15 साल तक खून-पसीना बहाकर परिवार को पालने वाली बेटी को जब अपनों ने ही नौकरानी बना दिया, तब दीवाली की रात मिले एक पुराने गुप्त दस्तावेज़ ने खोली लालची बाप-बेटे की खौफनाक साजिश और बदल दी पूरी तकदीर!
दीवाली की उस जगमगाती, शोरगुल भरी रात जब पूरा मोहल्ला आतिशबाजी की रोशनी में नहाया हुआ था, मेरे हाथ से उबलती हुई खीर का भारी पीतल का पतीला छूटकर फर्श पर गिर गया। खौलता हुआ गाढ़ा दूध, मेवे और चीनी के गरम छींटे मेरी दाईं कलाई और दोनों पैरों पर फैल गए। चमड़ी पर असहनीय जलन की तेज लहर उठी, लेकिन मेरे दिल में जो दर्द उस वक्त उठा, वह जिस्मानी जलन से कहीं ज्यादा गहरा, तीखा और जानलेवा था। बर्तन के संगमरमर के फर्श से टकराने की जोरदार गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि मेरी मां, सरिता शर्मा, तेजी से रसोई की चौखट पर आ खड़ी हुईं। उनके चेहरे पर किसी अनहोनी या चोट की चिंता का एक कतरा भी नहीं था। उनकी नजरें सिर्फ बिखरी हुई खीर, जले हुए मेवों और गंदे फर्श पर टिकी थीं।
माथे पर गहरी त्योरियां चढ़ाते हुए वे चीख पड़ीं, “नेहा! यह क्या अनर्थ कर दिया? बाहर ड्रॉइंग रूम में सारे खास रिश्तेदार बैठ चुके हैं, मेज पर खाना लगाने का वक्त हो गया और तूने यहां पूरा सत्यानाश कर दिया? अभी तक तूने एक थाली भी बाहर नहीं भेजी!” उन्होंने एक पल के लिए भी यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि खौलते दूध से मेरी कलाई लाल होकर सूजने लगी थी और पैर की उंगलियां दर्द से कांप रही थीं। मेरे आंसुओं को उन्होंने पूरी तरह अनदेखा कर दिया। मैंने बिना एक लफ्ज कहे, अपने आंचल से आंखें पोंछीं और उस तपते हुए फर्श पर घुटनों के बल बैठकर कपड़ा फेरना शुरू किया।

पिछले पंद्रह सालों से मेरे वजूद की यही तो असलियत थी। जब मैं सिर्फ उन्नीस साल की थी, तब मेरे पिता राजेश शर्मा का छोटा सा थोक का कारोबार पूरी तरह डूब गया था। रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया था, बैंक का कर्ज दरवाजे पर खड़ा था और घर में चूल्हा जलना मुश्किल हो गया था। उस नाजुक मोड़ पर मैं अपनी पढ़ाई और सपनों की तिलांजलि देकर एक कॉल सेंटर में रात की शिफ्ट में काम करने लगी। दिन में ट्यूशन पढ़ाती, रात को नौकरी करती और सुबह घर आकर झाड़ू-पोंछे से लेकर खाना बनाने तक का सारा काम अकेले संभालती। पंद्रह साल तक मेरी रीढ़ की हड्डी टूटती रही, लेकिन मैंने अपने पिता का कर्ज चुकाया, घर का किराया दिया और अपने छोटे भाई चिराग की महंगी से महंगी प्राइवेट कॉलेज की इंजीनियरिंग की फीस भरी।
ड्रॉइंग रूम से मेरे पिता राजेश शर्मा के ठहाके और गर्व भरी बातें लगातार गूंज रही थीं। वे अपने साले, बहनों और समधियों के सामने अपनी छाती चौड़ी करके कह रहे थे, “अरे भाई, चिराग जैसा बेटा तो भगवान बड़े नसीब वालों को देता है! पूरे नोएडा की सबसे बड़ी रियल एस्टेट फर्म में सीनियर प्रोजेक्ट हेड बन गया है मेरा शेर। पिछले महीने ही कंपनी ने उसे शानदार प्रमोशन दिया है।”
चिराग मखमली सोफे पर पैर पर पैर चढ़ाए बैठा मुस्कुरा रहा था। उसके गले में दो तोले की भारी सोने की चेन चमक रही थी, हाथ में लाखों की ब्रांडेड घड़ी थी और दरवाजे के ठीक बाहर उसकी नई पच्चीस लाख की चमचमाती एसयूवी खड़ी थी। दो घंटे पहले जब चिराग ने उस गाड़ी से घर के आंगन में कदम रखा था, तो घर का माहौल किसी त्योहार से भी बड़ा हो गया था। मां ने चांदी की थाली सजाकर, घी का दीपक जलाकर उसकी आरती उतारी थी और उसके माथे पर कुमकुम का तिलक लगाया था। पिता ने उसे सीने से ऐसे चिपका लिया था मानो सारा जहान जीत लिया हो।
मेरी मौसी अनुराधा अपने पति के साथ बैठी मीठी आवाज में कह रही थीं, “भाई साहब, चिराग के संस्कार ही ऐसे हैं। आज के जमाने में ऐसा बेटा कहां मिलता है जो कुल का नाम रोशन कर दे!”
