Story

11 साल तक पति कहता रहा ‘मायके वाले तुम्हें पसंद नहीं करते’, पर जब सास ने रोते हुए सच खोला तो गोवा के बीच विला में 11 साल का सबसे बड़ा झूठ बेनकाब हो गया

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“पापा, क्या आपके घरवालों को हमसे इतनी दूरी रखनी थी कि ग्यारह सालों में एक बार भी हमें अपने साथ उस बड़े घर की छुट्टियों में नहीं बुलाया?”

अनन्या ने यह बात बहुत धीमे स्वर में कही थी, लेकिन उस शांत कमरे में उसके शब्द किसी भारी पत्थर की तरह गिरे।

कमरे के एक कोने में खड़ा राघव अपने नीले रंग के बड़े सूटकेस की ज़िप बंद कर रहा था। उसके चेहरे पर हर साल की तरह वही एक जानी-पहचानी जल्दबाज़ी और बेरुखी थी। हर साल मई और जून की तपती गर्मियों में यही एक सिलसिला बिना किसी रुकावट के दोहराया जाता था। पूरे आठ दिनों के लिए वह अपने माता-पिता, दोनों छोटे भाइयों, उनकी पत्नियों, विवाहित बहन, जीजाजी, चचेरे भाइयों और उनके बच्चों के साथ गोवा के उस पुश्तैनी बीच विला में छुट्टियां मनाने चला जाता था। और मैं, यानी मीरा, दिल्ली के इस शांत और खाली फ्लैट की चारदीवारी में अपनी पंद्रह साल की बेटी अनन्या और ग्यारह साल के बेटे आरव के साथ पीछे छूट जाती थी।

मुझे वह दिन आज भी पूरी तरह याद था जब राघव पहली बार हमें छोड़कर अकेला उस पारिवारिक यात्रा पर गया था। तब हमारी अनन्या सिर्फ चार साल की एक नन्ही सी गुड़िया थी। उसने अपने पिता का कुर्ता पकड़कर पूछा था कि वह कहाँ जा रहे हैं, तो राघव ने बड़े प्यार से उसके गाल थपथपाते हुए वादा किया था, “बेटा, इस बार दादाजी का बुलावा सिर्फ बड़ों के लिए है। अगली बार पापा अपनी बिटिया को भी साथ ले जाएँगे और बड़ा सा नीला समुद्र और उसकी लहरें दिखाएँगे।” उस मासूम बच्ची ने अपने पिता के उस वादे को अपने नन्हे दिल में पत्थर की लकीर की तरह संजो लिया था। वह कई हफ़्तों तक बाज़ार से लाई गई अपनी एक छोटी सी बैंगनी रंग की प्लास्टिक की बाल्टी और चम्मच को अपने तकिए के पास रखकर सोती रही थी, ताकि जब वह समुद्र किनारे पहुँचे तो अपने हाथों से रेत का सुंदर किला बना सके।

समय बीतता गया, साल दर साल गुज़रते गए। वह चार साल की नन्ही बच्ची अब पंद्रह साल की समझदार किशोरी बन चुकी थी। उसका छोटा भाई आरव भी अब ग्यारह साल का हो चुका था। लेकिन वह ‘अगली बार’ इन ग्यारह सालों में कभी नहीं आया। हर साल राघव के पास कोई न कोई नया बहाना तैयार रहता था। कभी वह कहता कि माँ की तबीयत ठीक नहीं रहती और वह बच्चों का शोर बर्दाश्त नहीं कर सकतीं, तो कभी वह कहता कि संयुक्त परिवार में बहुत से लोग जमा होते हैं और वहाँ अलग से हमारे लिए कोई कमरा खाली नहीं बचेगा।

अनन्या ने खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखते हुए अचानक एक सवाल पूछा, “पापा, क्या रिया भी इस बार आपके साथ गोवा जा रही है?”

रिया राघव की पहली शादी से हुई बेटी थी। जब राघव और उसकी पहली पत्नी कविता का तलाक हुआ था, तब रिया बहुत छोटी थी। जब मेरी और राघव की शादी हमारे परिवारों की सहमति से तय हुई थी, तब मैंने इस बात को खुले दिल से स्वीकार किया था कि राघव का एक अतीत है और उसकी एक बेटी भी है। मुझे उस बच्ची से कभी कोई परहेज़ या शिकायत नहीं थी। मैंने शादी के शुरुआती सालों में कई बार राघव से हाथ जोड़कर कहा था कि रिया को भी हमारे घर लाया करे ताकि वह अपने दोनों छोटे भाई-बहनों अनन्या और आरव के साथ घुल-मिल सके, ताकि बच्चों के बीच खून का रिश्ता और प्यार पनप सके। लेकिन राघव हमेशा एक अजीब सी बेचैनी के साथ बात को टाल देता था और कहता, “मीरा, तुम इन पारिवारिक मामलों की संवेदनशीलता को नहीं समझतीं। कविता और उसके मायके वाले बहुत पुराने विचारों के हैं और रिया का यहाँ आना हालात को बहुत नाज़ुक बना देगा।”

