Story

25 दिन के नवजात को सीने से लगाए सिजेरियन के दर्द में तड़पती पत्नी पर पति ने फेंका नौकरियों का अखबार, कहा-कल से काम पर निकल, वरना घर से दफा हो जा; फिर बैंक स्टेटमेंट के एक खौफनाक राज ने उड़ाए पति और उसकी मालकिन के होश!

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अखबार का वह मुड़ा-तुड़ा, भारी पन्ना हवा में तैरता हुआ सीधे आकर मेरे मुंह पर लगा। कागज का तीखा, नुकीला कोना मेरी बाईं आंख के ठीक नीचे गाल पर चुभ गया। एक हल्की सी जलन हुई, लेकिन उस जिस्मानी चुभन से हजार गुना ज्यादा तीखा दर्द मेरे सीने के भीतर उस जगह हुआ जहां कभी इस शादी पर मेरा अटूट भरोसा धड़कता था। मेरी गोद में सिर्फ पच्चीस दिन का मेरा नन्हा बेटा आरव भूख और बेचैनी से तड़पकर अपनी नन्हीं मुट्ठियां भींचे लगातार रो रहा था।

अभी पूरे एक महीने का समय भी नहीं बीता था जब अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में मेरी सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। पेट के निचले हिस्से पर लगे टांके अभी पूरी तरह सूखे भी नहीं थे। जब भी मैं थोड़ा सा झुकती या करवट लेती, तो पेट के भीतर से एक असहनीय, खिंचती हुई टीस उठती थी। शरीर में इतना खून और ताकत नहीं बची थी कि मैं अपने पैरों पर दस मिनट भी सीधी खड़ी रह सकूं। रातों को जागकर बच्चे को दूध पिलाना, ऑपरेशन के बाद का बुखार और ऊपर से इस घर की अंतहीन उपेक्षा ने मुझे एक जिंदा कंकाल बना दिया था।

“अखबार उठाकर ढंग से अपनी आंखों के सामने लाओ और देखो उसे!” कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई रोहन की कड़क, बेरहम और तल्ख आवाज गूंजी।

रोहन ने अपनी ऑफिस की टाई को एक झटके में ढीला किया और सोफे पर पैर पसारकर बैठ गया। उसने अपना महंगा स्मार्टफोन निकाला और बिना मेरी तरफ एक बार भी देखे, उंगलियों से स्क्रीन स्क्रॉल करने लगा।

मैंने अपनी भीगी, थकी हुई नजरों को नीचे झुकाया। फर्श पर पड़े उस अखबार के क्लासिफाइड पन्ने पर लाल रंग के मोटे मार्कर से पांच-छह विज्ञापनों पर बड़े-बड़े गोल घेरे बनाए गए थे।

टेलीफोन ऑपरेटर (नाइट शिफ्ट), मॉल में बिलिंग कैशियर, प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी में रिसेप्शनिस्ट और पैकेजिंग हेल्पर।

मेरी आंखों में आंसुओं का एक भारी सैलाब उमड़ पड़ा। मैंने अपने कांपते हाथों से बच्चे के सिर को सहलाते हुए बेहद धीमी, गिड़गिड़ाती हुई आवाज में कहा, “रोहन… तुम्हें तो डॉक्टर की बात याद होगी ना? डिस्चार्ज के वक्त सर्जन ने तुमसे साफ-साफ कहा था कि मेरी डिलीवरी में बहुत कॉम्पलीकेशन्स हुए थे। मुझे कम से कम छह से आठ हफ्ते तक पूरी तरह बेड रेस्ट करना है, कोई भारी वजन नहीं उठाना है और तनाव से दूर रहना है।”

“डॉक्टर!” रोहन ने अपनी नजरें फोन से हटाए बिना ही एक घिनौना मुंह बनाया और हवा में हाथ हिलाते हुए तंज कसा, “डॉक्टरों का क्या है? वे तो अपनी फीस बनाने के लिए तुम्हें छह महीने तक बिस्तर पर पड़े रहने की सलाह दे देंगे। यह सब तुम्हारे जैसे आलसी और कामचोर लोगों के बहाने हैं। घर में बैठकर मुफ्त की रोटियां तोड़ने और मेरी कमाई पर मौज उड़ाने के दिन अब लद चुके हैं कविता!”

मेरे सीने में एक खंजर सा उतर गया। “रोहन, मैं कोई मुफ्त की रोटियां नहीं तोड़ रही हूं। यह तुम्हारा भी सगा बेटा है। मेरी मेजर सर्जरी हुई है, पेट के टांकों में आज भी सूजन है। अगर मैं अभी बाहर भागदौड़ करने लगी तो टांके खुल जाएंगे…”

“तो क्या हुआ?” रोहन सोफे से उठकर खड़ा हुआ और एक क्रूर ठहाका लगाते हुए बोला, “गांव-देहात में जाकर देखो, औरतें खेत में बच्चे को जन्म देने के तीन दिन बाद फिर से हल चलाने और घास काटने निकल पड़ती हैं। यह तुम्हारा नखरा सिर्फ मेरे सामने चलता है। जरा शिखा को देखो! मेरी सीनियर टीम लीडर और वाइस प्रेसिडेंट शिखा वर्मा को। बच्चे को जन्म देने के ठीक पंद्रह दिन बाद वह कॉर्पोरेट सूट पहनकर ऑफिस की सबसे बड़ी इंटरनेशनल बोर्ड मीटिंग लीड कर रही थी। उसने कंपनी के लिए पचास करोड़ का नया प्रोजेक्ट हासिल किया। वह है असली औरत—स्मार्ट, महत्वाकांक्षी, ग्लैमरस और आत्मनिर्भर!”