मैं रसोई के धुएं और गरम भाप के बीच अकेली खड़ी यह सब सुन रही थी। पिछले छह दिनों से दीवाली की सफाई, पुताई, सजावट, पर्दों की धुलाई और बाजार से तीस-तीस किलो राशन की बोरियां ढोकर लाने का सारा काम मैंने अकेले अपने दम पर किया था। सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के दो बजे तक मेरे हाथ-पैर मशीन की तरह चलते रहे। चिराग की पसंद के शाही पनीर, दम आलू, कचौड़ियां और गुलाब जामुन बनाने में मेरी उंगलियां कट गईं, लेकिन पूरे घर में किसी एक इंसान ने भी मुझसे यह नहीं पूछा, “नेहा, तूने सुबह से एक घूंट पानी पिया या नहीं?”
जब मैंने अपने जले हुए हाथों से भारी पीतल की बड़ी थाली संभाली और ड्रॉइंग रूम की डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ी, तो देखा कि पूरा परिवार पहले से ही कुर्सियों पर विराजमान था। पिता, मां, चिराग, मौसी, मौसाजी और चिराग की होने वाली मंगेतर के रिश्तेदार। डाइनिंग टेबल के चारों तरफ ठीक छह कुर्सियां करीने से लगाई गई थीं। उस सजी-धजती मेज पर मेरे बैठने के लिए कोई जगह नहीं थी। मेरे लिए हमेशा की तरह रसोई का फर्श और बचा-खुचा ठंडा खाना ही तय था।
मैंने भारी मन से खान-पान के बर्तन मेज पर सजाए। मां ने मेरी तरफ एक बार भी देखे बिना, बेहद रूखे स्वर में आदेश दिया, “नेहा, चिराग के लिए तुरंत फ्रिज से मटके वाला ठंडा पानी निकाल कर ला। उसे ज्यादा मसालेदार खाने के बाद ठंडा पानी चाहिए होता है। और हां, पूरियां एकदम गरमा-गरम उतरनी चाहिए, ठंडी पूरियां वह हाथ भी नहीं लगाता।”
सालों से मैं इस तरह के हर हुक्म पर अपनी नजरें झुका लेती थी, अपनी आत्मा को मारकर ‘जी मां’ कहती और अंदर भाग जाती थी। मैंने सोचा था कि मेरी यह खामोशी, यह बेमिसाल त्याग कभी न कभी इनके पत्थर दिलों को पिघला देगा। मुझे लगा था कि वे समझेंगे कि यह घर मेरी जवानी के पंद्रह सालों के खून-पसीने पर खड़ा है। लेकिन उस रात, जलती हुई कलाई के दर्द और उनकी आंखों में अपने लिए सिर्फ एक मुफ्त की नौकरानी का भाव देखकर मेरे भीतर सदियों से दबी हुई आत्मसम्मान की चिंगारी अचानक एक प्रचंड ज्वाला बन गई।
मेरी बर्दाश्त की सारी सीमाएं एक झटके में टूट गईं। मैंने अपने कांपते हाथों को सीधा किया, अपनी रीढ़ सीधी की और पूरी मजबूती से कहा,
“नहीं।”
वह एक छोटा सा शब्द कमरे के शोर में किसी बम के फटने जैसा गूंजा। पूरा कमरा एक पल में बिल्कुल खामोश हो गया। आतिशबाजी का बाहरी शोर भी जैसे उस सन्नाटे को नहीं चीर पा रहा था। चिराग ने अपने आईफोन से नजरें उठाकर मुझे घूरा। मौसाजी के हाथ का निवाला हवा में रुक गया।
पिता राजेश शर्मा का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने अपनी त्योरियां सिकोड़ते हुए कड़क आवाज में कहा, “यह क्या बदतमीजी है नेहा? मेहमानों के सामने यह क्या बकवास कर रही हो तुम?”
मैंने अपनी पलकें नहीं झपकाईं। पंद्रह सालों में पहली बार मैंने सीधे अपने पिता की आंखों में आंखें डालकर देखा। मेरी आवाज में अब कोई थरथराहट नहीं थी, “मैंने कहा, मैं अब पानी लेने नहीं जाऊंगी। जिसे जो चाहिए, वह खुद उठकर ले ले।”
पिता की आवाज भारी और हिंसक हो उठी, “तुम्हारा दिमाग ठिकाने पर है? चिराग दूर से लंबा सफर तय करके आया है, ऑफिस के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट संभालकर थका-हारा घर लौटा है। उसका ख्याल रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है!”

मैंने अपनी जली हुई कलाई उनके ठीक सामने कर दी, जिस पर लाल छाले उभर आए थे। मेरी आवाज पूरे हॉल में गूंजने लगी, “वह एसी गाड़ी की पिछली सीट पर पैर फैलाकर बैठा हुआ आया है बाबूजी! और मैं… मैं पिछले छह दिनों से लगातार अठारह-अठारह घंटे अपने पैरों पर खड़ी हूं। इस घर की एक-एक दीवार, एक-एक बर्तन और इस मेज पर रखे हर एक निवाले में मेरी कमाई और मेरी हड्डियों का चूरा लगा हुआ है। क्या मेरी थकान थकान नहीं है? क्या मेरा यह जला हुआ बदन सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर दिया जाएगा क्योंकि मैं एक बेटी हूं?”