अनन्या के सवाल पर राघव ने अपनी कलाई घड़ी बांधते हुए, बिना मेरी या बच्चों की तरफ देखे, बेहद रूखे स्वर में कहा, “मुझे नहीं मालूम कि वह आ रही है या नहीं।”

मैं अब चुप नहीं रह सकी। मेरे भीतर बरसों से सुलगती हुई टीस बाहर आ गई। मैंने कहा, “राघव, तुम्हें अपनी ही सगी बेटी के बारे में नहीं पता कि वह अपने दादा-दादी के साथ जा रही है या नहीं? तुम पूरे परिवार के साथ आठ दिन बिताने जा रहे हो और तुम्हें इतनी बुनियादी बात की भी जानकारी नहीं है?”

राघव का माथा तन गया और उसकी आँखों में चिढ़ साफ़ दिखाई देने लगी। उसने आवाज़ ऊंची करते हुए कहा, “मीरा, भगवान के लिए आज घर से निकलते वक्त अपनी यह पुरानी महाभारत मत शुरू करो। मेरी कैब नीचे खड़ी है और मुझे एयरपोर्ट के लिए देर हो रही है।”

पास के सोफे पर बैठा आरव, जो अपने हाथों में बंद पड़ा टैबलेट कसकर पकड़े हुए था, अपनी मासूम आँखों में उम्मीद और डर का मिला-जुला भाव लिए बोल पड़ा, “पापा, क्या हम कभी भी आपके साथ उस बड़े विला में नहीं जा पाएँगे? मेरे स्कूल के सारे दोस्त हर छुट्टियों में अपने पूरे परिवार और दादा-दादी के साथ कहीं न कहीं जाते हैं।”

राघव ने आरव के सिर पर हाथ फेरा और उसके चेहरे पर वही पुरानी, घिसी-पिटी और बनावटी मुस्कान उभर आई, जिसका इस्तेमाल वह हमेशा किसी भी कड़वे सच से बचने के लिए एक ढाल की तरह करता था। उसने कहा, “बेटा, यह हमारे खानदान की, तुम्हारे दादा-दादी के जमाने की बहुत पुरानी और जटिल परंपरा है। कुछ चीज़ें बड़े होने पर ही समझ में आती हैं।”

मैंने उसके ठीक सामने जाकर उसकी आँखों में आँखें डालकर पूछा, “राघव, अगर वह तुम्हारे खानदान की परंपरा है, तो हम कौन हैं? क्या मैं तुम्हारी ब्याहता पत्नी नहीं हूँ? क्या अनन्या और आरव तुम्हारे अपने बच्चे और उस खानदान के वारिस नहीं हैं?”

“मीरा, तुम सब जानती हो और बेवजह बात का बतंगड़ बना रही हो।”

“नहीं राघव, मैं कुछ नहीं जानती! एक या दो साल कोई मजबूरी या परंपरा हो सकती है। लेकिन ग्यारह सालों तक अपनी ही पत्नी और अपने ही मासूम बच्चों को परिवार के हर उत्सव, हर पारिवारिक मिलन और हर छुट्टी से पूरी तरह बाहर रखना कोई परंपरा नहीं है, यह सीधा-सीधा मानसिक प्रताड़ना और सरासर अन्याय है।”

राघव ने अपने सूटकेस का हैंडल पकड़ा और कड़े शब्दों में कहा, “मुझे इस वक्त कोई ड्रामा या तमाशा नहीं चाहिए। मैं जा रहा हूँ।”

उसने दरवाज़ा खोला और बिना पीछे मुड़े तेज़ी से सीढ़ियों से नीचे उतर गया। भारी मुख्य दरवाज़ा एक तेज़ आवाज़ के साथ बंद हो गया। उस बंद दरवाज़े की आवाज़ कमरे में बहुत देर तक गूँजती रही।

कमरे में छाई भारी खामोशी को तोड़ते हुए आरव ने बहुत धीमी और ठहरी हुई आवाज़ में कहा, “कोई बात नहीं, मम्मा। रोइए मत। मुझे तो पहले से ही पक्का पता था कि पापा हमें कभी अपने साथ नहीं ले जाएँगे।”

