुरुग्राम की एक प्रतिष्ठित हेल्थ-टेक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर डेटा एनालिस्ट के पद पर कार्यरत थी। मेरा करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था और मैं अपनी जिंदगी में पूरी तरह से स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और संतुष्ट थी।

तभी मेरे जीवन में रोहन मेहरा का आगमन हुआ। एक पारिवारिक मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म के जरिए हमारे परिवारों की मुलाकात हुई थी। रोहन एक बड़ी कंसल्टिंग फर्म में डायरेक्टर के पद पर काम करता था। उसकी बातचीत का सलीका, उसका आत्मविश्वास और चेहरे पर खिंची सौम्य मुस्कान किसी भी सामान्य लड़की को आकर्षित करने के लिए काफी थी। रोहन ने पहली मुलाकात में ही मुझे यह एहसास दिलाया कि वह पारंपरिक रूढ़ियों में विश्वास नहीं रखता। उसने कहा था, “अनन्या, मुझे एक गृहिणी नहीं बल्कि एक जीवन संगिनी चाहिए जो कंधे से कंधa मिलाकर चल सके।”

उसके परिवार में उसकी मां का कुछ वर्ष पूर्व ही देहांत हो चुका था, पिता एक रिटायर्ड बैंक अफसर थे जो चंडीगढ़ के पुश्तैनी मकान में रहते थे, और उसकी 25 वर्षीय छोटी बहन कृति, जो दिल्ली के फ्लैट में रोहन के साथ ही रहती थी। रोहन ने मुझे बताया था कि कृति का हाल ही में एक बहुत कटु ब्रेकअप हुआ था और डिप्रेशन के चलते उसने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी थी। रोहन के शब्दों में उसकी बहन बहुत नाजुक और संवेदनशील थी जिसे विशेष स्नेह की आवश्यकता थी। मैंने उस समय इसे एक बड़े भाई का अपनी छोटी बहन के प्रति गहरा प्यार समझा और मुझे लगा कि इतने संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान के साथ मेरा भविष्य सुरक्षित रहेगा।

शनिवार की रात, दिल्ली के एक भव्य और जगमगाते बैंक्वेट हॉल में हमारी शादी की रस्में पूरी हुईं। लाल बनारसी लहंगे में सजी मैं जब मंडप में पहुंची, तो दूर-दूर से आए रिश्तेदार रोहन और मुझे “मेड फॉर ईच अदर” की उपाधि दे रहे थे। मेरे पिता की आंखों में विदाई के आंसुओं के साथ-साथ एक गहरी तसल्ली थी कि उनकी बेटी को एक सुशिक्षित, समझदार और संभ्रांत परिवार मिला है। विदाई के समय रोहन ने मेरे पिता के हाथ अपने हाथों में थामकर भरी सभा में कहा था, “अंकल, आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए, आपकी बेटी अब मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और उसके सम्मान पर कभी कोई आंच नहीं आएगी।” उस वक्त किसी को भी यह गुमान तक नहीं था कि यह वाक्य केवल एक सामाजिक दिखावा और खोखला मुखौटा था।

शादी के बाद का पहला रविवार रिश्तेदारों के आने-जाने और औपचारिक रस्मों में बीत गया। लेकिन उस पूरे दिन कृति का व्यवहार काफी अजीब और उपेक्षापूर्ण रहा। वह किसी भी बातचीत में शामिल होने के बजाय लगातार अपने फोन पर लगी रहती या फिर व्यंग्यात्मक टिप्पणियां करती। जब मेरी सहेलियों ने उसे बधाई दी, तो उसने बनावटी मुस्कान के साथ कहा, “हां ठीक है, देखते हैं भैया का ध्यान अब मुझ पर कितना रहता है।” मैंने इन बातों को उसकी मानसिक स्थिति और असुरक्षा की भावना मानकर नजरअंदाज कर दिया। मुझे लगा कि जैसे-जैसे समय बीतेगा, हम दोनों के बीच एक अच्छी समझ बन जाएगी।