मां ने हड़बड़ाकर मेरी बांह पकड़ने की कोशिश की और दांत पीसते हुए फुसफुसाईं, “चुप कर नेहा! रिश्तेदारों के सामने पूरे खानदान का तमाशा मत बना। शर्म नहीं आती तुझे अपनी ही मां और बाप से जुबान लड़ाते हुए?”
मैंने अपनी बांह उनके हाथ से छुड़ा ली। मैंने दीवार के कोने में रखी एक खाली लकड़ी की कुर्सी खींची, उसे चिराग और पिता के बीच जबरन जगह बनाकर लगाया और पूरे हक से सबके बीच बैठ गई। पंद्रह सालों में पहली बार मैं उस मेज पर एक बेबस नौकरानी की तरह नहीं, बल्कि उस घर की सबसे बड़ी हिस्सेदार की तरह बराबरी से बैठी थी। मैंने अपनी थाली में खाना परोसा और कहा, “अगर इस घर में किसी को शर्म आनी चाहिए, तो वह आप लोगों को आनी चाहिए, जिन्होंने अपनी उस बेटी को बेगार मजदूर बना दिया जिसने अपनी पूरी जिंदगी आपके कर्ज चुकाने में होम कर दी।”
उस रात की कड़वाहट के बाद खाना तो किसी तरह खत्म हुआ, लेकिन रिश्तों की बची-खुची दीवारें भी दरक चुकी थीं। रात के ग्यारह बज रहे थे। रिश्तेदार जाने की तैयारी में थे। तभी मौसी अनुराधा की नजर आंगन के कोने में रखे उस पुराने, नक्काशीदार सागौन की लकड़ी के झूले पर पड़ी। वह झूला कोई साधारण फर्नीचर नहीं था। वह शुद्ध शीशम और सागौन की नक्काशीदार लकड़ी से बना एक बेहद कीमती और खानदानी झूला था, जिस पर बारीक पीतल के नट-बोल्ट और सुंदर मोर की आकृतियां उकेरी गई थीं।
मौसी ने मुस्कुराते हुए पिता से कहा, “अरे राजेश भैया, यह पुराना सागौन का झूला तो यहां धूल खा रहा है। चिराग ने नोएडा के पॉश इलाके में जो नया चार करोड़ का शानदार पेंटहाउस लिया है, उसकी बालकनी में यह झूला तो बिल्कुल रजवाड़ी ठाठ देगा। आप इसे चिराग को क्यों नहीं दे देते?”
वह झूला सुनते ही मेरे दिल में एक टीस उठी। वह झूला मेरी स्वर्गीय दादी, कल्याणी देवी का था। जब पूरा परिवार चिराग के जन्म पर जश्न मना रहा था और मेरे जन्म पर मातम छा गया था, तब सिर्फ मेरी दादी ने मुझे अपनी छाती से लगाया था। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दस साल उसी झूले पर बैठकर बिताए थे और अपनी मृत्यु से ठीक पहले उन्होंने कांपते हाथों से मेरा सिर सहलाते हुए कहा था, “नेहा बिटिया, इस मतलबी घर में कोई तेरा मोल नहीं समझेगा, लेकिन यह झूला सिर्फ तेरा है। इसमें मेरी दुआएं और मेरा आशीर्वाद बसा है।”
दो साल पहले जब मैंने अपनी पाई-पाई बचाकर, अपनी मेहनत की कमाई और बैंक से कड़ा होम लोन लेकर शहर के बाहरी इलाके में एक छोटा सा 1 BHK फ्लैट खरीदा था ताकि कभी सिर छुपाने की अपनी छत हो, तब मैंने पिता से हाथ जोड़कर विनती की थी कि मैं दादी का वह झूला अपने उस छोटे फ्लैट में ले जाना चाहती हूं। उस वक्त पिता ने मुझे बुरी तरह दुत्कारा था और कहा था, “लड़की होकर अलग रहने का ढोंग रच रही हो? अपनी औकात में रहो। यह खानदानी सामान इस घर की शान है, इसे किसी छोटे से दड़बे में ले जाने की इजाजत नहीं मिलेगी।”
और आज, वही झूला चिराग के नए बंगले की शोभा बढ़ाने के लिए खैरात में दिया जा रहा था!
मैंने तुरंत अपनी कुर्सी से उठते हुए सख्त आवाज में कहा, “वह झूला दादी ने मुझे अपनी आखिरी सांसों में सौंपा था। उस पर किसी और का कोई हक नहीं है। उसे इस घर से कोई नहीं ले जाएगा।”
पिता राजेश शर्मा ने अपनी मुट्ठी मेज पर जोर से पटकी। उनकी आंखों में पितृसत्तात्मक अहंकार और नफरत साफ झलक रही थी, “चिराग इस खानदान का इकलौता वारिस है! उसका बंगला बहुत बड़ा है और वह इस परिवार की असली इज्जत है। वहां उस झूले की सही कद्र होगी। एक शादीशुदा होने की उम्र पार कर चुकी, जिद्दी लड़की हमें यह नहीं सिखाएगी कि घर की चीजें किसे देनी हैं। इस पर कोई और बहस नहीं होगी!”