आरव के इन चंद मासूम शब्दों ने मेरे दिल के भीतर जैसे कोई गहरी छुरी चला दी। मेरे बच्चों ने अपनी उम्र से बहुत पहले ही दूसरों से उम्मीदें बांधना छोड़ दिया था, ताकि जब वह उम्मीद टूटे तो उनके नन्हे दिलों को कम से कम दर्द पहुंचे। एक माँ के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता था कि उसके बच्चों को इतनी छोटी उम्र में उपेक्षा सहने और अपने आंसुओं को चुपचाप पी जाने की आदत पड़ गई थी।

राघव के जाने के करीब दो घंटे बाद, जब मैं रसोई में बर्तन समेट रही थी और अपने आंसुओं को पल्लू से पोंछने की कोशिश कर रही थी, तभी अनन्या अपने हाथ में स्मार्टफोन थामे, हांफती हुई और कांपते कदमों से रसोई के भीतर आई।

उसका चेहरा पूरी तरह पीला पड़ चुका था और उसकी आँखों में अविश्वास के आंसू छलक रहे थे। उसने फोन मेरी आँखों के सामने करते हुए कहा, “मम्मा… ज़रा यह देखिए।”

मैंने फोन हाथ में लिया। स्क्रीन पर राघव की चचेरी बहन शालिनी का सोशल मीडिया पेज खुला हुआ था। शालिनी ने ठीक पंद्रह मिनट पहले ही गोवा के उस पुश्तैनी बीच विला से एक बड़ी पारिवारिक तस्वीर पोस्ट की थी, जिसके नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’परिवार का पुनर्मिलन, परंपरा, प्यार और गोवा की खूबसूरत शामें।’

उस तस्वीर को देखकर मेरे पैरों तले की ज़मीन जैसे पूरी तरह खिसक गई।

तस्वीर में गोवा के उस भव्य, सफेद विला के हरे-भरे लॉन में पूरा परिवार मौजूद था। मेरे ससुर पंडित बद्रीनाथ जी अपनी पारंपरिक सफेद धोती-कुर्ते में बैठे थे, सासू माँ सावित्री देवी बनारसी साड़ी में मुस्कुरा रही थीं, दोनों देवर, देवरानियाँ, ननद, जीजाजी और उनके सारे बच्चे सफेद कपड़ों की एक जैसी थीम में सजे-धजे खड़े थे। लेकिन जिस बात ने मेरी आत्मा तक को झकझोर कर रख दिया, वह थी तस्वीर का ठीक मध्य भाग।

तस्वीर के बिल्कुल बीचों-बीच, मेरे सास-ससुर के ठीक बगल में राघव खड़ा था। उसके एक कंधे पर उसकी पहली पत्नी कविता का हाथ था, और दूसरे हाथ से उसने अपनी पहली बेटी रिया को गले से लगा रखा था। कविता के चेहरे पर वही गर्व और अधिकार की मुस्कान थी जो किसी कुलवधू के चेहरे पर होती है, और पूरा परिवार उन तीनों को घेरकर ऐसे खड़ा था मानो वही उस घर का असली और एकमात्र केंद्रबिंदु हों।

रिया की इसमें कोई गलती नहीं थी। वह एक मासूम बच्ची थी और अपने पिता, अपने दादा-दादी और अपने पूरे परिवार के साथ वक्त बिताने का उसका पूरा नैसर्गिक अधिकार था। लेकिन उस एक तस्वीर ने ग्यारह सालों से बुने गए उस पूरे तिलिस्म को एक ही झटके में तार-तार कर दिया था। जिस ‘खानदानी परंपरा’ का बहाना बनाकर मुझे और मेरे बच्चों को ग्यारह सालों से उस चौखट से अछूतों की तरह दूर रखा गया था, उसी परंपरा में राघव की पुरानी ज़िंदगी अपनी पूरी शानो-शौकत और अधिकार के साथ मौजूद थी।

अनन्या की आवाज़ पूरी तरह भरभरा गई। वह फूट-फूट कर रोने लगी, “मम्मा… रिया उस खानदान की बेटी मानी जाती है, पर मैं और आरव क्यों नहीं? हमने ऐसा क्या पाप किया है? पापा ने हमें इस तरह क्यों छुपा कर रखा है जैसे हम कोई गुनाह हों?”