सोमवार की सुबह मेरे लिए एक नई शुरुआत का दिन था। मेरी कंपनी में एक नए वैश्विक प्रोजेक्ट का ओरिएंटेशन था जिसके लिए मेरा कार्यालय पहुंचना अनिवार्य था। मैंने सुबह जल्दी उठकर खुद के लिए चाय बनाई और रोहन के लिए नाश्ता तैयार किया। जब मैंने कृति के कमरे का दरवाजा खुला देखा, तो मैंने उसे भी चाय के लिए पूछा, लेकिन उसने कंबल मुंह तक खींचते हुए बिना देखे ही मना कर दिया। रोहन ने नाश्ता करते हुए मुझसे कहा कि शाम को घर आते समय डिनर के लिए कुछ विशेष सामग्री लेता आऊं। दोपहर करीब 2 बजे मेरे फोन पर रोहन का एक विस्तृत मैसेज आया, जिसमें उसने चिकन, पहाड़ी आलू, ताजा दही, सलाद और खास मक्खन लाने की लंबी सूची भेज दी थी।

मैंने तुरंत उसे रिप्लाई किया, “रोहन, आज मेरा नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ है और मुझे ऑफिस से निकलते-निकलते शाम के 6 बज जाएंगे। तुम्हारा ऑफिस घर के पास है और तुम मुझसे करीब एक घंटा पहले पहुंच जाओगे, क्या तुम यह सामान रास्ते से ले सकते हो?”

कुछ ही मिनटों में रोहन का सूखा और सख्त जवाब स्क्रीन पर चमका, “अनन्या, पहली बार शादी के बाद घर की नई बहू शाम की रसोई संभालेगी। थोड़ा पारंपरिक माहौल और घर जैसा अपनापन दिखना चाहिए। यह छोटी-छोटी चीजें मुझे मत सिखाओ।” उस मैसेज के लहजे ने मेरे मन में एक हल्की सी चुभन पैदा की, लेकिन मैंने नई-नई शादी के तनाव को टालने के लिए बहस नहीं बढ़ाई।

शाम को गुरुग्राम और दिल्ली के भीषण ट्रैफिक, गाड़ियों के धुएं और बारिश के कीचड़ से जूझते हुए जब मैं भारी-भरकम किराने के थैलों के साथ फ्लैट पर पहुंची, तो घड़ी में रात के 7:15 बज रहे थे। मेरे दोनों हाथ किराना बैग के वजन से लाल पड़ चुके थे और कंधों में तेज दर्द हो रहा था। जब मैंने मुख्य दरवाजे का लॉक खोला, तो लिविंग रूम का नजारा देखकर मैं स्तब्ध रह गई। कृति सोफे पर पैर फैलाकर आराम से लेटी हुई एक कोरियन वेब सीरीज देख रही थी। सेंटर टेबल पर चिप्स के खाली पैकेट, सॉफ्ट ड्रिंक्स के कैन और इस्तेमाल किए हुए टिशू पेपर बिखरे पड़े थे।

रोहन बालकनी में खड़ा अपनी पसंदीदा कॉफी पी रहा था। मेरे अंदर दाखिल होने पर उसने मेरे हाथ से भारी बैग थामने या एक गिलास पानी पूछने के बजाय अपनी कलाई पर बंधी महंगी घड़ी की तरफ देखा और त्योरियां चढ़ाते हुए कहा, “इतनी देर? तुम्हें पता है ना कि मुझे रात 8 बजे तक डिनर करने की आदत है?”

मैंने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया, “रोहन, बाहर आउटर रिंग रोड पर भीषण ट्रैफिक जाम था। मैं जितना जल्दी हो सके आने की कोशिश कर रही थी।”

सोफे पर लेटी कृति ने टीवी की स्क्रीन से अपनी आंखें हटाए बिना, बेहद लापरवाह और हुक्म चलाने वाले अंदाज में कहा, “भाभी, जल्दी कीजिए, मुझे बहुत तेज भूख लगी है। सुबह से कुछ ढंग का खाने को नहीं मिला।”

उसका यह रवैया देखकर मेरा मन खट्टा हो गया, लेकिन मैंने अपने भीतर उठते गुस्से को दबाया। अपने भारी ऑफिस के कपड़े बदले बिना, चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे और सीधे रसोई घर में चली गई। अगले 45 मिनट तक मैं उस गर्म रसोई में पसीने से तर-बतर होकर लगातार काम करती रही। मैंने दाल बनाई, चिकन करी तैयार की, चावल चढ़ाए और गरमा-गरम फुल्के सेके। उस दौरान न तो रोहन ने रसोई में झांककर पूछा कि क्या मुझे किसी मदद की जरूरत है, और न ही कृति ने पानी की बोतलें भरने की जहमत उठाई।