चिराग ने भी तिरस्कार भरी मुस्कान के साथ कहा, “दीदी, इतना ड्रामा करने की जरूरत नहीं है। आपकी उस छोटी सी झुग्गी जैसे फ्लैट में यह झूला समाएगा भी नहीं। मेरे पेंटहाउस के लिविंग एरिया में यह लाखों की विंटेज लुक देगा। मैं कल ही मूवर्स एंड पैकर्स को भेजकर इसे उठवा लूंगा।”
मैंने उन दोनों के चेहरों को देखा। वहां रिश्तों की कोई पवित्रता नहीं बची थी, सिर्फ दौलत, बेटे का अंधा मोह और लालच था। मैंने एक शब्द भी और बोलना अपनी तौहीन समझा। मैंने अपने आंसुओं को अपनी आंखों में ही सुखा लिया, अपना पर्स उठाया और आधी रात को उस अंधेरी सड़क पर अपने छोटे से फ्लैट की तरफ पैदल ही निकल पड़ी।
उस रात मुझे लगा कि शायद अब इस जहरीले परिवार से मेरा हर रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो गया। मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब कभी उस चौखट पर कदम नहीं रखूंगी। अपने छोटे से फ्लैट में आकर मैंने राहत की सांस ली और अपनी जिंदगी को नए सिरे से जीने की ठान ली।
लेकिन यह शांति ज्यादा दिन नहीं टिकने वाली थी।
ठीक दो हफ्ते बाद, दिसंबर के आखिरी हफ्ते में, मेरी मां का फोन मेरे मोबाइल पर घनघनाने लगा। मैंने कई बार काटा, लेकिन जब लगातार कॉल आते रहे तो मैंने भारी मन से फोन उठाया।
फोन उठाते ही बिना किसी हाल-चाल के मां की वही अधिकार जताने वाली तीखी आवाज सुनाई दी, “नेहा, सुन! इकत्तीस दिसंबर को चिराग के नए आलीशान पेंटहाउस की बहुत बड़ी गृह-प्रवेश पूजा और पार्टी रखी गई है। शहर के बड़े-बड़े बिल्डर्स, चिराग के अफसर दोस्त और हमारे खानदान के कम से कम पचास वीआईपी मेहमान आ रहे हैं। कैटरिंग वाले बहुत घटिया खाना बनाते हैं। पूजा का पूरा सात्विक भोजन, पचास लोगों की मिठाइयां और शाम का सारा इंतजाम तुझे ही संभालना है। तीस की सुबह ही वहां पहुंच जाना और सारा मोर्चा संभाल लेना।”
उनकी यह बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। जिस मां को दीवाली पर मेरी जली हुई कलाई नहीं दिखी थी, जिस परिवार ने मुझे मेज से बेदखल कर दिया था, वे आज भी पचास रईस मेहमानों के सामने मुझे सिर्फ एक मुफ्त की रसोइया बनाकर पेश करना चाहते थे ताकि उनका बेटा अपने दोस्तों के सामने अपनी रईसी का दिखावा कर सके!
मैंने फोन को अपने कान से थोड़ा दूर किया, एक गहरी सांस ली और बेहद ठंडी, शांत लेकिन चट्टान जैसी मजबूत आवाज में कहा,
“मां, मैं नहीं आऊंगी।”
फोन के उस पार जैसे सन्नाटे का पहाड़ टूट पड़ा। मां की सांसें तेज हो गईं, “क्या मतलब नहीं आएगी? तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया? तेरे सगे भाई के इतने बड़े दिन पर तू नखरे दिखाएगी? रिश्तेदार क्या कहेंगे कि बहन अपने भाई की तरक्की से जलती है?”
मैंने बिना अपनी आवाज ऊंची किए कहा, “मतलब बिल्कुल साफ है मां। जिस रिश्ते में मेरे वजूद की कीमत सिर्फ एक बिना वेतन वाली नौकरानी की है, जहां मेरी पंद्रह साल की तपस्या का इनाम सिर्फ जिल्लत और बेरुखी है, उस रिश्ते का बोझ अब मैं अपनी पीठ पर नहीं ढो सकती। चिराग लाखों कमाता है, अपने मेहमानों के लिए फाइव स्टार होटल से शेफ बुलाए। मैं अब आपके हुक्मों की गुलाम नहीं हूं।”
इससे पहले कि मां कोई नई गाली या ताना दे पातीं, मैंने फोन काट दिया और उनका नंबर ब्लॉक लिस्ट में डाल दिया। उस पल मुझे अपने सीने पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतरता हुआ महसूस हुआ।
लेकिन असली तूफान तो अभी आना बाकी था।
अगली ही सुबह, जब मैं अपने फ्लैट की बालकनी में चाय का कप लेकर बैठी थी, मेरे फोन पर मेरी छोटी चाची, सुमित्रा का फोन आया। चाची पूरे परिवार में अकेली ऐसी महिला थीं जो मेरे साथ हुए जुल्मों को समझती थीं, लेकिन अपने पति और मेरे पिता के दबदबे के कारण हमेशा चुप रहने पर मजबूर थीं। उनकी आवाज में इस वक्त गहरी घबराहट और एक अजीब सी बेचैनी थी।
“नेहा… बेटा, तू घर पर अकेली है ना? मेरी बात बहुत ध्यान से सुन,” चाची ने फुसफुसाते हुए कहा, मानो कोई उनके आसपास खड़ा सुन रहा हो।
“क्या हुआ चाची? आप इतनी डरी हुई क्यों हैं?” मैंने पूछा।
चाची की आवाज कांप रही थी, “नेहा, तेरे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है। तेरे पिता, चिराग और तेरे चाचा ने मिलकर तुझसे एक ऐसा खौफनाक सच छिपाया है जिसने तेरी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी। जिस पुश्तैनी हवेली और जमीन को बेचकर चिराग ने वह चार करोड़ का आलीशान पेंटहाउस और पच्चीस लाख की गाड़ी खरीदी है… उस जायदाद की वसीयत का सच वह नहीं है जो तुझे बताया गया था!”