‘शिखा’…

जैसे ही यह नाम रोहन के मुंह से निकला, कमरे की हवा में एक अजीब सा जहरीला भारीपन तैर गया। मेरे हाथ अनजाने में ही वहीं जम गए।

शिखा वर्मा। रोहन की नई मल्टीनेशनल आईटी कंपनी की हेड। पिछले चार महीनों से ऐसा कोई दिन नहीं बीता था जब रोहन के मुंह से शिखा के नाम की आरती न उतारी गई हो। शिखा कितनी फिट है, शिखा कौन से डिजाइनर कपड़े पहनती है, शिखा का परफ्यूम कितना महंगा है, शिखा अपने पति को कैसे उंगलियों पर नचाती है और शिखा हर महीने लाखों का इंसेंटिव कैसे उड़ाती है। गर्भावस्था के आखिरी तीन महीनों में जब मुझे रोहन के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, जब मैं उल्टियों और दर्द से कराहती थी, तब रोहन अक्सर शिखा के साथ देर रात की ‘क्लाइंट डिनर मीटिंग्स’ और ‘अर्जेंट प्रेजेंटेशन’ के नाम पर घर से गायब रहता था।

मैंने अपनी धुंधली आंखों से रोहन के पथराए, घमंडी चेहरे की तरफ देखा। मेरी आवाज में सदियों की कड़वाहट घुल गई, “मैं शिखा नहीं हूं रोहन। न ही मुझे किसी की नकल करनी है। मैं तुम्हारी कानूनी रूप से ब्याही हुई पत्नी हूं और इस वक्त तुम्हारे 25 दिन के बच्चे की मां हूं।”

रोहन मेरे बिल्कुल करीब आया। उसके चेहरे पर नफरत और अहंकार की ऐसी परत चढ़ी थी जिसे देखकर मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही इंसान है जिसके साथ मैंने सात फेरे लिए थे।

उसने अपनी तर्जनी उंगली मेरे चेहरे के सामने तान दी, “मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम क्या हो और तुम्हारी औकात क्या है! मेरी बात अपने इस छोटे से दिमाग में अच्छी तरह बिठा लो—कल सुबह ठीक नौ बजे से तुम इन विज्ञापनों पर फोन करना शुरू करोगी और इंटरव्यू के लिए जाओगी। अगर अगले तीस दिनों के भीतर तुमने कोई नौकरी पकड़कर घर में पैसा लाना शुरू नहीं किया, तो अपने इस बच्चे की पोटली बांधना और मेरे इस घर से हमेशा के लिए दफा हो जाना! मैं अकेला इस तीन कमरे के फ्लैट का किराया, तुम्हारी दवाइयों का बिल और राशन का पूरा खर्च ढोने का ठेकेदार नहीं हूं।”

उसकी बातें किसी गर्म सलाखों की तरह मेरे दिल के आर-पार हो रही थीं। उसकी आंखों में अपने ही खून, उस 25 दिन के मासूम के लिए दया का एक सूखा कतरा भी बाकी नहीं था।

मैंने अपने आंसुओं को रोकते हुए एक अंतिम सवाल पूछा, “और इस बच्चे का क्या होगा रोहन? जब मैं आठ-दस घंटे बाहर नौकरी करूंगी, तो इसे दूध कौन पिलाएगा? इसकी देखभाल कौन करेगा?”

“मुझे इससे कोई मतलब नहीं है,” रोहन ने बेहद ठंडे और लापरवाह लहजे में कहा। “दिन भर इसे सुलाने के लिए कोई ड्रॉप्स दे देना। या फिर अपने उस कंगाल मायके से अपनी मां को यहां बुला लो जो मुफ्त में इसकी दाई बन सके। मुझे सिर्फ महीने की पहली तारीख को घर के खर्च में तुम्हारी तरफ से पचास हजार रुपये का योगदान चाहिए। बस!”