रात के ठीक 8:15 बजे मैंने डाइनिंग टेबल पर सारा खाना व्यवस्थित तरीके से लगाया और लिविंग रूम की तरफ आकर आवाज दी, “कृति, रोहन, खाना लग गया है, गर्म है आकर खा लीजिए।”

रोहन डाइनिंग चेयर पर आकर बैठ गया, लेकिन कृति अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। उसने हाथ का एक उबाऊ इशारा किया और टीवी देखते हुए ही बोली, “भाभी, मेरी प्लेट सोफे पर ही लाकर दे दो। मेरा एपिसोड खत्म होने वाला है।”

मैं पूरा दिन काम करके, ट्रैफिक झेलकर और थका देने वाली रसोई की ड्यूटी पूरी करके आई थी। कृति की इस अनुचित और आलसी मांग पर मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैंने बेहद शांत, स्थिर लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, “कृति, डाइनिंग टेबल सिर्फ दो कदम की दूरी पर है। मैं अभी-अभी ऑफिस से आई हूं, सारा खाना अकेले बनाकर टेबल पर लगा दिया है। तुम खुद उठकर अपनी प्लेट ले सकती हो।”

कमरे में एक भयानक और असहज सन्नाटा पसर गया। टीवी पर चल रहे किरदारों की आवाजें भी अचानक बंद हो गईं क्योंकि कृति ने रिमोट से टीवी म्यूट कर दिया था। उसने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें मुझ पर गड़ा दीं और अचानक उसका चेहरा रोने जैसा बन गया। वह तेजी से मुड़ी और डाइनिंग टेबल पर बैठे रोहन की तरफ देखकर चिल्लाई, “भैया! आपने सुना यह मुझसे कैसे बात कर रही हैं? अभी शादी को दो दिन हुए हैं और इनका यह मिजाज है? पहले आप मुझे खुद अपने हाथों से प्लेट लाकर देते थे और अब यह मुझे ताने मार रही हैं!”

रोहन अपनी कुर्सी से इस तरह झटके से उठा जैसे किसी ने उसे भड़का दिया हो। उसके चेहरे की नसें तन गई थीं। वह भारी कदमों से मेरी तरफ बढ़ा और सख्त लहजे में बोला, “अनन्या, जाओ और कृति की प्लेट सोफे पर रखकर आओ।”

मैंने उसकी आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “रोहन, वह कोई छोटी बच्ची या बीमार इंसान नहीं है। वह 25 साल की एक पूरी तरह स्वस्थ वयस्क लड़की है। वह खुद अपनी थाली उठा सकती है।”

रोहन की आवाज एक पायदान और ऊंची हो गई, “मैंने जो कहा वह तुमने सुना नहीं? मैंने कहा उसकी प्लेट वहां रखो!”

“मैं तुम्हारी पत्नी हूं रोहन, इस घर की खरीदी हुई नौकरानी या तुम्हारी बहन की अटेंडेंट नहीं। अगर वह खाना चाहती है, तो टेबल पर आकर खाए।”

कृति तुरंत सोफे से उठी और रोते हुए बोली, “देखा भैया? मैंने पहले ही कहा था कि यह औरत हमारे परिवार को तोड़ने आई है। शादी होते ही इसे लगता है कि यह इस घर की मालकिन बन गई है!”

रोहन का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था। वह मेरे बिल्कुल करीब आ गया, उसकी सांसें मेरी पेशानी पर महसूस हो रही थीं। उसने अपनी उंगली मेरी आंखों के सामने लहराते हुए कहा, “मेरी बहन से इसी वक्त कान पकड़कर माफी मांगो, अनन्या।”

“मैं किसी से माफी नहीं मांगूंगी क्योंकि मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा है। मैंने सिर्फ बराबरी और स्वाभिमान की बात की है।”

“अनन्या, मैं आखिरी बार चेतावनी दे रहा हूं… अपनी हद में रहो!”