उस पल मेरे भीतर ग्यारह सालों से बंद पड़ा सब्र, शर्म और संकोच का हर दरवाज़ा टूटकर बिखर गया। मैं एक पारंपरिक भारतीय नारी की तरह हमेशा यही सोचती रही थी कि घर की बात घर में ही रहनी चाहिए, पति का मान ही मेरा मान है, और अगर ससुराल वाले मुझे नहीं अपनाना चाहते तो मुझे चुपचाप अपने बच्चों की परवरिश में ध्यान लगाना चाहिए। लेकिन आज उस खामोशी ने मेरे बच्चों के आत्मसम्मान को लहूलुहान कर दिया था।

मैंने तुरंत अपना फोन उठाया। मेरी उंगलियां गुस्से और बेचैनी से कांप रही थीं। मैंने अपनी सास सावित्री देवी का निजी नंबर डायल किया। यह वही नंबर था जिस पर मैंने पिछले कई सालों से सिर्फ दिवाली या होली पर औपचारिक बधाई देने के लिए ही बात की थी, क्योंकि राघव हमेशा मुझसे कहता था कि माँ मुझसे बात करने से कतराती हैं।

तीन घंटी बजने के बाद दूसरी तरफ से फोन उठ गया।

सासू माँ की जानी-पहचानी, भारी मगर ममतामयी आवाज़ सुनाई दी, “अरे मीरा बहू! कैसी हो तुम? अचानक तुम्हारा फोन आया, सब ठीक तो है ना? बच्चे कैसे हैं?”

उनकी आवाज़ में न तो कोई बनावटीपन था और न ही कोई कड़वाहट। वह बिल्कुल सहज और आत्मीय लग रही थीं। लेकिन मेरे भीतर का आक्रोश अब किसी औपचारिकता को मानने के लिए तैयार नहीं था।

मैंने गहरी सांस लेते हुए बिना किसी लाग-लपेट के सीधे सवाल किया, “मम्मीजी, मुझे आज आपसे एक बहुत सीधा सवाल पूछना है। आपने इन ग्यारह सालों में एक बार भी अनन्या और आरव को, अपने सगे पोते-पोती को, गर्मियों की छुट्टियों में अपने पास गोवा या अपने पैतृक गाँव क्यों नहीं बुलाया? हमारे मासूम बच्चों ने आपका क्या बिगाड़ा था?”

फोन के दूसरी तरफ एक लंबा, असहज और गहरा सन्नाटा छा गया। ऐसा लगा जैसे हवा की गति भी थम गई हो।

कुछ पलों बाद सासू माँ की हक्की-बक्की आवाज़ आई, “मीरा… यह तुम क्या कह रही हो बहू? हमने नहीं बुलाया? क्या होश में तो हो तुम?”

“हाँ मम्मीजी, मैं पूरी तरह होश में हूँ। ग्यारह साल से आपका बेटा राघव मुझसे और मेरे बच्चों से यही कहता आ रहा है कि आपके खानदान के लोग, आप और बाबूजी, मुझे और मेरे बच्चों को अपनी छुट्टियों और पारिवारिक उत्सवों में देखना तक पसंद नहीं करते। आज मेरे बच्चों ने इंटरनेट पर आप सबकी तस्वीर देखी है। आप सब गोवा में कविता और रिया के साथ खुशियां मना रहे हैं, और मेरे बच्चे यहाँ दिल्ली के कमरे में बंद होकर रो रहे हैं।”

दूसरी तरफ से एक गहरी, कांपती हुई सांस और फिर एक दबी हुई चीख सुनाई दी।

“हे भगवान… हे मेरे बांके बिहारी! यह क्या अनर्थ हो गया!” सासू माँ की आवाज़ अचानक रोने जैसी हो गई। “मीरा, राघव ने तो हर साल हमसे यही कहा कि तुम हमारे साथ कोई संबंध ही नहीं रखना चाहतीं!”

मेरे हाथ से फोन लगभग छूटने को हो गया। मैंने रसोई के मार्बल काउंटर को दोनों हाथों से कसकर थाम लिया। “क्या… क्या कहा आपने?”

सासू माँ फूट-फूट कर रोने लगीं। उनकी आवाज़ में बरसों का दबा हुआ दर्द और अफ़सोस बह निकला, “हाँ मीरा! हर साल जब गर्मियों की छुट्टियां नज़दीक आती थीं, तो तुम्हारे बाबूजी और मैं राघव से हाथ जोड़कर कहते थे कि इस बार अपनी पूरी गृहस्थी को लेकर आओ। हम अनन्या और आरव का मुंह देखने को तरस गए थे। लेकिन राघव हर बार सिर झुकाकर यही कहता था कि मीरा पुराने खयालों की है, वह कविता के विला में आने से सख्त नफरत करती है। वह कहता था कि मीरा नहीं चाहती कि उसके बच्चे रिया की परछाईं भी छुएं। वह कहता था कि अगर हमने मीरा पर दबाव डाला तो वह घर में कलह कर देगी और बच्चों को लेकर मायके चली जाएगी। उसने हमसे कहा था कि मीरा हमें फूटी आंख नहीं सुहाती!”