इतना कहकर रोहन अपने जूते फर्श पर पटकता हुआ किचन की तरफ बढ़ गया ताकि अपने लिए ब्लैक कॉफी बना सके।

शादी के पिछले दो सालों का पूरा मंजर मेरी आंखों के आगे किसी खौफनाक फिल्म की तरह घूमने लगा। जब दो साल पहले मेरी शादी रोहन से हुई थी, तब मेरे पिता ने अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी, अपनी प्रोविडेंट फंड की पाई-पाई जोड़कर मुझे पांच लाख रुपये का चेक मेरे स्त्रीधन और सुरक्षा के रूप में दिया था। शादी से पहले मैं खुद एक प्रतिष्ठित लॉजिस्टिक्स कंपनी में सीनियर अकाउंट्स एग्जीक्यूटिव के पद पर काम करती थी। मेरी अपनी पांच साल की नौकरी की मेहनत की गाढ़ी बचत के तीन लाख रुपये मेरे पास थे।

शादी के ठीक दो महीने बाद रोहन ने बड़े प्यार से, मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “कविता, हम दोनों अब एक हैं। हमारे बीच ‘तुम्हारा’ और ‘मेरा’ जैसा क्या? चलो हम दोनों मिलकर एक जॉइंट सेविंग्स अकाउंट खोलते हैं। तुम्हारी यह आठ लाख की कुल बचत उसमें सुरक्षित रहेगी और भविष्य में जब हम अपना खुद का लग्जरी आशियाना खरीदेंगे, तो यह रकम हमारे सपनों के घर की डाउन पेमेंट बनेगी।”

मैंने अपने भोलेपन में, अपने पति को अपना सब कुछ मानकर वह आठ लाख रुपये उस जॉइंट अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए थे। जब मैं गर्भवती हुई, तो रोहन ने ही जिद करके मेरी नौकरी यह कहकर छुड़वा दी थी कि ‘मेरी पत्नी को अब सिर्फ आराम करना चाहिए, मैं बहुत कमाता हूं।’ और आज… वही इंसान मेरे सामने मुझे एक लावारिस कुत्ते की तरह घर से निकालने की धमकी दे रहा था!

रोहन किचन में कॉफी मशीन चला रहा था।

मैंने अपने दिल पर पत्थर रखकर, अपने बच्चे को धीरे से मुलायम गद्दे पर लिटाया और उसके ऊपर नर्म चादर डाल दी। मैंने दीवार का सहारा लेकर खुद को खड़ा किया। टांकों में तेज खिंचाव हुआ, लेकिन मैंने अपने होंठ भींच लिए। मैंने अलमारी के सबसे भीतरी हिस्से से अपनी पुरानी कॉलेज के दिनों की निजी डायरी निकाली।

उस डायरी के आखिरी पन्ने पर एक नंबर लिखा था—नेहा कश्यप।

नेहा मेरी बचपन और कॉलेज की सबसे पक्की सहेली थी। आज वह दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेहद जानी-मानी, निडर और तेजतर्रार क्रिमिनल और फैमिली लॉयर बन चुकी थी।

मैंने तुरंत अपना फोन उठाया, व्हाट्सएप खोला और नेहा को एक संक्षिप्त संदेश भेजा: “नेहा, मुझे तुम्हारी कानूनी मदद की बेहद सख्त जरूरत है। मेरी जिंदगी और मेरे 25 दिन के बच्चे का भविष्य दांव पर है। क्या कल सुबह तुमसे तुम्हारे ऑफिस में मिल सकती हूं?”

मैसेज भेजते ही स्क्रीन पर डबल ब्लू टिक हुआ और दो सेकंड के भीतर नेहा का परेशान संदेश आया: “कविता! हे भगवान, सब ठीक तो है ना? तुम्हारी तो अभी डिलीवरी हुई थी, आवाज में इतनी घबराहट क्यों है? क्या उस रोहन ने फिर कुछ किया है?”

मैंने अपनी उंगलियों को तेजी से चलाया: “कल सुबह दस बजे मैं तुम्हारे कड़कड़डूमा कोर्ट वाले चैंबर में आ रही हूं। मुझे बस इंसाफ चाहिए नेहा।”

नेहा का तुरंत जवाब आया: “तुम बिल्कुल चिंता मत करो कविता। कल सुबह ठीक दस बजे पहुंचो। मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी।”

मैंने चैट को पूरी तरह क्लियर किया, फोन को साइलेंट मोड पर डाला और गहरी सांस ली।

तभी रोहन हाथ में कॉफी का मग लिए किचन से बाहर निकला। उसने सोफे पर बैठते हुए एक घमंडी नजर मुझ पर डाली, “कुछ सोचा फिर? या कल सुबह का तमाशा देखना है?”

मैंने अपने चेहरे के भावों को पूरी तरह सपाट कर लिया। मैंने अपनी आवाज में झूठी लाचारी लाते हुए कहा, “हां रोहन… मैं कल सुबह से ही अपने स्तर पर नौकरी ढूंढने की कोशिश करूंगी।”

रोहन के चेहरे पर एक कुटिल, विजयी मुस्कान फैल गई। उसने कॉफी की चुस्की लेते हुए कहा, “गुड। अक्ल ठिकाने आने में देर नहीं लगी। समझदारी इसी में है कि जो मैं कहूं, चुपचाप वही करो।”

रोहन अपने लैपटॉप पर कोई प्रेजेंटेशन खोलने में व्यस्त हो गया।

मैं कमरे के एक अंधेरे कोने में आई और अपने मोबाइल पर हमारे उस जॉइंट सेविंग्स अकाउंट का नेट बैंकिंग ऐप खोला।