“नहीं!” मैंने पूरी ताकत और दृढ़ता से कहा।

और अगले ही पल, हवा में एक तेज सनसनाहट हुई और रोहन का भारी, सपाट हाथ पूरी ताकत के साथ मेरे बाएं गाल पर आ गिरा। उस वार की गूंज पूरे लिविंग रूम में पत्थर की तरह टकराई।

उस एक पल में पूरी दुनिया जैसे ठहर गई। मेरे कान में तेज सीटी जैसी आवाज गूंजने लगी। गाल पर असहनीय जलन फैल गई और मेरी जुबान सुन्न पड़ गई। मुझे चंद पलों के लिए यह समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ है। क्या यह वही रोहन था जिसने दो दिन पहले पवित्र अग्नि के सामने फेरे लेते हुए मेरा सम्मान करने की कसमें खाई थीं? क्या यह वही पढ़ा-लिखा, कॉर्पोरेट जगत का आधुनिक पुरुष था?

रोहन अपनी छाती को तेजी से फुलाते हुए भारी सांसें ले रहा था। उसने अपने हाथ को नीचे किया और बिना किसी पछतावे या आत्मग्लानि के, उलटा मुझ पर चिल्लाते हुए बोला, “देखो तुमने मुझे क्या करने पर मजबूर कर दिया! अगर मेरी बहन की थाली सोफे तक नहीं ले जा सकती, तो इस घर की बहू बनने का तुम्हें कोई हक नहीं है!”

वह वाक्य मेरे भीतर आत्मसम्मान के उस आखिरी धागे को भी काट गया जो मुझे उस रिश्ते से बांधे हुए था। उस वक्त मेरे सामने दो रास्ते थे—या तो मैं एक पारंपरिक भारतीय बहू की तरह घुटनों पर बैठकर रोती, अपनी किस्मत को कोसती और परिवार की ‘शांति’ के नाम पर उस थप्पड़ को अपनी तकदीर मान लेती; या फिर मैं अपने पैरों पर खड़ी होती और उस अन्याय का उसी वक्त अंत करती।

मैंने अपनी कंपकंपाती उंगलियों से अपने जलते हुए गाल को छुआ। मेरी आंखों में आंसू थे, लेकिन वे कमजोरी के नहीं, बल्कि भीतर धधकते आक्रोश के थे। मैंने बिना कुछ बोले डाइनिंग टेबल की तरफ कदम बढ़ाए। टेबल पर सजी हुई चीनी मिट्टी की डिनर प्लेटों को मैंने दोनों हाथों से उठाया और पूरी ताकत के साथ संगमरमर के फर्श पर पटक दिया।

बर्तनों के चकनाचूर होने की कानफाड़ू आवाज से पूरा फ्लैट गूंज उठा। गर्म दाल और करी फर्श पर चारों तरफ फैल गई और चीनी मिट्टी के तीखे टुकड़े रोहन के जूतों के पास जाकर गिरे। कृति डर के मारे सोफे के पीछे दुबक गई और उसकी चीख निकल गई।

रोहन की आंखें फटी की फटी रह गईं। वह हकलाते हुए चिल्लाया, “पागल हो गई हो क्या? यह क्या बदतमीजी है?”

मैंने अपनी आवाज को स्थिर और बर्फ की तरह ठंडा करते हुए कहा, “नहीं रोहन, मैं पागल नहीं हुई हूं। बल्कि पिछले 48 घंटों में पहली बार मेरी आंखें खुली हैं और मुझे तुम्हारा असली, घिनौना चेहरा साफ दिखाई दिया है।”

मैं तेजी से मुड़ी और बेडरूम में चली गई। मैंने अलमारी से अपना वह छोटा ट्रॉली सूटकेस निकाला जिसे मैं शादी के बाद अपने साथ लाई थी। मेरे हाथ कांप रहे थे, लेकिन मेरा दिमाग पूरी तरह केंद्रित था। मैंने अपने सारे जरूरी कपड़े, अपने ऑफिस का लैपटॉप, अपनी डिग्रियां, पासपोर्ट, आधार कार्ड और अपने माता-पिता द्वारा दिए गए सभी गहने उस बैग में पैक कर लिए।

रोहन तेजी से कमरे में दाखिल हुआ। उसने मुझे सूटकेस की ज़िप बंद करते देखा तो उसका चेहरा गुस्से और घबराहट के मिले-जुले भाव से भर गया। उसने दरवाजे के फ्रेम को पकड़ते हुए उपहास के लहजे में कहा, “अरे वाह! क्या ड्रामा है! सिर्फ एक सामान्य थप्पड़ के लिए तुम अपना घर छोड़ रही हो? एक थप्पड़ के लिए शादी तोड़ोगी?”