मेरे हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा, “क्या मतलब चाची? पिता जी ने तो कहा था कि दादा जी और दादी जी ने सारी पुश्तैनी जमीन अपने दोनों बेटों के नाम कर दी थी, और चूंकि मैं बेटी हूं इसलिए कानूनन और सामाजिक रूप से मेरा उसमें कोई हिस्सा नहीं था। उसी हिस्से को बेचकर उन्होंने चिराग के नाम पर वह सब खरीदा!”
“यही तो सबसे बड़ा सफेद झूठ है नेहा!” चाची लगभग रो पड़ीं, “तेरी दादी कल्याणी देवी जानती थीं कि उनका बेटा राजेश और पोता चिराग कितने मतलबी और लालची हैं। वे जानती थीं कि तेरे पिता तुझे कभी कुछ नहीं देंगे। अपनी मौत से तीन महीने पहले, दादी ने अपने पुराने पारिवारिक वकील शर्मा जी को घर बुलाकर एक गुप्त और रजिस्टर्ड वसीयत तैयार करवाई थी। उस वसीयत के मुताबिक, पुश्तैनी हवेली और जमीन का अस्सी प्रतिशत हिस्सा सीधे तेरे नाम लिखा गया था, क्योंकि तूने पंद्रह साल तक उस खानदान का पेट पाला था! तेरे पिता और चिराग को सिर्फ दस-दस प्रतिशत का अधिकार था।”
मेरी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा, मेरा सिर चकरा गया। मैंने लड़खड़ाती आवाज में पूछा, “लेकिन… लेकिन अगर वसीयत मेरे नाम थी, तो उन्होंने वह करोड़ों की जमीन बेची कैसे? मेरे दस्तखत के बिना कोई रजिस्ट्री कैसे हो सकती थी?”
चाची ने जो खुलासा किया, उसने मेरे पैरों तले की जमीन पूरी तरह खींच ली।
“चार साल पहले, जब तेरे पिता ने तुझसे यह कहकर कई कोरे और कानूनी कागजातों पर दस्तखत करवाए थे कि वे बैंक के पुराने लोन को बंद करवा रहे हैं और तेरे नाम पर जो एजुकेशन लोन चिराग के लिए लिया गया था उसे क्लियर करवा रहे हैं… उन कागजों के बीच में उन्होंने पावर ऑफ अटॉर्नी के फर्जी दस्तावेज नत्थी किए थे! उन्होंने तेरे उन जाली और धोखे से लिए गए हस्ताक्षरों के दम पर बिल्डर के साथ मिलकर उस वसीयत को दबा दिया और करोड़ों की डील अपने और चिराग के नाम करवा ली।”
“और वह असली वसीयत… वह कहां है चाची?” मेरी रूह कांप उठी थी।
“वही तो मैं तुझे बताने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर फोन कर रही हूं नेहा!” चाची ने तेजी से कहा, “दादी की वह असली, रजिस्टर्ड वसीयत, जिसमें उन्होंने साफ लिखा था कि अगर उनके जाने के बाद कोई फर्जीवाड़ा हो तो यह वसीयत ही अंतिम सच मानी जाएगी… वह वसीयत और उस जमीन के असली लाल मुहर वाले मूल दस्तावेज दादी ने उस पुराने सागौन के झूले के अंदर बने एक बेहद गुप्त, छुपे हुए दराज में बंद किए थे! उस झूले की दाईं बाजू की नक्काशीदार मोर की आंख को जब अंदर की तरफ दबाया जाता है, तो नीचे की तख्ती में एक गुप्त लॉकर खुलता है। दादी ने उसकी एक पीतल की चाबी अपनी तांबे की पुरानी पूजा की पेटी में रखी थी।”
चाची ने सांस खींचते हुए आगे कहा, “चिराग और तेरे पिता को कल ही किसी पुराने मुंशी से यह भनक लग गई है कि दादी के असली कागजात उसी झूले में कहीं छिपे हैं। इसीलिए वे उस झूले को चिराग के पेंटहाउस में ले जाकर उसे तोड़कर वह दस्तावेज हमेशा के लिए जला देना चाहते हैं ताकि उनके इस फर्जीवाड़े का कोई सबूत कभी जिंदा न बचे! कल सुबह दस बजे मूवर्स वाले उस झूले को उठाने आ रहे हैं। अगर वे कागजात उनके हाथ लग गए, तो तू जिंदगी भर पाई-पाई के लिए मोहताज रहेगी और वे तेरे हक के करोड़ों पर ऐश करेंगे!”