मेरे दिमाग में चल रहा था कि अगर मुझे बच्चे को लेकर अलग होना पड़ा, अगर मुझे इस जालिम इंसान के चंगुल से निकलना पड़ा, तो मेरे अपने वो आठ लाख रुपये मेरे और मेरे बच्चे के भरण-पोषण के लिए काफी होंगे। मैं किसी किराए के छोटे मकान में रहकर अपना और अपने बेटे का गुजारा कर लूंगी।

मैंने ऐप में अपना यूजरनेम और पासवर्ड डाला। ऑथेंटिकेशन का कोड आया और मुख्य डैशबोर्ड खुला।

लेकिन जैसे ही स्क्रीन पर अकाउंट बैलेंस का पेज सामने आया, मेरे सीने की धड़कनें एक सेकंड के लिए पूरी तरह थम गईं। मेरी आंखों के सामने घुप अंधेरा छाने लगा, मेरा पूरा बदन पसीने से भीग गया।

स्क्रीन पर बड़े-बड़े सुनहरे अक्षरों में उपलब्ध शेष राशि (Available Balance) दिख रही थी: ₹ 12,480.50

बारह हजार चार सौ अस्सी रुपये!

मेरे दिमाग में धमाके होने लगे। मेरे पिता के खून-पसीने की कमाई के पांच लाख और मेरी जिंदगी भर की बचत के तीन लाख—कुल आठ लाख रुपये का वह विशाल फंड आखिर कहां गायब हो गया?

मेरी कांपती उंगलियों ने तुरंत ‘डिटेल्ड ई-स्टेटमेंट’ के विकल्प पर क्लिक किया। मैंने पिछले बारह महीनों का पूरा कच्चा-चिट्ठा पीडीएफ फॉर्मेट में डाउनलोड किया।

जैसे ही स्टेटमेंट खुला, स्क्रीन पर लाल रंग के डेबिट ट्रांजेक्शनों की एक अंतहीन, खौफनाक दास्तान मेरी आंखों के सामने तैरने लगी।

रोहन ने पिछले आठ महीनों में, यानी जब मैं गर्भावस्था के गंभीर दौर से गुजर रही थी और जब मेरी डिलीवरी होने वाली थी, तब उस जॉइंट अकाउंट से एक-एक करके लाखों रुपये निकाले थे।

  • 15 जून: ₹ 1,50,000 — डायरेक्ट ट्रांसफर टू ‘शिखा वर्मा’ (रिमार्क: पर्सनल लोन रिटर्न)
  • 02 जुलाई: ₹ 1,00,000 — डायरेक्ट ट्रांसफर टू ‘शिखा वर्मा’ (रिमार्क: डायमंड ब्रेसलेट शेयर)
  • 18 अगस्त: ₹ 2,25,000 — तनिष्क ज्वैलरी बुटीक (क्रेडिट कार्ड पेमेंट – सॉलिटेयर रिंग)
  • 24 सितंबर: ₹ 85,000 — ताज एग्जॉटिका, गोवा (लग्जरी विला वीकेंड बुकिंग)
  • 10 अक्टूबर: ₹ 1,15,000 — डिजाइनर बुटीक, साकेत (लेडीज गाउन और एसेसरीज)
  • 05 नवंबर (मेरी डिलीवरी से ठीक 10 दिन पहले): ₹ 1,00,000 — डायरेक्ट ट्रांसफर टू ‘शिखा वर्मा’!

मेरे हाथ इतनी बुरी तरह कांपने लगे कि फोन मेरे हाथ से छूटकर बिस्तर पर गिर गया।

मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ सी ठंडक दौड़ गई। जिस वक्त मैं सरकारी और सस्ते प्राइवेट अस्पतालों में डिलीवरी के खर्चों का हिसाब लगा रही थी, जिस वक्त मैं अपने बच्चे के लिए सौ-सौ रुपये के लंगोट और कपड़े बचा-बचाकर खरीद रही थी, जिस वक्त यह इंसान मुझे पैसों की तंगी का रोना रोकर ताने मारता था—उस पूरे वक्त यह मेरी जिंदगी भर की पूंजी अपनी उस अमीर, घमंडी मालकिन शिखा वर्मा के ऐशो-आराम, महंगे होटलों, हीरों के गहनों और अय्याशियों पर लुटा रहा था!

यह सिर्फ बेवफाई नहीं थी। यह मेरे भरोसे का कत्ल था, यह एक मासूम नवजात के मुंह से उसका निवाला छीनने की सोची-समझी डकैती थी!