मेरे पैरों के नीचे से मानों पूरी कायनात खिसक गई। मेरे हाथ और पैर बर्फ की तरह ठंडे पड़ गए। मेरा पूरा शरीर सुन्न हो गया।

ग्यारह साल! पूरे ग्यारह लंबे साल!

जिस व्यक्ति को मैंने अपना सर्वस्व माना था, जिसके एक इशारे पर मैंने अपने मायके और अपनी सामाजिक दुनिया को सीमित कर लिया था, वह दोनों तरफ झूठ का एक ऐसा विशाल और घिनौना जाल बुन रहा था जिसकी कल्पना भी कोई सामान्य इंसान नहीं कर सकता था। उसने अपने माता-पिता के सामने मुझे एक घमंडी, ईर्ष्यालु और नफरत से भरी औरत बनाकर पेश किया था, और मेरे सामने अपने माता-पिता को एक संकीर्ण और कठोर परिवार के रूप में चित्रित किया था जिसने मुझे कभी स्वीकार नहीं किया।

मेरी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। मैंने बहुत मुश्किल से अपनी आवाज़ को संभाला और कहा, “मम्मीजी… जब अनन्या केवल चार साल की थी, तो वह समुद्र देखने की उम्मीद में अपनी खिलौने वाली बाल्टी अपने सीने से लगाकर सोया करती थी। आज वह पंद्रह साल की हो गई है, लेकिन उसका वह इंतज़ार कभी खत्म नहीं हुआ।”

फोन के उस पार से सासू माँ के बिलखने की आवाज़ गूँज उठी। उन्होंने रोते हुए कहा, “मीरा, मेरी बच्ची… मेरी आँखों पर कैसा पर्दा पड़ा था कि मैंने अपने ही बेटे के इस मक्कार चेहरे को नहीं पहचाना! तुम्हारे बाबूजी यहाँ पास खड़े होकर सब सुन रहे हैं और उनकी आँखों से आंसू नहीं रुक रहे हैं। तुम इसी वक्त अगली फ्लाइट का टिकट लो और दोनों बच्चों को लेकर यहाँ गोवा आओ। अभी इसी वक्त! यह तमाशा, यह झूठ और यह फरेब अब और नहीं चलेगा। इसका फैसला आज इस पूरे खानदान के सामने, इस भरे विला में होगा!”

फोन कट गया।

अनन्या और आरव दोनों मेरी तरफ देख रहे थे। अनन्या ने आगे बढ़कर मेरे कांपते हाथों को थामा और पूछा, “मम्मा, दादी ने क्या कहा? क्या दादी भी हमसे नफरत करती हैं?”

मैंने अपनी बेटी के आंसुओं को पोंछते हुए अपने दोनों बच्चों को अपने गले से लगा लिया। “नहीं मेरी बच्ची। तुम्हारी दादी और दादाजी कभी तुमसे नफरत नहीं करते थे। वे तो ग्यारह सालों से यह सोचते रहे कि हम उनसे नफरत करते हैं।”

आरव ने मासूमियत से सिर उठाकर कहा, “लेकिन मम्मा, हम तो हमेशा उनसे मिलना चाहते थे। हमने तो कभी किसी से नफरत नहीं की।”

अनन्या ने अपने चेहरे से आंसुओं को पूरी ताकत से पोंछा। उसकी आँखों में अब वह बेबसी नहीं थी जो थोड़ी देर पहले थी। अब वहाँ एक अजीब सा ठहराव और आत्मसम्मान की एक नई ज्वाला जल रही थी। उसने कहा, “मम्मा, अब मुझे समुद्र की लहरें नहीं देखनीं। मुझे कोई पिकनिक नहीं मनानी। मुझे बस अपने पिता की आँखों में आँखें डालकर यह पूछना है कि उन्होंने हमारे साथ ऐसा क्यों किया।”

मैंने बिना एक पल गंवाए अपने फोन से उसी शाम की दिल्ली से गोवा की तीन एयर टिकट्स बुक कीं।

मैंने अपने कमरे की अलमारी खोली ताकि कुछ जरूरी कपड़े सूटकेस में रख सकूँ। अलमारी के सबसे ऊपरी रैक से जब मैंने एक पुराना बैग खींचा, तो उसके पीछे से एक धूल भरी चीज़ फिसलकर सीधे फर्श पर आ गिरी।

फर्श पर हल्की सी खनक के साथ वह चीज़ लुढ़कती हुई अनन्या के पैरों के पास जाकर रुक गई।

वह वही छोटी सी, बैंगनी रंग की प्लास्टिक की बाल्टी और उसका छोटा सा चम्मच था, जो ग्यारह साल पहले एक चार साल की नन्ही बच्ची के सुनहरे सपनों का प्रतीक हुआ करता था।

अनन्या ने झुककर उस बाल्टी को उठाया। उसने अपनी उंगलियों से उस पर जमी बरसों की धूल को साफ़ किया और उसे अपने सीने से कसकर चिपका लिया। उसकी आँखों में एक बार फिर आंसू भर आए, “मम्मा… आपने इसे ग्यारह सालों से फेंकने के बजाय सँभालकर रखा था?”