चाची ने फोन काट दिया।
मैं अपने कमरे में जड़वत खड़ी रह गई। मेरे पंद्रह साल के त्याग, मेरी रातों की नींद, मेरे भूखे पेट, मेरी जली हुई कलाई और मेरी बेदाग निष्ठा के बदले मेरे अपने सगे पिता और भाई ने मुझे यह सिला दिया था? उन्होंने मुझे सिर्फ नौकरानी नहीं बनाया था, उन्होंने मुझे जिंदा लाश बना दिया था, मेरे ही हक के करोड़ों रुपये लूटकर मुझे सड़क पर ला खड़ा किया था!
मेरे भीतर का सारा भोलापन, सारा संकोच और सारी कमजोरी उसी क्षण भस्म हो गई। मेरी आंखों में अब लाचारी के आंसू नहीं थे, बल्कि अपने हक को वापस छीनने का फौलादी संकल्प था।
मैंने तुरंत शहर के एक बेहद सम्मानित और तेजतर्रार सीनियर एडवोकेट, विक्रम सिंघानिया से संपर्क किया, जो महिला अधिकारों और प्रॉपर्टी फ्रॉड के मामलों के सबसे बड़े माहिर माने जाते थे। मैंने उन्हें अपनी पूरी दास्तान और चाची से मिली जानकारी हूबहू बयां की। वकील सिंघानिया ने जब मामले की गंभीरता को समझा, तो उन्होंने तुरंत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) के उच्च अधिकारियों से संपर्क साधा। फर्जीवाड़े और पावर ऑफ अटॉर्नी के दुरुपयोग के प्राथमिक साक्ष्य देखते ही प्रशासन हरकत में आ गया।
अगली सुबह, ठीक साढ़े नौ बजे।
राजेश शर्मा का पुराना घर। बाहर मूवर्स एंड पैकर्स का एक बड़ा ट्रक खड़ा था। चिराग अपने कुछ रईस दोस्तों के साथ धूप का चश्मा लगाए, हाथ में कॉफी का मग लिए खड़ा था और मजदूरों को निर्देश दे रहा था, “अरे ध्यान से उठाओ इस झूले को! बहुत कीमती लकड़ी है। सीधे मेरे पेंटहाउस के मास्टर बेडरूम की बालकनी में पहुंचाना है।”
पिता राजेश शर्मा दरवाजे पर खड़े सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए मन ही मन अपनी जीत पर मुस्कुरा रहे थे। वे सोच रहे थे कि आज यह झूला उनके कब्जे में आते ही उस पुराने राज का नामोनिशान मिट जाएगा और उनकी झूठी प्रतिष्ठा पर कभी कोई आंच नहीं आएगी।
मजदूरों ने जैसे ही उस भारी सागौन के झूले को उठाने के लिए हाथ लगाया, तभी अचानक एक के बाद एक तीन पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियां और एक सरकारी मजिस्ट्रेट की गाड़ी घर के सामने आकर रुकीं।
पुलिस की गाड़ियों के अचानक आने से पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई। पड़ोसी अपने-अपने घरों की छतों और बालकनियों में जमा हो गए। चिराग के हाथ से कॉफी का मग छूटकर जमीन पर गिर गया। पिता राजेश शर्मा के चेहरे का रंग उड़ गया, सिगरेट उनके होंठों से फिसल गई।
गाड़ी का दरवाजा खुला। पहले एडवोकेट विक्रम सिंघानिया उतरे, उनके पीछे दो सब-इंस्पेक्टर, एक महिला पुलिस अधिकारी और फिर… मैं उतरी।
मेरी चाल में आज कोई झिझक नहीं थी। मैंने सफेद और काले रंग का औपचारिक सूट पहन रखा था, आंखों में अंगारे थे और चेहरा किसी न्याय की देवी की तरह अटल था।
पिता ने घबराते हुए अपनी आवाज को सख्त दिखाने का नाटक किया, “यह… यह सब क्या तमाशा है नेहा? तुम पुलिस को लेकर हमारे घर पर क्यों आई हो? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अपने खानदान की इज्जत को इस तरह सड़क पर नीलाम करने की?”
चिराग भी गुस्से में आगे बढ़ा, “दीदी, अपनी घटिया हरकतों से बाज आओ! तुम क्या साबित करना चाहती हो? क्या तुम्हारे दिमागी संतुलन का इलाज करवाना पड़ेगा?”
एडवोकेट सिंघानिया ने तुरंत आगे बढ़कर एक आधिकारिक कानूनी नोटिस चिराग के सीने पर दे मारा, “अपनी जुबान संभालकर बात कीजिए मिस्टर चिराग शर्मा! हम यहां कोर्ट के स्पेशल सर्च वारंट और मजिस्ट्रेट के आधिकारिक जब्ती आदेश के तहत आए हैं। आपके और आपके पिता के खिलाफ धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 (जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेजों का असली के रूप में इस्तेमाल) और आपराधिक साजिश के तहत गैर-जमानती शिकायत दर्ज हो चुकी है।”
मां सरिता शर्मा घर के अंदर से बदहवास हालत में बाहर भागीं, “अरे यह क्या कह रहे हैं आप? मेरे निर्दोष बेटे और पति ने क्या किया है? यह कलमुंही लड़की अपने ही भाई की तरक्की से जलकर हम पर झूठे इल्जाम लगा रही है!”