मैंने अपने आंसुओं को अपनी पलकों के पीछे ही दबा दिया। मेरी आंखों में अब लाचारी का एक कतरा भी नहीं बचा था; वहां सिर्फ बदले, न्याय और अपने बच्चे के हक को वापस छीनने का फौलादी अंगारा धधक रहा था।

मैंने बिना एक पल की देरी किए उस पूरे बारह महीने के बैंक स्टेटमेंट की तीन अलग-अलग पीडीएफ कॉपियां बनाईं। एक कॉपी अपने गुप्त पर्सनल गूगल ड्राइव पर अपलोड की, दूसरी कॉपी नेहा के व्हाट्सएप पर भेजी और तीसरी कॉपी को अपने पास सुरक्षित रख लिया।

तभी बाहर से रोहन की भारी, रौबदार आवाज आई, “कविता! अरे सुनती हो? जरा जल्दी से मेरा लेदर वॉलेट, कार की चाबियां और मेरी वह ब्लू सिल्क शर्ट अलमारी से निकालकर यहां लाओ! कल सुबह शिखा के साथ एक बहुत बड़ी ब्रेकफास्ट स्ट्रैटेजी मीटिंग है, मुझे देर नहीं होनी चाहिए।”

मैंने तेजी से अपने आंचल से अपनी आंखें पोंछीं, अपने कांपते होंठों को स्थिर किया और स्क्रीन लॉक की।

“बस दो मिनट रोहन… मैं अभी लेकर आती हूं,” मैंने कमरे के भीतर से ऐसी शांत और सहज आवाज में जवाब दिया मानो कुछ हुआ ही न हो।

अगली सुबह ठीक नौ बजे।

रोहन सज-धजकर, महंगा परफ्यूम छिड़ककर, अपनी कार लेकर सीटी बजाते हुए घर से निकल गया। उसने जाते-जाते दरवाजे से फिर चिल्लाकर कहा था, “याद रखना, शाम को जब मैं लौटूं तो तुम्हारे हाथ में किसी नौकरी का अपॉइंटमेंट लेटर होना चाहिए, वरना रात का खाना बाहर ही ढूंढना!”

जैसे ही उसकी कार की आवाज गली से ओझल हुई, मैंने अपनी एक पुरानी, भरोसेमंद पड़ोसन चाची, जिनका अपना भरा-पूरा परिवार था, उनसे हाथ जोड़कर विनती की कि वे दो घंटे के लिए मेरे सोए हुए बच्चे पर नजर रखें। मैंने अपने शरीर के दर्द को भूलकर एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी, अपने जरूरी दस्तावेज, शादी का एल्बम, बैंक पासबुक और गहनों के बिल एक बैग में रखे और एक कैब बुक करके सीधे कड़कड़डूमा कोर्ट पहुंच गई।

नेहा का चैंबर कानूनी किताबों और फाइलों से भरा हुआ था। जब नेहा ने मुझे देखा—मेरी पीली पड़ चुकी रंगत, मेरी आंखों के नीचे के काले घेरे और मेरे चलने का लड़खड़ाता अंदाज—तो वह अपनी कुर्सी से उठकर दौड़ी आई और उसने मुझे गले से लगा लिया।

“कविता! तेरी यह हालत किसने कर दी?” नेहा की आंखों में आंसू आ गए।

मैंने बिना कुछ बोले अपने बैग से वे सारे बैंक स्टेटमेंट्स, मेडिकल रिपोर्ट्स और अपनी डिलीवरी के पेपर्स निकाल कर टेबल पर रख दिए। मैंने नेहा को पिछले आठ महीनों की एक-एक घिनौनी हकीकत, कल रात का वह अखबार फेंकने का वाकया और रोहन द्वारा दी गई धमकियों की पूरी दास्तान कह सुनाई।

जैसे-जैसे नेहा उन बैंक स्टेटमेंट्स और शिखा वर्मा के नाम पर किए गए लाखों के ट्रांसफर्स को देखती गई, उसकी त्योरियां चढ़ती गईं और उसका चेहरा गुस्से से लाल होता गया।

उसने जोर से फाइल को टेबल पर पटका, “यह सिर्फ घरेलू हिंसा नहीं है कविता! यह भारतीय कानून के तहत एक गंभीर, संगीन और गैर-जमानती वित्तीय और वैवाहिक अपराध है। रोहन ने तुम्हारे साथ जो किया है, वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) और IPC की कई धाराओं के तहत आता है।”

नेहा ने अपनी कलम उठाई और डायरी पर धाराएं लिखना शुरू किया: “धारा 406 (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट – स्त्रीधन का गबन): तुम्हारे पिता द्वारा दिया गया पांच लाख का चेक और तुम्हारी बचत पूरी तरह तुम्हारा ‘स्त्रीधन’ है। पति या ससुराल वाले उस पर एक पैसा भी बिना तुम्हारी मर्जी के खर्च नहीं कर सकते। उसने इसे चुराकर अपनी सहकर्मी पर उड़ाया है। धारा 420 (धोखाधड़ी और जालसाजी): जॉइंट अकाउंट का दुरुपयोग करके तुम्हें अंधेरे में रखकर फंड्स का डायवर्जन। धारा 498A और घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act): डिलीवरी के 25 दिन बाद एक नई मां को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना, भूखा रखना और घर से निकालने की धमकी देना।”

नेहा ने आगे झुकते हुए कहा, “और सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता जानती हो क्या है कविता? रोहन और शिखा जिस मल्टीनेशनल कंपनी ‘ग्लोबल टेक सॉल्यूशंस’ में काम करते हैं, वह एक अमेरिकी कॉर्पोरेट कंपनी है। उन कंपनियों में ‘पॉश’ (POSH – प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरासमेंट), कॉर्पोरेट एथिक्स और ‘एंटी-फ्रॉड एंड कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ की ऐसी सख्त नीतियां होती हैं कि अगर किसी सीनियर एग्जीक्यूटिव पर वित्तीय गबन, अनैतिक संबंधों के जरिए कंपनी के पैसे का दुरुपयोग या अपने जूनियर के साथ मिलकर फ्रॉड करने का मामला साबित हो जाए, तो कंपनी उन्हें एक सेकंड में टर्मिनेट करके ब्लैकलिस्ट कर देती है!”