मैंने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हाँ अनन्या। शायद मेरे दिल के किसी कोने में भी यह उम्मीद बाकी थी कि किसी न किसी दिन तुम्हारे पिता का वह झूठा वादा सच साबित होगा। लेकिन अब वह भरम टूट चुका है।”

अनन्या ने उस बाल्टी को अपने छोटे ट्रैवल बैग के भीतर रखते हुए बहुत दृढ़ आवाज़ में कहा, “मैं इसे अपने साथ गोवा ले जाऊँगी। पापा को याद दिलाना जरूरी है कि एक वादा ग्यारह साल तक किसी मासूम के सीने में कैसे दफ़न रहता है।”

मैंने राघव को कोई संदेश नहीं भेजा, न ही कोई फोन किया।

उस शाम जब हमारी फ्लाइट ने दिल्ली के रनवे से उड़ान भरी, तो मेरे मन में किसी तरह का डर या घबराहट नहीं थी। ग्यारह सालों तक जिस अपमान और अकेलेपन को मैंने अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया था, वह अब खत्म होने वाला था। उस शाम हम तीनों उस तस्वीर का हिस्सा बनने जा रहे थे जिससे हमें ग्यारह साल पहले बड़ी चालाकी से मिटा दिया गया था।

रात के करीब साढ़े नौ बजे हमारी टैक्सी गोवा के उस आलीशान, पुश्तैनी विला के बड़े लोहे के मुख्य द्वार पर जाकर रुकी।

विला के चारों तरफ नारियल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ हवा में लहरा रहे थे और दूर से समुद्र की लहरों के टकराने की तेज़ आवाज़ आ रही थी। विला की विशाल बालकनी और बगीचे में रंग-बिरंगी रोशनियां जल रही थीं। पूरे लॉन में धीमी आवाज़ में संगीत बज रहा था और परिवार के सभी लोग रात के भोजन के लिए एक बड़ी गोल मेज के चारों तरफ जमा थे।

हंसी-मजाक और कहकहों की आवाज़ें बाहर तक आ रही थीं। राघव हाथ में जूस का ग्लास लिए अपने भाइयों और जीजाजी के साथ किसी बात पर ज़ोर-ज़ोर से हंस रहा था। कविता अपनी सास के पास बैठी कुछ बात कर रही थी और रिया अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ खेल रही थी।

मैंने अनन्या और आरव का हाथ थामा और विला के मुख्य प्रवेश द्वार की सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया।

जैसे ही हमारे कदमों की आहट और मेरे जूतों की खनक उस संगमरमर के बरामदे में गूँजी, सबसे पहले राघव के छोटे भाई विकास की नज़र हम पर पड़ी। उसके हाथ से पानी का ग्लास लगभग छूटते-छूटते बचा। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं, “भाभी… आप? यहाँ?”

विकास की आवाज़ सुनते ही पूरे लॉन का संगीत जैसे किसी ने एक झटके में बंद कर दिया हो। हंसी-ठहाके एकदम से थम गए। मेज पर बैठे सभी लोगों की नज़रें घूमकर मुख्य द्वार की तरफ टिक गईं।

राघव के चेहरे का रंग पलक झपकत ही ऐसे उड़ गया मानो उसने कोई साक्षात भूत देख लिया हो। उसके हाथ का ग्लास कांपने लगा और उसके होठों की रंगत पूरी तरह सफेद पड़ गई। उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमकने लगीं।

वह लड़खड़ाती आवाज़ में बोला, “मीरा? तुम… तुम यहाँ इस वक्त… बच्चों को लेकर कैसे?”