मैंने अपनी मां की तरफ देखा तक नहीं। मैंने पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, “सर, वह झूला वही है जिसकी जब्ती का आदेश आपके पास है।”
मजिस्ट्रेट ने पुलिस टीम को आगे बढ़ने का इशारा किया। पुलिसकर्मियों ने मजदूरों को पीछे हटाया और झूले को चारों तरफ से घेर लिया।
पिता राजेश शर्मा का पूरा शरीर कांपने लगा था। वे आगे बढ़कर झूले के सामने खड़े होने की कोशिश करने लगे, “नहीं! यह हमारी निजी संपत्ति है, यह खानदानी फर्नीचर है, आप इसे हाथ नहीं लगा सकते!”
महिला सब-इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज में पिता को एक तरफ धकेल दिया, “कानून के काम में रुकावट डालने की कोशिश मत कीजिए मिस्टर शर्मा, वरना हथकड़ी इसी वक्त लग जाएगी।”
मैं झूले के पास पहुंची। मैंने उस नक्काशीदार सागौन की लकड़ी पर हाथ फेरा। मुझे ऐसा लगा मानो मेरी दादी का हाथ मेरे सिर पर हो और वे कह रही हों—’हिम्मत रख बिटिया, आज तेरे इम्तिहान का आखिरी दिन है।’
मैंने अपनी जेब से वह पीतल की छोटी चाबी निकाली, जो मैंने सुबह ही चाची की मदद से हासिल कर ली थी। मैंने झूले के दाईं तरफ बने मोर की नक्काशी को देखा। जैसा कि चाची ने बताया था, मैंने मोर की दाईं आंख की पीतल की नक्काशी को पूरी ताकत से अंदर की तरफ दबाया।
‘क्लिक’ की एक हल्की सी यांत्रिक आवाज आई।
अचानक झूले के निचले भारी तख्ते के अंदर से एक बेहद गुप्त, छुपा हुआ लकड़ी का दराज बाहर निकल आया!
यह नजारा देखते ही पिता राजेश शर्मा के मुंह से एक चीख निकल गई और वे अपना सिर पकड़कर वहीं घुटनों के बल बैठ गए। चिराग का चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ चुका था, उसके माथे से पसीने की धार बहने लगी थी।
दराज के अंदर लाल मखमली कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी, दादी कल्याणी देवी की मूल रजिस्टर्ड वसीयत, कोर्ट की आधिकारिक मुहर लगे कागजात और उस पुश्तैनी जायदाद के असली मूल दस्तावेज रखे हुए थे!
मजिस्ट्रेट ने अपनी सफेद दस्ताने वाली उंगलियों से उन दस्तावेजों को बाहर निकाला और ध्यान से उनका अध्ययन किया। एडवोकेट सिंघानिया ने तुरंत उस वसीयत को सार्वजनिक रूप से जोर-जोर से पढ़ना शुरू किया।
उस वसीयत में स्वर्गीय कल्याणी देवी के स्पष्ट और अकाट्य शब्द दर्ज थे:
“मैं, कल्याणी देवी, पूरे होशोहवास में यह वसीयत लिख रही हूं। मेरे बेटे राजेश और पोते चिराग ने हमेशा मेरी बेटी जैसी पोती नेहा को प्रताड़ित किया है और उसका शोषण किया है। नेहा ने अपनी पूरी जवानी इस परिवार के कर्ज और भरण-पोषण में लगा दी। इसलिए, मेरी पूरी पुश्तैनी हवेली, दस एकड़ की पैतृक जमीन और मेरे तमाम सोने-चांदी के आभूषणों का 80% (अस्सी प्रतिशत) कानूनी और पूर्ण मालिकाना हक सिर्फ और सिर्फ मेरी पोती नेहा शर्मा का होगा। राजेश और चिराग को केवल 10-10 प्रतिशत का अधिकार मिलेगा। यदि मेरे देहांत के बाद मेरे बेटे या पोते द्वारा नेहा के अधिकारों का हनन करने या किसी फर्जी दस्तावेज के जरिए इस संपत्ति को हड़पने का प्रयास किया गया, तो यह संपूर्ण संपत्ति स्वतः पूरी तरह (100%) नेहा शर्मा के नाम हस्तांतरित हो जाएगी और दोषियों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा।”
वसीयत के शब्द जैसे ही खत्म हुए, वहां खड़े मोहल्ले वालों में फुसफुसाहट और लानत-मलानत का दौर शुरू हो गया।
“अरे राम राम! अपनी ही बेटी के साथ इतना बड़ा फरेब?”
“बेचारी पंद्रह साल तक इस घर के लिए खटती रही और बाप-बेटे ने मिलकर उसके करोड़ों हड़प लिए!”
“कितने गिरे हुए लोग हैं, भगवान ऐसा परिवार किसी को न दे!”
मजिस्ट्रेट ने तुरंत पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया, “दस्तावेज पूरी तरह असली, प्रमाणित और रजिस्टर्ड हैं। बिल्डर के साथ की गई चार करोड़ की डील में प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी, फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी और मनी लॉन्ड्रिंग साबित होती है। इस अवैध पैसे से खरीदी गई संपत्ति—जिसमें चिराग शर्मा का नया पेंटहाउस और 25 लाख की गाड़ी शामिल है—उसे तत्काल प्रभाव से सरकारी कस्टडी में सील किया जाए और इन दोनों आरोपियों को तुरंत हिरासत में लिया जाए!”