“अब हमें क्या करना होगा नेहा?” मैंने अपनी मुट्ठियां भींचते हुए पूछा।

नेहा के होंठों पर एक शातिर, पेशेवर और आत्मविश्वासी मुस्कान तैर गई। “अब हम कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगे जिससे रोहन को संभलने का मौका मिले। हम सीधे उस जगह वार करेंगे जहां उसका घमंड सबसे ऊंचा उड़ रहा है। कल शुक्रवार है ना? मुझे पता चला है कि कल शाम को उनकी कंपनी का ‘एनुअल कॉर्पोरेट गाला और अचीवर्स अवॉर्ड्स नाइट’ दिल्ली के हयात रीजेंसी होटल में होने जा रहा है। वहां कंपनी के भारत और अमेरिका के सारे टॉप डायरेक्टर्स, बोर्ड मेंबर्स और पूरी मीडिया मौजूद रहेगी। रोहन और शिखा को वहां ‘बेस्ट टीम ऑफ द ईयर’ का अवॉर्ड मिलने वाला है…”

नेहा ने मेरी आंखों में देखा, “हम वहीं चलेंगे कविता। कानूनी नोटिस, पुलिस प्रोटेक्शन और सबूतों के उस बवंडर के साथ… जो इन दोनों के उस झूठे, मक्कार तिलिस्म को पूरी दुनिया के सामने तार-तार कर देगा!”

अगले चौबीस घंटे मेरे जीवन के सबसे लंबे और तनावपूर्ण घंटे थे।

नेहा ने दिन-रात एक करके दिल्ली महिला आयोग (DCW), स्थानीय पुलिस स्टेशन की क्राइम अगेंस्ट विमेन (CAW) सेल, और उस मल्टीनेशनल कंपनी के ग्लोबल एथिक्स बोर्ड और इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी (ICC) को एक सीलबंद, आधिकारिक कानूनी शिकायत ईमेल और रजिस्टर्ड डाक के जरिए भिजवा दी। साथ ही, अदालत से भरण-पोषण, बच्चे की अंतरिम कस्टडी और स्त्रीधन की तत्काल रिकवरी के लिए आपातकालीन याचिका तैयार कर ली।

शुक्रवार की शाम, रात के आठ बजे।

हयात रीजेंसी का भव्य बॉलरूम रोशनी से जगमगा रहा था। सैकड़ों कॉर्पोरेट अधिकारी, विदेशी डेलिगेट्स और मीडिया के लोग शैंपेन के ग्लास थामे हंस रहे थे। मंच के पीछे बड़े-बड़े एलईडी स्क्रीन्स पर शिखा वर्मा और रोहन की तस्वीरें चमक रही थीं।

रोहन काले रंग के डिजाइनर टक्सीडो में अपने दोस्तों के बीच खड़ा शेखी बघार रहा था। उसके पास ही शिखा वर्मा एक बैकलेस सिल्क गाउन पहने, अपने गले में वही 2.25 लाख का सॉलिटेयर हीरों का हार लटकाए इतरा रही थी जो मेरे पैसों से खरीदा गया था।

“थैंक यू रोहन,” शिखा ने अपनी शैंपेन का ग्लास रोहन के ग्लास से टकराते हुए धीमी आवाज में कहा। “तुम्हारा वह आइडिया कमाल का था। उस बेवकूफ औरत के अकाउंट से पैसे निकाल कर हमने जो यह नया प्रोजेक्ट फंड दिखाया, उसी की बदौलत आज हमें यह ग्लोबल रिकॉग्निशन मिल रहा है। बस अब जल्दी से उसे तलाक देकर रास्ते से हटाओ, फिर हम दोनों मिलकर कंपनी का सिंगापुर वाला रीजन संभालेंगे।”

रोहन ने गर्व से अपनी कॉलर ठीक की, “अरे शिखा, तुम उस गंवार की चिंता मत करो। आज सुबह ही मैंने उसे घर से निकालने का पूरा इंतजाम कर दिया है। वह तो इस वक्त किसी कॉल सेंटर के बाहर नौकरी की भीख मांग रही होगी। उसकी औकात मेरे जूतों के बराबर भी नहीं है।”

तभी अचानक मंच के मुख्य स्पीकर्स से संगीत की आवाज अचानक बंद हो गई।

पूरे हॉल में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

बॉलरूम के मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों भारी दरवाजे खुले।

वहां से अंदर कदम रखा मैंने।

मैंने गहरे लाल रंग की एक शालीन, पारंपरिक बनारसी साड़ी पहन रखी थी। मेरे सीने से चिपका हुआ मेरा 25 दिन का बेटा आरव एक सुरक्षित बेबी-कैरियर में सो रहा था। मेरे दाईं तरफ हाईकोर्ट की सीनियर एडवोकेट नेहा कश्यप थीं, और मेरे ठीक पीछे दिल्ली पुलिस की दो महिला सब-इंस्पेक्टर, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और कंपनी के भारत मामलों के वाइस प्रेसिडेंट (लीगल) मिस्टर डेविड फर्नांडीज चल रहे थे!