उसका यह सवाल उस थप्पड़ से भी ज्यादा जहरीला और हिंसक था। यह उस सोच का प्रमाण था जो यह मानती है कि शादी के नाम पर एक पुरुष को अपनी पत्नी पर शारीरिक और मानसिक अधिकार मिल जाता है।

मैंने अपने बैग का हैंडल पकड़ा और उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “यह सिर्फ एक थप्पड़ नहीं है रोहन, यह तुम्हारी घटिया और दकियानूसी मानसिकता का सबूत है। और हां, एक थप्पड़ ही काफी है यह बताने के लिए कि तुम्हारे साथ बिताया जाने वाला हर अगला पल मेरी आत्मा की हत्या जैसा होगा।”

जब मैं सूटकेस लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी, तो रोहन दौड़कर आया और उसने मुख्य दरवाजे के सामने खड़े होकर मेरा रास्ता रोक लिया। उसके चेहरे पर अब एक अहंकारी पुरुष का दबदबा था। उसने कहा, “तुम इस घर से बाहर कदम नहीं रख सकतीं। बाहर समाज में मेरी क्या इज्जत रह जाएगी? चुपचाप कमरे में जाओ।”

मैंने बिना एक पल गंवाए अपना मोबाइल फोन निकाला, स्क्रीन अनलॉक की और 112 डायल करने के लिए अपनी उंगली स्क्रीन पर रख दी। मैंने फोन उसकी आंखों के ठीक सामने करते हुए कहा, “रोहन मेहरा, अगर तुम अगले तीन सेकंड में इस दरवाजे के सामने से नहीं हटे, तो मैं इसी वक्त घरेलू हिंसा और बंधक बनाने की धाराओं के तहत पुलिस को कॉल करूंगी। फैसला तुम्हारा है—शांति से रास्ता छोड़ते हो या पुलिस की गाड़ी के सायरन के साथ अपना तमाशा देखना चाहते हो?”

मेरी आंखों में छिपे उस चट्टानी इरादे और निडरता को देखकर रोहन की हिम्मत जवाब दे गई। उसका अहंकार कानून के खौफ के आगे ढह गया। उसने धीरे से अपना पैर पीछे खींचा और रास्ता छोड़ दिया।

मैं भारी कदमों से लेकिन सिर ऊंचा करके उस सोसाइटी की बिल्डिंग से बाहर निकल आई। रात के 9 बज चुके थे। दिल्ली की ठंडी हवा मेरे जलते हुए गाल को छू रही थी। मैंने सड़क पर आकर एक कैब बुक की। मेरी पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया अपने माता-पिता के घर जाने की थी, लेकिन मैं जानती थी कि रात के इस पहर मेरी इस हालत को देखकर मेरे बुजुर्ग पिता का दिल टूट जाएगा। वे पहले से ही दिल के मरीज थे। इसलिए मैंने अपनी सबसे करीबी दोस्त और हाई कोर्ट की जानी-मानी एडवोकेट नेहा कपूर को फोन मिलाया।

नेहा ने मेरी आवाज सुनते ही भांप लिया कि कुछ बहुत गलत हुआ है। उसने बिना कोई सवाल पूछे कहा, “अनन्या, सीधे मेरे वसंत कुंज वाले अपार्टमेंट में आ जाओ, मैं तुम्हारा इंतजार कर रही हूं।”

जब मैं नेहा के फ्लैट पर पहुंची, तो उसने मुझे गले से लगा लिया। उस सुरक्षित आलिंगन में पहुंचकर पहली बार मेरे आंसुओं का बांध टूटा। लेकिन नेहा एक पेशेवर वकील थी; उसने मुझे संभालने के साथ-साथ तुरंत कानूनी प्रक्रियाओं की दिशा में सोचना शुरू कर दिया। उसने सबसे पहले एक हाई-रेजोल्यूशन कैमरे से मेरे चेहरे पर पड़े उंगलियों के लाल और नीले निशानों की अलग-अलग एंगल से स्पष्ट तस्वीरें लीं। उसने मेरे चेहरे पर आइस-पैक लगाया और मुझे तुरंत पास के एक प्राइवेट अस्पताल ले जाकर मेरा मेडिकल परीक्षण (MLC) करवाया, ताकि मेडिकल रिकॉर्ड में यह दर्ज हो सके कि मेरे चेहरे पर ताजा शारीरिक चोट के निशान हैं।