इससे पहले कि मैं या राघव कुछ और कह पाते, भोजन की मेज की मुख्य कुर्सी से ससुर पंडित बद्रीनाथ जी अपनी लाठी का सहारा लेकर उठे। उनके चेहरे पर वह सौम्यता नहीं थी जिसके लिए वह जाने जाते थे, बल्कि उनकी आँखों में एक ऐसा गहरा क्रोध और आक्रोश था जो मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था।

उनके पीछे-पीछे सासू माँ सावित्री देवी भी उठीं। उनकी आँखों के किनारे रोने की वजह से पूरी तरह लाल थे।

सासू माँ आगे बढ़ीं और उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए सीधे राघव के सामने जाकर अपनी कांपती हुई उंगली उसकी तरफ उठाई। उनकी आवाज़ पूरे विला के सन्नाटे को चीरती हुई गूँज उठी, “राघव! आज अपनी इन आँखों से देख अपनी इस गृहस्थी को! आज पूरे परिवार को बता कि तूने ग्यारह साल तक हम बूढ़े माँ-बाप से और अपनी इस निर्दोष पत्नी से कौन सा घिनौना खेल खेला है!”

राघव बुरी तरह घबरा गया। उसने इधर-उधर देखते हुए बात को दबाने की कोशिश की, “माँ… आप क्या कह रही हैं? यह पारिवारिक मामला है, इसे अंदर चलकर कमरे में आराम से बात करते हैं। सब लोग देख रहे हैं…”

“नहीं!” ससुर जी की भारी आवाज़ किसी बिजली की तरह कड़की। उन्होंने अपनी लाठी ज़मीन पर ज़ोर से पटकी। “आज कोई बात बंद कमरे में नहीं होगी! आज ग्यारह साल का हिसाब इसी खुले लॉन में, इस पूरे खानदान के सामने होगा!”

कविता अपनी जगह से उठकर आगे आई और हैरान होकर बोली, “अंकल जी, आंटी जी, आखिर हुआ क्या है? आप राघव पर इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं?”

सासू माँ ने मुड़कर कविता की तरफ देखा, “कविता, तू भी सुन और यह पूरा परिवार भी सुने। हम ग्यारह साल से इस मुगालते में जी रहे थे कि मीरा घमंडी है, मीरा हमसे नफरत करती है, मीरा नहीं चाहती कि उसके बच्चे अपने इस परिवार से मिलें। और दूसरी तरफ यह हमारा बेटा, अपनी उस भोली पत्नी से यह कहता रहा कि उसका यह ससुराल, उसके यह सास-ससुर इतने पत्थर दिल हैं कि वे उसे और उसके बच्चों को कभी अपने घर में देखना नहीं चाहते!”

यह सुनते ही पूरे परिवार में एक गहरा सन्नाटा और कानाफूसी फैल गई। देवरानियों और ननद के चेहरे पर गहरा सदमा साफ़ दिखाई देने लगा।

विकास ने आगे आकर राघव का कॉलर लगभग पकड़ते हुए कहा, “भैया! क्या यह सच है? हम हर साल आपसे पूछते थे कि भाभी और बच्चे क्यों नहीं आते, और आप हमेशा कहते थे कि मीरा भाभी को हमारे गाँव और हमारे पुश्तैनी तौर-तरीकों से घिन आती है! क्या आप हम सबसे इतना बड़ा झूठ बोलते रहे?”

राघव की नज़रें पूरी तरह ज़मीन में गड़ चुकी थीं। उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था। उसका वह शातिर और आत्मविश्वास से भरा चेहरा अब एक बेनकाब मुजरिम की तरह थर-थर कांप रहा था।

उसने हताशा में मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में गिड़गिड़ाया, “मीरा… मेरी बात सुनो। मैंने यह सब सिर्फ… सिर्फ परिवार में शांति बनाए रखने के लिए किया था। मैं नहीं चाहता था कि कविता और तुम्हारे बीच कोई तनाव हो, मैं नहीं चाहता था कि रिया और बाकी बच्चों के बीच कोई तुलना हो…”

“शांति बनाए रखने के लिए?” मैं आगे बढ़ी और सीधे राघव के सामने जाकर खड़ी हो गई। मेरी आँखों में अब आंसू नहीं थे, केवल एक ऐसा स्वाभिमान था जो ग्यारह साल के दमन के बाद आज पूरी तरह आज़ाद हो चुका था।

मैंने कहा, “राघव, तुमने शांति नहीं बनाई, तुमने एक जीता-जागता झूठ का साम्राज्य खड़ा किया था। तुमने मुझे एक ऐसी औरत बना दिया जो अपने ही ससुराल वालों की दुश्मन थी, और अपने बूढ़े माता-पिता को मेरे बच्चों की नज़रों में एक जालिम बना दिया। तुमने अपनी सुविधा, अपने आराम और अपने दोनों तरफ के झूठे ढोंग को बनाए रखने के लिए अपने ही बच्चों के बचपन की बलि चढ़ा दी!”