हॉल में मौजूद सैकड़ों लोगों की नजरें हम पर टिक गईं। फुसफुसाहटें शुरू हो गईं।

रोहन के हाथ से शैंपेन का ग्लास छूटकर संगमरमर के फर्श पर गिरा और चकनाचूर हो गया। शिखा का चेहरा एक सेकंड में पीला पड़ गया।

“क… कविता?!” रोहन के मुंह से एक सूखी, फटी हुई आवाज निकली। “तुम… तुम इस बच्चे को लेकर यहां क्या कर रही हो? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? सिक्योरिटी! सिक्योरिटी कहां है? इस पागल औरत को बाहर निकालो!”

“सिक्योरिटी अपनी जगह पर ही रहेगी मिस्टर रोहन मेहरा!” मिस्टर डेविड फर्नांडीज की भारी, आधिकारिक आवाज माइक पर गूंजी।

कंपनी के लीगल हेड मिस्टर फर्नांडीज सीधे मंच की तरफ बढ़े। उनके चेहरे पर सख्त नाराजगी थी। उन्होंने पूरे हॉल के सामने घोषणा की, “आज का यह अवॉर्ड्स समारोह तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाता है। कंपनी के ग्लोबल एथिक्स बोर्ड और विमेन प्रोटेक्शन सेल को मिस्टर रोहन मेहरा और मिस शिखा वर्मा के खिलाफ गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी, कॉर्पोरेट फंड्स के दुरुपयोग और भारतीय दंड संहिता के तहत घरेलू हिंसा व आपराधिक गबन की आधिकारिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं।”

पूरे हॉल में जैसे भूचाल आ गया। कैमरे चमकने लगे, मीडिया वाले आगे बढ़ने लगे।

नेहा कश्यप ने तुरंत आगे बढ़कर अरेस्ट वारंट और कोर्ट का अंतरिम जब्ती आदेश रोहन और शिखा के चेहरों के सामने लहराया।

“मिस्टर रोहन मेहरा,” नेहा की बुलंद आवाज पूरे बॉलरूम में गूंज उठी, “आप अपनी जिस 25 दिन पहले सिजेरियन डिलीवरी से गुजरी पत्नी को घर से निकालने और अखबार फेंककर धमकाने का काम कर रहे थे, उस पत्नी के आठ लाख रुपये के स्त्रीधन की डकैती का पूरा कच्चा-चिट्ठा अब पुलिस और आपकी इस कंपनी के पास है!”

नेहा ने बड़े स्क्रीन की तरफ इशारा किया।

वहां लगी विशाल एलईडी स्क्रीन पर उन बैंक स्टेटमेंट्स की प्रतियां एक-एक करके फ्लैश होने लगीं!

स्क्रीन पर साफ-साफ दिख रहा था कि कैसे रोहन ने अपनी पत्नी के जॉइंट अकाउंट से पैसे चुराकर शिखा वर्मा के निजी अकाउंट में भेजे, कैसे तनिष्क शोरूम से वह हीरों का हार खरीदा गया जो इस वक्त शिखा के गले में झूल रहा था, और कैसे ताज गोवा के लग्जरी विला की बुकिंग उसी चोरी के पैसे से की गई थी!

शिखा ने घबराकर अपने गले के हार को अपने हाथों से छिपाने की कोशिश की। वह हकलाते हुए चिल्लाई, “यह… यह सब बकवास है! यह मेरा निजी मामला है! रोहन ने मुझे वो पैसे अपनी मर्जी से दिए थे, मुझे नहीं पता था कि वो पैसे उसकी पत्नी के हैं!”

“झूठ मत बोलो शिखा वर्मा!” मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। मेरी आवाज में आज कोई आंसू नहीं थे, कोई कमजोरी नहीं थी। मेरी आंखों में जलती हुई फौलादी आग ने शिखा और रोहन दोनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

“तुम एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक और कॉर्पोरेट महिला होने का ढोंग करती हो ना?” मैंने सीधे शिखा की आंखों में देखते हुए कहा। “तुम्हें दूसरी औरतों को यह ज्ञान देने में बहुत मजा आता था कि डिलीवरी के पंद्रह दिन बाद काम पर लौटना चाहिए? लेकिन तुम्हारा यह सारा ग्लैमर, तुम्हारा यह झूठा रुतबा और तुम्हारे गले का यह हार एक बेबस, नवजात की मां के खून-पसीने की चोरी पर टिका हुआ था! तुम्हें शर्म आनी चाहिए कि तुमने अपने ही सहकर्मी के घर को उजाड़ने और एक 25 दिन के मासूम के मुंह से उसका हक छीनने में जरा भी हिचकिचाहट महसूस नहीं की!”