उस पूरी रात मेरे फोन पर रोहन के मैसेज और कॉल्स की बाढ़ आ गई थी। उसके संदेशों का रंग हर घंटे बदल रहा था। रात 11:30 बजे का मैसेज: “अनन्या, आई एम सो सॉरी। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। काम का बहुत ज्यादा स्ट्रेस था और कृति के व्यवहार से मैं भी चिड़चिड़ा हो गया था। प्लीज घर वापस आ जाओ।” रात 1:00 बजे का मैसेज: “तुमने कृति को जानबूझकर भड़काया। तुमने उसे नीचा दिखाने की कोशिश की। गलती तुम्हारी भी बराबर की थी।” रात 2:30 बजे का मैसेज: “अगर तुमने यह बात अपने मायके वालों या किसी तीसरे इंसान को बताई, तो समाज में बदनामी सिर्फ तुम्हारी होगी। लोग कहेंगे कि दो दिन भी शादी नहीं संभाल पाई।” सुबह 4:00 बजे का मैसेज: “शादी कोई खेल नहीं है जिसे तुम ऐसे छोड़ दो। हमारे परिवारों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। समझदारी दिखाओ और सुबह चुपचाप वापस आ जाओ।”

नेहा ने उन सभी मैसेजेस, वॉइस नोट्स और कॉल रिकॉर्ड्स का स्क्रीनशॉट लेकर एक सुरक्षित क्लाउड ड्राइव पर डिजिटल बैकअप बना लिया। उसने कहा, “अनन्या, यह आदमी बहुत शातिर है। यह तुम्हें इमोशनली ब्लैकमेल करके और समाज का डर दिखाकर वापस बुलाना चाहता है ताकि तुम पर और ज्यादा हावी हो सके।”

अगली सुबह, मैंने सबसे पहले अपने माता-पिता को नेहा के घर बुलाया। जब मेरे पिता और मां ने मेरे गाल पर नीले पड़े निशान देखे और पूरी दास्तान सुनी, तो मेरे पिता के हाथ कांपने लगे। उनकी आंखों में बेबसी और पछतावे के आंसू थे। उन्होंने रोते हुए कहा, “बेटा, मैंने किस भेड़िए के हाथ में तुम्हारा हाथ सौंप दिया! मैंने सिर्फ उसकी डिग्रियां और उसका ओहदा देखा, इंसानियत देखना भूल गया।”

मैंने अपने पिता के हाथ थामे और कहा, “पापा, आप खुद को मत कोसिए। आपने कोई गलती नहीं की। लेकिन अब मैं उस घर में कभी वापस नहीं जाऊंगी। मुझे बस आपका आशीर्वाद और आपका साथ चाहिए।”

मेरे पिता ने अपने आंसू पोंछे, अपनी रीढ़ सीधी की और बोले, “अनन्या, मेरी बेटी का आत्मसम्मान मेरे लिए किसी भी सामाजिक लोक-लाज से हजार गुना बड़ा है। तुम जो भी कदम उठाओगी, तुम्हारा यह बूढ़ा बाप चट्टान की तरह तुम्हारे पीछे खड़ा रहेगा।”

उसी दोपहर, नेहा की मदद से हमने दिल्ली पुलिस के क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल (CAW Cell) में घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई और रोहन मेहरा को एक विस्तृत लीगल नोटिस भिजवा दिया। उस नोटिस में साफ तौर पर लिखा था कि अनन्या शर्मा बिना किसी शर्त के इस शादी से अलग होने और तलाक की अर्जी दाखिल करने जा रही है।

शाम को जब लीगल नोटिस रोहन के पते पर डिलीवर हुआ, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे उम्मीद थी कि एक भारतीय लड़की समाज के डर से या अपने मायके वालों के दबाव में आकर दो-चार दिन में समझौता कर लेगी। लेकिन यहां बात सीधे पुलिस और कोर्ट तक पहुंच चुकी थी।