तभी पंद्रह साल की अनन्या अपने छोटे बैग से उस धूल भरी बैंगनी प्लास्टिक की बाल्टी को निकालते हुए आगे बढ़ी।

उसने उस छोटी सी बाल्टी को ले जाकर राघव के पैरों के ठीक सामने ज़मीन पर रख दिया।

उस नन्ही बाल्टी की आवाज़ संगमरमर के फर्श पर बहुत गूँजी। अनन्या ने अपने पिता की आँखों में सीधे देखते हुए, बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, “पापा, जब मैं चार साल की थी, तब आपने मुझसे कहा था कि अगली बार आप मुझे समुद्र दिखाएँगे और रेत का किला बनाना सिखाएंगे। मैं ग्यारह साल तक हर रात यह सोचकर सोती रही कि शायद मुझमें ही कोई कमी है, शायद मैं ही इतनी बुरी बेटी हूँ कि मेरे दादा-दादी और मेरे पिता मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहते। आज ग्यारह साल बाद मैं खुद यहाँ समुद्र देखने आई हूँ, लेकिन आपके साथ नहीं, अपने आत्मसम्मान के साथ।”

अनन्या के इन शब्दों ने वहाँ खड़े हर इंसान के कलेजे को छलनी कर दिया।

ससुर जी अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रखकर सोफे पर बैठ गए और बच्चों की तरह रोने लगे। रिया, जो अब तक खामोश खड़ी थी, दौड़कर आई और उसने अनन्या और आरव को अपने गले से लगा लिया। उस बच्ची की आँखों से भी आंसू बह रहे थे, “अनन्या… आरव… मुझे सच में कभी नहीं पता था कि पापा ने तुम्हारे साथ ऐसा किया है। मुझे हमेशा बताया गया कि तुम लोग अपनी नानी के घर जाना पसंद करते हो।”

सासू माँ आगे बढ़ीं। उन्होंने अनन्या और आरव को अपने आंचल में समेट लिया और उनके माथे को चूमते हुए रो पड़ीं, “मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों… मुझे माफ़ कर दो मीरा। हम अपने ही खून की पहचान नहीं कर सके और इस मक्कार के झूठ को सच मानते रहे।”

राघव ने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छूने की कोशिश की, “बाबूजी… मुझे एक बार अपनी बात समझाने का मौका दीजिए…”

ससुर पंडित बद्रीनाथ जी ने अपनी लाठी से उसका हाथ झटक दिया। उनकी आवाज़ में एक अंतिम फैसला था, “दूर हट जा मेरी नज़रों से राघव! जिस बेटे ने अपने स्वार्थ और झूठी शान के लिए अपने ही परिवार के दो टुकड़े कर दिए, अपनी पत्नी का मान मर्दन किया और अपने मासूम बच्चों के दिलों में ज़हर और हीनभावना भरने की कोशिश की, वह इस कुल की परंपरा और इस चौखट का वारिस कहलाने के लायक नहीं है। आज इसी वक्त तू अपना सामान बांध और इस विला से बाहर निकल जा। हमारे लिए इस विला के दरवाज़े मीरा और इन बच्चों के लिए खुले हैं, तेरे जैसे धोखेबाज़ के लिए नहीं!”

राघव ने मुड़कर अपनी बहनों, भाइयों और कविता की तरफ देखा, लेकिन हर किसी ने अपनी नज़रें फेर ली थीं। उस भरे-पूरे विला में, जहाँ थोड़ी देर पहले वह केंद्रबिंदु बना हुआ था, अब वह पूरी तरह अकेला, बेसहारा और तिरस्कृत खड़ा था।

उस रात राघव अपना वही नीला सूटकेस घसीटते हुए, उस विला के मुख्य द्वार से अकेला बाहर निकल गया।

अगली सुबह जब सूरज की पहली सुनहरी किरणें गोवा के उस नीले समुद्र के पानी पर चमकीं, तो मैं, अनन्या, आरव, सासू माँ और ससुर जी समुद्र किनारे खड़े थे। अनन्या और आरव उस गीली रेत पर बैठे थे, उनके हाथों में वही पुरानी बैंगनी बाल्टी थी और वे अपने दादा-दादी और अपनी बड़ी बहन रिया के साथ मिलकर रेत का एक विशाल और अटूट किला बना रहे थे।

ग्यारह साल के लंबे और घुटन भरे अंधेरे के बाद, आज पहली बार मेरे बच्चों के चेहरे पर वह सच्ची, बेपरवाह और गरिमामयी मुस्कान खिली थी, जिसे कोई झूठी परंपरा या फरेब अब कभी नहीं छीन सकता था।

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