पुलिस ने एक झटके में हथकड़ी निकाली और चिराग शर्मा की दोनों कलाइयों में डाल दी। जिस चिराग के गले की सोने की चेन पर कल तक सबको घमंड था, आज उसके हाथों में लोहे की ठंडी हथकड़ियां चमक रही थीं। वह गिड़गिड़ाने लगा, “इंस्पेक्टर साहब, मुझे छोड़ दीजिए! मेरा करियर बर्बाद हो जाएगा, मेरी नौकरी चली जाएगी, मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगा! बाबूजी ने मुझे फंसाया है, सब बाबूजी का प्लान था!”
पिता राजेश शर्मा को जब पुलिस ने पकड़कर खींचा, तो वे रोते हुए मेरे पैरों में गिर पड़े। वे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगे, “नेहा… मेरी बच्ची! मुझे माफ कर दे! मैं तेरा बाप हूं, मुझसे लालच में बहुत बड़ा पाप हो गया। अपने बूढ़े बाप और अपने इकलौते भाई को जेल मत भेज बेटी, हमारी खानदान की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी!”
मां सरिता छाती पीट-पीटकर रोने लगीं, “नेहा, तू इतनी पत्थर दिल कैसे हो सकती है? अपने ही सुहाग और अपनी ही कोख के चिराग को बर्बाद होते देखेगी?”
मैंने एक कदम पीछे हटा लिया। मेरी आंखों में उनके लिए न तो कोई नफरत बची थी और न ही कोई दया। वे मेरे लिए अब सिर्फ कुछ लालची, स्वार्थी अजनबी थे जिन्होंने पंद्रह साल तक मेरी आत्मा को नोंचा था।
मैंने बेहद शांत और अडिग आवाज में कहा, “बाबूजी, जब मैं खौलते हुए दूध से जल रही थी, तब आपको अपनी इस बेटी का दर्द नहीं दिखा। जब पंद्रह साल तक मैं रात-दिन एक करके आपका कर्ज उतार रही थी, तब आपको मेरा खून-पसीना नहीं दिखा। जब आपने धोखे से मेरे दस्तखत चुराए और मेरा हक बेचकर अपने बेटे का महल खड़ा किया, तब आपकी खानदानी इज्जत कहां सो रही थी? आपने मुझे बेटी नहीं, एक बेजुबान जानवर समझा था जिसे जब चाहा इस्तेमाल किया और जब चाहा ठुकरा दिया। आज जो कुछ भी आपके साथ हो रहा है, वह मेरा बदला नहीं है… वह आपके अपने कर्मों का इंसाफ है।”
पुलिस ने चिराग और राजेश शर्मा को घसीटते हुए पुलिस वैन में बैठा दिया और सायरन बजाती हुई गाड़ियां थाने की तरफ रवाना हो गईं। चिराग की चीखें और मां का रोना उस खाली सड़क पर बिखर कर रह गया।
एडवोकेट सिंघानिया ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, “मुबारक हो नेहा जी। उस पूरी चार करोड़ की संपत्ति, बिल्डर से मिलने वाले हर्जाने और दादी के तमाम आभूषणों की आप अब कानूनी तौर पर अकेली और वैध मालकिन हैं। चिराग का वह पेंटहाउस अब कानूनी तौर पर आपके नाम ट्रांसफर होगा या फिर नीलाम होकर पूरी रकम आपके बैंक खाते में आएगी।”
मैंने वकील साहब का धन्यवाद किया।
मैंने मजदूरों को बुलाया और उनसे कहा, “इस झूले को बहुत हिफाजत से उठाइए और मेरे उस 1 BHK फ्लैट में पहुंचाइए।”
शाम ढल चुकी थी।
मेरे छोटे से फ्लैट की बालकनी में अब वह पुराना, नक्काशीदार सागौन का झूला सज चुका था। मैंने उस पर साफ चादर बिछाई और उस पर बैठ गई। हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में दीवाली के बचे हुए तारे चमक रहे थे।
मैंने अपने दोनों जले हुए हाथों को देखा। उन पर अब दवाई की ठंडक थी, लेकिन उससे भी ज्यादा मेरे दिल में वह सुकून था जो सिर्फ अपनी लड़ाई खुद लड़कर जीतने के बाद मिलता है। मैंने पंद्रह साल तक जो खोया था, वह सिर्फ पैसा नहीं था, वह मेरा आत्मसम्मान था। और आज, उस पुराने कागज़ और दादी के आशीर्वाद ने मुझे न सिर्फ मेरा हक वापस दिलाया था, बल्कि मुझे यह भी सिखा दिया था कि जो रिश्ते आपके आंसुओं की कद्र नहीं करते, उन्हें पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाना ही जिंदगी की सबसे बड़ी जीत होती है।
झूला हौले-हौले झूल रहा था, और मैं अपनी जिंदगी की नई, आजाद और स्वाभिमानी सुबह का स्वागत मुस्कुराते हुए कर रही थी।