महिला सब-इंस्पेक्टर ने बिना किसी देरी के आगे बढ़कर शिखा के गले से वह सवा दो लाख का हीरों का हार एक झटके में खींचकर उतार लिया और उसे सीलबंद एविडेंस बैग में डाल दिया।

शिखा फूट-फूटकर रोने लगी, “प्लीज… ऐसा मत करो! मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी!”

मिस्टर फर्नांडीज ने कड़क आवाज में फैसला सुनाया, “मिस शिखा वर्मा और मिस्टर रोहन मेहरा, कंपनी के कोड ऑफ कंडक्ट, फाइनेंशियल फ्रॉड और सेक्सुअल मिसकंडक्ट की धाराओं के तहत आप दोनों को इसी क्षण तत्काल प्रभाव से नौकरी से बर्खास्त (Terminated) किया जाता है। आपकी सारी ग्रेच्युटी, पीएफ और पेंडिंग सैलरीज को फ्रीज कर दिया गया है ताकि कोर्ट के आदेशानुसार पीड़िता के आठ लाख रुपये की रिकवरी की जा सके!”

यह सुनते ही रोहन के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसकी नौकरी, उसका करियर, उसका घमंड और उसका पूरा वजूद एक पल में राख के ढेर में तब्दील हो चुका था।

पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अपनी कमर से ठंडी लोहे की हथकड़ी निकाली और रोहन की दोनों कलाइयों में ‘ठक’ की आवाज के साथ डाल दी।

रोहन घुटनों के बल मेरे पैरों में गिर पड़ा। वह रोते हुए, हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, “कविता… मुझे माफ कर दो! मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया। मैं उस शिखा के हुस्न और पैसों के लालच में अंधा हो गया था। मुझे जेल मत भेजो कविता! मैं तुम्हारा और अपने बेटे का जीवन भर गुलाम बनकर रहूंगा, मैं तुम्हारे पैरों में पड़ा रहूंगा… मुझे बचा लो!”

मैंने अपने कदम पीछे खींच लिए। मैंने अपने बेटे आरव के चेहरे को देखा जो मेरी गोद में चैन से सो रहा था।

मैंने बेहद ठंडी, स्थिर और अडिग आवाज में रोहन से कहा, “रोहन, जब तुमने उस अखबार को मेरे चेहरे पर फेंका था, जब तुमने मेरे 25 दिन के मासूम बच्चे की भूख की परवाह किए बिना मुझे सड़क पर फेंकने की धमकी दी थी, तब तुमने अपनी पत्नी को नहीं, अपने ही हाथों से अपने सुहाग और अपने परिवार को हमेशा के लिए मार दिया था। जो इंसान अपने नवजात बच्चे का सगा नहीं हो सका, वह इस दुनिया में किसी का नहीं हो सकता। तुम मेरे पति होने के लायक कभी थे ही नहीं। अब कानून और जेल की सलाखें ही तुम्हारा असली घर हैं।”

पुलिस वाले रोहन और शिखा को मीडिया के कैमरों और सैकड़ों लोगों की थू-थू के बीच घसीटते हुए बाहर खड़ी पुलिस वैन की तरफ ले गए।

बॉलरूम के उस शानदार हॉल में अब न्याय की एक पावन खामोशी छाई हुई थी।

नेहा ने आगे बढ़कर मेरे कंधे पर हाथ रखा, “जीत तुम्हारी हुई है कविता। कोर्ट के आदेश से तुम्हारे पूरे आठ लाख रुपये ब्याज और पचास लाख के हर्जाने के साथ रोहन की संपत्ति और सैलरी अकाउंट से तुम्हें वापस मिलेंगे। बच्चे की पूरी कस्टडी हमेशा के लिए तुम्हारे पास रहेगी।”

मैंने अपनी सहेली नेहा को दिल से धन्यवाद दिया।

होटल के उस विशाल कांच के दरवाजे से बाहर निकलकर जब मैं सड़क पर आई, तो सुबह की ठंडी, ताजी और पावन हवा मेरे चेहरे को छू गई। पूर्व दिशा से सूरज की सुनहरी, चमचमाती किरणें अंधेरे को चीरती हुई आसमान में फैल रही थीं।

मेरी गोद में सोए हुए नन्हे आरव ने अपनी नन्हीं आंखें खोलीं और पहली बार अपनी मां के चेहरे को देखकर एक प्यारी सी, मासूम मुस्कान बिखेर दी।

मैंने अपने आंसुओं को पोंछते हुए अपने बेटे को अपने सीने से और कसकर लगा लिया। मेरे जिस्म का दर्द अब पूरी तरह गायब हो चुका था। मुझे पता था कि आने वाला रास्ता आसान नहीं होगा, लेकिन अब मेरे पास मेरा आत्मसम्मान था, मेरे अधिकार थे और अपने बच्चे को एक स्वाभिमानी, सच्चे और निडर इंसान के रूप में पालने की फौलादी ताकत थी। एक मां अपने बच्चे के हक के लिए लड़ी थी, और उस नई सुबह में उसकी जीत का सूरज पूरी शान से चमक रहा था।

 

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