घबराहट में रोहन ने अपने रिश्तेदारों को इकट्ठा किया और मेरे पिता को लगातार फोन करने लगा। उसी रात करीब 8 बजे, नेहा के फोन पर एक अनजान नंबर से एक ऑडियो फाइल आई। यह ऑडियो किसी और ने नहीं, बल्कि रोहन की एक दूर की रिश्तेदार भाभी ने भेजी थी, जो शादी के समय से ही रोहन और उसके परिवार की हरकतों से वाकिफ थीं और अंदर ही अंदर मेरा समर्थन कर रही थीं।

उस ऑडियो फाइल में रोहन और उसकी बहन कृति की एक बंद कमरे में हुई गुप्त बातचीत की रिकॉर्डिंग थी। उस रिकॉर्डिंग को सुनते ही हम सबके रोंगटे खड़े हो गए।

रिकॉर्डिंग में कृति की तीखी आवाज गूंज रही थी: “भैया, आपने उसे जाने क्यों दिया? आपको तो उस पर और दबाव बनाना चाहिए था! याद है ना पापा ने क्या कहा था? मम्मी भी तो शादी के शुरुआती सालों में बहुत पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करती थीं। पापा ने भी तो उन्हें पहली बार हाथ उठाकर ही सीधा किया था। मम्मी भी तो उस वक्त चुपचाप सहकर घर में रुक गई थीं और अपनी नौकरी छोड़ दी थी! अगर आप अनन्या को पहले हफ्ते में ही नहीं दबाएंगे, तो यह पूरी जिंदगी आपके सिर पर नाचती रहेगी और मुझे इस घर से बाहर निकाल देगी!”

और उसके जवाब में रोहन की आवाज सुनाई दी: “मुझे पता है कृति, मैंने वही करने की कोशिश की थी। लेकिन यह औरत मम्मी जैसी सीधी और दब्बू नहीं है। इसने तो सीधे पुलिस कंप्लेंट कर दी। अब अगर मेरा करियर बर्बाद हुआ, तो मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा।”

उस 45 सेकंड के ऑडियो क्लिप ने मेहरा परिवार के उस ‘सभ्य’ मुखौटे को तार-तार कर दिया था जिसके पीछे वे सालों से जी रहे थे। वह कोई अचानक हुआ गुस्सा या काम का तनाव नहीं था। वह उस घर की पीढ़ियों पुरानी एक सोची-समझी, जहरीली और पितृसत्तात्मक परंपरा थी, जहां महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़कर उन्हें गुलाम बनाया जाता था। रोहन की स्वर्गीय मां कोई बीमारी से नहीं गुजरी थीं, बल्कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी उस चारदीवारी में अपने पति के इसी दमनकारी व्यवहार को सहते-सहते तिल-तिल कर दम तोड़ा था। और वही जहर अब रोहन और कृति के खून में बह रहा था।

अगले दिन जब CAW सेल में हमारी पहली काउंसलिंग काउंसलिंग सेशन हुई, तो रोहन अपने पिता के साथ बेहद साफ-सुथरे सूट में, हाथ जोड़े हुए पहुंचा। उसके चेहरे पर अब वह पुराना घमंड गायब था और उसकी जगह एक चालाक लाचारी ने ले ली थी। उसके पिता ने मेरे पिता के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, “शर्मा जी, बच्चों में छोटी-मोटी नोकझोंक हो जाती है। रोहन से गलती हो गई, वह गुस्से पर काबू नहीं रख पाया। घर की बात को थाने-कचहरी तक मत घसीटिए। हम सब बैठकर सुलझा लेते हैं।”

रोहन ने आगे बढ़कर मेरे पैर छूने का नाटक करते हुए कहा, “अनन्या, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मैं वादा करता हूं कि आगे से कभी ऐसा नहीं होगा।”

मैंने घृणा से अपने पैर पीछे खींच लिए। मैंने अपना फोन निकाला, उसे टेबल पर रखा और वह 45 सेकंड का ऑडियो क्लिप सबके सामने पूरे लाउडस्पीकर पर चला दिया।

कमरे में जैसे सन्नाटा जम गया। रोहन और उसके पिता के चेहरों का रंग उड़कर सफेद हो गया। काउंसलिंग ऑफिसर, जो कि एक वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारी थीं, के चेहरे के भाव पूरी तरह बदल गए। उन्होंने रोहन और उसके पिता की तरफ घूरते हुए फाइल को जोर से टेबल पर पटका।

मैंने रोहन की आंखों में आंखें डालते हुए बेहद शांत और गंभीर आवाज में कहा, “रोहन मेहरा, तुम्हारी मां मजबूर थीं क्योंकि उस दौर में उनके पास शायद आर्थिक आजादी और अपने परिवार का साथ नहीं था। उन्होंने तुम्हारी और तुम्हारे पिता की हिंसा को अपनी नियति मान लिया और पूरी जिंदगी घुट-घुट कर जीं। लेकिन मैं तुम्हारी मां नहीं हूं। मैं 21वीं सदी की एक शिक्षित, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी महिला हूं। तुम्हारा यह खानदानी हिंसा का चक्र इसी कमरे में और इसी पल हमेशा के लिए खत्म होता है।”

मैंने काउंसलिंग ऑफिसर की तरफ देखकर कहा, “मैडम, मुझे किसी सुलह या समझौते में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं इस इंसान के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून की धारा 12, भरण-पोषण और मेरे स्त्रीधन की पूरी वापसी के साथ-साथ हिंदू मैरिज एक्ट के तहत क्रूरता के आधार पर तत्काल तलाक की अर्जी आगे बढ़ाना चाहती हूं।”

अधिकारी ने सहमति में सिर हिलाया और रोहन की तरफ सख्त लहजे में कहा, “मेहरा साहब, अगर अगले 48 घंटों के भीतर इस लड़की का सारा स्त्रीधन, गहने और सामान सुरक्षित वापस नहीं लौटाया गया, तो आपके बेटे के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाएगी और इसकी सूचना सीधे इनकी कंपनी के एचआर डिपार्टमेंट को भेजी जाएगी।”

नौकरी जाने और जेल की सलाखों के पीछे पहुंचने के खौफ से रोहन और उसके पिता के सारे तेवर हवा हो गए। अगले ही दिन रोहन ने मेरे सारे जेवरात, कपड़े और हर एक दस्तावेज बिना किसी आनाकानी के मेरे घर भिजवा दिए। कानूनी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी और मेरे पास मौजूद पुख्ता मेडिकल साक्ष्यों, मैसेज रिकॉर्ड्स और उस ऑडियो क्लिप के दबाव में आकर रोहन को बिना किसी शर्त के आपसी सहमति से तलाक के कागजात पर दस्तखत करने पड़े।

उस घटना को आज पूरा एक साल बीत चुका है।

तलाक के बाद के शुरुआती कुछ महीने मेरे लिए आसान नहीं थे। हमारे तथाकथित सभ्य समाज में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो यह सवाल उठाने से नहीं चूकते कि “क्या सिर्फ एक थप्पड़ के लिए बनी-बनाई शादी तोड़ देना सही था?” लेकिन जब भी कोई मुझसे यह सवाल पूछता है, मैं पूरे गर्व और आत्मविश्वास से सिर उठाकर कहती हूं कि आत्मसम्मान पर हुआ पहला हमला ही आखिरी होना चाहिए। जो हाथ शादी के दूसरे दिन उठ सकता है, वह भविष्य में आपकी जान भी ले सकता है।

आज मैं अपने करियर के एक नए मुकाम पर हूं। मेरी कंपनी ने मुझे यूरोपियन ऑपरेशंस के लिए सीनियर कंसल्टेंट के रूप में प्रमोट किया है। मैं अपने माता-पिता के साथ एक खुशहाल, शांत और गरिमामय जीवन जी रही हूं। मेरे पिता की आंखों में अब कोई दुख नहीं, बल्कि अपनी बेटी के साहस पर गर्व की चमक है।

यह कहानी केवल मेरे एक थप्पड़ का जवाब देने की नहीं है, बल्कि हर उस बेटी के लिए एक सीख है जो शादी और समाज के दबाव में आकर अपने स्वाभिमान से समझौता कर लेती है। रिश्ते प्यार, बराबरी और परस्पर सम्मान की नींव पर टिकते हैं, डर और गुलामी पर नहीं। जब कोई आपके आत्मसम्मान को कुचलने की कोशिश करे, तो समझौते का रास्ता तलाशने के बजाय उस अन्याय के खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाना ही जीवन का सबसे सही और साहसी फैसला होता है।

 

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